कोरोना काल (लघुकथा)

ढ़ाई महीने बाद घर लौटे कार्तिक को घर में धूल धक्कड़ो का पूरा साम्राज्य फैला दिखा। बैठने के लिए कोई जगह नहीं था। कार्तिक ने पहले सोफा और बिस्तर को झटकार कर बैठने का जगह बनाया। आरोही चाय बनाने किचन में गयी तो ताजे पानी का अभाव था। कोई और समय होता तो वह पड़ोस में दौड़ जाती और पानी ले आती, पर एक तो कोरोना संक्रमण और लाॅकडाउन का विषम बेला का समय, दूसरे यात्रा के बाद लौटने के कारण उसे किसी के घर जाना उचित नहीं लगा। साथ लाये बोतल के पानी का उपयोग करके आरोही ने चाय बनाया। चाय पीकर वह पूरे घर का निरीक्षण करने लगी।
किचेन गार्डेन के सारे पौधे सूखकर लकड़ी हो गये थे। वह रुआंसी सी कार्तिक के पास लौट आई, बोली,"कार्तिक, मेरे तो सारे पौधे ही सूख गये है। कितने मेहनतों से पौधों को लगायी और संजोयी थी। अब मैं क्या करुंगी?"
"अरे, ये तो वहाँ इतने दिन रुकने की मजबूरी में पता ही था कि पौधे सूख जायेंगे। फिर ये फालतू का रोना क्यों? यह समय ही विकट है वरना अपना घर छोड़कर हम कहीं और इतने दिन टिकते।"
"यही तो बात है। हम तो दो-चार दिन के लिए गये थे। लाॅकडाउन में फँस जायेंगें, ये पता ही नहीं था वरना चाभी ही कहीं दे जाते तो पौधे तो नहीं सूखते।"आरोही बोली। 
" ये कोरोना वायरस का संक्रमण काल सिर्फ मानव जाति के लिए ही नहीं बल्कि जीव-जंतु और पेड़-पौधों के लिए भी जानलेवा साबित हुआ है। आरोही, तुम्हारे तो सिर्फ पौधे ही सुखे है। जिसने किसी अपने को ऐसे में खोया होगा उसे कितनी हिम्मत रखनी पड़ी होगी, सोचो? "
"हाँ कार्तिक, मैं अपने सूखे पौधों को देखकर ही घबड़ा गई थी। अब ऐसा नहीं होगा।"
कार्तिक बोला," हाँ आरोही, ऐसे विषम परिस्थितियों में हमें हिम्मत से सकारात्मक सोच बनाकर जीवन को उल्लसित और ऊर्जावान बनाना है ताकि सभी नियमों का पालन सुचारु रूप से करके स्वयं को, परिवार को, पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों को सुरक्षित रख सकें।"
"अब ऐसा ही होगा, कार्तिक। मैं इन सूखे पोधों की जगह नये पौधे लगाऊंगी, ताकि किचेन गार्डन फिर हराभरा दिखे और हम कोरोना काल में भी मुस्करा सकें।" 
आरोही अपने आँसुओं को पोछते हुए अपने में नये उत्साह व लगन का संचार की और आगे के काम में जुट गई। 

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