कोरोना काल की खुशियाँ (लघुकथा)

ढ़ाई माह बाद वेदिता के घर उनके बेटा-बहु प्रशांत - अंशिका और पोता चित्रांश आ रहे थे। घर में खुशियों का माहौल बहुत था। वेदिता का मन उल्लसित था कि चित्रांश के आने से घर की खोई खुशहाली और चहल-पहल लौट आयेगी। वह बार-बार घड़ी पर निगाह टिका रही थी। वह आतुर थी पोता को गले लगाकर चूमने और पुचकारने को।
टैक्सी रुकने पर वेदिता बाहर आई  तो उसने महसूस किया कि सबके चेहरे खुशी के बावजूद भी मुरझाये व बदले हुए थे, जैसे किसी जंजीर ने उन्हें जकड़ लिया हो। उल्लास और हो हल्ला का वह माहौल नहीं दिखा, जो पहले बच्चों के आने पर दिखता था।
वेदिता ने दोनों बाहें फैला दी, तो चित्रांश जिस तेजी से गाड़ी से कूदकर दादी के बाहों मै समाने के लिए दौड़ा। प्रशांत उसी तेजी से उसे रोकते हुए बोले, " चित्रांश, भूल गये। दादी के तुरंत गले नहीं लगना है। और मम्मी आप भी पोता को देखकर सोसल डिस्टेंडिंग की बात भूल गयी।" 
चित्रांश और वेदिता तत्काल ठहरकर कातर नजरों से एक दूसरे को देखने लगे। मन की पीड़ा दोनों के चेहरे पर चमकने लगी, तो दादी मायूस होकर बोली," बेटा, थोड़े दिनों के लिए रुक जाओ। मैं तुम्हें फिर गोद में ले लुंगी।" प्रशांत सामान को एक तरफ व्यवस्थित करके बाथरूम की तरफ जाते हुए अंशिका से बोला," अंशिका, मैं चित्रांश को नहला दूंगा। तुम भी नहाकर ही किसी चीज को हाथ लगाना।"
चित्रांश प्रशांत के साथ नहाकर आ गया तो अंशिका बाथरूम में चली गई।
बच्चों के नहाने के बाद जब पूरा परिवार एक साथ खाने के लिए जुटे तब प्रशांत वेदिता से बोला,"मम्मी, हमें खाना अलग दे दो। हम कुछ दिन कोरेंटाईन रहेंगे।"
खाना परसती हुई वेदिता के नयनों के कोर से आँसू की चंद बूंदें झिलमिलाने लगी, जिसे उन्होंने सबकी नजरें बचाकर अपने आँचल से पोछ ली।
ऐसे माहौल को देखने के बाद भी वेदिता संतुष्ट थी कि जो हो रहा है, वह इस समय की मांग है। ऐसी जागरूकता जीवन की ज्योति को जगाये रखेगी। यदि सबका जीवन सुरक्षित रहेगा तो खुशियों की बयार भी अपने पुराने रंग में फिर बहेगी, हँसेगी, मुस्कुरायेगी और गुनगुनायेगी।

No comments:

शंखनाद (कविता)