पानी की चंद बूंदें (बाल कहानी)

चंदन पार्क के जामुन के पेड़ पर गोकी गौरैया अपनी दो नन्हीं बच्चियों मुनिया और चुनिया के साथ रहती थी। धीरे-धीर जब बच्चों के पंख निकल आये तब वह बच्चों को पार्क में उड़ना सिखाने लगी। एकदिन एकाएक चुनिया को मस्ती सूझा तो वह माँ से बोली,"माँ, सामने वाले बड़े से मकान के छत पर चलो। वहाँ छत के मुंडेर पर उड़ने में बहुत ज्यादा मजा मिलेगा।"
चुनिया का सुझाव गोकी को अच्छा लगा। वह भी बच्चों को नयी जगह दिखाना चाहती थी, इसलिए वह उपर जाने को सोचने लगी।
"पर माँ, मैं उतने उपर उड़ नहीं पाऊंगी। मेरी हिम्मत नहीं हो रही है। आप मेरी बात मान जाईये और यहीं उड़ना सिखाईयें।" चुनिया की  नई सोच पर मुनिया घबड़ाकर बोली।
मुनिया थोड़ी कमजोर थी, इसलिए उसकी हिम्मत जवाब देने लगी, पर गोकी उसकी हिम्मत बढ़ाते हुए बोली," बेटी, इतना डरते नहीं है। मैं तुम्हारे साथ हूँ। थोड़ी हिम्मत करो, हम उपर आराम से पँहुच जायेंगे।"
गोकी बच्चों को लेकर हिम्मत बढ़ाते हुए सामने के मकान के छत के उपर पँहुच गयी। खुले छत पर उड़ने में सभी को बहुत मजा आने लगा। वहाँ कोई और पक्षी दिख नहीं रहा था। गोकी चीं-चीं ,चूं-चूं करके दो कदम तक उड़ती फिर रुककर पीछे देखती।  उससे चन्द दूरी पर फुदकते हुए उसके दोनों बच्चे माँ को निहारते हुए चीं-चीं,चूं-चूं करते माँ के पास आ जाते और चोंच फैला देते। गोकी उनके फैले चोंच में अनाज के कुछ दाने डाल देती और आगे बढ़ जाती। थोड़ी देर में चीलू चुहिया आयी। बच्चों से हाय-हलो कर बातें की। फिर गोकी के साथ दाना चुगती रही। वह अपने बिल में जाने लगी तो गोकी बोली,"थोड़ी देर और ठहर जाओ। जब हम जायेंगे, तब तुम चली जाना।" पर चीलू को काम की जल्दी थी। वह गोकी की बात न मान के अपने बिल में घुस गयी।
अब गोकी अकेले ही बच्चों के साथ मजा लेने लगी। वह उड़ती और दाना चुगती रही। कुछ समय बाद जब सभी थककर चूर हो गये तब गोकी बोली," अब सभी लोग थोड़ी देर आराम करेंगे। आराम करने के बाद ही हम उड़ना शुरु करेंगें और पार्क में चलेंगे।" बच्चे आराम करने लगे। अचानक गोकी के बच्चों को प्यास लगी तो गोकी छत के चारों तरफ पानी ढ़ूढ़ने लगी। छत धूप के कारण तप रहा था। पानी न पाकर  मुनिया चीं-चीं, चूं-चूं करके चिल्लाने लगी," माँ, मुझे बहुत जोर की प्यास लगी है। प्यास के मारे तो मेरा दम निकलने ही वाला है।"
गोकी बोली," चिल्लाना बन्द करो, मुनिया। मैं अभी पानी ढ़ूढ़कर तुम्हें पिलाती हूँ।"
" माँ, यहाँ तो कहीं पानी है ही नहीं। आप बेकार ही चुनिया के जिद पर हमें छत पर घुमाने आ गयी। अपने बगिया में होते तो मैं कब की अपनी प्यास बुझा लेती।" परेशान  मुनिया माँ के भूल का एहसास कराते हुए माँ से बोली।
" बेटा, गलती कभी-कभी सभी से हो ही जाती है। मुझे क्या पता था कि इतने बड़े छत पर पानी की एक बूंद भी नहीं मिलेगी। लेकिन जब परेशानी आती है, तब घबड़ाते नहीं है। उस समय हिम्मत रखनी चाहिए।" गोकी चारों तरफ नजरें दौड़ाती हुई बोली।
   यह कहकर गोकी छत के मुंडेर पर बैठ गयी और चारों तरफ पानी ढ़ूढ़ने लगी। उसी समय कोली कौआ भी छत के मुंडेर पर कांव-कांव करते हुए आया और बैठ गया। पहले तो गोकी डरकर उड़ना चाहती थी। पर प्यासी मुनिया की याद आते ही वह वहीं बैठे-बैठे कोली से बोली," कोली भैया, तुम तो यहाँ अक्सर आते होगे। देखों ना इस छत के आसपास न तो कोई पेड़ ही दिख रहा है और न कोई पानी पीने की जगह। क्या तुम कोई ऐसी जगह बता सकते हो, जहाँ मैं अपनी मुनिया को शीघ्र ही पानी पिला संकू।"
कर्कश कोली कांव-कांव करके चिल्ला पड़ा," क्यों चिल्लाकर मेरी जान खा रही हो। मुझे भूख लगी है। मैं स्वयं ही रोटी खोजने में व्यस्त हूँ। मैं तुम्हारे साथ समय बर्बाद नहीं कर सकता। यह तो यहाँ आने से पहले सोचना चाहिए। जब सोचा नहीं तो पछताने की अपेक्षा उड़ो, मेहनत करो तब पानी जरुर मिल जाएगा।" यह कहकर स्वार्थी कोली कांव-कांव करते हुए उड़ गया।
चुनिया को कोली के सीख पर बहुत गुस्सा आया। वह बोली," मुसीबत में फँसे लोगों की मदद करने के बजाय स्वयं ही कांव-कांव कर रहे हो। और चिल्ला माँ पर रहे हो। अरे कभी-कभी किसी दूसरे की मदद करके मददगार भी बनना चाहिए। चलो माँ, कहीं और पानी  ढ़ूढ़ते है।"
गोकी बच्चों को लेकर आगे अगले छत पर उड़ गयी। पर यहाँ भी उसे पानी की कोई बूंद भी  नहीं मिला। तभी उसे एक बंदर मिंटू दिख गया। मिंटू मुंडेर पर बैठकर बड़े आराम से मजे लेकर आम खा रहा था। उसी समय बुलबुल बोनी अपने बुलबुल साथी के साथ चहकती हुई छत पर आई। गोकी बोनी से पानी पूछने ही वाली थी कि बोनी मिंटू को देखकर डर के कारण उड़ गयी। अब गोकी के पास मिंटू से पूछने की अपेक्षा कोई चारा नहीं बचा था।
गोकी मिंटू से बोली," मिंटू भैया, आप मेरी मदद कर दो। गर्मी से मेरी मुनिया का हाल बेहाल हो रहा है। उसे बहुत प्यास लगी है। कहीं पानी दिख रहा हो तो मुझे बता दो। मैं उसे वहाँ ले जाकर पानी पिला दूंगी। मेरा पार्क यहाँ से बहुत दूर है। वह वहाँ तक पहुँच नहीं पायेगी।"
मिंटू गुर्राकर बोला," देखती नहीं हो कि मैं आम खाने में व्यस्त हूँ। मुझे पता नहीं है। पूछना है तो किसी और से जाकर पूछों।"
गोकी मुनिया और चुनिया से बोली," तुम लोग थोड़ी देर और सब्र करो। मैं तब तक पानी ढ़ूढ़कर आती हूँ। यह कहकर गोकी उड़ने को हुई कि मुनिया चिल्ला पड़ी," माँ मुझे छोड़कर नहीं जाओ। मेरा प्यास के मारे दम निकल रहा है। मैं अभी गिर जाऊँगी।"
मुनिया की हालत देखकर गोकी रुक गई। वह घबड़ा गई। इतने पक्के मकानों के छत पर पानी की एक बूंद भी नहीं दिख रहा था। पार्क भी यहाँ से दूर है। मैं मुनिया को पानी कहाँ से लाकर दूं। अभी गोकी यह सोच ही रही थी कि गिच्चू गिलहरी कहीं से फुदकती हुई वहाँ आ गयी। उसे जब गोकी से पता चला कि मुनिया प्यास के कारण बेहाल है तो वह घबड़ा गयी। उसने आराम से आम खाते मिंटू को देख लिया। वह गुस्से से मिंटू को देखकर चिल्लाई," मिंटू, मुनिया को प्यास लगी है, उसे मदद की जरूरत है और तुम आराम से बैठकर आम खा रहे हो। जाकर जल्दी देखकर बताओ कि रंजीत भैया के छत पर तसले में पानी भरा है कि नहीं। मैं मुनिया को लेकर वहीं आती हूँ। रंजीत भैया रोज अपने छत पर तसले में पानी भरकर रखते है। मैं वहीं रोज पानी पीने जाती हूँ।"
  गिच्चू के चिल्लाने का असर मिंटू पर हुआ। वह आम खाना छोड़कर रंजीत के छत की तरफ कूद गया। जाते-जाते चिल्लाकर बोला," मैं भी तो वहीं से पानी पीकर तृप्त होता हूँ।"
"फिर तुमने गोकी को क्यों नहीं बताया?" गिच्चू ने प्रश्न किया, जिसे मिंटू सुन नहीं पाया। तब
गिच्चू गोकी से बोली," गोकी, तुम मुनिया को लेकर मेरे पीछे आओ। ये रंजीत बहुत ही नेक और अच्छा लड़का है। वह हम जैसे लोगों के लिए अपने छत पर पानी और अनाज के दाने जरुर रखता है। मैं प्रतिदिन वहीं पानी पीती हूँ।" यह कहकर गिच्चू आगे-आगे फुदकने लगी।
पानी की चंद बूंदे जिंदगी के लिए कितनी महत्वपूर्ण होती है। यह मुनिया के प्यासे होने पर गोकी को अनुभव हुआ। 'यदि आज रंजीत भैया के रखें पानी की उम्मीद न होती तो नीचे पार्क तक जाते-जाते न जाने मुनिया की क्या दशा हो जाती।' गोकी बुदबुदाती हुई मुनिया-चुनिया को ढ़ाढ़स बँधाने लगी। फिर धीरे-धीरे गिच्चू के पीछे मुनिया-चुनिया के साथ उड़ने लगी।
इसी बीच मिंटू ने आकर बताया कि रंजीत के तसले में लबालब पानी भरा है। सब लोग रंजीत के छत पर पँहुच गये। मुनिया के साथ सभी ने अपना गला तर किया। पानी पीकर मुनिया बोली," माँ, मेरी प्यास बुझ गयी, अब मैं बिलकुल ठीक हूँ।"
"बहुत भले और अच्छे हैं रंजीत भैया। आज उनके इस नेक काम से मेरी मुनिया को नया जीवन दान मिला है। रंजीत के रखें जल से मेरी मुनिया की और  मेरे जैसे न जाने कितने प्यासों की प्यास यँहा आकर बुझती होगी।" गोकी खुश होकर बोली।
"एक बात और है...गोकी। रंजीत भैया के घर के सामने नाद में भी पानी भरा रहता है। बहुत से जानवरों को मैं उससे प्यास बुझाते देखती हूँ।" मुनिया को खुश देखकर गिच्चू बोली।
गोकी बोली," रंजीत भैया के इस उपकार को महसूस करके मैं सोच रही थी कि यदि हर मकान की छत पर ऐसे ही पानी रखा मिलता तो किसी भी पक्षी को प्यास के कारण तड़पना नहीं पड़ता। जैसे मेरी मुनिया तड़प रही थी।"
"तुम्हारी सोच सही है, गोकी। मैं उम्मीद करती हूँ कि मुनिया की परेशानी से बहुत से बच्चे अपने छत पर पानी-दाना रखना शुरू कर देंगें ताकि लोगों के सही सोच के कारण हमें भविष्य में ऐसी मुसीबत का सामना नहीं करना पड़ेगा। अब तो मुनिया की मुसीबत टल गयी। और अंधेरा भी घिरने वाला है। चलो, सब लोग अपने-अपने घर चलते है।"
इसके बाद सभी लोग खुशी-खुशी अपने ठिकाने पर चले गये।
                      

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