कचरा (कविता)

लोगों के घरों से 
निकले कचरे।
ठेलों पर लदकर, जब,
कहीं कूड़े के ढ़ेर बन जाते है।
तब इधर-उधर फैली वे चीजें, 
निरर्थक व बेकार कहलाते है। 
तब भी, वे कितने काम के होते  है, 
कितनों के काम आते है। 
कितनों के लिए है चेहरें की मुस्कान, 
कितनों के लिए संजीवनी बनते है। 
कुछ बीनते है, कुछ चुगते है, 
कुछ सूंध के चले जाते हैं। 
पर कुछ है, जो इनमें से कुछ, 
खाकर मस्त हो जाते है। 
है, अपना ये ऐसा कचरा, 
कुछ में खुशियाँ भरते है। 
कुछ को जीवंत करके ही, 
धूल-धुसरित हो जाते हैं। 
प्रकृति का है ये अजब अजुबा, 
जो हमको कुछ समझाते है। 
जिसको समझते है, हम कचरा, 
वह बहुतों के लिए उपयोगी होता है। 

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