लाॅकडाउन की लीला (लेख)

मैं तो लाॅकडाउन शुरु होने के पहले से ही स्वयं को ताले में बंद महसूस करती हूँ। जब से लखनऊ के पाॅश इलाके में रहने का सुअवसर मिला तब से गौरवान्वित होने की अपेक्षा मायूसी ज्यादा परिलक्षित होती है, क्योंकि जिंदगी बीत गयी मुहल्ले बाजी करते हुए। पर अब अपने कुनबे में ही बंद जैसी लगती हूँ। मुहल्ले बाजी की वो चुहलबाजी, पकवानों का आदान-प्रदान तो इस पाॅश इलाके में विलुप्त ही हो गया। अब के पड़ोसियों से हाॅय-हलो सड़क पर होती है या पार्क में। किसी के घर का चाय नसीब होना अदृश्य सपने सदृश है। वैसे कहीं-कहीं किटी पार्टी जिंदा है। 
किसी के घर आने जाने के लिए सगे-संबंधियों से संपर्क साधना पड़ता है। पर लखनऊ जैसे शहर में किसी रिश्तेदार के घर जाने के लिए पूरा दिन चाहिए। क्योंकि कोई रहता है तीर-घाट तो कोई मीर-घाट। एक दो पारिवारिक सदस्य घर के आसपास रहते है। जब मेरा मन उबने को होता मैं उनके यहाँ पहुचँ जाती, जब उनका जी घबड़ाता, वे मेरे आ जाते। यह अवसर छह-सात माह में एक बार आता है। पर तब भी हँस-मुस्कुरा तो लेते थे।
अब इस लाॅकडाउन के समय में इन पारिवारिक संबंधों में भी ताले लग गये है। ना किसी का आना और ना स्वयं कहीं जाना। एकांत...बस एकांत ।।। 
जीवन के आखिरी समय में इन्हीं पारिवारिक संबन्धों के कंधों पर सवार हो कर लोग इस दुनियाँ से कूच करते थे। पर वाह रे, कोरोना वायरस का वैश्विक महामारी... तेरी लीला अपरम्पार है, अब तो खुशनसीबों को ही चार कंधे नसीब होते है, वरना तो ऐसे ही जाना पड़ता है... ऐसे ही जाना है... बिना मोह-माया, बिना लगाव के.. अकेले-अकेले... बिलकुल अकेले। यही है कोरोना जमाने का चलन उर्फ दस्तुर।

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