वात्सल्य की प्रतिमूर्ति (कहानी)

((अपने चार बच्चे होने बावजूद एक बिना माँ के बच्चे को अपना कर उसके असंस्कारी जिंदगी को सवाँरनें और उसे आह से अहा बनाने में अपनी जिंदगी कुर्बान करने वाली महिला कोई साधारण महिला नहीं हो सकती। राजरानी ऐसी ही एक महिला थी जिसने अपनी जिंदगी में वह कर दिखाया ..जो एक दृढ़ निश्चय व जुझारूपन की हिम्मत वाली जिद्दी व जीवट महिला ही कर सकती थी))

वात्सल्य की प्रतिमूर्ति
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सुसंगत व सुव्यवस्थित परवरिश और जन्मजात विरासत में मिले खराब संस्कार में द्वंद होने पर जीत किसकी हो सकती है???

वह किसी राजघराने की रानी नहीं थी..वह सिर्फ नाम की भी राजरानी नहीं थी। वह तो राजरानी थी अपने दिल में पनपने वाली उन भावनाओं की...जिसमें प्रेम, करुणा, ममत्व व दुलार का विशाल भंडार समाहित था। तभी तो वे अपने उसी अद्भुत प्रेम भंडार से अपना प्रेम छलकाती थी....सभी अपनों और अजनबियों के लिए जो उनके संपर्क में आता था और जिन्हें वे अपना और सिर्फ अपना समझने लगती थी। ऐसी ही शख्सियत की मालकिन का नाम था..राजरानी। 

सामान्य परिवार की मालकिन राजरानी के चार नन्हें - मुन्ने प्यारे बच्चे थेे..एक बेटा आकाश और तीन बेटियाँ....सुरभि , सुगंधा और सुनिधि। इन बच्चों की माँ होने के बावजूद भी राजरानी के मन में वह दर्द और कसक था जिसके कारण उन्हें उस अबोध, अनबोले, नवजात शीशु का उस समय का वह करुण कंदन बर्दाश्त नहीं हुआ..जो वह जन्म लेते ही अपनी माँ को खोकर अनाथ बन चुकने के बाद कर रहा था। बच्चे की चीख ने राजरानी के अंतर्मन को गहराई तक छूकर द्रवित कर दिया। जिसके कारण वे विवश हो गई और अपने को रोक नहीं पायी। तभी तो अस्पताल के उस गमगीन वातावरण में अजनबी होते हुए भी वे लपक कर उस बच्चे को अपने गोद में दुबका ली, और अपने मीठे स्नेह भरे आलिंगन के कारण उसे चुप करा दी। वह बच्चा कैसे और किस खानदान से सम्बंधित है...यह राजरानी ने सोचा भी नहीं..वे तो उस समय, बस अपने ममतामयी आँचल में पनाह देकर उस मातृ विहीन बच्चे को उसके परिवार की सहमति से अपने घर ले कर चली आयी।

इस नवागंतुक शीशु के साथ राजरानी को घर में प्रवेश करने के बाद जब सबको हकीकत पता चला तो घर में कुहराम सा मच गया। परिवार का कोई भी सदस्य इस नये परिस्थिति से समझौता करने को सहमत नहीं था। सबसे पहले तो बेटा आकाश ही दौड़ता हुआ राजरानी के पास आया। राजरानी के गोद में नन्हें से बच्चा को देखकर वह माँ का आँचल थामकर ठिठक गया, फिर उस बच्चे को खींचते हुए रुआँसा होकर बोला, "माँ, तुम्हारी गोद में ये किसका बच्चा है? पहले इसे इसकी माँ को दे दो, फिर मैं तुम्हारी गोद में आऊंगा।" 
"बेटा, यह तुम्हारा छोटा भाई सूरज है। अब यह तुम्हारे साथ इसी घर में रहेगा। आओ, मैं तुम दोनों को एक साथ अपने गोद में ले कर प्यार करती हूँ।" राजरानी आकाश को दुलराते हुए बोली।
आकाश रुठकर माँ का हाथ झटकते हुए बोला, "नहीं, जब तक तुम इसे इसकी माँ के पास नहीं पँहुचाती, मैं तुम्हारे गोद में नहीं आऊंगा। मैं जा रहा हूँ, मुझे पुकारना मत।" उसी समय राजरानी की  बेटियाँ आ गयी।  सुरभि बोली, "माँ, यह प्यारा बच्चा किसका है? आप थकी हुई लग रही है, इसलिए पहले इसे मेरे गोद में दे दो फिर हाथ मुँह धोकर तरोताजा हो जाओ।"
"नहीं बेटी, अभी ये बहुत छोटा है और तुम भी छोटी हो। तुम इसे सम्भाल नहीं पाओंगी।" राजरानी सूरज को बिस्तर पर लेटाती हुई बोली।

राजरानी का इरादा जब उनके पति "बाबूजी" के समझ में आया तब वे विचलित हो कर राजरानी से बोले, "राजरानी, तुम्हारे दिमाग में यह बेवकूफी भरा काम करने का ख्याल कैसे आया? घर में चार बच्चों के होते हुए तुम्हें पाँचवे को पालने का शौक क्यों चर्राया है? देखो, अपने बच्चों के पैर में कुल्हाड़ी मारने की जरूरत नहीं है। तुम यह भी तो नहीं जानती कि बच्चे का खानदान कैसा है और वह किस परिवार से संबंध रखता है। इसलिए इस नई मुसीबत को शीघ्र इसके घर पँहुचा दो।"
बाबूजी की नाराजगी राजरानी को विचलित नहीं कर पायी। वे शांत स्वर में बोली, "आप नाहक चिंता कर रहे है। कृष्ण भी तो यशोदा के घर रहकर पले थे। इसका खानदान कैसा भी हो, जब यह हमारा संगत पायेगा और हम इसे अपने बच्चों के साथ समान परवरिश देंगे तो यह जैसा हम चाहेंगे, यह वैसा ही बनेगा। यह हम सबका प्यारा कृष्ण - कन्हैया बनकर रहेगा।"
"राजरानी, तुम समझती क्यों नहीं हो? यशोदा के और कोई औलाद नहीं थी। तुम्हें तो भगवान ने पहले से ही चार बच्चे दिए है। उनके हक पर लात मत मारो। ले जाओ पहले इसे जँहा से लायी हो वँहा वापस कर दो।" बाबूजी विक्षिप्त से हो गए पर राजरानी पर कोई असर नहीं पड़ा।
वे सूरज को दुलराते हुए बोली, "देखिए जी, मैं जो कदम आगे बढ़ा चुकी हूँ, उससे पीछे नहीं हटूंगी। चाहे आप हो या कोई भी हो..वह इसका विरोध किसी भी हद तक करके देख लें। मैंने जो सोच लिया है, उसे मैं करके रहूंगी। बस एक वादा आपसे करती हूँ कि इस बच्चे के खातिर अपने बच्चों का अहित कभी नहीं करुंगी।" राजरानी के पागलपन वाले हठ के आगे बाबूजी  विवश होकर मौन हो गये।

सूरज अब एक संभ्रांत परिवार में शामिल हो कर पलने लगा। राजरानी सबका समान पालन-पोषण करने लगी। उन्हें न अपनों के रुठने की परवाह थी और न दूसरों के व्यंग्य बाणों की परवाह थी। वह बस मद मस्त हाथी की तरह अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए आगे बढ़ती रही।
राजरानी किसी धनाढ्य परिवार की तो थी नहीं, जिससे उनका मार्ग सरल व सुगम होता। अब तो उन्हें पांच बच्चों को पालना था अतः बहुत सी कठनाईयाँ आनी थी और जिनका सामना राजरानी को करना भी पड़ा। पर कठनाईयों से जुझते उतराते हुए भी अपने नाव को खेने में उनके चेहरे पर शिकन की लेशमात्र भी लकीर परिलक्षित नहीं होती थी।
बच्चों को पालने में राजरानी ने कभी भेदभाव नहीं किया। उनकी छत्रछाया में सभी बच्चे एकसाथ, एकसमान पलने और बढ़ने लगे। बच्चों को व्यवस्थित करके समय पर स्कूल-कालेज भेजना वे अपना कर्तव्य समझती थी।
बहुर्मुखी प्रतिभा की धनी राजरानी उन जरूरत मंद गरीब परिवारों की भी सहचरी बनी रहती थी..जो उनके संपर्क में आते थे। और इसी कारण वे चकरघिन्नी की तरह सबकी मदद के लिए सबके पास चक्कर लगाने पँहुच जाती थी और सबके दुख दर्द को समझकर मदद कर आती थी। यह मदद उनकी संवेदनाओ, समझ,समझदारी के साथ साथ आर्थिक भी होती थी। क्योंकि वे सिर्फ देना जानती थी, लेना नहीं।
उनके ऐसे ही अविश्वसनीय व अविस्मरणीय कृत्यों के कारण उनकी पदवी अपने आप सार्वजनिक रुप से "अम्मा" की हो गई। अब वे सबके लिए "अम्मा" बन गयी।
बाबूजी अक्सर अम्मा को समझाते और कहते, "राजरानी, हम इतने धनी नहीं है जो तुम अपने घर को धर्मशाला बना ली हो। तुम्हें इतना बोझ तले मेहनत करते मैं नहीं देख सकता इसलिए इन जिम्मेंदारियों से दूर रहकर सिर्फ अपने बच्चों पर ध्यान दो, वरना अपने सब बच्चे बर्बाद हो जायेंगें। फिर हम कहीं के नहीं रह जायेंगे।"
तंगहाली और बेहाली में भी अम्मा ने जवाब दिया, "देखिए जी, मैं हूँ ना। इसलिए आप किसी की चिंता मत करिए। बच्चों की परवरिश में कोई कोर कसर बाकी नहीं रहेगा। मैं जी जान से उनके भविष्य को सुरक्षित करने में लगी हूँ अतः आप निश्चिंत होकर अपना काम करो।"

अपने कामों में व्यस्त अम्मा को बढ़ते बच्चों में यह महसूस होने लगा कि सूरज का व्यवहार कुछ परिवारिक परम्परा से हटकर है। वे जितना सूरज की तरफ ध्यान देती, उतना ही वह उनके हाथ से छिटकने लगा था।
पर अम्मा का माथा उस समय और ठनका...जब वे यह जान गई कि एक ही शिक्षा और परवरिश होने के बावजूद भी दो संस्कारों की विरासत लेकर पैदा हुए बच्चों का मानसिक स्तर एक सा विकसित होकर एक स्तर पर पँहुच नहीं सकता। बच्चों में आने वाले गुणों की छाप अपने पूर्वजों के गुणों पर आधारित होते है। यही कारण था कि समान सुविधा और समान परवरिश होने के बाद भी सभी बच्चे समान नहीं होते। उन पर अपने माँ-बाप के व उनके पूर्वजों के गुण ही  हावी होते है।
अम्मा को अब अपने बच्चों और सूरज के रहन सहन और स्वभाव में अंतर परिलक्षित होने लगा। अम्मा के बच्चे "बाबूजी और अम्मा" के स्वभाविक गुणों के कारण पढ़ने में तेज, अग्रणी और सुव्यवस्थित थे। उन्हें अपने भविष्य की चिंता थी, इसलिए उनके अपने मार्ग से विचलित होने की सम्भावना कम थी। वहीं सूरज पर अम्मा का दबाव होने के बावजूद भी उसका मन पढ़ने में कत्तई नहीं लगता था। पढ़ने में मन न लगने के अतिरिक्त सूरज में और भी बहुत सी खामियाँ उजागर होने लगी। वह घर में ही लोगों की जेब से रुपये और सामान गायब करके अपना शौक पूरा करने लगा। छुप-छुप कर गलत बच्चों की संगत करना और उनके जैसा व्यवहार अपनाना सूरज ने चोरी-चोरी सीख लिया।
एक दिन बाबू जी ने महसूस किया कि उनके जेब से रुपया गायब था। उनका क्रोध चरम सीमा पर पँहुच गया। वे अम्मा पर चीखते हुए बोले, "राजरानी, तुम क्यों एक गलत परम्परा की नींव पर एक बिगड़े बच्चे को शह देकर पूरे परिवार को गर्त में ड़ूबोने को तत्पर हो? छोड़ आओ, इस नालायक बच्चे को इसके पिता के घर और सबको चैन से रहने दो। यदि तुम नहीं पँहुचा सकती तो मुझे बताओ, मैं पँहुचा दूंगा।"
बाबूजी के इस बात से अम्मा कुपित होकर बोली, "आप नाहक सूरज के पीछे पड़े है। माना उसमें कुछ कमियाँ है। मैं उन कमियों को दूर कर दूंगी। जहाँ तक अपने बच्चों का सवाल है, तो वे हीरा है। वे बिगड़ नहीं सकते।"
"तुम सूरज की कमियाँ क्या दूर करोगी? उसने तो अब चोरी भी सीख लिया है। मेरे जेब से रुपया गायब कोई और नहीं, सिर्फ तुम्हारा लाडला सूरज ही कर सकता है।"
"सूरज ने यदि इतनी बड़ी गुस्ताखी की है तो उसकी खैर नहीं। मैं अभी उससे पूछती हूँ और सही होने पर दण्ड भी दूंगी।"
अम्मा कहने को तो बाबूजी को चुप करा दी पर उनकी आत्मा जानती थी कि यह गुस्ताखी सूरज के अतिरिक्त कोई और कर ही नहीं सकता है। वह सूरज की कमियों को ढ़कने की पूरजोर कोशिश करती। बाबूजी यह अच्छी तरह जान गये थे कि दत्तक पुत्र के प्रेम में अंधी इस गान्धारी को कुछ कहना बेकार है। यह अपने आगे किसी की सुनेगी नहीं। इसलिए उसकी बातों को वहीं छोड़कर आगे बढ़ जाने में ही उन्हें अपनी भलाई नजर आयी।

सूरज की गलत आदतें जब सर चढ़कर बोलने लगा और अम्मा को विश्वास होने लगा कि सूरज बिगड़ चुका है, तब अम्मा का माथा ठनका। अब वे सतर्क हो कर सोचने पर मजबूर हो गई कि परवरिश पर संस्कार हाबी होने लगा है। उन्हें अपनी गलती का एहसास होने लगा। संस्कार की महत्ता अब उनके जेहन में समा गई, वे समझ गई कि उनका मार्ग उतना सरल नहीं है जितना सरल वे करना चाहती थी। अब यदि उन्होंने थोड़ी सी भी ढ़ील सूरज को दी तो  उनके कठोर परिश्रम पर पानी डालकर सूरज का संस्कार हाबी हो जायेगा। अपने आगे बढ़े कदम को पीछे खींचने की अपेक्षा अम्मा को काँटों भरे राह पर चलना मंजूर था।
अम्मा के अपने बच्चे, अभावों से जूझने के बावजूद भी शिक्षा ग्रहण करने में अग्रणी थे। पर वहीँ सूरज का रुझान व झुकाव जो गलत कार्यों की तरफ हो गया था, उसे सुधारना जरूरी था। सूरज को सुधारने के लिए अम्मा ने कमर कस लिया। कम पढ़ी लिखी होने के बाद भी सूरज को पढ़ाने के लिए अम्मा रात के अंधेरे में जब सब खा पीकर अपने कमरे में पढ़ने और सोने चले जाते थे तब वे स्वयं पढ़ती ताकि दिन के उजाले में सूरज को पढ़ा सकें। वे सूरज को स्वयं पढ़ाती थी, समझाती थी और नेक व अच्छा बनने की सलाह देती थी। सूरज को पढ़ाने के साथ ही उसके गलत आदतों को सुधारने में अम्मा जी जान से जूझती रही। जिसके परिणाम स्वरूप सूरज को सुधारते, सवाँरते, संगठित करके वे उसे इस लायक तो बना ही दी कि वह बड़ी तो नहीं पर जीविकोपार्जन के लिए कामचलाऊ नौकरी कर सके।
बाबू जी अम्मा का साथ ज्यादा दिन निभा नहीं पाये। वे बीच मझधार में ही अपनी सारी जिम्मेदारियों का बोझ अम्मा के कंधों पर डालकर इस दुनियाँ से कूच कर गये। अकेले पड़ जाने के बाद भी अम्मा ने कभी हिम्मत नहीं हारी। वे अडिग इरादें और हिम्मत के बलबूते आगे बढ़ती रही और सफल भी हुई। उम्र की कोई सीमा उन्हें उनके इरादे से डिगा नहीं पाया ।

अम्मा का बेटा आकाश आई.ए.एस. और बेटियाँ डाँक्टर और इंजीनियर बन गए। शादी के बाद सभी बच्चे अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गये।
अपने बच्चों को सुव्यवस्थित करने के बावजूद भी अम्मा ने किरायें का घर नहीं छोड़ा। वे सूरज के साथ उसी घर में रहती थी। सबके दूर रहने के बाद भी वे अपने परिवार को एकसूत्र में बाँधे रखी। अपनी प्रतिभा की सुनहरी किरणे बिखेरने वाले अम्मा के बच्चों की यह हिम्मत नहीं थी कि वे सूरज की अवहेलना कर सकें।
अम्मा ने अपने बच्चों के सहयोग से एक घर खरीदा, फिर वे सूरज के साथ उसी घर में रहकर सूरज की शादी की। सूरज की शादी के बाद आकाश बोला, "अम्मा, सूरज का घर बस गया। वह नौकरी भी करने लगा। अब तुम्हारी जिम्मेदारी सूरज के प्रति समाप्त हो गई। इसलिये तुम मेरे साथ बंगलौर चलो। वँहा भी तुम्हारे पोता-पोती है जो तुम्हारी राह देखते है। वे तुम्हें पाकर बहुत खुश होंगें। थोड़ी खुशी उनकी भी झोली में डाल दो।"
अम्मा अपने दिल से विवश थी इसलिए आकाश का मन रखने के लिए बोली, "ठीक है, चलूंगी पर शीघ्र ही वापस आ जाउंगी। क्योंकि जब मुझे संतुष्टी मिल जायेगी कि सूरज का परिवार पूर्ण रुप से व्यवस्थित हो गया है, तब मैं खुद तुम्हारे पास आकर रहने लगूंगी।"
आकाश जानता था कि वह दिन कभी नहीं आयेगा। यह अम्मा का झूठा आश्वासन है। क्योंकि सूरज न कभी व्यवस्थित होने के प्रति कटिबद्ध था और न कभी होने का प्रयास करता। इसलिए अम्मा उसे मझधार में छोड़कर नहीं जा पायेंगी। यह जानते हुए निराश आकाश अपने घर लौट गया।

सूरज की पत्नी बेला सुंदर और समझदार थी पर ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी। इसलिए बूढ़ी होती अम्मा की मैराथन दौड़ फिर शुरू हो गई। सूरज की असलियत जानने और उस पर विश्वास न जमने के कारण अम्मा वहीं सूरज के पास बनी रही क्योंकि उनके मन में बेला को पढ़ा लिखाकर इस लायक बनाना था जिससे विपरीत परिस्थितियों में सूरज के परिवार को डगमगाने से पूर्व एक ठोस सहारा ऐसा मिल जाये जिससे सुरज के परिवार की परवरिश अच्छी तरह होती रहे। बेला को आगे की पढ़ाई के लिए स्वतंत्र करके गृहस्थी का सारा बोझ अपने ढ़लते कंधों पर डाल कर अपने जीवन की दूसरी पाली जीने को अम्मा तैयार हो गयी। जिस उम्र में अम्माँ को आराम चाहिए था उस उम्र में खाना बनाना, सबको टिफिन देना, सब्जी लाने जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को स्वयं के कंधों पर ढ़ोने का दायित्व उन्होंने जिस सरलता से अपने कंधों पर लिया वह एक दृढ़ निश्चय वाली जिद्दी, जीवट व जुझारुपन की हिम्मत वाली महिला के लिए ही संभव था। बच्चों की सफलता के घमण्ड में उन्होंने कभी अपनी औकात नहीं बढ़ायी। वे अपने बच्चों के पास मेहमान की तरह जाती थी। जहाँ वे कुछ दिन रहती-टिकती पर उनका मन मयूर विहार करता था सूरज के आँगन में  अतः शीघ्र ही वे सूरज के पास लौट आती। समय अंतराल पर सूरज के दो बच्चे हुए..आदर्श और अवन्ति। आदर्श और अवन्ति दोनों अम्मा को बहुत प्यारे थे।
बड़े होते आदर्श और अवन्ति के क्रियाकलापों और रहन-सहन में जमीन-आसमान का अंतर अवतरित होने लगा। अवन्ति के गुणों में अम्मा की छाप नजर आती थी। वहीं आदर्श अवन्ति के विपरीत निकला। उस पर अपने पूर्वजों की छाप चिन्हित होने लगी।     
अम्मा ने जानबूझकर पोते का नाम आदर्श रखा था ताकि वह एक सभ्य बच्चा बने। पर होनी को कौन टाल सकता था...आदर्श सिर्फ नाम का आदर्श था। गलत  हरकतों में वह अपने बाप से दो कदम आगे ही निकला। अभी अम्मा इस दुख को झेल ही रही थी कि उन्हें बहुत बड़ा सदमा लग गया। सूरज अपने अधकचरे परिवार का बोझ अम्मा के कंधों पर डालकर इस दुनियाँ से कूच कर गया।

अब बुढ़ी अम्मा अपनी जिंदगी की इस तीसरी पाली में और भी अधिक सक्रिय होकर जागरूक, जीवट और जुझारू बन गई। बेला को सम्भालने के बाद उनकी नौकरी एक अध्यापिका के रुप में लगवा दी।  इसके बाद बच्चों को पालना-पोषना और गृहस्थी सम्भालना.. सब वे बखूबी निभाती रही। अम्मा की मुसीबतों  में कोई कमी नहीं आयी क्योंकि आदर्श एक दूसरा सूरज था। एक बार फिर अम्मा अपने पुराने जिम्मेदारियों में लिप्त हो गयी। क्योंकि सूरज के परिवार को पालना-पोषना, गढ़ना, संरक्षित और सुव्यवस्थित करना वे अपनी जिम्मेदारी समझती थी। इसीलिए सूरज के बाद आदर्श के गलत आदतों को सुधारने का  जिम्मा एक बार फिर अम्मा अपने कंधों पर ले ली। 
अम्मा जिंदगी भर सूरज और उसके परिवार को सम्भालती, सुधारती रही और असंस्कार पर अपनी परवरिश का दबदबा बनाती रही। पढ़ने के बाद अवन्ति की शादी एक संभ्रांत परिवार में हो गई। जँहा वह सुखी और संपन्न जीवन व्यतीत करने लगी। अपने पुत्र आकाश के सहयोग से अम्मा ने आदर्श को भी अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बना दिया। अम्मा के अच्छे परवरिश की छाप सभ्य तरीके से रह रहे सूरज के परिवार में परिलक्षित होने लगा था।
  
सूरज और उसके परिवार को अपनाकर उसके असंस्कारी जिंदगी को सँवारने और उसे आह से अहा बनाने  में अपनी सुख-सुविधाओं वाली जिंदगी को त्याग कर काँटों भरी राह को चुनने के बाद खुद को चलायमान और सक्रिय बनाकर अपने जिंदगी की जो आहुति अम्मा ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक दी वह काबिले तारीफ थी। ऐसा कोई कमजोर दिल वाला नहीं बल्कि एक विशाल ह्रृदय की साम्राज्ञी राजरानी ही कर सकती थी और उन्होंने वह कर भी दिखाया।

सुसंगत व सुव्यवस्थित परवरिश और जन्मजात विरासत में मिले खराब संस्कार में द्वंद्व होने पर जीत किसकी हो सकती है ?....यह समझने और सुलझाने में राजरानी ने अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी और अंत में यह साबित कर दिया कि पूरी निष्ठा और लगन से किया गया कोई परिश्रम यदि पूर्ण रुप से सफल नहीं होता तो वह बेकार भी नहीं जाता। वह अपनी छाप किसी न किसी रुप में छोड़ ही देता है।

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शंखनाद (कविता)