विचित्र जादूगर (बाल कहानी)

नादान वन के जंगली रेगिस्तानी जगह पर नागफनी के पौधों का जमावड़ा था। सभी नागफनी मस्त और खुशहाल थे। पर गफनी नाम का नागफनी हमेशा बहुत दुखी रहता था। क्योंकि उसे अपना गद्देदार मोटा हरा शरीर बिलकुल पसंद नहीं था और उस पर पतले-पतले नुकीले चुभने वाले काँटों से उसे बेहद चुभन होती थी। वह दिन-रात इसी सोच में फँसा रहता कि कैसे वह अपने अनिच्छुक बेकार थुलथुल शरीर को बदल कर सुंदर व आकर्षक बना सकें। गफनी के इस दुख का कोई समाधान नहीं था। क्योंकि गफनी किसी को अपना ऐसा दोस्त भी नहीं बनाया था, जो उसके गलत सोच में सुधार करके कुछ अच्छा समझा सकें और उसे सही राह दिखाकर उसके कष्ट को कुछ कम कर सकें।
एकदिन बिरजू नाम का अनोखा, तिकड़मी, समझदार पर चालाक जादुगर उधर से गुजर रहा था। वह बड़ा सा लबादा पहने हुए था। उसके कंधे पर थैला और हाथ में एक छड़ी थी। वह कहीं से जादू दिखाकर लौट रहा था, इसलिए बहुत थका हुआ था। आसपास कोई बड़ा वृक्ष दिख नहीं रहा था। अचानक उसे लेटने की इच्छा हुई तो वह गफनी के पास ही अपने थैले को सर के नीचे रखकर  सो गया। दोपहर का समय था। सूरज सर पर सवार था। गफनी ने देखा कि कोई पथिक पसीना से लथपथ उसके जड़ के पास सो रहा है। गफनी को अनजान बिरजू नामक उस पथिक पर दया आ गई। वह अपने मोटे गुदगुदे पत्तों का छतरी बनाकर बिरजू के सर के उपर छाया बना दिया ताकि बिरजू को धूप से बचाया जा सके।
बिरजू की नींद जब पूरी हुई तो उसे बहुत आराम महसूस हुआ। वह  लेटे-लेटे ही अपनी आँखें खोलकर चारों तरफ देखने लगा। अपने सर पर नागफनी गफनी के पत्तों को छाया के रुप में देखकर वह बहुत खुश हुआ। वह उठकर बैठ गया। फिर गफनी से बोला, "दोस्त, तुम्हारे पत्ते तो बहुत जानदार और काम के है। इनकी छाया में मैं बहुत सुकून से सोया था, वरना गर्मी से हाल बेहाल हो गया था।"
यह सुनकर गफनी मायूस होकर बोला, " तुम्हें मेरे ये मोटे पत्ते अच्छे लगे। पर मैं तो इनकी मोटी आकृति से उब चुका हूँ। और इनसे छुटकारा पाना चाहता हूँ।"
"ओह, मैं तो सोच रहा था कि पत्तों की तारीफ सुनकर तुम बहुत खुश होगे। पर यहाँ तो तुम उल्टी गंगा बहा रहे हो। अपनी ही मांसल जानदार पत्तों की तारीफ से खुश होने के बजाय दुखी हो।और उन्हें अपने से दूर करना चाहते हो। "
" हाँ दोस्त, मैं सचमुच अपने मोटे पत्तों एवं काटों से दुखी हूँ। तुम इनसे छुटकारा दिलाने में मेरी कोई मदद कर सकते हो, तो कर दो। तुम्हारा मुझ पर बहुत एहसान होगा।" गफनी गिड़गिड़ाते हुए बोला।
" ये पत्ते, तुम्हें अच्छे नहीं लगते हैं। मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा है। अरे, तुमने इन्हीं पत्तों की सहायता से तो मेरी ऐसे समय में मदद किया है, जब मैं बेहद परेशान और थका हुआ था। मैं एक जादूगर हूँ। मैं तुम्हारी सहायता कर सकता हूँ, पर मेरी भी एक शर्त है।"
गफनी खुश हो गया, हड़बड़ा कर बोला," हाँ-हाँ,जल्दी बोलो। मैं तुम्हारी हर शर्त मानने को तैयार हूँ।"
बिरजू को गफनी के मूर्खतापूर्ण नासमझी पर अफसोस हुआ। पर वचन में बँधें होने के कारण उसे गफनी की सहायता करनी ही थी। इसलिए वह गफनी से बोला," देखो गफनी, मैं तुम्हें तीन बार अपनी इच्छा पूर्ति के लिए मौका दे सकता हूँ। लेकिन एक बार इच्छा पूरी करने के एक महीने बाद मैं दुबारा आऊंगा। उस समय यदि तुम्हारी कोई दूसरी इच्छा होगी तो मैं उसे पूरी करके चला जाऊंगा। इसी तरह मैं तीसरी बार भी तुम्हें दर्शन देकर तुम्हें अपनी इच्छा पूर्ति का मौका दूंगा। लेकिन तीन मौका के बाद मैं तुमसे कभी नहीं मिलूंगा। इसलिए दोस्त, सोच समझकर जो मांगना है, मांग लो। क्योंकि मेरे जाने का समय हो गया है। "
गफनी जैसे सोच समझकर पहले से ही तैयार बैठा था। वह बोला," हाँ दोस्त, तुम झटपट मेरे पत्तों को सोने का बना दो। जिसके कारण मैं सुंदर और आकर्षक लगूंगा। लोग मुझे देखकर जलेंगे। मुझे तुम्हारी जरुरत दुबारा नहीं पड़ेगी दोस्त। मैं इसी से संतुष्ट और खुश हो जाऊंगा।" गफनी खुशी से बावला हुआ जा रहा था। उसके पागलपन और नासमझी पर बिरजू मुस्कुराता हुआ बोला," नहीं दोस्त, मैं वचन का पक्का हूँ। मैं अगले महीने फिर आऊंगा। तब तक तुम अपने सोने के पत्तो का सुख भोगना। अगर तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी तो मैं तुमसे मिलकर चला जाऊंगा। "
यह कहकर बिरजू गफनी के पत्तों को सोने में बदलकर चला गया।
गफनी अपने जगमग चमकते सुनहरे पत्तों को देखकर बहुत इतराने लगा। जो भी कोई उधर से गुजरता गफनी अपनी सुनहरी किरणें उस पर डाल कर उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता। धीरे-धीरे सबके साथ-साथ चोरों को भी पता चल गया कि गफनी सोने का है। अब जिसको जब भी मौका मिलता, वह गफनी के पत्तियों को नोंचनें और तोड़ने लगा। गफनी को दर्द होता था, पर वह किसी को रोक नहीं सकता था। गफनी को बिरजू की याद आने लगी। वह अपने दर्द भरे एक महीना को किसी तरह पूरा किया।
एक महीना बाद जब बिरजू आता दिखा तो गफनी जोर से चिल्ला पड़ा, "अरे दोस्त, जल्दी आओ और मुझे इस सोने के पत्तों से छुटकारा दिला दो।"
"आ रहा हूँ। पहले जरा सांस लेने तो दो। हाँ अब बताओ। तुम्हें अब क्या कष्ट है।" बिरजू अपना थैला जमीन पर रखते हुए बोला।
"दोस्त, इस सोने की पत्ती के कारण मेरा जीना हराम हो गया है। जिसको देखो, वही मुझे नोंचने-खसोटने लगता है। मैं इस नोच-खसोट के कष्ट से उब चुका हूँ और अब इससे छुटकारा चाहता हूँ। "
गफनी की अधिरता देखकर बिरजू बोला," इतनी जल्दी अपने नये रुप से उब गये।. खैर कोई बात नहीं? अब तुम क्या चाहते हो? यह मुझे बताओ। लेकिन यह याद रखना कि यह तुम्हारा दूसरा मौका है। "
" मैंने सोच समझ लिया है। अब तुम मेरी पत्तियों को हरे रंग की मुलायम, बिना काटों वाली कर दो। मैं उसमें खुश रहूंगा। "
गफनी को खुश देखकर बिरजू बोला," तुमने सोच समझ लिया है कि नहीं।"
"मैंने खूब सोच समझकर यह मांगा है। अब तुम आराम से जाओ। अब जब तुम आओंगे, मुझे खुश ही पाओंगे। "
" हाँ, ऐसा ही हो। मैं यही सोचकर जा रहा हूँ कि जब मैं आऊंगा, तुम्हें खुश ही देखना चाहूंगा। "
बिरजू गफनी के पत्तों को मुलायम हरे पत्तों में बदलकर चला गया।
गफनी खुश था कि अब उसके पत्तियों को कोई नोचेंगा नहीं।
गफनी की हरी मुलायम पत्तियाँ हवा की झोंकों से लहरा रही थी कि तभी कुछ जानवर उधर से गुजरे, तो उंहे की हरी मुलायम पत्तियाँ दिख गयी। वे एक साथ उन पत्तियों पर टूट पड़े और उन्हें नोच-खसोट करके खाने लगी। गफनी को इस नये विपत्ति की उम्मीद नहीं थी गफनी हाय-तौबा मचाते रह गया, पर उसकी बात किसी ने नहीं सुनी। उसके साथी भी अब उससे जी चुराने लगे। वे गफनी को लालची समझते थे, जिसे अपनी चीजों पर संतोष नहीं था। इसलिए वे गफनी से बात नहीं करते थे। गफनी के पत्ते जैसे बड़े होते, कोई ना कोई जानवर आकर उसे नोंच लेता। गफनी के पास अब सिर्फ बिरजू के इंतजारी का काम ही बचा था। गफनी अपने पत्तियों को नुचवाता और आँसू बहाते हुए बिरजू को याद करता।
धीरे-धीरे वह समय आ ही गया जब  बिरजू आता दिखा।
पास आकर देखा कि बिरजू चुपचाप रो रहा है। गज्जू बोला, "दोस्त, आज तुम कुछ बोलोगे नहीं। क्या तुम्हें मेरा आना ठीक नहीं लगा?"
"अरे, नहीं दोस्त, मैं तो शर्मिंदगी के कारण बोल नहीं पा रहा हूँ। मैं यदि लालची और असंतुष्ट नहीं होता तो मुझे इतना कष्ट झेलना नहीं पड़ता? मुझे माफ कर देना।" बिरजू आँसू बहाते हुए बोला।
गज्जू बिरजू को समझाते हुए बोला,"नहीं दोस्त, कभी-कभी अलग सोच बनाना भी जरुरी हो जाता है। यदि तुम्हारी सोच ऐसी नहीं होती, तो तुम्हें ये अनुभव कहाँ से मिलता? लेकिन एक बात गाँठ बाधँ लो... लालच करना हमेशा बुरा रहा है और रहेगा। इसलिए लालची नहीं बनना चाहिए। "
" हाँ दोस्त, अब मैं अच्छी तरह समझ चुका हूँ कि लालच करना बुरी बला है। पछताना पड़ता है। "
" तो फिर बताओ, मुझे अब क्या करना है? "
" अब यह भी बताने को रह गया है क्या? मुझे मेरे पहले वाले स्थिति में कर दो। मैं उसी स्थिति में ठीक था।"
" ठीक से सोच लो। क्योंकि अब मैं आ नहीं पाऊंगा। यह तुम्हारा आखिरी मौका है। और हमारे मिलन का आखिरी समय। इसलिए मैं नहीं चाहता कि मेरे जाने के बाद तुम्हें पछताने का कोई मौका मिले।"
" नहीं, अब मुझे  समझ में आ गया है कि हर चीज की महत्ता अपनी जगह सही है। बस उसके उपयोग को समझना जरुरी है।  तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद.. मुझे ऐसा मौका देने के लिए।"
  गज्जू बिरजू को पहले वाली स्थिति में करके खुश था कि बिरजू को आखिर समझ में आ ही गया कि महत्वाकांक्षी होना ठीक है पर बिना सोचे समझे लालची होना ठीक नहीं है।
गज्जू चला गया। बिरजू को अपने साथियों का साथ मिल गया तो वह पहले की तरह खुश होकर हँसने, मुस्कुराने के साथ साथ गुनगुनाने लगा।

No comments:

शंखनाद (कविता)