पहला प्यार (कविता)

 
उसके आने की आहट सुनकर,
मैं लहरों सी, लहरा गई।
उसके नजर की मादकता से,
मैं दिल ही दिल में, घबड़ा गई।  
प्यारी सी मुस्कान, उसकी देख,
मैं धीरे से सिमट- संकुचा गई।
मेरे पास से गुजरा, जब वह,
मैं छुईमुई सी शरमा गई।
हल्की सी छुअन पाकर,
मैं पगली सी, पगला गई।
उसकी मोहनी हर अदा,
मुझे मोहपाश में बाँध गई।
दिल की धड़कती सांसें मेरी,
आगे बढ़ने को मचल गई।
पर उसके पड़े, खामोश लब,
मेरे पैरों की जंजीर बनी।
रंगत बदलती, हर अदा उसकी,
कब मुखरित होकर बोलेगी।
वह बोलेगा या खामोश रहेगा,
या यूं ही, अल्हड़-अनजान बनेगा।
लगता है, बस मुझे तरसाने को ही,
वह क्षणिक मुस्कान बिखेरता है।
उम्मीदों से भरी चाहत है, मेरी,
कब मुखरित हो स्वीकार करेगा।
वह मिल जाएं, तो सार्थक है,
वरना जीवन बेकार लगेगा।
संगत न पा करके, उसका,
खिलता फूल मुरझा जायेगा।
इंतजार रहेगा, मुझको हरपल,       
मैं खुद में खुद को बहलाती हूँ।
मुखरित होने वाला ये प्यार है, मेरा,
मैं, हुलसीत हो, शरमा जाती हूँ।

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