मन की पीड़ा (लेख)

श्रमिक भाई-बहनों की जितनी दुर्दशा इस लाॅकडाउन की अवधि में देखने को मिला वह हृदयविदारक और आत्मा को झकझोरने वाली लगी। ऐसी कटु सत्य पर आधारित घटनाओं का क्रम जो विभिन्न रुपों में इस समय देखने, सुनने और अनुभव करने को मिला, वह अकल्पनीय था। यथार्थ जो समय चक्र में घुमता हुआ बार-बार नजरों के सामने से गुजरता रहा, उस यथार्थ से स्वयं को झुठलाकर मुँह फेर तो सकते है, पर अपनी आँखें मूंद नहीं सकते। कहने को चाहे जो कह ले कोई, पर गरीबी, भूखमरी और जानलेवा जैसी अथाह मार्मिक पीड़ा, जो इस वर्ग ने इस अवधि में झेला है, उस सच पर लाख पर्दा डालने के बाद भी वह छुपेगा नहीं, बल्कि किसी ना किसी रुप अपना चादर फाड़कर मुखरित होगा और अपना आईना समाज को दिखलाता और मुँह चिढ़ाता हुआ मिलेगा।
असंपन्नता के इस गरीबी के सच से इंकार भी नहीं किया जा सकता है। क्योंकि गरीबी के इस भयंकर दर्दनाक मंजर को देखा, सुना और समझा सभी ने है। पर कौन किस रुप में इसका विश्लेषण करता है यह सबके अपने विवेक पर निर्भर करता है। पर सच्चाई यही है कि वही इस दर्द को महसूस कर आँसू बहा सकता है, जो इस जमीनी हकीकत का सामना कभी जमीनी स्तर पर किया हो।
वैसे जरूरत पर मदद करने वाला ईश्वर सदृश होता है। मदद की दरकार पर मदद करना आंतरिक सुख की अनुभूति कराता है। इसलिए कोई इस पवित्र अनुभूति से वंचित भी नहीं होना चाहता। और अपने सामर्थ्य के अनुसार कुछ न कुछ मदद करता जरुर है।
पर यथार्थ में गरीबी व मजबूरी इस युग का अभिशाप है। इसलिए दिखावा के लिए कोई कितना भी मदद का ढोल पीट ले, पर सच्चाई यही है कि किसी असम्पन्न को सुविधा सम्पन्न गरिमामय जीवन बिताने का सपना कोई दिखाना नहीं चाहता और न इस स्तर पर कोई उच्च वर्गीय काम ही होता है। क्योंकि मजबूर व बेबस के श्रम को चूसना और चूसकर फेकना सभी उच्च वर्गीय लोगों की चाहत और जरुरत होती है, पर उनकी बेससी को मिटाना किसी का उद्देश्य नहीं होता।
इस सच का भी कारण साफ परिलक्षित होता है। यदि पूरे समाज को सम्पन्नता की लत लग जायेगी तो जमीनी स्तर पर होने वाले श्रम को कौन करेगा? यह एक ज्वलन्त प्रश्न है। जो सुरसा की भांति मुँह बाये खड़ी है, पर कोई ऐसा नजर नहीं आता जो इस प्रश्न का सही जवाब दे सके। और इस देश से गरीबी हटाने की पहल कर सके। जमीनी स्तर से उपर उठने वाले भी कुर्सी मिलते ही बदल जाते है क्योंकि उस समय उनके सोच का दायरा बड़ा, उच्च स्तरीय और आदर्श हो जाता है।
देश कभी बदलेगा या यूं ही असहायों पर अपने सहानुभूति का मरहम लगाकर हम उन्हें उनकी उसी हालात में भुगतने को छोड़कर आगे बढ़ जायेंगे और पीछे मुड़ कर देखने की कभी जुर्रत या हिम्मत भी नहीं संजों पायेंगे कि कभी अपनी जिंदगी में ऐसा भी कोई दर्दनाक मंजर देखने का अवसर मिला था, जो बेहद दर्दनाक, शर्मनाक और शर्मशार करने वाला था। क्योंकि हम भी सिर्फ इन पर अपनी गहरी मार्मिक संवेदना या घड़ियाली आँसू बहा सकते है, पर इनके आँसू पोछकर इनके दुख-दर्द को मिटाकर इन्हें सम्पन्न नहीं बना सकते है।  


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