जब मेरा मन बौराया उत्कृष्ट साहित्यकार बनने के लिये (व्यंग्य)

साहित्य में अति रुचि के कारण साहित्यकारों के सारगर्भित उत्तम लेखन शैली और उनको उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए मिलने वाले सम्मान और प्रशस्ति पत्र की ओर मेरा ध्यान बार - बार आकर्षित  होने लगा। तब साहित्यकारों के आकर्षक व्यक्तित्व से प्रभावित होते होते कब मेरे भी मन में बिरले दर्जे का साहित्यकार बनने का कीड़ा कुड़बुड़ाने लगा ..यह मेरे छोटी सी बुद्धि के समझ से परे था । पर भ्रम में भ्रमण करने और भटकने से कोई किसी को रोक नहीं सकता , इसलिए मैं भी किसी के रोकने से रुकी नहीं । तभी तो इन महान विभूतियों के उत्तम लेखन शैली से अभिभूत होकर मैं भी सपनों के भँवर जाल में फँसते -फँसते अक्सर  अपने आप को उन महान विभूतियों की कतार में  खड़ी स्वयं को देखते हुए मंद -मंद मुस्कुराने लगी।  कोरी कल्पना कब और कैसे साकार होगी ?..इस भ्रम में भटकने और बहकने के कारण अक्सर मैं हाथ में कलम और कागज लेकर विचारमग्न होकर विचारों में खो जाती। घंटो एक ही मुद्रा में पड़े रहने और सोचने के बावजूद भी उत्तम  विचारों और भावों की बेहद कमी महसूस होती थी । मजबूरी थी...क्योंकि ऐसा  कोई भाव  मेरे संज्ञा शून्य मस्तिष्क में उपजता ही नहीं था , जिन्हें मैं अपने मन -मस्तिष्क में बो कर उत्तम रचना रुपी फसल की पैदावार बढ़ा संकू । मैं बौराई सी , बौखलाती हुई कुछ सोचती, खोती और भटकती रही पर कोई ऐसा भाव..मैं अपने मन में भर ही नहीं पायी जिसे मैं अपने कोरे कागज जैसे पांडूलिपी पर कुछ अंकित कर शुरुआत कर संकू । मैं खुले आकाश में पंख फैलायें परिंदे के समान उड़ान पर उडा़न भरती रही ,पर मन बावला किसी एक जगह ठहर ही नहीं पाता था । मन कभी प्रेमचंद की ईदगाह में विचरनें लगता , तो कभी जोश उमंग से भरा जोशिला गीत  ' खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी ' गाने लगता ,  तो कभी , 'यदि होता किन्नर नरेश मैं ,राज महल में रहता । सोने का सिंहासन होता , सिर पर मुकुट चमकता ।...' गुनगुनाने लगता। उच्च कोटि के साहित्यकारों की रचना  में रचते - बसते मन बावरा..कब भटक कर  उच्च कोटि के साहित्यकारों की कतार में स्वयं को खड़ा करके उन महान विभूतियों के सम्मान से सम्मानित होने वाले गौरव को खुद ग्रहण  करने लगती। पर झूठ कब तक मेरा साथ निभाता । प्रशस्ति पत्र पकड़ते  समय  हाथ कांपने और पैर डगमगाने के साथ ही  मैं कब अपने आप धड़ाम से गिर कर जमीन पर धूलधूसरित हो गई...यह चैतन्य अवस्था में आने के बाद ही पता चला ।
जागरुक अवस्था में जब मैं अपनी स्थिति का जायजा लेने लगी , तब पता चला कि मेरी अमूल्य कोरी डायरी... जमीन पर पड़ी टसूएं बहा रही थी , कलम अंगुलियों के बंधनों से अपने को मुक्त करके तकिए पर विराजमान हो गई और मेरा शरीर आधा बिस्तर पर और आधा जमीन पर औधे मुँह लटका  पड़ा था।
मुझे अपनी दयनीय और सोचनीय दशा बर्दाश्त नहीं हुआ ,तो मैं झटपट जागरूक लेखक की तरह उठकर बैठ गयी । आज एक कविता या कहानी पूरी करनी ही है ..यह दृढ़ निश्चय करके जब मैं बैठी तो मैंनें उम्दा साहित्यकारों की चार पाँच किताबें अपने चारोँ तरफ फैला ली । साहित्यकारों के शरण में तो मुझे जाना ही था, क्योंकि उन्हीं के प्रेरणा से मुझे उच्च कोटि का साहित्यकार जो बनना था ।पर वाह रे बुद्धि की बलिहारी ..जब सरल और सीधे तरीके से काम नहीं बना तो मैंने उंगली अपनी टेढ़ी कर ली ।और चुनिंदा साहित्यकारों के साहित्य से एक - एक , दो - दो लाइनों की नकल करके अपनी एक नयीं  कृति तैयार कर ली । नकल ...नहीं -नहीं ...यह तो सरासर चोरी और बहुत बड़ा गुनाह है । पर मेरा मनमयूर बौराया हुआ था , इसलिए सब कुछ समझते-बूझते हुए भी मन को कड़ा करके मैंने स्वयं को समझाया , बुझाया और शांत किया कि उफ ये चोरी या नकल नहीं है क्योंकि नकल के लिए भी अक्ल की जरूरत पड़ती है और ये बुद्धिमानी वाली अक्ल मेरी अपनी अक्ल थी ।आखिर इसमें भी तो मेरी अक्ल और बुद्धि के साथ - साथ मेहनत भी खर्च हुआ है ।और जब ये बुद्धि और अक्ल मेरी थी तो फिर ये मेरी रचना हुयी कि नहीं ..?  मैंनें डावाडोल होते हुए अपने मन को कड़ा करके एक बार फिर समझाया ,' डरो मत । ये तुम्हारी स्वरचित अपनी रचना है। इससे किसी और को कुछ लेना देना नहीं है । '  थोड़ी देर बाद बौराया हुआ मन जब खुद शांत हुआ तब मैं अपनी बुद्धि को खुद ही दाद देती हुयी ..दो चार और रचनाओं को रचकर कलमबद्ध कर ली और झटपट उन्हें लिफाफे में कैद करके लेटर बाक्स के सुपुर्द कर दी और फिर निश्चिंत होकर घर में चैन की नींद सो गयी । खर्राटों की आवाज ऐसी बुलंद थी मानों वे मेरी कामयाबी के जोशीले गीत गा रहे हो ।
अब मेरी अगली दौड़ शुरू हो गयी । पेपर या पत्रिका आने की हल्की आहट पर मैं उछलकर कूद पड़ती और दौड़ती हुई  किसी और के हाथ में पकड़ी पेपर या पत्रिका को उसके हाथ से छिनकर अपनी रचना को झटपट टटोलने लगती । पर वाह रे मेरी किस्मत...ये कैसी साहित्यशाला है ?...जहाँ मेरे जैसे मेहनती और जुझारू लेखिका का कोई कद्र करने वाला ही नहीं मिला ।
दिन - महीने - साल बीतते गये ।मेरे मेहनत का कोई कद्रदान नहीं मिला तो मेरी लेखनी भी जंग खाने लगी और मैं भी कुंठाग्रस्त होने लगी । पर मेरी उत्कण्ठा क्षीण नहीं हुयी थी ।ललक और जुझारूपन की इच्छा अब भी बरकरार था और  उच्च श्रेणी की साहित्यकार बनने की अभिलाषा अब भी मन में कुड़बुडा़ते हुए जीवित था ।
मैं सोचती रही । कुछ नयी रचना रचने का ताना-बाना बुनती और कल्पना लोक में विचरती रही ।
उसी बीच एकदिन जब कामवाली..सुशीला के साथ उसकी बेटी गौरी ..बिखरे बाल सहित रोते बिलखते हुए , माँ का दामन पकड़े ,चीखते -चिल्लाते हुए घर में घुसी , तो मैं चौककर उससे पूछी ," यह क्यों रो रही है ? "
" दीदी, यह स्कूल नहीं जाना चाहती है ।अब आप ही इसे समझाओ ..जब मैं इसे पढ़ाने को तैयार हूँ तो यह क्यों मेरी तरह अनपढ़ बनना चाहती हैं ? "
मैंनें गौरी को समझा-बुझाकर स्कूल भेज दिया । उसी समय ' बेटी बचाओ ,बेटी को पढ़ाओ ' का नारा बुलंद था ।मेरे भी मन में  गौरी की प्रेरणा से साक्षरता दिवस का भाव कुडबुड़ाया तो मैंने एक न पढ़ने वाली लड़की ...मुनिया  के मनोभावों को उजागर करने वाली कहानी 'मुनिया ' लिखी और एक बाल पत्रिका के ' कहानी प्रतियोगिता ' के शीर्षक में भेज दी ।
उम्मीद तो थी नहीं , क्योंकि सितंबर की पत्रिका दुकान पर आ चुकी थी और अक्टूबर में साक्षरता दिवस पर लिखी कहानी को कौन भला कोई अपनी पत्रिका में जगह देता ?
मन में उठे उथल-पुथल के बीच अक्टूबर माह की पत्रिका हाथ में आने पर ,  मैं अनमने भाव से जब पत्रिका लेकर पलटी ,तो मैं झटपट उछल पड़ी । क्योंकि मुझे अपनी कहानी मुनिया चमकती सी अपनी छटा बिखेरती दिख गई ।खुशी की सीमा अतिरेक थी ।आँखों की कोर में दो बूंद आँसू आकर टिक गये । जिसे  मैंने लोगों की नजरें बचाकर अपने आँचल में समेट लिया ।
       घर आकर जब सबने मेरी कहानी पढ़ी ,तो सभी बहुत खुश हुए । उत्साह से लबरेज होकर अब मेरी लेखनी कोरे कागज पर दौड़ने लगी ।अब मुझे किसी के साहित्य से पक्तियाँ चुराने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि विचार खुद -ब- खुद दिमाग में कौंधने लगे । शब्दों को क्रमबद्ध तरीके से संजोकर कलमबद्ध करना मैं सीखने और रचने लगी । क्योंकि साहित्य सृजन की शाला में मैं एक अदना सी विद्यार्थी रचनाकार हूँ  । साहित्य मन में उठते भावों का दर्पण होता है ।मेरे भी मन में उठते भावों से संचित की गई रचनाएँ पेपर और पत्रिका में अपनी जगह बनाने लगी । मैं समझ गयी कि महान साहित्कारों की टोली तक पहुचँने के लिए बहुत लगन ,मेहनत और सब्र की जरूरत होती है ।
सपनों की कोरी कल्पना से यथार्थ के सही मंच पर पैर जमाने में काफी कड़ी  मेहनत , लगन और जुझारूपन के साथ साथ लम्बा समय भी गुजारना पड़ता है । मैं हतोत्साहित नहीं हुयी । सफर के इस दौर में मैं चल पड़ी हूँ , तो चलती रहूंगीं । उच्च कोटि की साहित्यकार तो नहीं.. पर अदना सी छोटी रचनाकार तो बन ही सकती हूँ ।

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