उफ् ये ऊलजलूल बातें (व्यंग्य)

मयूर कालोनी में रहने वाली मिसेज कोमल एकदिन अपने घर से निकली ही थी कि सामने से उसी कालोनी में दो दिन पहले ही रहने आयी मिसेज प्रमिला मिल गई।
प्रमिला स्वयं ही आगे बढ़कर अपना परिचय देती हुई औपचारिकता पूरी की, फिर बड़ी तत्परता से मिसेज कोमल के साड़ी को घूरती हुई उनके आँचल को हाथ से पकड़ती हुई  बोली," कहाँ जाने की तैयारी में है ? आपकी साड़ी आप पर बहुत जँच रही है। उस पर मैचिंग झूमकी, चूड़ी,  बिंदी और पर्स बहुत ही सुंदर है..कहाँ से खरीदी है ये सब ? "
मिसेज कोमल अचकचा गई। पहली ही मुलाकात में बेतकल्लुफ भरी इतनी बातें। किसी अजनबी महिला से पहली मुलाकात में ऐसे प्रश्न की उम्मीद उन्हें नहीं थी, बोली," ये सारी चीजें तो बहुत पुरानी है, मिसेज प्रमिला। इसलिए मुझे याद भी नहीं है कि कितने की और कहाँ की है। वैसे मैं बहुत जल्दी में हूँ। लौटकर मिलती हूँ। फिर बातें करुंगी।"
हड़बड़ाकर जाती हुई कोमल को अपने बातों के दायरे में उलझाने के उद्देश्य से मिसेज प्रमिला तत्परता दिखाती हुई बोली," जल्दी में भी आप इतना तो बता ही सकती थी, पर जानबूझकर गोल करना चाहती है, तो कोई बात नहीं। पर आपको जाने की इतनी हड़बड़ी क्या है ? दो घड़ी किसी पड़ोसी से मिलकर बाते करना.. गुनाह है क्या ? "
मिसेज कोमल के पास इन बेतुकी बातों से अपना पिंड छुड़ाने का कोई विकल्प नजर नहीं आया तो झूठमुठ ही बोल पड़ी," बेटू के पापा , माल में बुलाये है। देर होने पर नाराज हो जायेंगे । इसलिए जल्दी में हूँ। "
"ओह तो पिक्चर जाने का प्रोग्राम पहले से ही था। पहले बता देती, तो इतना विलम्ब नहीं होता। खैर जल्दी जाईये वरना पिक्चर छूट जायेगी।"
मिसेज कोमल जल्दी से नमस्ते बोलकर आगे बढ़ गयी और कोलोनी से बाहर जाकर ही सांस ली। फिर मन ही मन बुदबुदायी,' बाप रे बाप, बात करने का क्या तरीका है ? पहले दिन ही ऊलजलूल बातों से हालत बिगाड़ दी, तो आगे क्या होगा ? इनके सामने कौन टिक पायेगा ?'
मिसेज कोमल के जाने के बाद मिसेज प्रमिला पार्क में जाकर बैठ गई और किसी दूसरे  शिकार की इंतजारी करने लगी ताकि उनकी चकचक वाली उल्टी-सीधी ऊलजलूल बातें आगे भी जारी रह सके।
              बहुत सी महिलायें बेफिजूल बातें करने में माहिर होती है। उन्हें अपने इस काम में बहुत आनंद की अनुभूति मिलती है। इस नेक काम में उन्हें सामने वाली की नुक्ताचीनी निकालने की आदत सी बन जाती है क्योंकि इसके बिना उनकी बातें आगे बढ़ ही नहीं सकती है।
ऐसे लोगों को न समय की परवाह होती है, न जगह की। वे किसी को भी अपना मोहरा बना  शुरू हो जाती है अपने ऊलजलूल बातों से समाँ बाँधने की और सामने वाली को फँसाने की। वे वेलगाम होती अपनी जिह्वा पर  कोई लगाम नहीं लगा पाती। अपनी बात को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें कोई मुद्दा चाहिए, तब अपने मुद्दे की तलाश में वे सामने वाले को ही अपना मोहरा बनाती है। और अपनी बक-बक से सामने वाले को उलझा देती है।
  किसी की द्वारा की गई ऊलजलूल बातें छुपाने से भी छुपती नहीं है। क्योंकि यह एक ऐसी घातक बीमारी है जो  किसी शख्स को लग जाती है, तो वह जल्दी उस शख्स का पिंड छोड़ती नहीं है। बातों के रुख में मुँहफट या बातूनी होना..ऐसे लोगों की खास आदत होती है। क्योंकि किसी का व्यर्थ में झूठी तारीफों का पुलिंदा बाँधना या उनके किसी समान का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए पैनी दृष्टि और वाक्पटुता का समन्वय करके दूसरे को आकर्षित करने या उसके मनोभावों को डगमगाने के लिए विवश करने का जो गुण किसी ऐसे व्यक्ति में होता है ..वह किसी दूसरे सीधे-सादे सरल व्यक्ति में नहीं हो सकता क्योंकि यह उस ऊलजलूल बातें करने वाले व्यक्ति की निजी सम्पत्ति होती है।
             मयूर कालोनी की नई निवासी मिसेज प्रमिला ऐसी ही एक सशक्त महिला थी , जो अपने उत्तम और उत्कृष्ट मिलनसार गुणों के कारण पहले अपने पड़ोसियों से ऐसे घुलमिल जाती थी जैसे उनसे बड़ा हितैषी कोई और उनका हो ही नहीं सकता था।
इसलिए पहले लोग मिसेज प्रमिला के आकर्षण व्यक्तित्व और सामने वाले के तारीफों के पुल बाँधने को उनकी आदत समझते थे। पर जैसे जैसे लोग उनके नाक में दम करने वाली नुक्ताचीनी को समझने लगे थे, तभी से लोग उनसे कतराने लगे।
क्योंकि आते-जाते जब भी कोई उनसे किसी भी मोड़ पर टकरा जाता तो वे यह नहीं देखती कि वह जगह उनकी बेफिजूल बातों के लिए कैसी और कितनी सुरक्षित है।
समय की नाजुकता को न समझना मिसेज प्रमिला की आदत थी । तभी तो एकदिन मिसेज प्रमिला मिसेज पंखुड़ी से मेडिकल कॉलेज के कैंपस में ही टकरा गई। वे तेज चाल में भागती मिसेज पंखुड़ी को हड़बड़ाती हुई रोककर एकाएक पूछ बैठी," अरे मिसेज पंखुड़ी, इतना सजधजकर कहाँ भागी जा रही है ? आपका चेन और टाप्स बहुत सुंदर लग रहा है। एकदम साड़ी से मैचिंग है। कहाँ से खरीदी है ? उस दुकान का नाम मुझे बता दीजिए। मैं भी खरीदूंगी।"
        मिसेज प्रमिला का यूं मिलना और फिर उन्हें रोकना ही मिसेज पंखुड़ी को नागवार लगा। वे खिजती और बुदबुदाती हुई बोली,"अरे मिसेज प्रमिला, ये अस्पताल है, हमारी कालोनी नहीं । यहाँ ऐसी ऊलजलूल बातें नहीं करते है। मैं दवा लेने जा रही हूँ । बाद में मिलूंगी। " यह कहते हुए मिसेज पंखुड़ी तेजी से आगे बढ़ गई।
मिसेज पंखुड़ी के इस अवहेलना भरे व्यवहार से मिसेज प्रमिला तिलमिला गई। अपने खुन्नस में उबलते हुए वे आगे ही बढ़ी ही थी कि उन्हें  गेस्ट्रोलाजी के सामने बने पार्क में मिसेज कुमुद दो-तीन महिलाओं के साथ बैठी हुई मिल गई। मिसेज प्रमिला झटपट अपनी पूरी आत्मियता दिखाते हुए उनके पास जाकर बैठ गई। फिर अपनी खुन्नस उनके सामने उड़ेलती हुई बोली," अरे मिसेज कुमुदअच्छा हुआ जो आप मुझे मिल गई। अभी अभी मिसेज पंखुड़ी मिली थी। मैंने जरा सी उनके साड़ी और टाप्स की तारीफ क्या कर दी, वे तो लगी इतराने। पर जब उसका दाम और दुकान का नाम पूछ ली, तो नाक भौं सिकोड़ती और तमकती हुई चली गई। मानों उनके जैसा साड़ीऔर टाप्स किसी और को मिल ही नहीं सकता है।"
       मिसेज कुमुद उसी कालोनी की थी । अतः वे मिसेज प्रमिला के लिए अजनबी नही थी। पर मिसेज प्रमिला नहीं जानती थी कि मिसेज कुमुद किस बला का नाम है। क्योंकि अभी तक उन्हें कोई ऐसा शक्स नहीं मिला था जो उनके बेतुकी बातों का मुँहतोड़ जवाब देकर उन्हें उनकी आदतों का आईना दिखा सकें।
              मिसेज प्रमिला के चुप होते ही मिसेज  कुमुद बोली,"अरे, मिसेज प्रमिला, आपको क्या एहसास नहीं है कि आप इस समय कहाँ बैठी है। अरे ये अस्पलात है..अस्पताल । कोई शापिंग माल नहीं। यहाँ लोगों के दुख-दर्द का हाल पूछते है..टाप्स और साड़ी की कीमत वाली ऊलजलूल बातें नहीं करते।"
खिसियाती हुई मिसेज प्रमिला बोली," अरे मैं तो तारीफ में दुकान का नाम पूछकर कोई गुनाह तो नहीं कर दी। इसमें इतना ऐठनें और तेवर दिखाने वाली बात कहाँ से आ गई जो मिसेज पंखुड़ी दिखा रही थी ?"
"बात आई क्यों नहीं, मिसेज प्रमिला ? जहाँ दुख-दर्द की बातें पहले होनी चाहिए, वहाँ आपको टाप्स की खूबसूरती दिखेगी तो सामने वाला कुड़बुड़ायेगा ही। उनके टाप्स की खूबसूरती क्या आपको इतना भा गई  कि आप यहाँ से निकलते ही सीधे उसी सुनार के दुकान पर जायेंगी और वैसा ही टाप्स खरीदेंगी। आप उसके अतिरिक्त कोई और टाप्स देखेंगी भी नहीं। इस झूठी तारीफ की जगह आप उनके यहाँ आने का कारण भी पूछ सकती थी। "
खिसियानी बिल्ली जैसी हालत हो गई मिसेज  प्रमिला की । वे झेंपती और सिकुड़ती हुई समझ गई कि यहाँ उनका दाल गलने वाला नहीं है। वे संकुचाते हुए बोली ," मेरे पूछने का ये मतलब नहीं था । मैं तो बस यूं ही पूछ बैठी थी।"
"मिसेज प्रमिला, यूं ही का मतलब ये नहीं होता कि आप माहौल  और समय की नाजुकता को समझे ही नहीं। ये अस्पताल है । यहाँ  फुर्सत में फिजुल की बातें हो सकती है , वह भी तब जब सब कुछ ठीक हो। हाँ, आपने ये तो बताया ही नहीं कि आप यहाँ क्यों पधारी है ? क्या आप का कोई परिचय यहाँ भर्ती है ? "
          अचानक मिसेज प्रमिला हड़बड़ाती हुई उठकर खड़ी हो गई , बोली,"  नहीं-नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। मैं तो भूल ही गई थी। मुझे जल्दी ही जाना है। बाय।"
         मिसेज प्रमिला अपने आने का उद्देश्य छुपाते हुए अपना सा मुँह लेकर वहाँ से हट गई । वह बुदबुदाती हुई जा रही थी 'कैसा जमाना आ गया है , किसी को थोड़ा भाव दो, तो वह सर पर सवार हो जाता है। जैसे मेरी कोई इज्जत है ही नहीं।'
  प्रमिला को आज अपना भाव मालूम हुआ क्योंकि मिसेज कुमुद जैसा नहलें पर दहला मारने वाला कोई शक्स उन्हें अभी तक मिला ही नहीं था। किसी के मनोभावों को डगमगा देना सरल है पर किसी के द्वारा जब स्वयं अपना मनोबल डिगता नजर आता है तब शुद्ध रुप से आटे-दाल का भाव पता चलता है । मिसेज प्रमिला को जब अपनी करनी चार लोगों के बीच नीलाम होते नजर आया तो वे वहाँ से  तौबा करते हुए ऐसे गायब हुई जैसे धनुष से निकला हुआ तीर ।
मिसेज प्रमिला आज अपने व्यवहार का आईना देख ली तब उन्हें अपनी असलियत महसूस हुई। उफ्..वे ऐसी ऊलजलूल बातों में अभी तक उलझी हुई थी, जिसका वजन दूसरों के लिए शून्य था।
प्रमिला की आँखें आज खुल गई। यदि कोलोनी में उन्हें अपनी अहमियत बरकरार रखनी होगी, तो उन्हें ऐसे बातों से तौबा करना होगा तौबा... वरना उनके इज्ज़त का पलिदा जो आज बना है , वह बार -बार बनता रहेगा । और लोग उनसे घुलमिल कर मिलने के बजाय कन्नी काटते हुए दूर भागते रहेंगे ।
मिसेज प्रमिला अब समझ गई कि उनका ऊँट पहाड़ के नीचे आ चुका है, इसलिए इन ऊलजलूल बातों से तौबा करना ही उनके लिए श्रेयश्कर होगा।
उफ् ये ऊलजलूल बातें किसी की... किसी और को अब और अधिक मंजूर नहीं....

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शंखनाद (कविता)