लाॅकडाउन के गहन गम्भीर पल (कविता)

लाॅकडाउन के गहन,गम्भीर,गतिहीन एकांतवास के 
घोर दुखदायी बेला में,      
अपनों की यादों में भटकने और गोते लगाने वाला, 
निष्क्रिय-निराश-निष्प्राण सा कोमल मन, 
चुपचाप बैठा किन्हीं अटकलों व भटकनों में उलझने लगा, 
तभी ठंड़ी-ठंड़ी बहती बयार की ठंड़े छुअन से, मन कुछ सम्मोहित व विचलित हो, चहुँ दिशा को निहारने लगा। 
बाहर अमिया से लदें हरे पेड़ की हरी-घनी पत्तियों के झुरमुट से, 
कोयल की मधुर कुहू-कुहू की गूँजती गान, गगन में गूँजने लगी। 
मैं उठी, खिड़की के झरोखों से, झपकाती अपनी आँखों से
बाहर झाँकती हुई, उस महान गायिका को ढ़ूढ़ने लगी, 
उत्सुक नैनों को वह काली मनमोहनी सी सलोनी कोकली कोयल, तो दिखी नहीं, 
पर कुहू-कुहू की मधुर कूक मेरे कर्ण को बेधती, तरंगीत और आनन्दित करती रही, 
मैं सुध-बुध खो इस मधुर संगीत के सुर व ताल में तल्लीन हो गई। 
मन थोड़ा उल्लसित व प्रफुल्लित हुआ, तो दरवाजा खोल बाहर आ गई, 
बाहर मुंड़ेर पर बैठे, गुँटर-गूं करते व दाना चुगते कोमल कबूतर भी दिखे, 
यह मनोहर दृश्य निहारने के लिए मैं वहीं बैठ गयी तो, तो वे फुर्र से उड़ गये, 
पर तभी बाहर लटके तार पर बैठे चुलबुले बुलबुल के जोड़े दिखे, 
बहते बयार के झोंकों से हिलते-डोलते तारों को कसकर पकड़े हुए, 
आगे-पीछे होते हुए भी, वे डरे और उड़े नहीं, बस साथ-साथ बैठे हुए मौज-मस्ती डूबे रहे, 
आत्मबल से भरा उनका साहस देख, मैं भी आत्मविश्वास की डोर से बँधनें लगी। 
चंचल मन आगे बढ़ने को आतुर हुआ, तो गेट खोल मैं बाहर आ गई, 
एक कुतिया माँ के दूध को मचलते चार पिल्ले कूं-कूं करके मचल रहे थे, 
माँ लेट गयी, बच्चे चुलुभ चुलुभ कर चुभलाते हुए दूध पीने लगे, 
तृप्त होने की चाह में, वे एक दूसरे पर चढ़ते और उन्हें  धकेल कर अपनी जगह बनाने लगे, 
ऐसा मनमोहक, लुभावना दृश्य, मन की सारी व्यथा हर, माँ की यादों में भटकाने लगा। 
अब क्या करु, कैसे ढ़ूढ़ू अपनी माँ को, मन फिर बौराने व बौखलाने लगा, तभी रसोईघर में कुछ खटपट हुई, मैं दौड़ी भागती घर के अंदर पँहुची, 
एक बिल्ली भगोनें से चभड़ चभड़ कर दूध पीती दिखी, 
मैं वहीं ठहर कर उसे वैसे ही दूध पीने दी, 
मन को आच्छादित व आह्लादित करने वाले ये पल, 
बहुत ही सुखदायी और मनभावन लगा, 
माँ के यादों की सारी विरह वेदना व दुखदायी पल 
क्षणभर में ही विलुप्त हो गया। 
लाॅकडाउन के इस दौर में, जबतक अपनों से दूर हूँ, 
प्रकृति के इन अनमोल साथियों से जब अपना मन बहलने लगा, 
तब अपनों की कमी, दिल से थोड़ी दूर जाकर कहीं और विचरनें लगा। 
इन जीवित पशु-पक्षियों में अपनों सा ही भाव कुडबुडाने, जागने व पनपने लगा, 
तब इन्हीं साथियों के साहचर्य से, लाॅकडाउन के अकेलेपन में अपना मलीन व मुरझाया मुँखड़ा, मुस्कुराकर मुखरित होने लगा। 

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