आड़ी तिरछी नजरें (व्यंग्य)

जोगी और नीरा की शादी खुशियों भरे माहौल में जल्दी ही हुई थी। एकदिन शाम को मदहोश करने वाले सुहाने मौसम में नीरा अपने पति जोगी के साथ पहली बार घर से बाहर निकली तो खुशियों की फुलझड़ी उसके मन में फूटने लगी जिसके कारण वह बहुत उत्साहित व रोमांचित थी, पर अपने हर रोमांचक क्षणों के मध्य जब उसकी सतर्क नजरों ने महसूस किया कि उसके पति की चंचल  निगाहें छुप छुपकर कहीं और अटकती व भटकती नजर आ रही है तो नीरा का उमंगों से उछलता मासूम दिल धक से धड़ककर सिकुड़ गया, तब  वह एकदम से बुझ गयी।
       एक बार नहीं, दो बार नहीं, जब कई बार यह क्रिया दुहराई जाने लगी तब उसे लगा जैसे उसके विश्वास पर सौ सौ घड़ा पानी पड़ चुका है। लगातार मिलने वाले ठोस अनुभवों के बाद वह सतर्क हो गयी। तब ऐसे पति की निगाहों पर अपनी जासुसी निगाह छुप छुपकर टिकाना नीरा अपने वैवाहिक जीवन का प्रथम महत्वपूर्ण कर्तव्य समझने लगी।
नीरा को बाहर तो बाहर घर के भीतर भी जब यही नजारा बार बार देखने को मिला तो उस के दिन का चैन औेर रातों की नींद हराम हो गई। नीरा की काम वाली थी तो बहुत साधारण नैन नक्शे वाली। पर उसका अल्हड़पन और हुल्लड़पन से इतराकर मटककर लुभावने तीखे अंदाज में काम निबटाना नीरा को अच्छा लगता था। उसे लगा कि उसे अपने अकेले के लिए एक अच्छा साथी मिला है। पर जब उसे पति की चंचल निगाहें काम वाली को घूरती, लपलपाती प्रतीत हुई तो उसने खतरा मोल लेना मुनासिब नहीं समझा। तब नासूर बनने वाले इस चटपटे, तीतेे रिश्ते को ही उसने जड़ से समाप्त करने के लिए उस काम वाली को ही झटके से झटककर हटा दिया।
 इस बार सुंदर कामवाली को रखने का नीरा ने कोई जोखिम मोल नहीं लिया। इसलिए खोज खाज कर उसने एक अंधेड़ महिला को काम पर लगाया। पर यहाँ भी नीरा की चालाकी नहीं चली, पति की चंचल निगाहें नहीं बदली तो नहीं बदली।
पति यदि रसिक हो, कामुक हो ,नजरें आड़ी तिरछी करके हर नारी को घूरने वाला हो तो समझो पत्नी का हर सुख शान्ति हर गया। पत्नी सतर्क रहे, सचेत रहे पर उसकी इस सतर्कता के बावजूद भी ऐसा पति सबकी नजर बचाकर नैन मटक्का कर ही लेता है। उसकी इस अनाधिकृत्य अधिकार पर किसी का वश नहीं चल पाता। पत्नी के लिए तो खास तौर पर नहीं, तब बेबस पत्नी को हाथ मलने के सिवा कुछ नहीं बचता।
ऐसे पति की चौकसी की चाकरी निभाना बहुत बड़ी कारवाई है। जिसके लिए उसे कितने महत्वपूर्ण कामों की कुर्बानी देनी पड़ती है। तभी तो ऐसे पति की पत्नी अपने एक सूत्रीय काम..पति की आड़ी तिरछी नजरों पर अपनी निगाह जमाएं रखने की चौकसी करके अपने कर्तव्य की इति श्री समझती है और यह समझने की भूल करके इतराती है कि उनका पति उनके वश में है। पर उनकी शान में बट्टा तब लगता है जब वह पति की चोर नजरों को रंगे निगाहों पकड़ लेती है। तब उनका घमण्ड़ टूट कर बिखर जाता है।
  पतियों के आरी तिरछी नजरों से निजात पाना हर नारी के वश में नहीं ,पर नारी यदि कमर कस ले तो वह अपने अभियान में सफल जरुर होती है । यही सोचकर नीरा अपनी काम वाली को ही बदलने लगी । पर काम नहीं बना, तो नहीं बना। उसने देखा कि काम वाली गोरी लाओ या काली ,लम्बी लाओ या ठिगनी ,मोटी लाओ या पतली। पति की निगाह में कोई अंतर नजर नहीं आता। काम वाली को जल्दी जल्दी बदल बदल कर  नीरा उब चुकी थी पर न उसकी खोजी निगाहें बदली, न पति की आड़ी तिरछी नजरें। कामवाली के बिना रहना भी नीरा को मंजूर नहीं था। कामवाली को रखना उसकी मजबूरी है और पति की नजदीक की नारियों पर आड़ी तिरछी नजरें करके डोरे डालने की प्रवृति या नियत भी स्वीकार नहीं था। उसका ब्रम्हास्त्र भी जब काम नहीं आया तब वह घुल घुल कर आधी होने लगी।
   नीरा अपने मुहल्ले में काम वाली वाई बदलने का रिकार्ड कायम कर चुकी थी पर आज तक उन्हें अपने काम में सफलता नहीं मिली तो नहीं मिली। वे पति की निगाहों से अपने काम वाली को बचाना चाहती है पर ये पति महोदय उसके कड़े  मेहनत पर हजारों घड़े वाला पानी डालकर सब मिट्टी की पलीदी कर देते है।
काम वाली के सामने नीरा के पति अपने काम में इतने सक्रिय हो जाते है कि ऐसा लगता है कि जैसे उन्हें अपने काम का प्रशस्ति पत्र इन्हीं कामवालियों से मिलता है। कामवालियों को भी अपने मालकिन से ज्यादा सहूलियत अपने मालिक से मिलती है। इसलिए वे मालिक से सहयोग लेना ज्यादा उचित समझती है। जब वह पुकारती है..मेम साहिब, जरा यह मेज पकड़वा लीजिए तो मेम साहिबा का जवाब मिलता," अभी दो मिनट रुको।" पर उसी दो मिनट में मालिक कहीं भी होते कूदकर झट से प्रगट हो जाते। नीरा जब तक हाथ पोछती हुई रसोईघर से निकलती तब तक मेज इस पार से उस पार पहुचँ चुका होता। तब हाथ पोछती हुई नीरा हाथ मलती हुई, मुहँ लटकाकर रसोईघर में वापस चली जाती। एकदिन नीरा की कामवाली ने जब नीरा से कुछ रुपये के मदद की गुहार लगाई तब नीरा ने सौ बहाने उसके सामने परोस दिया। पर कामवाली भी घाट घाट का पानी पीकर नीरा से ज्यादा परिपक्व हो चुकी थी, इसलिए उस समय तो वह चुप हो गयी पर एकदिन नीरा की अनुपस्थिति में जब उसने वही फरमाइश जोगी जी से की तो उसे झट से मदद मिल गया। उसके बाद यह आश्वासन भी मिला कि फिर जरुरत पड़ी तो निसंकोच मांग लेना। नीरा को पता चला तो उसे चार सौ चालीस बोल्ट का झटका लग गया। वह टाँय टाँय फिस्स हो गयी। जब होश आया तब नीरा ने जोर, जबरजस्ती और धमकी का रुख अपनाया तो पति के सामने जाकर गरजना, तड़कना फिर तड़तड़ाकर बरसना शुरु हो गयी पर पति की खामोश चुपचाप मुस्कुराकर सुनने की विधा ने उसके क्रोध को पानी के बड़े बड़े बुलबुले की भांति फुक्क से फोड़ दिया।
नीरा को अपने पति और  कामवाली के बीच बैठकर दोनो को ताड़ने में अपना कीमती वक्त गवांना भी मंजूर था। वह ताड़ती थी..टस से मस नहीं होती थी पर उसने देखा वे दोनों अपने इरादे से उससे भी ज्यादा टस से मस नहीं होते, क्योंकि वे दोनों अपने फन में पक्के माहिर थे ।
  वक्त ने पलटी मारी। धीरे धीरे नीरा बदलने लगी क्योंकि अब नीरा में समझदारी वाली अक्ल आ गयी थी। वह समझ गयी कि भैस के आगे बीन बजाने का कोई फायदा नहीं था। यहीं सोचकर नीरा ने एकाएक दोनों के सामने सर फोड़ने का अपना इरादा छोड़ दिया।
     इरादा नेक हो पर काययाबी हाथ न लगे तो रास्ते का रुख बदलने में ही समझदारी होती है। नीरा ने हर हथियार अजमाकर भी असमर्थ हो गई तो उसने ऐसे कामों  से तोबा कर लिया। उसने अपना मुख व रुख दोनों ही मोंड़ लिया ।आड़ी तिरछी नजरों की ऐसी कि तैसी हो। अब वह पति के आड़ी तिरछी निगाहों के इलाज करने में खुद को बीमार होने के लिए झोकेंगी नहीं।
नीरा ने सोचा कि भाड़ में जाए दूसरों को एकटक टकटकी लगाने वाली पति की आड़ी तिरछी नजरों का। वह क्यों अपनी खुशी और संतुष्टी इन बेकार-फिजुल के लफड़ो में खो रही है। इस सोच के साथ ठोस और कठोर निर्णय लेने के कारण नीरा के दिन बहुत जल्दी बहुरने और सुधरने लगा। फिर तो धीरे धीरे क्रोधातिक्रोध में गुस्साना, चिड़चिड़ाना, बौखलाना और पति को लताड़ना सब फुस्स होकर सिमटने, सिकुड़ने और बदलने लगा जिससे सब कुछ बहुत सुकून ,शांति और संतोष वाला हो गया। इसलिए पति जोगी हो या भोगी...अपने हित की रक्षा करने में ही अपनी भलाई और अच्छाई है। इसलिए ऐसे बेकार और फिजुल कामों में अपना सुख चैन गवाँ कर अपने को आधी करने की जरुरत कत्तई और कभी नहीं था और न आगे रहेगा ।
नीरा अब अपने खाली समय को अपने तरीके से जीने लगी। वह अपने निजी कामों में मन लगाने लगी जैसे अपने रुचियों व अपने कैरियर और बच्चों के भविष्य को सुधारना, संवारना और आगे बढ़ाना। अब नीरा को महसूस और अफसोस भी हुआ कि पति के आड़ी, तिरछी नजरों का पीछा करके उसने अपने स्वर्ग से सुंदर सुनहरे वक्त को कितना दुर्गम, दुरुह व कठिन बना दिया था।
अपने सोच के इस परिवर्तन से नीरा अब निश्चिंत है, संतुष्ट है, खुश है और स्वतंत्र है। अब वह पति की दूसरों को एकटक घूरती आड़ी ,तिरछी नजरों की गुलाम नहीं है। 

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शंखनाद (कविता)