वादों के स्वादिष्ट व्यंजनों का लुफ्त उठाते रहिए (व्यंग्य)

(चुनावी माहौल आ गया। मेहनत-मसक्कत, वादों-प्रतिवादों का समय है। ऐसे में नेताओं को गरीब-अशक्त जनता, भीड़ जुटाने वाली जनता और विरोधियों का मुँह दबाने वाली जनता की सक्त जरुरत पड़ती है । तभी तो नेता लोग बहुत खूबसूरती से अपने असलियत को छिपाते हुए ,खूनपसीना बहाते हुए जनता के सम्पर्क में जा रहे है। ताकि वे जनता को अपने पक्ष में कर सकें।)

वादों के स्वादिष्ट व्यंजनों का लुफ्त उठाते रहे
भूखी गरीब जनता का पेट आजकल राजनीतिक नेतागण अपने वादों के स्वादिष्ट व्यंजनों के हसीन सपनों और लच्छेदार बातों से से खूब भर और संतुष्ट कर रहे है। किसी के पास रोजगार का अवसर है, तो किसी के पास कर्ज माफी, आवास की सुविधा, महगांई भत्ता की। जनता के जरुरतों का भंडार खाली है। उसे अपने जरूरत का बहुत सामग्री चाहिए, तभी तो जरुरतमंद जनता की आँखें दिन-रात टीवी पर और कान उसके आवाज पर घुमती हुई टिकी रहती है कि कौन सा पार्टी का मुखिया कितना मलाईदार व्यंजन पेश करता है। तभी तो जनता का मन मयूर चकरघिन्नी की तरह इस चक्कर में ज्यादा नाचता और घुमता रहता है कि ... किसकी मलाई ज्यादा  रसदार निकलती है, ताकि वह उसके ही हिस्से में अपना बहुमूल्य वोट डाल सकें।
उम्मीद की आस पर नजरें गड़ाए जनता का दिल तो पागल होता है , इसलिए उस पर उम्मीद का जुनून सवार रहता है कि अपने भविष्य को सुधारने के लिये वह किस पार्टी के नेता के सर पर  जीत का सेहरा बाँधें ताकि उसका भविष्य सुधरने के लिए सुरक्षित हाथों में जाएं। और वह नेता उसके उम्मीदों के आस पर खरा उतरें। नेता को समझना,बूझना और तौलना भी जरुरी होता है, तभी तो सही नेता के चुनाव के लिए वह प्रत्येक दल के नेता का भाषण सुनने के लिए भूखा-प्यासा  मैदान की ओर दौड़ पड़ता है। और इंतजारी के आस में नजरें गड़ायें रहता है , ताकि वह अपने नेता के नेक इरादें को समझने बूझने में नाकाम साबित न हो जाएं।
जनता को नेतागण मूर्ख समझने की भूल करते है।  लेकिन जागरूक जनता भी कम चालाक  नहीं है, यदि वह किसी एक पार्टी पर अपना मंतव्य बनाता भी है , तब भी वह दूसरें के मंतव्य को बारीकी से समझने के लिए सतर्क रहता है कि कहीं दूसरी पार्टी उससे बड़ी वादों की पिटारी वाली रसमलाई न ला दे और वह दूर खड़ा मुँह बायें ताकता और हाथ मलता न रह जाये। इसलिए जागरूक जनता आज भी बौखलाई हुई डगमगाती सी खड़ी है कि मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं। और जाऊं भी तो उधर ही जाऊं जहाँ ठोस आधार वाली भूमि नजर आयें। और उसके द्वारा चुना गया नेता सबल ,सुघड़ और सशक्त विचारधारा वाला हो।ताकि उसे बाद में पछताना न पड़े ।
जनता जानती है कि वह जिसे एक बार गद्दी पर बैठा देगा, वह पाँच साल गद्दी पर बैठकर अपनी धौंस जमाता रहेगा, फिर वह अच्छा करता है या बुरा... वह इसके लिए स्वतंत्र है। उसे फिर कोई गद्दी से उतार नहीं सकता है।
     मलाईदार व्यंजन के फिराक में सिर्फ जनता ही नहीं है, बल्कि बड़े-बड़े पूंजीपति, रसूकदार व्यक्ति, फिल्मी सितारे और गुंडे-मवाली भी राजनीति  के ग्लैमर से अछूते नहीं रह पाते है। इस फिराक में  वे भी तन-मन-धन से जुट जाते है कि ताकि उन्हेँ भी चुनाव में रसमलाई वाला रसूखदार पद पाने का मौका हाथ लग जायें । तभी तो उनके भी पॉच साल के सुख-चैन का गारंटी पक्का हो जायें। 
चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल बना है। लोग बेचैन है,परेशान है, समर युद्ध में खुद को झौकने को तैयार है। इसके लिए चाहे दोस्त को दुश्मन और दुश्मन को दोस्त बनाना पड़े तो बना लेंगे। सगे-सम्बंधियों को विरोध में या विरोधी पार्टी में देखना पड़े तो देख लेंगें, क्योंकि यह मौका चुकने के बाद अगला मौका पाँच साल बाद ही मिलेगा। सगे- संबंधी तो अपने ही होते है, वे आज रुठे है , तो कल मान जाएंगे और फिर एक हो जायेंगें।
    चुनाव का माहौल चुनौतियों से पूर्ण होता है। इसलिए नेता हो या जनता ..सभी के लिये यह वक्त जागने का, समझने का और समझ बूझकर आँखें खोलने का है, तभी तो जनता परेशान है...किसे वोट दें? नेता परेशान है किस दल में जायें? गृहणियाँ परेशान है.. पति की बात मानें या सहेलियों की या  बेटा-बेटी की। इसलिए सभी अपने राजनैतिक भविष्य के गुत्थी को सुलझाने की भागमभाग दौड़ में लगा हुआ है।
वोट डालना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। एक-एक वोट का महत्व है, इसलिए हमें अपने मताधिकार का प्रयोग जरूर करना चाहिए। लोकतांत्रिक देश में हम रहते है । हमारा नेता हमारे पसंद का हो। बहुत सोच विचार कर हम अपना प्रिय नेता चुनते  और लोकतंत्र की राजगद्दी पर बैठाते है। ताकि चुना गया नेता लोकहित में कल्याणकारी कर्तव्य निभाकर लोकोपयोगी कार्य को अंजाम तक पँहुचा सकें।
इस बीच कर्तव्य किसी अंधेरी कोठरी में मुँह छुपाकर बैठी है कि कब कोई आयेगा और उसकी सुधि लेकर कोई काम करेगा।
   चुनाव के बाद उँट किस करवट बैठता है, यह कोई नहीं जानता। परिणाम अपने हित में हो या विपरीत हो। अब तो हम कुछ नहीं कर सकते क्योंकि नेता का चुनाव हमीं ने किया है ।
चुनाव की आँधी बीत जाने के बाद जनता हो या नेता...सभी को होश आयेगा कि उसने इस चुनाव के परिणाम में क्या खोया-क्या पाया है। जो जीत गया ..वह गाजे-बाजे के साथ रसमलाई का स्वाद लेगा और जो चुक गया.. उसे अंधेंरे कमरे में बैठ कर आकलन करने और आगे की रणनीति बनाने के अतिरिक्त कुछ और नहीं बचेगा। ऐसे में कुछ लोग मौकापरस्ती होते है। वे हर हाल में, हर माहौल में अपनी पैठ बनाये रहते है, ताकि वे मुँह छुपाने के बजाय जीत वाले दल में शामिल हो कर जीत का जश्न मना सकें।
      चुनावी माहौल में  सभी देशवासियों को, जो वोट डालने योग्य हो.....वे सतर्क व  जागरूक बनकर अपने मताधिकार का प्रयोग जरुर करें और योग्य सांसद का चुनाव करें,वरना चुनाव का परिणाम आने के बाद यदि सब किए करायें पर पानी फिर गया तो आरोपप्रत्यारोप के बाद अंत में पछतातें हुए यह न कहना पड़े कि," अब पछतायें होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।"

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शंखनाद (कविता)