पाॅलिथिन का थैला (व्यंग्य)

 झटपट लाल आँफिस से छूटे तो झटपट घर की तरफ लपके । क्योंकि घर लौटते समय उन्हें एक ही बात की चिंता सताती थी कि घर पहुँचते ही पत्नी का फरमान जारी हो जायेगा कि घर में सब्जी नहीं है । मैं क्या पका कर तुम्हें खिलाऊंगी । इसलिए जाकर सबसे पहले सब्जी ले आओ ।
                           झटपट लाल जी सब्जी के महत्व को समझते थे । क्योंकि उनकी  यही मुसीबत थी कि सब्जी न लाओ तो मुई न जाने क्या पकाकर सामने रख देगी, कहेगी," सब्जी नहीं थी घर में । बेसन की सब्जी बनाई है । बिना नाक भौ सिकोड़े चुपचाप खा लेना । पहली बार गुगल से विधी ढ़ूढ़कर मेहनत से बनायी हूँ । "
      घर पहुँचकर आखिर में वही हुआ जिसके बारे में झटपट लाल जी अभी तक चिंतित थे । घर पहुँचते ही जब पत्नी झूलीका ने सब्जी  की फरमाइश कर दी तो झटपट लाल बोले ," अरे भागवान, सब्जी की फरमाइश तो कर दी  , पर अभी तक तुमने कोई थैला तो दिया ही नहीं । जिसमें मैं सब्जी ले आऊं ।"
झूलीका चौंककर बोली , " थैला ?  अरे, ये थैला का झमेला तुम रोज क्यों खड़ा करते हो ?  जानते हो तुम कि मेरे पास कोई थैला-वैला नहीं है । "
झूलीका ने थैला न होने की झकझक शुरु की तो झटपट लाल भी नहले पर दहला मारते हुए बोले ," आँफिस से आते ही सब्जी के लिए सर पर सवार हो जाती हो । अरे , कोई थैला पकड़ाओगी या ऐसे ही हाथ में पकड़कर लाऊंगा सब्जी ।" झटपट लाल हाथ में आलू पकड़ कर झूलीका के सामने झुलाते हुए बोले। "ये थैला का कौन सा झमेला लेकर तुम रोज-रोज मेरे सामने खड़े हो जाते हो ? इतनी हेकड़ी घर में दिखाने की जरूरत नहीं है । ये प्लास्टिक का थैला लो । वैसे बाजार में पॉलिथीन में ही सब्जी मिलती है । तुम  भी जाकर पॉलिथीन में ही सब्जी ले आओ । समझे ? " झूलीका अकड़कर बोली ।
               झटपट लाल झूलीका के सामने नम्र पड़ गये इसलिए नम्रता से बोले ,"अरी भागवान , तुम तो जानती ही हो कि मैं पॉलिथीन में सब्जी लाने से कतराता हूँ ..फिर भी तुम आज तक एक कपड़े के थैले का इंतजाम नहीं कर पायी हो। "  
         झूलीका झल्लाकर बोली , "जानते हो , मैं थैला नहीं रखती । तब भी बखेड़ा खड़ा कर देते हो । एक ही बात को कितने दिन समझाना  पड़ेगा ।"
झटपट लाल झूलीका को समझाने की गरज से बोले ,  "अरे बन्नो, क्यों मेरी मिट्टी पलीदी करने पर तुली हो ? सरकार ने पॉलिथीन पर बैन लगाया है । इसलिए यदि मैं पकड़ा जाऊंगा, तो सीधे मुझे जेल की हवा खानी पड़ेगी । "
"जेल ही तो जाना पड़ेगा । दो-चार दिन वहाँ का भी हवा खाने में क्या बुराई है । मैं भी इन फुर्सत के पलों में बच्चों के साथ मायके हो आऊंगी । वैसे तो तुम जाने ही नहीं देते हो ।" झूलीका बात को हल्का करने की नीयत से बोली ।
झटपट लाल अपने ही धुन में थे , बोले , "अरी भागवान , कुछ तो डरो ..पर्यावरण के प्रदूषण से , जो अधिकतर पॉलिथिन के कारण ही फैली है । वैसे पॉलिथीन के प्रयोग पर सरकार ने  बैन भी लगाया है पर इससे कुछ नहीं होगा ..जब तक कि हम जैसे नागरिक जागरूक न हो जाये ।"
" तुम तो हमीं पर धौंस जमाने के लिए बने हो । जब पॉलिथीन की ही जय जयकार चारों तरफ मची हुई है । तो तुम भी उसी के सुर में सुर मिलाओ । क्यों अलग से गला फाड़ने पर तुले हो ? "
झटपट लाल दुखी होकर बोले ," अरी भागवान , कैसी गलत शिक्षा दे रही हो । जब सब कुएँ में कूद रहे है तो क्या तुम मुझसे भी यही उम्मीद करती हो कि मैं भी कुएँ में कुद जाऊं । शर्म आती है मुझे तुम पर । "
"गलत शिक्षा कैसी ? मैं तो तुम्हें जमाने के साथ चलने को कह रही हूँ । तुम जानते ही हो कि चाहे कोई कम्पनी हो या बाजार हो , सभी अपने उत्पाद को चाहे वह बड़ा हो या छोटा या प्रतिदिन प्रयोग में आने वाली चीजें हो...सभी को वे पॉलिथिन बैग में सजाकर बेचते है। जैसे -चिप्स,कुरकुरे, टॉफी और पानी के बोतल आदि । सभी इनका दिल खोलकर स्वागत करते है । किसी को इसके प्रयोग से कोई इंकार नहीं है । जबकि परिणाम सब जानते है कि इसके प्रयोग से अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मारने से जो गम्भीर घाव होता है उसकी पीड़ा को खुद ही प्रदुषण के रुप में हमें ही सहना पड़ता है ।"
झूलीका के इस प्रवचन से झटपट लाल खुश होकर बोले ,"  अरे मेरी बन्नो , तुम उतनी मुर्ख हो नहीं , जितना मैं समझता था । पर जब तुम्हें ही इसके उपयोग से परहेज नहीं है , तो हम दूसरे को दोष नहीं दे सकते है ।"
" ज्यादा नैतिक शिक्षा देने की जरूरत नहीं है । जैसे सब बहती गंगा में हाथ धोते जा रहे है ,वैसे ही तुम भी हाथ धोते जाओ । तुम्हें रोकने वाला कोई नहीं है । न तो कोई सरकार और न कोई जागरूक जनता या कोई जागरूक संस्था । प्रदूषण हो रहा है तो होने दो ...कौन सा अपने बाप की जेब से खर्च हो रहा है जो मैं बैठकर रोऊ । "
"लानत है ..तुम्हारी मुर्खता भरी सोच पर । समझदार होते हुए भी तुम्हारे जैसे मूरख से ही देश का बंटाधार हो रहा है , वरना आज धरती माँ और नदियाँ यूं विघटित न होने वाली पॉलिथिन से पटी न होती । जैसे आज जगह जगह पर पॉलिथीन का कृत्रिम पहाड़ मुँह बायें मुँह चिढ़ाता सा दिख रहा है । कभी आँखें खोलकर देखो , तब समझ में आयेगा कि यह मनुष्यों के साथ साथ जल-थल पर रहने वाले सभी जीव-जन्तुओं के लिए भी बहुत घातक है । "
"देखों झिनकू के पापा ,  मैं मुर्ख नहीं हूँ.. सोचती-बुझती और समझती मैं भी सब कुछ हूँ। ये मिट्टी और पानी में गलती नहीं है , जलाने पर ये वायु को प्रदूषित करती है । इसके निर्माण , प्रयोग या नष्ट करने की  तीनों प्रणाली हमारे लिए घातक है । एक तरह से ये जहरीले नाग की तरह हमें अपने फन में जकड़े हुए है पर सुख-सुविधाओं का लोभी इंसान जानबूझकर दूसरों को जिम्मेदार ठहराकर खुद को बचना चाहता है । प्रदूषण विश्व स्तरीय समस्या है । अतः इसका निवारण भी विश्व स्तर पर होना चाहिए । पर कोई इससे छुटकारा पाना नहीं चाहता है । सब आँखेँ मूंदकर कुदरत  की सुंदरता को तहस-नहस करने पर तुले है । "
"अरे भागवान , यही तो मैं भी तुम्हें समझाना चाहता था । पर तुम भी एक थैला न सिलकर दुसरों  के ताल में ताल मिलाकर नाचना चाहती हो और खुद को छोड़कर दूसरों पर दोष  मढ़े जा रही हो । "
झूलीका अफसोस करते हुए बोली , " सच, आज तुमने मुझे आईना दिखाकर मेरी सीरत से मेरा सामना कराकर मुझे सचेत कर दिया । आस्तीन में सांप पालने जैसे ही सब पॉलीथिन को पाले हुए है । पर अपनी सुख सुविधाओं और महत्वाकांक्षी होने के कारण ही हम इसके दुष्परिणाम व दुष्प्रभावों को जानते बुझते हुए इसके जाल में फँसने के बावजूद भी अनजान बनकर जीते है । कोई पहल करना नहीं चाहता है ,  जैसे मैं खुद । अब मै समझ गयी, सचेत होना हमारी पहली प्राथमिकता है । "
"अरे  मेरी प्यारी बन्नो, पहले तुम खुद को जागरूक करो..उसके बाद अपने घर के लोगों को, फिर अपने साथ वालों को जागरूक करो कि ऐसे समानों का प्रयोग कम से कम करें जो हमारे जीवन को धीरे धीरे डस कर बर्बाद कर रहा है । दृढ़ संकल्प पहले अपने आप से करो । जब हम बदलेंगें तभी देश बदलेगा । "
झूलीका को पति की बातें अच्छी लगी । बोली," देखो जी , गुस्ताखी माफ कर देना ।  आज से , नहीं , बल्कि अभी से  पर्यावरण में प्रदूषण की मात्रा कम करने के लिए पॉलिथिन जैसी चीजों का प्रयोग बंद । तुम बैठो । चाय पीओ। आज सब्जी तब आयेंगी जब मैं तुम्हें कपड़े का थैला सिलकर कर दे दूंगीं।"
"शाबाश, मेरी भागवान ,  आज आया ऊँट पहाड़ के नीचे । बड़ी देर कर दी सदबुद्धि लाने में ,पर समझकर अमल में लाना..मत भूलना । जब जागों तभी सबेरा होता है ।  यदि देश के एक एक नागरिक में ऐसी समझदारी आ जायें तो क्या कहना ? हमें किसी दूसरे को समझाना ही नहीं पड़ेगा और प्रदूषण अपने आप हमसे दूर होता जायेगा । "
"ठीक है , झिनकू के पापा । अब मुझे ज्यादा शर्मिंदा मत करो । मैं पर्यावरण संरक्षण में सदैव तुम्हारे साथ हूँ ।" झूलीका बोली ।
यह सुनकर झटपट लाल गर्व से बोले ," ठीक है मेरी भागवान । तो फिर आओ , हम पति-पत्नी मिलकर पर्यावरण को स्वच्छ रखने के नाम पर पहले संकल्प  के रुप में कपड़े के थैला तैयार करते है और फिर गर्मागर्म चाय पीकर सब्जी लाते है । " झटपट लाल झूलीका का हाथ पकड़कर धम्म से सोफे पर बैठ गये ।

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शंखनाद (कविता)