बंजर भूमि के फूल (कहानी)

 दिनभर बैंक की आपाधापी से जुझने के बाद शाम की गौधूली बेला में श्रेया अपने बैंक से निकली तो काफी थकी हुई थी। वह बोझिल कदमों से चलती हुई घर पहुचीं। ताला खोल कर सबसे पहले उसने पर्स को सोफे पर टिका दिया, फिर वहीं आँखें मूंदकर निढ़ाल सी पड़ गई ।
           थोड़ी ही देर बाद श्रेया को प्यास लगी। वह अनमनी अलसाई सी पानी लेने के लिए उठी , क्योंकि इस समय वह अकेली थी । आगे  बढ़ते ही उसे फर्श पर पड़ा हुआ एक लिफाफा दिखा। वह झटपट लिफाफा खोलकर पत्र पढ़ने लगी। पत्र उसके अंतरंग बचपन की सहेली भैरवी का था।
    पत्र पढ़कर श्रेया बहुत खुश हो गयी। उसके चेहरे पर सखी मिलन का नूर चमकने लगा , क्योंकि भैरवी ने सपरिवार अपने आने और उसके यहाँ दस दिन रुकने की सुचना दी थी।
                  श्रेया सोचों के बयार में बहने लगी,उसने सोचा,' कितने दिनों बाद मिलना होगा भैरवी से ? कैसी होगी भैरवी और उसकी गुड़िया ? गुड़िया अब बड़ी हो गयी होगी। कैसी लगती होगी वह ? उसने तो गुड़िया को अभी तक देखा ही नहीं क्योंकि जब भैरवी ने उसे बुलाया था, तब वह भैरवी के घर गई ही नहीं । श्रेया को समझ में नहीं आया कि उस समय वह क्यों और कैसे ...इतनी निष्ठुर बन गयी थी जो नन्हीं गुड़िया के आगमन पर ...भैरवी का निमंत्रण मिलने के बाद भी वह उसे देखने हैदराबाद गई नहीं । ' पर आज भैरवी के आने की खबर से श्रेया अति प्रसन्न थी । भावनाओं के अतिरेक में ड़ूबने-उतराने के कारण उसके मानस पटल पर वर्तमान के साथ ही अतीत की भूली बिसरी यादें भी कुड़बुड़ाने लगी ।
            श्रेया जानती थी भैरवी के बुलाने पर उसके यहाँ न जाकर उसने कुछ अच्छा नहीं किया था । वह अपने फैसले से खुश भी नहीं थी । उसे मलाल भी बहुत था...पर वह अपने पति शार्दूल के अहम् पर चोट भी नहीं करना चाहती थी, इसलिए मन की पीड़ा मन में ही दबाकर पति के इच्छा के विरुद्ध न जाने के कारण उसने मजबूरन यह निर्णय लिया था।
               अनगिनत उमड़ते घुमड़ते प्रश्नो के बीच उलझकर श्रेया थोड़ी उदास हो गयी । नूर भरे चेहरे पर अपनी गलतियों के एहसास व अफसोस के कारण उसकी स्थिति अजीब हो गयी । उसके मन में ग्लानि , पीड़ा , उमंग और उत्साह के कारण असमंजस की खिचड़ी पकने लगी। तब उसने पानी पीकर अपने को तर किया फिर शार्दूल को भैरवी के आने की सूचना देने के लिए फोन करने लगी।
                फोन रखकर श्रेया चाय बना लायी । शार्दूल के आने में अभी समय था। अकेले चाय पीते हुए उसे अपने अकेलेपन का दंश डसने लगा । वह मायूस होकर अपने सूने घर में खुशियाँ टटोलने और ढ़ूढ़ने लगी पर उसे अपने घर के कण कण में उदासी ही नजर आया, अब तो यह उदासी उसके तन-मन में समा गई थी । वह चाय लेकर बालकनी में आ गयी।
             बाहर का नजारा देखते हुए उसका मन स्थिर हुआ , तब उसे अपने नौकरी करने पर गर्व महसूस हुआ । नौकरी की वजह से उसका सारा दिन व्यस्तता में बीत जाता था, वरना पहाड़ सा पूरा खाली दिन उसे व्यग्र करने के लिए काफी था ।
                नौकरी से श्रेया को याद आया अपने विवाह पूर्व की वह घटना जब वह बैंक पीओ की परीक्षा में उत्तीर्ण हुई थी । भैरवी के पत्र और अकेलेपन के एहसास के कारण श्रेया के पास अतीत के गलियारे में विचरने के अतिरिक्त और कोई काम बचा नहीं था इसलिए वह पँहुच गयी अपने मायके गोरखपुर, जब उसकी शादी भी नहीं हुयी थी ।
            छोटा शहर था श्रेया का ....इसलिए उसके बैंक पीओ में कामयाबी मिलने की खबर फैलते देर नहीं लगी । एक सप्ताह के अंदर ही एक स्मार्ट - सुंदर बैंक मनैजर का उसके लिए विवाह का प्रस्ताव आ गया । श्रेया के पापा ने इस विवाह की स्वीकृति की सुचना जब सबको सुना दी , तब श्रेया इतनी ज्यादा खुश हुई कि उसे  सबसे पहले अपनी बचपन की सहेली भैरवी ही याद आयी। वह खुशी -खुशी भैरवी के पास पहुँच गयी ।  दोनों सहेलियों के अंतरंग बातों और खुशियों के बीच में एक राज और खुला कि भैरवी  के शादी की बातें भी तय होने के अपने अंतिम दौर में पँहुच चुकी है ।
             साथ साथ पढ़ने वाली दोनों सहेलियाँ साथ साथ ही अल्प अंतराल में ससुराल जाने की जद्दोजहद में जुट गयी । शादी के बाद भैरवी अनुराग के साथ हैदराबाद पहुँच गयी, तो श्रेया अपने स्मार्ट पति के साथ दिल्ली में बस गयी।
           शादी के बाद दोनों सहेलियों के बीच पत्राचार के माध्यम से उनका संबन्ध तो बरकरार था पर अभी तक उनका मिलना संभव नहीं हो पाया था । समय अविराम गति से आगे बढ़ता रहा ।  शादी के चार साल बाद अचानक श्रेया भैरवी के घर पहुँच कर भैरवी को चौंका दी । उस समय दोनों सहेलियाँ भावुकता में गले मिलकर फफक पड़ी। मिलन की अनोखी, अद्भुत एहसास को तरंगित करके वे एकसार होने लगी । सुख- दुख की लम्बी फेहरिस्त थी उनके पास । हँसी -खुशी और मौज -मस्ती में उनका दिन बीतने लगा।
               दोनों सहेलियों के वैवाहिक जीवन की एक समानता ने उन्हें एकतार कर एक जैसे दुख-दर्द से सराबोर कर दिया था , जिसके कारण वे अपने दुख दर्द को एकदूसरे के सामने उकेरने को मजबूर हो गयी । दोनों सहेलियों के घर में  बच्चों की किलकारियों की गूँज अभी गूंजी नहीं थी । यही कारण था कि दोनों के आँगन का सूनापन उन्हें व्यथित करता था । पूजा-पाठ , दवा और चिकित्सयी सुविधा भी उनके अरमानों की पूर्ति में बौना साबित हो गया ।
                वे करे तो क्या करें ? अभी वे इस मसले पर अपनी आपसी समझ बना नहीं पायी थी , इसलिए सबके सामने खुलकर बात नहीं की । एकांत  मौका की दरकार उन्हें थी इसलिए ऐसे मौके की तलाश में उनकी जुंबा खामोश थी । एक दिन मौका मिलने पर अभी वे इस गम्भीर पहलू पर विचार विमर्श कर ही रही थी कि शार्दूल और अनुराग जो इस समय कहीँ घूमने गये थे.. वे वापस आ गये ।
               फिर चारों की चौकड़ी मिलकर चाय पीने और  गपशप करने बैठी तो बातों का रुख हँसी के फौव्वारों में फूट पड़ा । पर अनुराग, भैरवी के मन के कुछ अस्फुट शब्द बाहर आने को मचल रहे थे । पर वे कह इसलिए नहीं पा रहे थे क्योंकि उन्हें डर था कि उनकी बातों को श्रेया-शार्दूल किस रुप में लेंगे और उनपर क्या असर पड़ सकता है । भैरवी-अनुराग ने मिलकर  अपने जिंदगी  का एक अहम् फैसला कर लिया था जिसे श्रेया -शार्दूल से कहना भी जरुरी था । इसलिए धीरे धीरे अनुराग गम्भीर होने लगे ।
        आज उसी फैसले को अवगत कराने के लिए अनुराग को मौका मिला तो वे श्रेया से मुखातिब होकर बोले, " दीदी , अबतक के वैवाहिक जीवन से मैं और भैरवी बहुत खुश और संतुष्ट थे ,पर अब हमें हमारी एक कमी अखरने और खटकने लगी थी...वह कमी थी ...हमारे और भैरवी के बीच एक मध्यस्थता की...एक बच्चे का अभाव । हमने बहुत प्रयास किया, पर सफलता नहीं मिली । अतः अपनी कोशिशों से हम यह मान चुके कि मैं और भैरवी दोनों मिलकर ऐसे बंजर भूमि है जो नये पौध उगाने में असमर्थ है । इसलिए हमने अपने वैवाहिक जीवन की सार्थकता सिद्ध करने के लिए एक उपाय का सहारा लेकर उसे क्रियान्वित करने का फैसला कर लिया है ।"
                   श्रेया और शार्दूल ध्यान से सुन रहे थे । यही विकट परिस्थितियाँ उनके जीवन में भी सुरसा की भांति मुँह बाएं खड़ी थी । जिससे वे जुझ भी रहे थे । अनुराग की बातों से शार्दूल अपने को धैर्य की सीमा में बांध नहीं पाये ,इसलिए उतावले होकर बीच में ही टपक कर बोले ,"कौन सा उपाय क्रियान्वित कर रहा है भाई ,कुछ मुझे भी तो बता ? "
                 "वही तो बता रहा हूँ कि हम दोनों अपने बंजर भूमि पर फूल उगाने का उपाय सोच रहे हैं । " अनुराग शांत स्वर में बोले ।
                 "फूल उगाने का उपाय बताओ यार , पहेलियाँ बुझाकर समय मत बर्बाद करो ।" शार्दूल को सब्र नहीं हो रहा था इसलिए उत्तेजित होकर बोले ।
               अनुराग झुझलाकर बोले ,"अरे,वही तो बताने की कोशिश कर रहा हूँ कि मैं और भैरवी  एक बच्ची गोद लेने वाले है ।"
               "क्या ..यह भी कोई उपाय है ? " शार्दूल के मुख से अनायास ही निकल पड़ा क्योंकि कोई इस मुद्दे पर ऐसा विकल्प भी सोच सकता है या ऐसा विकल्प भी उसके सामने भी आ सकता है... यह शार्दूल के कल्पना के बिलकुल विपरीत था । अनुराग का यह उपाय उन्हें रास नहीं आया । वे इस मत से सहमत भी नहीं थे इसलिए खिन्न होकर बोले ,"अरे वाह,यह तुम्हें कोई सार्थक उपाय लगता है ? तुम फिर से विचार कर लो , क्योंकि दूसरे के पौध को क्या तुम अपने घर आँगन में सींच पाओगे ? ना भाई ना, यह कोई सार्थक उपाय नहीं लगता है। तुम कोई और दूसरा उपाय  क्यों नहीं करते हो ? "
             "हमारे लिए तो यही विकल्प अब अंतिम शेष बचा है । क्योंकि अबतक इससे पहले का कोई विकल्प कारगर सिद्ध नहीं हुआ । हम हर उपाय से निराश हो चुकने के बाद ही  यह उपाय अपना रहे हैं ,भैया । " अनुराग जोर देकर बोला ।
         " इतनी जल्दी निराश होकर हिम्मत हार चुके हो , पर क्यों ? इतनी भी जल्दी क्या थी ..थोड़ा और सब्र तो कर लेते । "
             " नहीं भैया , अब सब्र ही तो नहीं बचा है । हम हार ही तो गये है । इसलिए मैं, इस हार पर अब नयी जीत का मोहर लगाना चाहते हैं। हमें अपने आपसी सम्बन्धों को मधुर बनाने के लिए एक माध्यम... या यूं कहें एक धुरी की तलाश थी जो हमें एक गुड़िया के रुप में मिलने वाली है , उसे ही हम गोद लेने को सोच रहे है । " सार्थक सोच से प्रफुल्लित होकर अनुराग बोले ।
                शार्दूल की सोच पुरानी, कुंठित और पारम्परिक था,इसलिए उन्हें पसंद नहीं आया कि अनुराग किसी बच्चे को गोद ले । वे अपने तर्को से अनुराग को परास्त करने की हीलहुज्जत में जुट गये अतः अनुराग को बरगलाने की कोशिश में जोर देकर बोले, " गुड़िया ? अरे ऐसी मुर्खता क्यों कर रहे हो ? लेना है , तो लड़का गोद क्यों नहीं लेते हो ? जिससे तुम्हारी प्रतिष्ठा भी बनी रहेगी और तुम्हारे आन-बान और शान में कोई कमी भी नहीं आयेगी ।"
            शार्दूल की बेतुकी बातों से अनुराग को हँसी आ गई । वे हसँकर बोले ," इसमें आन-बान और शान की बात कहाँ से आती है ,भैया ? "
           शार्दूल थोड़ा अकड़कर बोले,"अरे भाई ,बेटा होगा तो तुम्हारे नक्शे कदम पर चलकर तुम्हारा वारिस बनेगा, तुम्हारी विरासत सम्भालेगा , तुम्हारी साख बचाएगा जिससे तुम्हारी सत्ता बनी रहेगी ।"
              अनुराग हसँते हुए बोले,"वाह भैया ,वाह। गोद लेने की इतनी खूबियों से तुम परचित हो तो चलो आज तुम भी एक लड़का गोद ले लो ,जिससे दीदी की गोद भर जाएगी और किलकारियों की गूंज से तुम्हारा घर भी आबाद हो जायेगा और फिर जब बच्चे बड़े हो जायेंगे तब हम उनकी शादी करा के समधी बन जायेंगे ।"
             अनुराग के इस मजाक ने शार्दूल के न जाने किस कमजोर कड़ी को छू लिया कि वे तिलमिला गये , तब वे तमतमाकर बोले," देखो अनुराग मुझे सब कुछ पसंद है पर ऐसा फालतू मजाक कत्तई पसंद नहीं है कि मैं दूसरे की औलाद को अपना सकूं या अपने घर में पनाह देकर उसे अपनी औलाद की गद्दी पंर बैठा सकू..। ऐसा सामर्थ्य मुझमें नही है। मैं ऐसा घटिया काम कर ही नहीं सकता....कि अपनी कमी को आईना बनाकर अपने सामने बैठा सकूं , जिससे वह हमारी कमी का अक्श हमें ही दिखाकर हमें मुह चिढ़ाता रहे। इसलिए मुझे बक्स दो मेरे यार। मैं तुम्हारा साथ नहीं निभा पाऊंगा ।"
             शार्दूल खड़े हो गये ।अनुराग सहमकर बोले," अरे भैया,मेरा इरादा आप को दुख पहुँचाना नहीं था अतः मुझे माफ कर दीजिए।"
            बात कहाँ से कहाँ पहुचँ गयी। शार्दूल के विचार से सबका मन खट्टा हो गया ।सबकी बोलती बंद हो चुकी थी । इसलिए धीरे धीरे गोष्ठी भंग हो गयी । सब लोग अनमने मन से अपने अपने काम में व्यस्त हो गये ।
          शाम को अनुराग और भैरवी ने सुना कि श्रेया और शार्दूल जा रहे हैँ,तब वे चौंक गये।  दोनों को रोकने की उनकी पुरजोर कोशिश भी बेकार साबित हुआ । रात की ट्रेन से श्रेया -शार्दूल चले गये पर जाते जाते अपने रिश्ते में कटूता के बीज बो गये ।
               एक माह के अंदर ही अनुराग -भैरवी एक गुड़िया गोद ले लिए ।अनुराग ने शार्दूल को निमंत्रण भेजकर उन्हें अपनी खुशी में शामिल होने का आग्रह किया, पर वे दोनों पलटकर भैरवी-अनुराग से संपर्क नहीं रखे ,तो नहीं ही रखे ।
              सोचों के अलग -अलग दायरे में बँधें होने के कारण... एक ही परिस्थिति में होते हुए भी एक के घर में खुशियों का फूल खिल गया । नन्हीं बुलबुल की गूँज से अनुराग और भैरवी का वीरान चमन आबाद होकर चमकने ,चहकने और महकने लगा। पर वहीं श्रेया और शार्दूल अब भी वीरान ,नीरस और दमघोंटू वातावरण में जीने को मजबूर थे ।
                वैसे श्रेया की सोच शार्दूल जैसी नहीं थी। वह भी अनुराग और भैरवी के राह पर चलना चाहती थी..पर वह मात्र एक पुरुष के अहंकारी जिद के आगे बौना बन जाती थी , इसलिए इच्छा होते हुए भी शार्दूल के रुख को भाँपकर खामोश हो जाती । एक बच्चे को गोद लेना एक ऐसा निर्णय था जो अकेले पति के सहमति के बिना ...लिया और भोगा नहीं जा सकता था ,इसलिए बेबस श्रेया तिलमिला कर रह जाती थी ।
             वैसे औलाद के मुद्दे पर श्रेया और शार्दूल के वश में जितनी भी हिम्मत थी ,उतनी हिम्मत वे जी जान से लगा चुके थे । चिकित्सिय सुविधा से लाभ के मसले पर एक औरत को उसकी क्षमता से अधिक जितना भी शारीरिक कष्ट झेलाया जा सकता था ,वह सभी यातनाएं और कष्ट श्रेया ने अपने शरीर पर झेला...पर उसके पहलू में औलाद का सुख नहीं बदा था..सो उसे वह सुख नहीं मिला । उसकी चाहत अधुरी ही रहनी थी , तो अधुरी ही रह गयी ।
               शार्दूल बाहर की दुनिया में अपना दिल बहला लेते थे ,पर श्रेया अपने आँसू सुखा कर भी बेचैन थी । जब वह आँसू् बहाती या कोई और उपाय सुझाती ,तब भी उन आँसुओं का कोई मोल शार्दूल के पास सिर्फ इसलिए नहीं था ...क्योंकि उन्हें अपनी और सिर्फ अपनी औलाद चाहिए  था...जो श्रेया उन्हें देने में असमर्थ थी अतः हरसिंगार के झरते फूलों की भांति श्रेया के अरमान भी झरते और बिखरते रहे । विकल्प के सभी मार्ग बंद होने के बावजूद भी शार्दूल से परिवर्तन की कोई उम्मीद श्रेया को नहीं थी ।
          धीरे -धीरे कई साल बीत गया। श्रेया ने न भैरवी की सुधि ली और भैरवी ने न श्रेया की । दोनों परिवारों में अघोषित कर्फ्यू का माहौल बना रहा, जिसे कभी किसी के पहल ने तोड़ने की हिम्मत नहीं दिखाई ।
                पर आज वर्षो बाद उसी कर्फ्यू का ताला तोड़ने वाला पत्र पाकर श्रेया इतनी खुश हो गयी कि सोचों के दायरे से निकलकर उत्तेजना में उठी और बाजार चली गयी... नन्हीं गुड़िया के स्वागत के लिए ढ़रों सामान खरीदने के लिए ।
             अनुराग और भैरवी के आने पर श्रेया और शार्दूल ने उनका स्वागत दिल खोलकर किया । भैरवी के साथ प्यारी बुलबुल भी थी । बुलबुल के कारण चहकते और खिलते भैरवी और अनुराग ने श्रेया का दिल जीत लिया । उमंगों और तरंगों के बीच सबका समय बीतने लगा। श्रेया के लिए भी सबसे ज्यादा आकर्षण का केन्र्द बुलबुल ही थी । बुलबुल के सानिध्यता में श्रेया का मुरझाया दिल -दिमाग और चेहरा भी खिलकर महकने लगा । वह  भी चहकने , खिलने और खिलखिलाकर हँसने लगी । शार्दूल को श्रेया में आया ये अमूलचूल परिवर्तन रास नहीं आता था । इस परिवर्तन की  केंद्र बिंदु  बुलबुल ही थी , इसलिए वह बुलबुल से दूर ही रहते और श्रेया को भी उससे दूर रहने की सलाह देते । पर श्रेया शार्दूल के इस सलाह को अनसुनी करके टाल जाती ।और भैरवी के परिवार में मस्त रहती । शार्दूल खुलकर सबका साथ नहीं निभा पाते थे जिससे कारण वे मन ही मन में कुढ़ने लगे । उनके और अनुराग के संबंध औपचारिकता के सीमित दायरे में बँध कर रह गया ।
              बुलबुल भी शार्दूल को चुभने लगी थी । तभी तो अपनी आँख की किरकिरी मानने के कारण वे उसकी उपस्थित को मन ही मन बर्दाश्त नहीं कर पाते और इसलिए  उसकी शैतानियों पर अपने सिद्धांत का अंकुश लगाने से वे अक्सर  चुकते नहीं थे ...यहाँ नहीं बैठो ,ये खिलौना यहाँ क्यों फैलाया है, दूध कहीं ऐसे पीते है , इतनी शैतानियाँ क्यों करती हो...जैसे टोकाटाकी से बुलबुल का बालमन सहमकर सिकुड़ जाता तब वह श्रेया के आलिंगन में समा जाती । असीम आनन्द से आनन्दित होने वाले ऐसे सुखद अनुभूति में  श्रेया ड़ूब जाती । श्रेया के निंश्छल प्यार और दुलार के कारण बुलबुल श्रेया के ईर्द - गिर्द ही मड़राती थी ।
      श्रेया भी शार्दूल के इस व्यवहार से दुखी हो जाती,वह मायूस होकर जब झल्ला जाती तब शार्दूल से कहती,"शार्दूल , बुलबुल अभी बच्ची है । वह तुम्हारे नियम कानून को नहीं समझती इसलिए उसे बक्स दो और खुलकर खेलने दो।" श्रेया के टोकने के बाद भी शार्दूल श्रेया की बात को अनसुनी कर देते और अपनी आदत में कोई परिवर्तन नहीं करते।
                एकदिन अचानक शार्दूल दोपहर में ही आफिस से घर लौट आये। उन्हें तेज बुखार था । उस समय घर में सिर्फ श्रेया और बुलबुल थे ।भैरवी और अनुराग बाजार गये थे ।
              शार्दूल लेटे थे । उन्हें इस तरह लेटे हुए देखकर बुलबुल चिंतित हो गयी। वह चुपचाप सहमी-सिकुड़ी सी...थोड़ी हिम्मत संजोकर धीरे धीरे उनके पास आयी और उनका माथा छूकर देखने लगी । माथा छूते ही वह चौंककर चिल्लायी ,"आंटी ,अंकल का माथा ...बहुत ज्यादा गरम है । उन्हें बुखार है । आप कुछ करिये , वरना ये और बढ़ जायेगा । "
शार्दूल भी बुलबुल के नन्हें हाथों के स्पर्श और घबराहट भरी आवाज से चिंहुक गये । शीतल-ठंड़ी फुहार की क्षणिक शीतलता से शार्दूल का तन-मन भींग गया । वे बुलबुल से कुछ कहना चाह रहे थे कि तभी श्रेया जोर से चिल्लायी , " हाँ बुलबुल, मैं अभी दवा देकर पट्टी रखती हूँ तो अंकल का बुखार कम हो जाएगा । तुम उन्हें आराम करने दो । वे परेशान न हो जायें ,इसलिए मेरे पास आ जाओ । "
बुलबुल कूदकर श्रेया के  पास चली गई । शार्दूल बुलबुल का जाना अनमने भाव से देखते रह गये ।
            "आंटी ,मैं भी अंकल के माथे पर पट्टी रखूंगी । " बुलबुल मचलकर बोली । बुलबुल छोटी थी पर वह श्रेया के हर काम में हाथ बँटाना चाहती थी ।
        इसलिए वही छोटी बुलबुल श्रेया के साथ शार्दूल की सेवा में जुट गयी । श्रेया जब ठंड़े पानी का पट्टी शार्दूल के माथे पर रखने लगी ,तो बुलबुल भी श्रेया से भीगी पट्टी लेकर कभी शार्दूल के हाथ पैर पर मलती ,तो कभी माथा सहलाने लगती और फिर परेशान होकर बार बार शार्दूल का माथा छूकर देखती और कहती ,"आंटी , अंकल का माथा अभी भी गरम है... इसलिए पट्टी अभी और रखनी पड़ेगी । "
           श्रेया के साथ साथ बुलबुल के नन्हें -कोमल हाथों के प्यार भरे फुहार के स्पर्श मात्र और उसकी अकुलाहट से शार्दूल का तपता शरीर अपनी गर्मी भूलकर सामान्य होने लगा , जिससे शार्दूल को बहुत राहत व सुकून मिला ।
             बुखार कम होने के बाद श्रेया शार्दूल के लिए चाय बना लायी । वह शार्दूल को चाय पीने के लिए बोलकर अपना काम करने लगी । उसी समय बुलबुल शार्दूल के पास आकर  बोली ,"अंकल, चाय पी लो , तो बहुत जल्दी ठीक हो जाओगे। "
               यह कहकर चुलबुली बुलबुल मेज से प्याला उठाने लगी तो उसके हाथ से प्याला छूटने लगा जिससे चाय छलक पड़ा।
           "अरे -अरे बचकर। देखो जल न जाना "। शार्दूल हड़बड़ाकर उठ गये और बुलबुल के हाथ से प्याला लेकर रख दिये और फिर उसे प्यार से अपने पास बैठा लिए ।
तब बुलबुल सहज भाव से बोली ,"अंकल ,आप इतना अधिक गुस्सा करते है इसलिए आप को बुखार हो गया । मेरे पापा तो कभी गुस्सा करते ही नहीं इसलिए उन्हें कभी बुखार नहीं होता । "
          "साँरी बेबी,साँरी। अब मैं भी गुस्सा नहीं  करुंगा ,पर एक ही शर्त है मेरी...कि तुम्हें मेरे साथ खेलना पड़ेगा । " शार्दूल अपनी गलती स्वीकारते हुए बोले ।
            "खेलूंगी ,जरुर खेलूंगी ।"बुलबुल दुलराकर बोली तो शार्दूल खिल उठे । बुलबुल के तिलस्मी जादू के बंधन में शार्दूल जकड़ चुके थे ।
             "अरे बुलबुल ,अंकल को बुखार है।उन्हें परेशान मत करो। " श्रेया बुलबुल को शार्दूल के पास देखकर घबड़ा गयी क्योंकि शार्दूल और बुलबुल कभी एक साथ हो सकते हैं यह श्रेया के सोच से परे था । उसी समय अनुराग और भैरवी भी आ गये ।
          शार्दूल ठीक हो गए तो आंतरिक रुप से बदलने भी लगे। अब वे बुलबुल के साथ खेलते तो बुलबुल भी चहकती, इतराती, झूमती और मचलती हुई दौड़कर जब शार्दूल के गोद में धम्म से समा जाती या गर्दन पकड़कर लटक जाती तब शार्दूल का निष्क्रिय ,खामोश और सुनी गोद झंकृत होकर झनझना जाता ..फिर वे इस अद्भुत -अनोखे ,दुर्लभ बाल-सुलभ अठखेलियों के मोहपाश में बधँकर जीवंत हो...खिल जाते । ऐसे सुंदर सुहाने बसंत ऋतु की कामना कभी शार्दूल ने की ही नहीं थी ..जिसके अनुभव से आज उनकी झोली भर गई थी । कभी आँख की किरकिरी बनी बुलबुल अब शार्दूल को दिलोजान से प्यारी हो गई ।
           बुलबुल की अठखेलियों से नख शिख तक तरंगित होने वाले शार्दूल का अहम् और जिद का आवरण अपने आप बर्फ की भांति पिघलने लगा। जीवन में आए इस परिवर्तन को महसूस करके उन्हें एहसास हुआ कि पुरानी और औछी मानसिकता में स्वयं को जकड़कर आगे कदम न बढ़ाना....खुशियों के सैलाब से स्वम् को ही वचिंत करना ...उनकी कितनी बड़ी मूर्खता थी।
            अब शार्दूल के मन में अपने और श्रेया के सुप्त,शांत और मृतप्राय अस्तित्व के लिए बुलबुल जैसी संजीवनी की अभिलाषा बलवती होने लगी । भूल सुधारने की कुलबुलाहट शार्दूल के दिल कुड़बुड़ाने के साथ ही साथ अंगड़ाईयाँ भी लेने लगा। शार्दूल अब अपनी सोच को क्रियान्वित करने के लिए बहुत बेचैन होने लगे।
              उसी दिन शाम की सुहानी बेला में जब सब लोग चाय की चुस्कियों में व्यस्त थे तब पश्चाताप की अग्नि में जलने वाले शार्दूल अनुराग से बड़े नम्र स्वर में बोले ," दोस्त,वर्षो पूर्व की गयी अपनी गलती का एहसास ...मुझे अब हो गया । तुमने जो कदम उठाया था वह सही था...मैं ही गलत था । अपनी खुशियों का द्वार मैंने खुद बंद किया था इसलिए आज अपनी खुशियों का वही द्वार मैं खुद खोलना चाहता हूँ । "
               "तुम करना क्या चाहते हो ,मुझे बताओ। मैं तुम्हारा साथ निभाने को तत्पर हूँ । बस मुझे आदेश करो ,मेरे दोस्त ।"अनुराग भी शार्दूल की अकुलाहट देखकर  भावुक होकर बोले ।
        अनुराग का संबल पाकर शार्दूल बोले," ठीक है दोस्त ,फिर चलो । आज हम लोग भी एक बच्चा गोद लेते है ।"
              "बच्चा गोद लोगे ..वो भी तुम ? अरे भाई,  तो फिर विलम्ब किस बात की है । बोलो कब चले....नन्हें मुन्ना को देखने।" अनुराग उत्तेजित होकर बोले ।
         "मुन्ना नहीं ....मुन्नी ।" शार्दूल हसँकर बोले ।
       अनुराग आश्चर्यचकित होकर हसँने लगे, बोले ,"ओह , मुन्नी आयेगी तो फिर तुम्हारे आन -बान और शान का क्या होगा ? " शार्दूल के बदले रुप की पहेली अनुराग समझ नहीं पाये फिर भी वे बहुत खुश हुए ।
          "अरे यार , इस आन-बान और शान को मारो गोली। मैंने अपना इरादा बदल लिया है। मैं भी गुड़िया गोद लूंगा...बुलबुल की तरह ...बुलबुल की छोटी बहन । "
                शार्दूल के इस अप्रत्याशित उद् घोष को सुनते ही श्रेया रोमांचित हो गयी ,बोली ," सच , ये क्या बोल रहे है आप ? इतनी बड़ी अचम्भित , अनहोनी ,अवांछित और अनमोल उपहार मेरी झोली में डालने के निर्णय से आप ने मुझे अचम्भित और कृतार्थ कर दिया । ऐसी दुर्लभ खुशी को मैं सम्भाल नहीं पा रही हूँ ...मैं क्या करु ?"
            .    शार्दूल श्रेया को अंक में भर कर  भावविह्वल हो गये ,बोले , " ओह मेरी प्यारी श्रेया , मैं तुम्हारा बहुत बड़ा गुनहगार हूँ। मुझे माफ कर दो । अपने अहम् की तुष्टि के नाम पर तुम्हारी भावनाओं को ठेस पहुचाँने की जो भूल मैंने की थी,उस भूल के प्रायश्चित का मौका देकर मेरा सहयोग करो ।"
             श्रेया शार्दूल के आलिंगन में रो प़ड़ी । मन की खामोश पीड़ा आँसुओं के सैलाब के रुप में अविरल बहने लगा । उसी समय बुलबुल  दोनों के बीच में आकर श्रेया को खींचते हुए बोली ," अंकल , छोड़िए मेरी आँटी को। आप आँटी को रुला क्यों रहे है ? "
         "अरे ,नहीं बाबा , भला ऐसी गुस्ताखी मैं कभी कर सकता हूँ । देखों , तुम्हारी आँटी रो नहीं , बल्कि हँस रही है । " शार्दूल श्रेया के आँसुओं को पोंछते हुए बोले ।
        श्रेया शार्दूल से अलग होकर बुलबुल को गोद में उठा कर बाँहों में भींच ली और निर्मिमेष भाव से  शार्दूल के बदले रुप को अपलक निहारने लगी । भैरवी अब तक मूक दर्शक बनी बैठी थी । उसको बोलने का कोई मौका ही नहीं मिला । पर सहेली के जिंदगी में आने वाले खुशियों के अम्बार के आभास से वह भी मन ही मन पुलकित होने लगी ।
           माहौल की इस सरगर्मी में क्षणिक मनन के बाद अचानक अनुराग  ऐसे खड़े हो गये ..जैसे उन्हें इसी पल की प्रतिक्षा बरसों पहले से थी । वे अति उत्साहित होकर बोले ," नेक काम में देरी...अब मुझे  बर्दाश्त नहीं , इसलिए सब लोग जल्दी तैयार होकर बाहर आईये । मैं कार निकालता हूँ। हम लोग अभी चलेंगे ... नन्हीं गुड़िया का पता लगाकर ले आने के लिए ।" यह कहकर अनुराग बाहर जाने लगे ।
              अनुराग के इस पहल भरे उत्साह के सामने किसी को कुछ कहने का मौका ही नहीं मिला ।  सबके चेहरे पर मुस्कान तिरोहित होने लगा ।
          इस प्रकार एक और बंजर भूमि पर फूल उगाने के अभियान के लिए ...सब लोग अति उमंग व उत्साह से लबरेज होकर  झटपट कार में सवार हो गये ।

No comments:

शंखनाद (कविता)