फूलों सी मुस्कान (बाल कहानी)

चम्पा अपनी गुड़िया को अच्छे कपड़े पहनाकर फूलों वाली लड़ियों से उसे सजा रही थी ।वह अपने काम में मस्त व व्यस्त थी ।तभी वह अकेले ही बहुत खुश नजर आ रही थी ।
उसी समय उसका भाई  चंदन पार्क से खेलकर घर में दाखिल हुआ और उसके रंग में भंग डालते हुए जोर से चिल्लाया ," चम्पा , एक गिलास पानी दे दो । बहुत प्यास लगी है । "
" खुद जाकर ले लो । देख नहीं रहे हो कि मैं खाली नहीं हूँ । " चम्पा अपनी गुड़िया को प्यार से दुलराते हुए तपाक से बोली , तो चंदन को गुस्सा आ गया ।
वह चम्पा के पास आकर उसके हाथ से गुड़िया छिनने की कोशिश करते हुए जोर से बोला ," देती है कि नहीं । वरना अभी दो थप्पड़ भी जड़ दूंगा ।"
चम्पा को भी गुस्सा आ गया । वह अपनी गुड़िया पकड़े पकड़े जोर से  चिल्लाते हुए बोली ,"जाओ अब तो और नहीं देती । तुम्हारी जो मर्जी हो ,वो कर लो ।"
" ठीक है । तुम मेरी बात नहीं मानती तो मैं भी तुम्हारी कोई बात कभी नहीं सुनुँगा ।"
"मत सुनना , कौन तुम्हें मनाने आ रहा है ।"
" ठीक है , तू जो राखी बहुत मन से और खुशी से मेरे लिए लायी थी..वह तुम अपने ही पास रखना । मैं तुझसे नहीं बधँवाने वाला । " चंदन अपने भाई होने का गुरुर दिखाते हुए जोर से बोला ।
चम्पा खुद को कम नहीं समझती थी इसलिए तैश में बोली , "जा जा । मैं भी नहीं बाधँती तुम्हें राखी । तुम भी कोई और बहन को खोज लेना ।"
चंदन अब नरम पड़ गया । वह बात को नर्मी से सुलझाना चाहता था । इसलिए शांत स्वर में बोला ,"अरे अब भी मान जाओ और एक गिलास पानी दे दो। मैं तुम्हें माफ कर दूंगा ।"
"मैं नहीं देती । तुमने मेरी गुड़िया को खींचा क्यों था । उसकी बाहें टूट जाती तो क्या तुम बनाते ? जाओ ,पानी पी लो ।मुझे अपना काम करने दो ।"यह कहकर चम्पा अपनी गुड़िया में व्यस्त हो गई ।
चंदन खुद पानी लेकर पी लिया ।चम्पा उसे घूरने लगी तो वह मुँह चिढ़ाता हुआ बाहर चला गया ।
चंदन पहले ही पानी लेकर पी लेता तो उसका झगड़ा चम्पा से होता ही नहीं । चंदन बार बार चम्पा पर रौब झाड़कर उसे परेशान करता था । उसकी ऐसी आदत सी पड़ गयी थी । जब कि माँ बार बार उसे समझाती कि वह तुम्हारी प्यारी , दुलारी छोटी बहन है । उससे प्यार भरी प्यारा संबंध बनाओ , तो वह तुम्हारी हर बात मानेंगी ,पर चंदन  मानता नहीं था । उसे अपना अकड़ और रौब दिखाने में ही मजा आता था ।
                दो दिन बाद चम्पा और चंदन.. दोनों का मनपसंद और प्यारा रक्षाबंधन का त्यौहार था । रक्षाबंधन पर्व की इंतजारी दोनों भाई-बहन बड़े शौक और उत्साह से करते थे । तभी तो चम्पा चंदन के पसंद की सुंदर झिलमिलाती हुई बडी़ सी राखी खरीद कर लायी थी और जिसे वह बड़े जतन से संजोंकर  रखी थी । चंदन भी चम्पा को गिफ्ट में देने के लिए चम्पा के पसंद की सुंदर गुड़िया खरीद कर लाया था ।
लेकिन आज रक्षाबंधन के पावन पर्व के दिन चम्पा  यह सोचकर परेशान थी कि जब चंदन  भैया से कट्टी हो गयी तो वह चंदन को राखी कैसे बाँधेंगी ? वैसे दुविधा में दोनों थे तभी दोनों अपने - अपने अकड़ के कारण अपने को काम में व्यस्त दिखा रहे थे पर एक दूसरे से बोलते नहीं थे ।
चम्पा सुबह ही नहा धोकर तैयार हो गई और उसने अपनी राखी का थाल भी सजा लिया । पर वह चंदन को बुलाती कैसे ? वह माँ की इंतजारी करने लगी ताकि माँ चंदन को बुलाने में उसकी मदद कर सके पर माँ किचन में पकवान बनाने में व्यस्त थी । वह माँ से बोली ,"मम्मी, अभी आपको कितना समय लगेगा ? मैं तैयार हो गई हूँ ।"
"बस थोड़ी देर और इंतजार करो ।अभी आ रही हूँ । तब तक चंदन भी तैयार हो जायेगा ।"
"ठीक है मम्मी । मैं बैठी हूँ । आप जल्दी से आइये ।"चम्पा यह कहकर अपनी गुड़िया से खेलने लगी ।
चंदन उठा ,नहाया और तैयार हो गया । इसके बाद वह बिना किसी से बोले और बताये बाहर निकल गया ।आज वह चम्पा से राखी न बधँवाकर चम्पा को मजा चखाना चाहता था ।वह मन ही मन में खुश था।चम्पा दुखी व परेशान होगी तो उसे बहुत मजा आयेगा ।
    बाहर निकलकर चंदन पार्क में इधर उधर टहलकर समय व्यतीत करने लगा । काफी समय बाद उसे मम्मी पापा दिखाई दिए जो उसे पुकारते हुए उसे ढ़ूढ़ रहे थे । चंदन मौका देखकर झाड़ियों के बीच में और छुप गया । जिससे उसके मम्मी-पापा उसे ढ़़ूढ़ नहीं पाये और वापस चले गये । वह घर नहीं गया ।
   समय बीतता गया और दोपहर हो गई ।उसके पेट में चूहें कूदने लगे ।चम्पा को मजा चखाने के चक्कर में वह भूखा भी रहा पर जब भूख बर्दाश्त से बाहर होने लगा तब वह सौरभ के घर चला गया ।वहाँ उसने आंटी के हाथ का बना पकवान छक कर खाया और संतुष्ट होने पर आराम से सोफे पर पसर गया और टीवी देखने में तल्लीन हो गया।
   थोड़ी देर बाद शेखर और मयंक आ गये । शेखर बोला ,"अरे यार चंदन , अभी तक तुमने राखी नहीं बधँवायी ।वाह मजा आ गया । हर साल तुम सबसे पहले राखी बधँवाकर हम लोगों को चिढ़ाते थे ।आज मुझे मौका मिला है । बोलो कहाँ है तुम्हारी राखी ।"
"मुझे छेड़ो मत।आज मैं राखी नहीं बधँवाऊंगा । मेरी बहन बहुत नकचढ़ी हो गयी है ।उसे मजा चखाना है अभी ।"
मयंक बोला ,"अरे दोस्त ,गुस्सा थूको । कोई आज के दिन बहन से रुठता है । मुझे देखो , मेरी कोई बहन नहीं है इसलिए मैं बहन के लिए तरसता रहता हूँ  । यह तो भला हो रेखा दीदी का जिन्होंने मुझे  भाई मानकर मुझे राखी बाधाँ है और तुम्हें बहन मिली है तो तुम्हें उसकी कोई कद्र नहीं ।"
"कद्र क्यों करु ? वह मेरी बात मानती ही नहीं है तभी तो आज उसे परेशान करने निकला हूँ ।मजा आयेगा उसे...जब वह मुझे न पाकर हैरान व परेशान हो रही होगी ।"
"यह तुम्हारे ही वश की बात होगी ।मैं तो कभी ऐसा नहीं कर सकता । मैं अभी तुम्हारे घर जाकर सुचित करता हूँ कि तुम यहाँ छुपे हुए हो ।" मयंक थोड़ा क्रोध में बोला ।
उसी समय बाहर से आवाज आयी ," सौरभ, जरा सुनो ।"
सौरभ बाहर आकर बोला ,"क्या बात है ,आदित्य ? तुम घबड़ा क्यों रहे हो ? "
"क्या तुमने चंदन को कहीं देखा है ? वह मिल नहीं रहा है । आंटी अंकल बहुत परेशान हो रहे है । रो रोकर चम्पा बेहोश हो गई हैं ।आंटी अंकल उसे लेकर अस्पताल जा रहे हैं ।"
तभी शेखर ,मयंक के साथ चंदन भी बाहर आ गया । चंदन बोला," क्या हुआ चम्पा को ,जल्दी बताओ ?"
" तुम यहाँ आराम से बैठे हो। जल्दी चलो। चलकर खुद ही अपने घर का नजारा देख लो ।मैं क्या बोलू । " आदित्य आश्चर्यचकित हो जल्दी से बोला ।
चंदन के साथ सभी बच्चे  चंदन के घर की तरफ दौड़ने लगे । घर पहुचँ कर चंदन ने देखा..चम्पा बेहोश है और मम्मी पापा उसे लेकर अस्पताल ले जाने की तैयारी कर रहे थे क्योंकि चम्पा को होश नहीं आ रहा था ।
माँ चंदन को देखकर बोली ," बिना बताए कहाँ चले गये थे ? तुम्हारी इंतजारी में देखो इसका क्या हाल हो गया है । "चंदन दौड़कर चम्पा के पास गया और बोला ,
"चम्पा उठो , देखो मैं आ गया हूँ । आँखे खोलो मेरी बहन । मैं तुम्हें छोड़कर अब कहीं नहीं जाऊंगा। उठो मेरी बहना , देखो राखी बाधँने का समय बीत रहा हैं । मैं खुश हूँ कि मुझे तुम जैसी बहन मिली ।"
माँ चम्पा के बालों में हाथ फेरती हुई और मुहँ पर पानी की छींटे मारती हुई प्यार से बोली ," देख चम्पा, तेरे सामने कौन खड़ा है ...तुम्हारा भाई चंदन । अब जल्दी से उठ ,वरना राखी बाँधने का समय निकल जायेगा ।"
चम्पा को धीरे धीरे होश आया तो उसने धीरे से आँखेँ खोली । सामने चंदन को देखकर वह चंदन से लिपटकर रोती हुई बोली ,"भैया, कहाँ चले गये थे मुझे छोड़कर ? अब मैं तुम्हारी सब बातें मानुंगी ,पर तुम मुझे छोड़कर अब कहीं नहीं जाना। मुझसे वादा करो ।"
चंदन को अपनी गलती का एहसास हो चुका था । वह चम्पा की हथेली प्यार से दबाते हुए चम्पा से बोला ," चम्पा, मेरी बहन ,यह मेरी पहली भूल थी ।मैं नादानी में तुम्हें मजा चखाने के चक्कर में ऐसी गलती कर बैठा।आइंदा मुझसे ऐसी भूल नहीं होगी ।चल मेरी बहना ,पहले मुझे राखी बाधँकर अच्छी वाली मिठाई खिला। फिर कुछ और करेंगे । "
"अरी चम्पा, देखो । चंदन के पीछे तुम्हारे कितने सारे भाई राखी के इंतजारी में खड़े है। उठो सबको राखी बाँधों और मिठाई खिलाओ ।"
"हाँ हाँ, तुम्हारे हाथ की मिठाई और आंटी के हाथ का पकवान खाने के लिए हमारे पेट में चूहे उछल कूद मचाये हुए हैं । इसलिए जल्दी करो ।समय नहीं है । उन्हें पकवान चाहिए ।" मयंक अपने पेट को सहलाते हुए बोला तो चम्पा हसँकर , बोली ,भैया, मैं अभी जल्दी से तुम लोगों के चूहे भगाने का उपाय कर रही हूँ ।आप लोग आराम से बैठ जाईयें ।"
चम्पा ने चंदन के साथ ही उसके दोस्तों को भी राखी बाँधी और मिठाई खिलाकर सबका मुँह मीठा कराया । इसी बीच चंदन की माँ पकवानों से  डांईनिंग टेबुल को सजाकर भर दी । हँसी ठिठोली करते हुए सारे बच्चे स्वाद लेकर पकवानों का मजा लेने लगे ।
इस प्रकार रुठे भाई- बहन के अद्भुत प्रेम मिलन से रक्षाबंधन का त्यौहार बड़ी धूमधाम से सम्पन्न हुआ ।जिसके कारण चम्पा के मुखमंडल पर फूलों सी मुस्कान खिल गयी ।

No comments:

शंखनाद (कविता)