जैसी करनी वैसी सीख (बाल कहानी)

फूलों वाले पार्क के सामने रोहिणी अपने भाई रोहन के साथ रहती थी । दोनों भाई-बहन में अथाह प्रेम भाव था । दोनों एक साथ खेलते, खाते और पढ़ते थे ।  रोहन शैतान, चुलबुला और रोहिणी से छोटा था । अपने नटखट स्वभाव के कारण रोहन अपनी बड़ी बहन रोहिणी को बहुत परेशान बहुत करता था । जिसे अपने छोटे भाई से अत्यधिक लगाव होने के कारण रोहिणी हमेशा सह भी लेती थी ।
परंतु एकदिन रोहन की शैतानियों से तंग होकर जब रोहिणी ने महसुस किया कि रोहन अपनी शैतानियों से बाज नहीं आता है । समझाने पर वह उसकी बात भी समझ नहीं पाता है बल्कि अवहेलना करता है तब  रोहिणी ने सोच लिया कि रोहन की जैसी शैतानियाँ  है ...उसे ठीक करने के लिए उसे वैसे ही अपनी अंगुली टेढ़ी करके सीख देनी पड़ेगी । वरना वह हद से बाहर जाकर बड़ी शैतानी करने लगेगा ।
            बात ऐसी थी कि ...रोहन जब भी पार्क में खेलता था और उसे कोई भी पशु-पक्षी दिख जाता, तब वह उन्हें परेशान करने के लिए तत्पर हो जाता । रोहिनी मना करती । वह बार-बार  समझाती कहती ," तुम्हें जब कोई कष्ट देता है, तब तुम्हें बहुत कष्ट होता है ।  तुम दुखी भी हो जाते हो । जैसे तुम दुखी और परेशान होते हो , वैसे ही पशु-पक्षी भी दुखी होते है । वे बोल नहीं पाते तो क्या हुआ , दुख-दर्द को महसूस तो करते ही है। "
"महसूस करते है , तो रोते कलपते क्यों नहीं है ? जैसे मैं रोता कलपता हूँ ।"रोहन तर्क करते हुए बोला ।
रोहिणी बोली ," जीव-जंतु रोते-कलपते नहीं है, पर महसूस तो करते ही है , इसीलिए वे प्रतिरोध करते है । जीव जंतुओं के पास अपना पक्ष के लिए कुछ ऐसे हथियार होते है जिनके बल पर वे अपने को परेशान करने वाले से बदला ले सकते है । इसलिए सुधर जाओ वरना एकदिन पछताओगे ।"
" जब पछताना पडेगा , तब देखूंगा ,दीदी । अभी तो मौज-मस्ती से खेलने दो । "यह कहकर रोहन खेलने लगा ।
एकदिन रोहिणी अपने भाई रोहन को चारों तरफ ढ़ूढ़ रही थी । जब रोहन उन्हें कहीं नहीं दिखा, तो वे जोर से आवाज लगाती हुई बोली ," रोहन  ,क्या कर रहे हो ? यँहा आओ ।"
" दीदी, मैं अभी आ नहीं सकता । मैं काम कर रहा हूँ ।" रोहन की आवाज घर के बाहर बरामदे से गूंजी ।
"कौन सा काम कर रहे हो, जो आ नहीं सकते ? जरा मैं भी तो देखू । " यह कहते हुए रोहिणी बरामदे में पँहुच गयीँ । रोहिणी ने देखा रोहन  भागती हुई चींटियों पर पानी से बौछार कर रहा था । रोहिणी घबड़ाकर बोली," अरे.रे.रे...। ये क्या कर रहे हो ? छोड़ो चींटियों पर पानी डालना । सब की सब मर जायेंगी । "
" मर जाने दीजिए । मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है । दीदी , ये चींटियाँ मुझे बहुत परेशान कर रही थी , इसलिए मैं उन्हें सबक सिखा रहा हूँ ।"
" सबक सिखाने की क्या जरूरत है ? तुम वहाँ से हट जाओ । ये अपने आप चली जायेगी । तुम्हें कोई नुकसान भी नहीं पहुँचायेगी । " रोहिणी यह कहते हुए रोहन को खींचनें लगी।
रोहन रोने लगा और रोते हुए बोला ," अभी माँ से शिकायत कर दूंगा कि तुम मुझे परेशान कर रही हो । मैं तो इन चींटियों के साथ खेल रहा था ।"
      "तुम उसके साथ खेल रहे थे , कि उसे घायल कर रहे थे ? चलो यहाँ से । तुम्हेँ होमवर्क भी करना है । " रोहिणी जिद करने लगी ।
"दीदी , आपने अच्छा नहीं किया । आपने मेरे चींटियों को भाग जाने दिया । अभी तो मैं चलता हूँ पर बाद में उन्हें ढ़ूढ़ ही लूंगा । कहाँ भागकर जायेगी ये मुझसे ।"
"ये बहुत गंदी बात होगी , रोहन । तुम आइंदा चींटियों को नहीं मारोंगे । तुम मेरे बहुत ही अच्छे और दुलारे भाई हो । क्या मेरा कहना नहीं मानोगे ? "
"मान ही तो रहा हूँ ..तभी तो होमवर्क करने आपके साथ चल रहा हूँ ।" रोहन मासूम सा चेहरा बनाकर बोला ।
रोहिणी समझ रही थी कि यह रोहन का बनावटी भोला चेहरा उसे बेवकूफ बनाने के लिए है । थोड़ी ही देर में जब उसे मौका मिल जायेगा , तब जीव-जंतुओं को सताते समय उसका चेहरा इतना भोला व मासूम नहीं दिखेगा । जिस समय रोहन शैतानी करता है उस समय उसका चेहरा उग्र व कठोर हो जाता है । यही चेहरा रोहिणी को पसंद नहीं था । वह चाहती थी कि उसका भाई सदैव भोला व मासूम बना रहे और हल्की-फुल्की ,चुलबुली सी शैतानी करें ।
रोहिणी रोहन को होमवर्क कराती जा रही थी और साथ में जीव -जंतुओं के रक्षा करने की नैतिक घूंटी भी पिलाती जा रही थी ।" रोहिणी के समझाने का असर दो-चार दिन चला फिर सब कुछ जैसे का तैसा हो गया ।
एकदिन रोहिणी ने फिर देखा कि रोहन चींटियों के साथ छेड़खानी कर रहा हैं । जमीन पर  चींटियाँ इधर उधर भाग रही थी और रोहन उन्हें परेशान कर रहा था ।
रोहिणी प्यार से रोहन को समझाने के लिए बोली ,"रोहन भाई , चींटियों को छेड़ते नहीं है । उसे भी चोट लगती है और कष्ट होता है ।"
इस प्रकार रोहिणी के बार बार प्यार से  समझाने के बाद भी रोहन जब नहीं समझता तब रोहिणी ने सोच लिया कि अब उसे रोहन को समझाने के लिए अपनी अंगुली टेढ़ी करनी पड़ेगी ।
      रोहन  सिर्फ चींटियों को  ही नहीं बल्कि रोहन अपने संपर्क में आने वाले हर जीव जंतु को सताता था । कालोनी का कम्मो कुत्ता, लूसी बिल्ली, कल्लू कबुतर और मोलू मैना उसे  देखते ही दूर भाग जाते थे । क्योंकि उन्हें रोहन का रोद्र रुप पता था । जीव-जंतुओं की छटपटाहट और बौखलाहट देख रोहन को बहुत मजा मिलता था ।
ऐसे हिंसक प्रवृत्ति वाले खेल देखकर रोहिणी घबड़ा जाती । वे एक बार नहीं ..बार बार रोहन को मना करती, पर रोहन मानता नहीं था । रोहिणी ने सोचा अब इन्हें इन्हीं के अंदाज में समझाना पड़ेगा ।
एकदिन रोहन के  कमरे में मच्छरों का प्रकोप काफी बढ़ गया । रोहिणी ने रोहन के बिस्तर पर मच्छरदानी नहीं लगायी थी । रोहन सोने गया तो सोने के थोड़ी बाद जोर से चिल्लाया ,"दीदी , आपने मेरे बिस्तर पर मच्छरदानी नहीं लगायी है । और तो और आपने कमरें में मार्टिन भी नहीं लगाया है । मैं क्या करु..मुझसे तो रहा ही नहीं जा रहा ।"
"रोहन ,एक दिन सब्र करके सो जाओ । नहीं तो खुद ही मच्छरदानी लगा लो ।" रोहिणी लापरवाही में बोली ।
"दीदी यँहा एक पल सब्र नहीं हो रहा है और आप कहती है, एकदिन सब्र कर लो । मैं एक पल बर्दाश्त नहीं कर सकता । आप शीघ्र आइये वरना मैं माँ से शिकायत कर दूंगा । "
" शिकायत करनी है तो कर लो ,पर मैं आने वाली नहीं हूँ । मेरी तबीयत ठीक नहीं है । तुम्हेँ जैसे मर्जी ,वैसे सो लो । "यह कहकर रोहिणी चादर से मुँह ढ़ककर सोने का उपक्रम करने लगी ।
थोड़ी देर बार रोहन उसके चादर में घुसते हुए बोला ," मैं तो आज यहीं सोऊंगा तुम्हारे पास ।"
" नहीं, तुम यहाँ नहीं सो सकते हो । अपने बिस्तर पर जाओ ।" रोहिणी रोहन से चादर खींचते हुए बोली ।
"मैं नहीं जाऊंगा । मेरे बिस्तर पर मच्छरों का प्रकोप बहुत है । दीदी ,  मुझे यहीं सोने दो । " रोहन रोहिणी से आग्रह करते हुए बोला ।
" क्यों , तुम्हें क्या उलझन है ? मच्छरों का काम तो काटना ही है । वे काटेंगे नहीं तो करेंगे क्या ? ..तुम्हारी सहनशक्ति कँहा चली गई ? तुम आराम से , मौज-मस्ती से सोओ । मच्छरों को आराम से  अपना काम करने दो । "
"आप भी ना ,दीदी । आप मुझे छेड़ने के लिए बोल रही है । " रोहन रुठते  हुए बोला ।
"क्यों न बोलू ? क्योंकि तुम तो वैसे ही परेशान हो रहे हो जैसे चींटियाँ तुम्हारे चोट से परेशान होकर इधर उधर भागती है और तुम मजा लेते हो । अब मच्छरों की बारी है । थोड़ा अपने को कटाकर मच्छरों को मजा लेने दो ।  उन्हें भी तो मस्ती मारने का शौक होगा । उनके शौक को पूरा होने दो । " रोहिणी रोहन को चिढ़ाते हुए बोली ।
"दीदी , आप मुझ पर व्यंग्य कर रही है ना ।"
"व्यंग्य नहीं रोहन , सच्चाई बता रही हूँ । यदि तुम जानबूझ कर किसी को परेशान करोगे तो एक दिन तुम्हें भी किसी कारण वैसे ही परेशान होना पड़ेगा । इसलिए जानबूझकर किसी को सताना नहीं चाहिए ।"
"दीदी , मैं मच्छरों के काटने से जब बहुत परेशान हो गया तब आपके पास आया हूँ । आज आपने मेरी आँखें खोल दी है । मैं समझ गया कि किसी को परेशान करने से उसे कितना कष्ट होता है । रोज आप मच्छरदानी लगा देती थी तो मुझे मच्छरों के काँटने का कष्ट मिलता ही नहीं था । आज इसका प्रत्यक्ष अनुभव मिलने से मुझे सीख मिल गई । अब मैं जानबूझ कर किसी को सताऊंगा नहीं । "
" तुम मान नहीं रहे थे ।इसलिए  तुम्हें शिक्षा देने के लिए ही मैंनें जानबूझकर मच्छरदानी नहीं लगायी थी । यह तुम्हें 'जैसी करनी वैसी सीख' के लिए सजा थी । जब तुम सीख जाओगे तब मच्छरदानी लगने लगेगी ।  "
"मेरी अच्छी दीदी आपने मुझे बहुत अच्छी सीख दी है । "
"एक बात और है ,रोहन । तुम किसी को परेशान नहीं करोगे , तभी मेरा प्रयास सफल माना जायेगा । वरना 'जैसी करनी, वैसी सीख' बेकार हो जाएगा ।"
" नहीं दीदी , अब मैं समझ गया , अब वैसी शैतानी नहीं होगी । अब तो मुझे अपने पास सोने दीजिए।"
           यह कहकर रोहन रोहिणी के बिस्तर में घुसने लगा , तो रोहिणी भी एक तरफ सरककर उसे जगह दे दी । फिर उसके बालों में हाथ फेरने लगी । एक नयी उम्मीद और विश्वास के साथ दोनों भाई-बहन चैन से सो गये ।

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