मुक्ति (कहानी)

बरसों से दबंगों द्वारा दासत्व एवं दबंगई की दहशत भरी पीड़ा झेल रहे मानसिकता पर अपनी तरफ से विराम चिंह लगा कर अपनी नयी सोच की ओर अग्रसर होने की अप्रत्याशित साहसिकता दिखाना ही अपने आप में बहुत बड़ी बात होती है।
मुक्ति
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"आगे बढ़ने का सपना देखने "...का हक  क्या सिर्फ उँचे ओहदे वालों की ही जागीर होती है ? छोटे वर्ग के लोग इस हक से दूर रहें । दबंगई के कारण उनके स्वाधिकार पर किसी और का  स्वामित्व आनन-फानन में अचानक बन जाये या सदैव के लिए स्थापित हो ... ऐसी मानसिकता क्यों और किसकी बनायी हुई है ? और यह दबंगई आखिर किस हद तक , कितने समय तक समाज में लागू रहेगा ..यह कोई कह नहीं सकता ।
वैसे इस प्रश्न पर यह कहावत सही लगता है..... "जो डर गया, वह मर गया ,
जो डट गया, वह शान से खड़ा है । "
एक गरीब किसान के मन में दबंगों के कारण उपजने वाले डर, भय और उसकी दबी कुचली मानसिकता के साथ ही साथ परिस्थितिजन्य विपरीत परिस्थितियाँ जैसे सूखा, अति वृष्टि, सूदखोरों के बढ़ते कर्जे के बोझ तले दबे रहना और जैविक संसाधनों के अभाव का मिला जुला ऐसा प्रहार होता है कि वह सिर्फ तिलमिला कर ही नहीं रह जाता है बल्कि ऐसे कष्टकारी जीवन को मजबूरन झेलने और जीने को विवश हो जाता है और जब स्थिति मृतप्राय  के कगार तक पँहुचने लगता है ,तब भी हताशा-निराशा की स्थिति  होने के बावजूद भी वह अपने स्थिति से सिर्फ समझौता करना ही जानता है । उस पर दुखों का पहाड़ ही  टूट पड़े ,तब भी वह खामोश रहता है क्योंकि उसकी स्थिति ऐसी नहीं रह जाती है कि वह हिम्मत करके उम्मीद की कोई लौ जला सकें ।
ऐसे छोटे तबके के लोग विकास के ख्वाब से दूर ही रह जाते है ।अपने हक को मांगने की अपेक्षा पीढ़ी दर पीढ़ी  समाज के दबंग लोगों की अमानत बनकर उन्हीं के खोल में बंद रह जाते है और अपने सोच को कुंद करके  परिवार सहित वहीं दफन हो जाते है । यह मानसिकता आज जो उच्च वर्ग में विकसित है...वह समाज के विकास के लिए अभिशाप है । फिर भी ऐसे कृत्य से अभिशप्त जीवन जीने को अब भी बहुत से लोग मजबूर है । और ऐसे में मजबूरी वश वे लोग जी भी रहे है । पर ऐसे लोगों के मन में कभी न कभी कोई विद्रोह की चिंगारी फूटेगा नहीं... यह कहा नहीं जा सकता ।
पर विद्रोह की चिंगारी फूटने के बाद भी वे मजबूर लोग ऐसा नहीं कर पाते है ,क्योंकि उनके पास अपने सर को छुपाने के लिए कोई ऐसा दूसरा ठोस आधार नहीं होता , जिसके बल पर  वे इस त्रासदी से मुक्ति पा सकें ।
फिर एक गरीब किसान रामदीन इतना दूर तक तो कभी सोच ही नहीं पाता क्योंकि वह अपनी सरजमीं...अपने कर्मभूमि  को छोड़कर कहीं जाना नहीं चाहता था। वह जीता है , तो अपनी जमीन के लिए और मरना भी चाहता है तो अपनी जमीन के लिए । अपने छोटे से खेत में जब वह अपने लहराते, हवा से बातें करते हुए अपने हरे भरे पौधों को निहारता है , तो उसका रोम- रोम पुलकित हो जाता है । उसकी बाछें भी खिल जाती है । अपने उमंग में मस्त वह अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ आराम से गुजर बसर कर खुशहाल जीवन जी रहा था । गाँव के दबंग प्रधान ठाकुर महेन्द्र प्रताप सिंह भी उसे अपने खेतों पर  बेगारी के लिए बुलाते, तो वह बिना किसी नानुकुर के चुपचाप खुशी- खुशी चला जाता था । क्योंकि रामदीन सोचता था कि ठाकुर बड़े आदमी है, जब मुसीबत पडे़गी तो गाहे-बेगाहे वे उस जैसे जरुरतमंदों के लिए मददगार साबित होंगे । पर रामदीन की सोच सही नहीं निकला ।  ठाकुर उसके सहयोग को उसकी मजबूरी समझते थे । तभी तो ठाकुर उसे अपने सपनों के अनुसार जीने नहीं देते थे। इसलिए उसे ठाकुर के छाये में उसे दहश्त भरी जिंदगी ही जीनी पड़ रही थी ।
रामदीन समझ गया कि दूर के ढ़ोल सुहाने होते है । किसी के सम्पर्क में आने पर ही उसकी असलियत खुलती है । रामदीन ठाकुर के चंगुल में फँस चुका था । अब वह ठाकुर के यँहा जाना नहीं चाहता था । इसलिए कभी जब नहीं जाता तो ठाकुर के बाशिंदे जबरजस्ती उसे बुलाकर ले जाते और बेगारी कराते । जाल में फँसे  मछली की तरह फड़फड़ाकर रामदीन रह जाता था । अपनी परेशानियों की आँच से रामदीन अपने बच्चों को दूर ही रखता था । क्योंकि रामदीन के नैनों में अपने बच्चों के लिए सुनहरे सपनों की चमक दिखती थी । वह अपनी परेशानियों को दरकिनारे करके अपने दोनों बच्चों को स्कूल भेजने लगा । जिससे वे पढ़-लिखकर कुछ और अलग करने के योग्य बन जायें और उन्हें ठाकुर की दासता से मुक्ति मिल जाये ।
अचानक समय ने अपना क्रूर पैतरा बदला । रामदीन के साथ ही पूरे गाँव का सुख चैन लुट गया । हरे-भरे ,लहराते खेत -खलिहान गायब हो गये । प्रकृति का प्रकोप सूखा के रुप में अपनी आँसुरी बाहों के घेरे में गावँ को ऐसा लपेट लिया कि  सारा गाँव धूँ-धूँकर जलने लगा । पूरे गावँ को तबाही के मंजर से जूझना पड़ा । हरे-भरे खेत पानी के अभाव में मुरझाकर सूख गये, उपजाऊ जमीन बंजर भूमि में बदल गये । चारों तरफ त्राहि त्राहि मच गया । परिवार के परिवार उजड़ने लगे । भूख, बेकारी , साहूकारों के कर्जा  और ठाकुरों के बेमर्रुअत दबाव के चपेट में लोग फँसने लगे । कई परिवार के सदस्य खासकर बच्चे भूख की पीड़ा से बिलबिलाने लगे । परिवार का मुखिया  अपने परिवार की यह दुर्दशा देख नहीं पाता था ।और उसके सामने समाधान का कोई आस नहीं था। ऐसी स्थिति में बर्दाश्त नहीं कर पाने के कारण हिम्मत हार गये मुखिया ऐसी दुश्वारियाँ करने पर मजबूर होने लगे , जिन्हें न कोई समझ पाया और न कोई उन्हें रोक पाया ।  ऐसे में वे खुद की बलि देना ही मुनासिब समझने लगे क्योंकि उन्हें कहीं से भी उम्मीद की कोई किरण दिख नहीं रही थी...न ठाकुर की तरफ से , न सूदखोरों की तरफ से , न सरकार की तरफ से और न आसमान की तरफ से बरसते बूंदों के रुप में । जिंदगी की लड़ाई जीते जी जब वे मजबूर किसान जीत नहीं पायें तो मौत को गले लगाकर सारे जी जंजालों से छुटकारा पाना ही उन्हें सही विकल्प लगने लगा । जबकि यह उनकी कायरता ही थी । थोड़ी हिम्मत दिखाकर वे जिंदगी के जंग को जीत सकते थे ..पर शायद उनमें वह जोश और उमंग मर चुका था जो उनके जीवन में संजीवनी सा असर दिखाकर उन्हें जीवंत कर सकें ।
रामदीन अपनी जिंदगी के जंग को कायरों की तरह यूं हारना नहीं चाहता था । इसलिए वह इन विषम परिस्थितियों में भी हिम्मत संजोए हुए था । वह टूट कर बिखरना नहीं चाहता था। इस लिए वह मन ही मन में अपने परिस्थितियों से लड़ने का उपाय सोचने लगा । आर्थिक रूप से कमजोर किसान अपने युवा होते बच्चों को शीघ्रताशीघ्र अपने कामों में जोड़कर उन्हें परम्परागत तरीक़े से चली आ रही पुश्तैनी कामों में झोंक देते है । उसे वे वह नहीं करने देते है जो वे करना चाहते है ।
पर रामदीन उन किसानों में नहीं था जो अपने निजी स्वार्थ के लिए अपने बच्चों की आहुति देकर उन्हें अग्नि में जलने के लिए झोंक दे । वह खुद टूट सकता था.. टूटकर बिखर सकता था ,पर उसके दिल में जो हिम्मत की चिंगारी फूट रही थी.. उसके कारण वह अपनी आने वाली पीढ़ी को इस बर्बादी से बचाना चाहता था । यही कारण था कि उसने अपने बड़कू बेटा सूरज को नई रोशनी में पंख फैलाने की अनुमति और आजादी दे दी ।
सूरज की पढ़ाई कहीं अधर में न अटक जाए इसलिए अपने जीवन का सबसे पहला व बड़ा विकल्प रामदीन को यही नजर आया कि वह अपने बेटा सूरज को गाँव से दूर शहर में पढ़ने को भेज दें । अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने शहर में रहने वाले अपने साले से संपर्क साधा और उनके सहयोग से सूरज को गुपचुप तरीका से शहर में पढ़ने भेज दिया । कुछ दिनों तक तो वह सबको बहलाता रहा, पर ऐसी बातें देर तक छुपती नहीं है । जल्दी ही सबको पता चल गया कि सूरज पढ़ने के लिए शहर गया है ।
कानाफूसियों और चमचागिरी के माध्यम से नमक मिर्च लगी सामग्री जब गावँ के प्रधान ठाकुर महेंद्र प्रताप सिंह के सामने परोसी गई तो वे आगबबूला हो गये । उन्होंने रामदीन को तुरन्त अपने बँगले पर उपस्थित होने की खबर भिजवा दिया ।
शाम के गौधूली बेला में ठाकुर महेंद्र प्रताप सिंह के आलिशान बँगला के बरामदे में किसान रामदीन हाथों को जोड़कर जमीन पर बैठा था और सामने ठाकुर तेज आवाज में चीख रहे थे , " रामदीन मैं कहता था कि तुम अपने बेटा के नाक में नकेल डालकर रखो , वरना एक दिन वह तुम्हें गच्चा दे देगा । देखा , मेरी बात न मानने का नतीजा । तुम मेरी बात माने नहीं , तो वहीं हुआ , जिसके लिए मैं तुम्हें आगाह कर रहा था । अब देख लिया ना अपने बेटा को पढ़ाने और बाबू बनाने का नतीजा । शहरी बाबू बनने के लिए फुर्र हो गया । तुम्हारे बुढ़ापे पर भी तरस नहीं खाया । " ठाकुर क्रोध से तिलमिलाते हुए लाल पीला हो रहे थे और रामदीन वैसे ही नजरें  झुकाये बैठा रहा ।
उसकी खामोशी से ठाकुर और चिढ़ गया , इसलिए खिसियाते हुए रौब में बोला ," इसमें सारी कारगुजारियाँ तुम्हारी ही लगती है , तुमने ही उसे ढ़ील दिया होगा ,  वरना उसमें ऐसी हिम्मत आती कहाँ से ,जो वह तुम्हें और इस गाँव को छोड़ने की हिम्मत करता । लो भुगतो , अब अपनी करनी का फल । "
"क्या करु मालिक , नकचढ़ा था । किसी की सुनता नहीं था ।" रामदीन  धीमें आवाज में बोला । पर यह सुनते ही ठाकुर गरजते हुए अपनी घौंस में चिल्लाया ," एक बात कान खोलकर सुन लो रामदीन , बड़े के साथ तुमने जो किया सो किया । अगर वह पकड़ में आ गया तो उसे छोडूंगा नहीं  । पर छोटे के साथ अब मेरी कोई मर्उत नहीं चलेगा । तुम उसे कल ही लेकर हमारे फार्म हाउस बेगारी कराने आ जाना ....वरना तुम्हारे साथ साथ छोटू की भी खैर नहीं होगी । वह मजा चखाऊंगा कि जिंदगी भर तुम दोनों बाप-बेटा भूलोगें नहीं और किसी गुस्ताखी के लायक बचोगे भी नहीं । मेरी धौंस याद रखना ।" यह कहते हुए ठाकुर उसे पैर से एक ठोकर लगाते और पैर पटकते हुए चले गये ।
रामदीन तैश खा गया , पर अपनी भावनाओं को वह दबाये रहा , तभी तो उसके आँखों में क्रोध, क्षोभ, विषाद और पश्चाताप किसी भी तरह के आँसू दिख नहीं रहे थे । वह तो अपने आँखों की उस चमक को जो बड़कू सूरज के जाने के कारण उसके नयनों में समायी थी उसे भी वह ठाकुर की नजरों से छुपायें हुए था , इसलिए नजरें झुकायें था ..पर ठाकुर के अन्तिम धमकी को सुनकर उसकी रोएँ काँप गई । उसके दिल दिमाग में धौकनी चलने लगी । उसे तो ऐसी बातों का भान भी नहीं था कि बेरहम ठाकुर ऐसा भी कर सकता है । ठाकुर की निगाहें उसके फूल जैसे छोटू संजय पर भी टिक सकती है । यह उसके सोच से परे था । छोटू उसकी नजर में बहुत छोटा था । वह ठाकुर की कौन सी बेगारी कर सकता है , जो ठाकुर उसे अपने पैरों तले रौंदना चाहता है ।  रामदीन को अपनी यह स्थिति सबसे अधिक वीभत्स व भयावह लगी । जो उसके सम्भाले सम्भल नहीं रहा था । रामदीन एक झटके में उठा उसके पैरों में पहिया लग चुका था । क्योंकि वह पलभर में ही अपने घर पहुँचना चाहता था ।
कभी रामदीन एक मजा हुआ किसान था । उसे अपने खेत खलिहान से बेहद लगाव था । वह अपनी जमीन पर अपने सामर्थ्य से अधिक  मेहनत मशक्कत करता था । उसका खेत अच्छे फसल से हर समय लहराया करता था । उसे अपने खेतों के प्रति अपने लगन, निष्ठा और परिश्रम पर पूर्ण विश्वास था..जो उसका गुरुर था । पर आज उसका गुरुर भी उसे धोखा देने लगा था । जिससे रामदीन का पैर भी लड़खड़ाने लगा ।
रामदीन ने सोचा था कि दो एक सालों में अपने छोटू के साथ मिलकर मेहनत मशक्कत करके अपनी स्थिति सुधार लेगा ..तब छोटू को भी बाहर शहर का रास्ता दिखा देगा । वह टूटकर भी बिखरेंगा नहीं , बल्कि इस दलदल से निकलने का पुरजोर कोशिश करेगा । पर ठाकुर के घर से निकलते ही उसके आँखों के सामने घुप्प अंधेरा छा गया । इस नयी मुसीबत का सामना वह अब कैसे करें ..यह उसे सूझ नहीं रहा था ।
बदवहास रामदीन के पैरौं  में चकरघिन्नी लग गई थी । वह जल्दी से घर पँहुच कर छोटू को अपने सीने में छुपा लेना चाहता था । घर में पावं रखते ही वह जोर से पुकारता है , " छोटू ,छोटू , तुम कहाँ हो ?"
छोटू को देखते ही वह उसे अपने दामन में समेट लेता है और बालों में बाहें फिराता हुआ बार-बार चूमते हुए बोला , " मेरा लाल, मेरा  सुगना..मैं तुम्हें ठाकुर के गिरफ्त में फँसने नहीं दूंगा...इसलिए मेरे लाल , मेरे छोटू ...भाग जा ..तू भी भाग जा शहर । यह जगह अब तुम्हारे रहने की नहीं है । यहाँ रहोगें तो यहाँ के दबंग लोग तुम्हें नोच लेंगें । इसलिए तुम भी पढ़ने के लिए शहर चले जाओ । हमारी चिंता मत करना । हम लोग यहाँ के तौर तरीका के आदि है । हम जी लेंगें । तुम लोगों को कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है ।"
रामदीन की कातरों जैसी तेज आवाज सुनकर उसकी लुगाई चन्नी वहाँ आ गई । रामदीन की स्थिति देख वह घबड़ाकर रामदीन को झकझोरते हुए बोली ," छोटू के बापू , क्या हुआ है तुम्हें  ? तुम छोटू को कहाँ भेज रहे हो और क्यों ? "
रामदीन गुस्से से सराबोर था ,बोला ," चन्नी मैं छोटू की जुदाई सहने को तैयार हूँ पर उसे ठाकुर के हवाले नहीं कर सकता । ठाकुर उसे मांग रहा है और हम उसे उसके हवाले किसी भी कीमत पर कर नहीं सकते । इसीलिए उससे कह रहा हूँ , बेटा ..भाग जा , इस गाँव को छोड़कर भाग जा । ये ठाकुर हमें यहाँ पनपने नहीं देंगे और मैं तुम लोगों को यहाँ मरने नहीं दूंगा ।"
चन्नी घबड़ा गई । वह छोटू को रामदीन से अलग करके खेलने के लिए भेज दी । फिर रामदीन को पकड़कर कमरे में ले गई और एक गिलास पानी देकर बोली ,"बड़कू के पापा , धैर्य रखो , ऐसे कोई जोर जबरजस्ती से हमारे छोटू को हमसे छीनकर नहीं ले जा सकता । पहले हम समस्या समझे ,फिर आराम से सोचते है कि हमें करना क्या है ? तब हम कोई रास्ता निकालेंगे । आप निश्चिंत रहो । "
रामदीन अर्धविक्षिप्त सा लेट गया । अपने प्राकृतिक आपदा के कारण  बंजर होती भूमि, प्रधान की दबंगई और कर्ज के मकड़जाल में फँसने के कारण अपनी सरजंमी से लगाव होते हुए भी रामदीन की जो गति हो गई थी उससे मुक्त तो वह गावँ में रहकर भी हो सकता  था क्योंकि परिस्थितियों से जूझने की उसकी आदत सी पड़ चुकी थी ..पर अपने छोटू को वह प्रधान के चंगुल से कैसे बचाये ? हताशा-निराशा की स्थिति में भी यह विचार उसे झंकझोर रहा था । छोटू के मनमाफिक उज्जवल भविष्य की कामना संजोए रामदीन अब अपने पुरानी अविकसित मानसिकता ..'गाँव में ही जमें रहो' वाली विचारधारा से मुक्ति पाकर चलायमान जिंदगी जिना चाहता था , जिसमें गाँव भी हो और शहर भी ।
रामदीन का ध्यान अचानक महाभारत की ओर मुड़ गया । महाभारत के अति ज्ञानी विद्वान, महारथी भीष्म पितामह और कौरवों -पाण्डवों के आचार्य गुरु द्रोणाचार्य भी हस्तिनापुर छोड़कर पाण्डवों के साथ नहीं गये क्योंकि हस्तिनापुर उनकी कर्मभूमि थी । चूंकि कर्मभूमि को छोड़ना बहुत जोखिम भरा काम होता है , जिसके लिए बहुत बड़ा दिल होना चाहिए । रामदीन भी अपनी कर्मभूमि को छोड़ना नहीं चाहता था , पर विचारों के मंथन ने उसके दिमाग पर जोर डाला कि ये महान हस्तियाँ अपने कर्मभूमि में रहकर भी अपने समय के बिगड़े माहौल को सुधार नहीं पाये और कौरव व पाण्डवों के बीच छिड़े युद्ध  के कारण  स्थिति और अधिक भयावह हो गया । रामदीन की स्थिति तो इनके सामने नगन्य ही है। फिर भी यदि बिगड़े माहौल से मुक्ति की कामना करनी होगी और अपने छोटू को दासता के बंधन से मुक्त करना हो तो इसके लिए बदलाव का रुख अपनाना ही श्रेयस्कर होगा ।
बरसो से दबंगों द्वारा दासत्व एवं दबंगई की दहशत भरी पीड़ा झेल रहे मानसिकता पर अपनी तरफ से विराम चिंह लगाकर अपनी नई सोच की ओर अग्रसर होने की अप्रत्याशित साहसिकता दिखाना ही अपने आप में बड़ी बात होती है ।
रामदीन उठा और पत्नी के पास सलाह मश्विरा करके तैयारी शुरु कर दिया । एकदिन रात के अंधेरे में  अपने दिल पर पत्थर रखकर रामदीन अपने दरवाजे की कुंडी में ताला डाला और अपने खेत की मिट्टी को हाथ में  लेकर बुदबुदाया ," मेरी जीवनदायिनी , मेरी पालनहारा मैं तुमसे विमुख हो कर जा तो रहा हूँ , पर मैं तुमसे मुक्त नहीं हूँ । मै तुमसे उऋण कभी भी नहीं हो सकता । इसलिए  तुम्हारे ऋण से मुक्त होने के लिए मैं फिर जल्दी ही आऊंगा, और तुम्हारी सेवा दुगने लगन व परिश्रम से करुंगा , क्योंकि मेरी मुक्ति तो तुम्हारे ही सरजमीं पर , तुम्हारी ही बांहों में होनी है ।"
रामदीन ने खेत की मिट्टी को चूमा और उसे माथे पर लगा लिया । फिर पत्नी और बेटा की अंगुली थामकर उम्मीद की नई किरण की  आस में धीरे धीरे आगे बढ़ गया ।

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शंखनाद (कविता)