बेड़ियाँ (कविता)

गहनों की बेड़ियों से,
पुरुष सदैव मुक्त है।
इसलिए वे स्वतंत्र है,
निरंकुश है, अभिमानी है।

गहनों की बेड़ियों में,
नारी सदैव लिप्त है।
इसलिए वह पराधीन है,
अबला है, असहाय है।

पशु-पक्षी व जीव-जन्तु,
इन बेड़ियों से अनजान है।
इसलिए नर व मादा दोनों,
स्वतंत्र, समान व स्वालंबी है।

बेफिक्र जिंदगी (कविता)

कभी किसी 
भी वक्त,
प्रिय दोस्तों 
के घर जाकर,
पाते थे हम 
भरपूर सुकून,
अपने ही 
घर जैसा।

चाय सुड़कते थे
बड़े प्रेम से,
खाते-पीते थे
तसल्ली से। 
कभी यूं ही
बेफिक्र होकर,
समा भी जाते थे
नींद के आगोश में।

लगाते थे 
बेफिक्री में,
कहकहे भी 
दिल खोलकर।
कश भी लगाते  
धुँआ भी उड़ाते,
थे बड़े चैन
और आराम से।

दोस्तों के पास 
मिलता था,
दुख-दर्द का
समाधान भी।
आया समय
बदलाव का,
बँध गए सब  
नये बंधनों में।

बिछुड़ गए
साथियों से,
फिर दूरियाँ 
भी बढ़ गई।
अपने ही
जंजाल में,
सब व्यस्त हो
फँसते गये।

ढ़लते उम्र के
पड़ाव पर,    
साथी मिले फिर 
कुछ पुराने व नये।
नये ठौर व 
उम्मीदों के साथ,
हम दोस्तों में 
फिर बँधने लगे।

दोस्त क्या
मिले,
बुझते दीपक
फिर जलने लगे।
दोस्ती फलने
फूलने लगी,
दिन मस्ती में 
कटने लगी।

गुनगुनाना
भी वही,
ठहाका
भी वही हो गया।
उम्र के इस 
आखिरी दौर में, 
हम व्यस्त हो गये,
नई जागृति के साथ।।     

मेरे बंदर मामा (अटूट रिश्ता-7) (यादगार लम्हें)

रिश्ते में बंदर तो हमारे मामा ही लगते है। अतः जिससे पहले से रिश्ता हो, उससे फिर नया रिश्ता क्या जोड़ना?
मौसी का घर बहुत करीबी का मनपसंद घर होता है। बचपन की बहुत सी यादें मौसी के घर से जुड़ी होती है। मौसी के घर हम लोग पहुँचे और वहाँ बंदर मामा न पहुँचे और उनकी चुहुलबाजियों वाली शैतानी न हो, तो अजीब ही लगेगा। पर बनारस में मौसी के घर पर मौजूद बंदर मामा की शैतानियाँ हँसाने से ज्यादा रुलाती थी। वे बहुत ज्यादा डरावना माहौल बना देती थी। खुला छत होने के बावजूद भी हम उस खुले जगह का लुफ्त खुलकर उठा नहीं पाते थे, हमेशा चौकस रहना पड़ता था। कभी इच्छा भी होती तो बहुत डरे हुए छत पर बैठते हुए खाते। निश्चिंतता तो मिलती नहीं थी, क्योंकि दो-चार बंदर मामा आसपास जरूर मड़राते मिल जाते थे। जरा सी चूक हो जाये तो पसंदीदा चीज पर झपट्टा पड़ ही जाता था। कपड़े गायब, खाने की चीजें सब झपट्टा मारकर गायब। फिर तो मनुहार करने में समय ही बीत जाता था। कीमती या जरुरी सामान को दूबारा पाने के लिए ढ़ेर सारी मिन्नतें और ढ़ेर सारी खाने की चीजों का चढ़ावा न्योछावर करना पड़ता था, तब जाकर कहीं मन चाही वस्त्र या चीज वापस मिलता था। हम लोग तो थोड़े दिनों के लिए जाते थे, इसलिए हम  दोनों स्थितियों का मजा भरपूर लेते थे। मामा से डरते भी बहुत थे, पर उन्हें चिढ़ाकर मजा भी बहुत लेते थे।

हमारे उल्लू वाले घर में एकदिन बंदरों के झुंड में से एक बंदर को आभास हो गया कि उपर की मंजिल के इस छेद में कोई पक्षी है। वह झुंड से पीछे होकर रुक गया। फिर वह कूदकर छेद के पास गया, पर पकड़ने की जगह न होने के कारण वापस आ गया। छेद में सो रहे उल्लू को भी आभास हो गया कि खतरा सामने मड़रा रहा है। वह चिखती-चिल्लाती किसी तरह जान बचाकर छेद से निकलकर उड़ती हुई सामने के पेड़ पर बैठ गई। बंदर काफी देर तक छेद से उलझता रहा। वह छेद में हाथ डालने की कोशिश करता, पर छेद के पास टिकने की जगह न पाकर वापस आ जाता। आखिर बंदर को महसूस हो गया कि वह छेद तक पहुँच नही सकता है, तब आखिर में बंदर को ही हार माननी पड़ी। जब बंदर वहाँ से चला गया, तब मैं भी निश्चिंत होकर अंदर आयी।
बंदर झुंड में घुमते है और एक दूसरे से सदभावना भी रखते है। उनके आपसी मेल का मिशाल कई जगह देखने को मिल जाता है। कभी जूं निकालते हुए, कभी दूसरे को खुजली करते हुए, तो कभी बच्चे को पेट में चिपकाए हुए।
घर में अचानक घुरे बंदरों के आतंक से सामना कई बार हुआ है। सिद्दिद छोटा था। शुक्र था कि वह अंदर लेटा था।मेरे पति देव जी बाहर गये और बंदर अंदर आ गया। जाली का दरवाजा था। इनके जाने के बाद तो वह बंद हो गया, फिर बंदर आये कैसे? यह विकट प्रश्न था।  मेज पर रखा ढ़ेर सा खाने-पीने के सामान को बंदर उलट-पुलट दिया। दरवाजा बंद होने के कारण वह वापस जाएगा कैसे? हम अपने को कमरे में बंद तो कर लिए थे, पर डर रहे थेकि ये तो अनजान है इसलिए जब ये अंदर आयेंगे तो बंदर उनपर टूट न पड़े। मोबाइल कमरे से बाहर था। मैंने धीरे से हिम्मत करके मोबाइल चौकी पर से उठाया और इन्हें फोन करके सतर्क कर दिया। मैं फोन करके मोना को भी पीछे से अपने कमरे में बुला ली। थोड़ी देर बाद ये बाहर से दरवाजा खोलकर हो-हल्ला मचाये और मसक्कत किए, तब जाकर  बंदर वापस घर में से निकल पायें। 
एकबार दिल्ली में मैं मंटू के पास अकेले थी। व्रत का दिन था। मैं अकेले केला खरीदकर वापस लौट रही थी। अचानक न जाने कहाँ से एक बंदर कूदकर आया और दुपट्टे में छिपाये हुए केला को टटोलते हुए निकाल लिया और कूदकर पेड़ पर चढ़ गया। मैंने मान लिया कि भगवान जी ने स्वयं आकर प्रसाद ग्रहण कर लिये है। मैं वापस फिर लौटकर दुकान पर गई और अपने लिए केला खरीदकर वापस लौटी..पर इस बार मैं सतर्क थी। बंदर मामा की आँखों में धूल झोकती हुई मैं किनारे से निकल आई। बंदर मामा को आभास नहीं हो पाया कि इस बार भी उनके भोग की सामग्री मेरे पास है..पर इस बार मैंने उन्हें गच्चा दे दिया और उनके आतंक से बाहर निकल पाई।
शिमला के जाखू मंदिर से निकलने ही बंदर मामा मेरे पति के उपर चढ़ गये। ये चुपचाप खड़े हो गये। वे इन्हें चारों तरफ से टटोल कर प्रसाद ढ़ूढ़ते रहे। मैं दूर खड़ी दर्शक बनी रही। जब प्रसाद मिल गया तो अपने आप चले गये।

बंदर से संबंधित बहुत सी कहानियाँ अभी और जुड़ी हुई है जिसे मैं समय-समय पर अंकित करती रहूंगी।

कोरोना का उधम (कविता)

उधम मचाया है,देखो,
कोरोना काल ने आज। 
सबको ताले में बंद कर,
जीना कर दिया दुश्वार।

आशायें मर गई है,
उम्मीदें सो रही है।
शारीरिक क्षमताएं,
शीथिल पड़ बेजान है।

आँसूएं सब जम गई,
भावनाएं बह गई है।
मन की पीड़ा बेदम है,
संवेदना बेसुध पड़ी है।

नाते-रिश्ते जम गए,
माँ-बाप बिछुड़ गये।
भाई-बहनों की सुधि नहीं,
अपने परिवार में रम गये।

स्कूल कालेज बंद है,
ऑफिस बस नाम का है।
पढ़ना-लिखना ठप्प है,
रोजगार सब बंद है।

कोरोना का ये है संकट,
हर पल बस बढ़ रहा है।
अर्थव्यवस्था चरमरा गई,
मदद को नहीं आते है लोग।

कामधाम सब ठप्प है,
बेरोजगारों की भीड़ है।
राजनीति में बस होड़ है,
आना-जाना कहीं नहीं है।

डॉक्टर-नर्स व्यस्त है
पुलिस काम में लगा है
सफाई वाले त्रस्त है
घर में टीवी की होड़ है।

कोरोना की ये लीला है
बैठे बैठे इसे ढ़ोना है
कुल्फी जैसा जमा है
बेदम सबको कर रहा है

पर अब हम भी सतर्क है
बेबस होकर नहीं बैठेंगे 
हौसला अपना बुलंद करेंगे,
हर काम हम फिर करेंगे।

करोना से बचकर रहेंगें, 
सतर्कता का हर पाठ पढ़ेंगे।
बच-बचकर अपनी राह चलेंगे
जीना है, तो तुमसे दूर रहेंगे।

आस्था का केन्द्र चित्रकूट (भाग-2)

और भी है विलक्षण स्थान
जहाँ चित्रों के कूट चित्रकूट के दस किमी के क्षेत्रफल में तमाम मंदिरों के समूह है। वहीं धार्मिक, एतिहासिक और प्रागैतिहासिक काल के तमाम स्थान अवलोकनीय है।
वाल्मीकि आश्रम लालापुर------
महर्षि वाल्मीकि की तपस्थली लालापुर चित्रकूट से इलाहाबाद जाने के रास्ते पर मिलती है। झुकेही से निकली तमसा नदी इस आश्रम के समीप से बहती हुई सिरसर के समीप यमुना में मिल जाती है। पूरी पहाड़ी पर अलंकृत स्तंभ और शीर्ष वाले प्रस्तर खंड बिखरे पड़े है जिनसे इस स्थल की प्राचीनता का बोध होता है। इस गुफा में श्वेतवर्ण से अंकित ब्राही लिपि भी मिल चुकी है। चंदेलकालीन  आशांबरा देवी का मंदिर इसी स्थान पर है और कहा जाता है कि यहीं पर स्वामी प्राणनाथ को दिव्य ज्ञान की अनुभूति हुई थी। उन्होंने बाद में पन्ना नगरी में जाकर प्रणामी संप्रदाय की शुरुआत की।
रसियन -----
चित्रकूट से इलाहाबाद जाते समय मऊ से उत्तर दिशा में चौदह किमी दूर रसियन नामक स्थान पड़ता है। चौरासी हजार देवताओं की साधनास्थली के बारे में कहा जाता है कि पूज्य देवरहा बाबा ने यहाँ पर उग्र तप किए थे। वैसे यह स्थान चित्रकूट धाम का प्रवेश द्वार भी माना जाता है। बाणासुर की धर्मपत्नी बरहा के नाम पर गाँव का नाम ही बरहा कोटरा रख दिया गया था। प्रख्यात शिव मंदिर के ध्वंसावशेष यहाँ पर बिखरे पड़े दिखाई देते है। इस मंदिर का सूक्ष्म अलंकरण और भव्य वास्तुकला विस्मित कर देती है। पुरातत्वविद बाणासुर के दुर्ग के पास बने बाँध के ध्वांसावशेषों को सिंधु काल के सभ्यता के समकालीन बताते है।मन को विस्मृत कर देने वाले इस स्थान पर जाते है। अद्भुत शांति का अनुभव होता है।वैसे यहाँ पर पास ही पहाड़ी पर आदि काल के मानव-निर्मित शैल चित्रों के साथ ही बौद्ध मूर्तियों के भग्नावशेष भी देखने योग्य है। जाने का दुर्गम रास्ता और शासन के ध्यान न देने के कारण पौराणिक, एतिहासिक और धार्मिक स्थान उपेक्षित सा ही है।
बांकेसिद्ध, कोटितीर्थ, देवांगना-----
चित्रकूट की पंचकोसी यात्रा का प्रथम पड़ाव अनसूइया के भ्राता सांख्यदर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल का स्थान बांकेसिद्ध के नाम से प्रसिद्ध है। इस गुफा में जँहा बीस हजार वर्ष पूर्व के शैल चित्र विद्यमान है जो अब मानव भूलो के कारण अंतिम सांसे ले रहे है। साल भर गंधक युक्त झरनों और विशेष किस्म के फूलों से सुशोभित इस स्थान को चित्रकूट का हृदय कहा जाता है। देवांगना में भी झरनें और पुष्पों की लताओं से लदे पेड़ दर्शनीय है कोटितीर्थ और पंपासर में हनुमान मंदिर आज भी लाखों लोगों के आस्था का केंद्र है। इसके आगे पर्वतीय मार्ग पर सरस्वती नदी, यमतीर्थ, सिद्धाश्रम, गृधाश्रम, मणिकार्णिका आश्रम इत्यादि है। पास ही मध्य में चंद्र, सूर्य, वायु, अग्नि और वरुण तीर्थ मिलते है।इन पाँच देवताओं के यहाँ पर निवास करने के कारण इसे पंचतीर्थ कहते है और कुछ ही दूरी पर ब्रह्मापद तीर्थ है। 
मडफा-------
चित्रकूट से बीस किमी दूर घुरेटनपुर के पास पर्वत पर भगवान शंकर अपने पंचमुखी रुप में सशरीर विद्यमान है।  किंवदती के अनुसार ऋषि मांडव्य की इस तपस्थली में महाराज दुष्यंत की पत्नी शकुंतला ने पुत्र भरत को जन्म दिया था। चंदेलकालीन वैभवशाली नगर के ध्वांशावशेष  यहाँ पर बिखरे पड़े दिखाई देते है। जैन धर्म के प्रवर्तक आदिनाथ के साथ ही अन्य जैन मूर्तियाँ यहाँ अपनी  बदहाली पर आँसू बहा रहीं है।
अत्रि आश्रम-----
महर्षि वाल्मीकि और महाकवि कालीदास ने इस स्थान का काफी रोचक वर्णन अपने ग्रन्थों में किया है।चित्रकूट से लगभग 15 किमी दूर  दक्षिण में मंदाकिनी के किनारे अत्रि-अनसूइया और उनके पुत्र चंद्रमा, दत्तात्रेय व दुर्वासा के स्थान है। यहाँ पर पाये जाने वाले शैलचित्र इसे पुराप्राचीन काल का घोषित करते है। मंदाकिनी नदी के उत्तरी किनारे पर भगवानों के ध्वंसावशेष मिलते हैं जो कुलपति कण्व के आश्रम के माने जाते हैं। इस आश्रम की निकटवर्ती पहाड़ियों पर काफी मात्रा में शैलाश्रय और उनमें रामकथाश्रित शैलचित्र प्राप्त हुए हैं। सप्तर्षियों में सम्मिलित महर्षि अत्रि का विद्यापीठ प्राचीन भारत के महान विद्यापीठों में गिना जाता हैं। यहां से दंडकारण्य की सीमा प्रारंभ हो जाती है और तीन मील दूर एक झरना और हनुमान जी की मूर्ति प्रतिष्ठित है यहीं पर विराध कुंड है। 
शरभंग आश्रम-------
सतना के वीरसिंहपुर से लगभग बारह किमी दूर यह स्थान राम और ऋषि शरभंग के अद्भुत मिलन का स्थल है। यही पर भगवान विष्णु से कुपित होकर ऋषि ने अपने शरीर का हवन किया था। यहां पर दो दिव्य कुंड हैं जो ऋषि शरभंग के तप बल की पुष्टि करती है। विराध कुंड की गहराई मापने के कई प्रयास हो चुके हैं पर अभी तक इसमें सफलता नही मिली है।
राजापुर--------
यमुना के किनारे बसी गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की जन्म स्थली। राम बोला से तुलसीदास जी ने जब रत्नावली के द्वारा ज्ञान प्राप्त किया तो चित्रकूट में आकर गुरु से दीक्षा लेकर रामचरितमानस के साथ ही अनेक ग्रंथ अपने आराध्य राम के बारे में लिख डाले। यहां पर उनके द्वारा स्थापित संकटमोचन हनुमान मंदिर व उनके द्वारा पूजित लगभग पंद्रह किमी दूर नांदी के हनुमान जी का मंदिर दर्शनीय है। वैसे पहाड़ी के पास ही साईंपुर में दाता साईं का मंदिर व स्थान दर्शनीय है। यहां पर हिंदू और मुस्लिम एकता को बढ़ाने वाला मेला लगता है।
कैसे पहुंचे-----
चित्रकूट के लिए कर्वी निकटतम रेलवे स्टेशन है। यह दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता,, बनारस, लखनऊ, भोपाल, जबलपुर व रायपुर से सीधा जुड़ा हुआ है। चित्रकूट से 30किमी दूर माणिक पुर जंक्शन भी है। यहाँ से देश के अन्य भागों के लिए ट्रेनें मिलती है। इसके साथ ही राष्ट्रीय राजमार्ग 76पर कर्वी का बस स्टाप है। यहाँ से लखनऊ, बनारस, कानपुर, इलाहाबाद आदि स्थानों के लिए सीधी बस सेवा है। वैसे जानकीकुंड में भी अंतर्राज्यीय बस स्टैंड है। यहाँ से सतना, रीवा, जबलपुर, पन्ना, मैहर आदि के लिए बसें मिलती है।निकटतम हवाई अड्डा खजुराहो , लखनऊ व बनारस है। इसके अलावा टैक्सी सेवा हर समय यहाँ पर मिलती है।
कहाँ रुके------
चित्रकूट में रुकने के लिए  वैसे तो तमाम धर्मशालाएं,लॉज और यात्री निवास है। इनमें प्रमुख उप्र, मप्र के टुरिस्ट बंगले, जयपुरिया स्मृति भवन, कामदगिरी भवन, विनोद लॉज, पंचवटी, रामदरबार होटल आदि है। वैसे हर मठ और मंदिर ने भी अपने गेस्टहाउस बना रखें है। उप्रसरकार का विश्राम गृह कर्वी में जबकि मप्र सरकार का विश्राम गृह सिरसावन में है।
घूमने का मौसम-----
वैसे तो वर्ष भर यहाँ पर घूमने का मौसम रहता है।पर जुलाई से लेकर मार्च-अप्रैल तक का समय पर्यटकों व दर्शनार्थियों के लिए ज्यादा मुफीद बताया जाता है।

कंकड़ फेंकना ठीक नहीं (लेख)

कुछ लोगों की मंशा दूसरों की जिंदगी में कंकड़ फेंककर सिर्फ हलचल मचाना ही होता है। ऐसे लोगों को ढ़ूढ़नें के लिए आपको कहीं जाने की जरुरत नहीं है। ये कहीं ना कहीं आपके अपने ही आसपास मिल जायेंगे। बस यदि कुछ जरुरी है, तो यह जरूरी है कि आप उन्हें पहचानते है कि नहीं? और यदि नहीं पहचानते है, तो पहचानेंगें कैसे?
वैसे ऐसे लोगों को पहचानने की भी जरूरत नहीं होती है क्योंकि ये अपनी हरकतों से खुद व खुद सामने आकर दिखने लगते है और अपनी पहचान उजागर कर देते है।
 
जिंदगी में संपर्क में आये वे व्यक्ति जो आपको चैन से अपना काम करने ना दे, अपने उलजुलूल बातों में आपको हरदम फँसाये या उलझाये रखने की कोशिश करता रहे और अपने उलटी-सीधी हरकतों से आपका ध्यान आकर्षित करके आपको भटकाता रहे...वहीं लोग ऐसे लोगों की श्रेणी में आते है। ऐसे व्यक्ति का उद्देश्य सिर्फ इतना होता है कि वह आपके अपने दैनिक कार्यों और उचित सोच में कंकड़ मारकर भटकाव उत्पन्न कर दें, जिससे आप अपने मूल उद्देश्य से भटककर गलत दिशा में मुड़कर भटक जाए।
 
ऐसे व्यक्तियों की श्रेणी में अधिकतर वहीं लोग आते है जिन्हें आपकी उन्नति से चिढ़न होती है। आपकी सफलता उनको रास नहीं आती है। जिंदगी के दौड़ में जो आपसे पीछे रहने के कारण खुन्नस खाये रहते है। उन्हें ही आपको आगे जाने से रोकना होता है, उन्हीं के दिमाग में ऐसी तिकड़मी सोच और उटपटांग हरकतें बनती और पनपती है। जिसके कारण पहले वही स्वयं अपने दिमाग को भटकाते है, फिर आपको भटकाने के प्रयास में जुगत लगाकर जुट जाते है।

ऐसे लोग सोचते है कि ऐसा करके वे बहुत फायदें में है, तो यह उनकी बहुत बड़ी भूल होती है। क्योंकि ऐसे लोग कभी सुख-चैन से बैठ नहीं पाते है। उनका दिमाग खुराफाती बातों में भटकता रहता है, वे तरह-तरह के मंसूबों को बनाने में अपने अच्छे-खासे दिमाग का बंटाधार कर देते है। फिर ऐसे लोगों की उन्नति होगी भी तो कैसे होगी? क्योंकि खुराफाती दिमाग के कारण उनका स्वयं पर से भरोसा फिसलती हुई गर्त में जाकर समाप्त हो जाता है, फिर वे अपनी उन्नति के लिए भी कोई प्रयास दिल से कर नहीं पाते है और दिल से प्रयास न करने के कारण उन्हें सफलता भी नहीं मिलती। दूसरों की जिंदगी में तंगड़ी लगाने वाले, तो खुद अपने बनाये तंगड़ी में फँसकर गिर जाते है, फिर वे सोचकर भी दूसरों को गिरा नहीं पाते क्योंकि दूसरा इन उलझनों से दूर स्वयं के प्रयास में निरंतर जुटा रहता है और सफलता प्राप्त कर लेता है।
इसलिए जो स्वयं के उन्नति के लिए उत्सुक होगा, वह ऐसे खुराफाती हरकतों में उलझेगा ही नहीं। जैसे-कुत्ता भौंक-भौंक कर हाथी को भटकाना या परेशान करना चाहता है, पर हाथी इन सबसे अनजान अपने चाल में मस्त हो कर आगे बढ़ता चला जाता है। 
 
इसलिए समझदारी यही है कि स्वयं अपनी उन्नति का राह बनाओं और आगे बढ़ों। दूसरे का किला ढ़हाने से स्वयं के शक्ति का ह्रास होगा और मंजिल सामने रहते हुए भी दिखेगी नहीं। और जो दिखेगा ही नहीं.. उस तक पहुँचने का सारा प्रयास विफल हो जायेगा। 
 
इसलिए कंकड़ फेकना छोड़कर...स्वयं के प्रयत्न एवं प्रयास से आगे बढ़ों , उन्नति का राह बनाओ और दूसरों को भी आगे जाने का मौका दो...यही सफलता पाने और आगे बढ़ने का मूल मंत्र है।
 

कोरोना का विभिन्न रुप (कविता)

कोरोना वायरस जब --
विदेश में था,
तो डरे नहीं।
देश में आया, 
तो सजग हुए।
शहर में आया,
तो सतर्क हुए।
कालोनी में आया,
तो  सहम गये।
गली में आया,
तो डर गये।
अब घर में घुस गया,
तो भयभीत हो गए।
कोरोना का वीभत्स रुप,
बहुत डरावना होता है।
तोड़ मरोड़ देता है,
जान पर बन जाता है।
इसलिए सतर्क रहो,
सम्भलकर रहो।
जितना हो सके,
इससे दूर ही रहो।
यह दूर तभी रहेगा,
जब तुम इसको समझोंगे।
जब पूरी सतर्कता और,
सजगता दिखलाओंगे।
और पूरी तरह 
इससे दूर रहने के,
नियमों को अपनाओंगे।
 

भगवान जी भी बहुत है (लघुकथा)

पाँच वर्षीय राजीव अपनी मम्मी की अंगुली पकड़े जब वह नानी के बड़े से मकान में घुसा तो वह अचम्भित होकर चारों तरफ निहारने लगा। वह पहले भी नानी के घर आया था, पर उसे देखकर यही लगता था कि जैसे वह पहली बार यहाँ आया हो।
अंदर पहुँचकर सभी लोग चाय और बातों में उलझ गये, पर राजीव चारों तरफ घुम-घुमकर पूरे घर का निरीक्षण करने लगा। इधर-उधर टहलने के बाद वह अपनी मम्मी के पास आकर बोला,"मम्मी, नानी का मकान कितना बड़ा है?"
"हाँ बेटा, नाना तहसीलदार है। यह उनका सरकारी बँगला है इसलिए इतना बड़ा है।" रागिनी राजीव को समझाते हुए बोली।
थोड़ी देर बाद राजीव फिर अपनी मम्मी के पास आकर बोला,"मम्मी, नानी के घर चारपाई बहुत है।"
"हाँ बेटा, यहाँ ज्यादा लोग है, इसलिए चारपाइयाँ भी अधिक है।" रागिनी राजीव को फिर समझाते हुए बोली।
थोड़ी देर बाद राजीव फिर माँ के पास आकर बोला,मम्मी, नानी के यहाँ बर्तन भी बहुत है।"
" हाँ बेटा, नानी के घर बहुत से लोग आते-जाते है, इसलिए यहाँ बर्तन भी बहुत है।"
राजीव बार-बार आता और किसी एक चीज की अधिकता का वर्णन करता, तो रागिनी के छोटे भाई-बहनों को बहुत मजा मिलने लगा। वे राजीव को छेड़ती। पर राजीव अपने ही धुन में मस्त बार-बार आकर रागिनी को परेशान करता। एक बार रागिनी खिज गई, तो झल्लाकर बोली,"मेरा पिंड छोड़ो। जाकर थोड़ी देर बाहर खेल लो।" उसी समय राजीव की नानी शारदा देवी पूजा करने जा रही थी। वे राजीव से बोली,"राजीव आओ, हम लोग पूजा करने चलते है। राजीव चुपचाप नानी के साथ पूजा करने चला गया।
पूजा करके लौटने पर राजीव फिर रागिनी के पास नहीं आया। वह नानी का आँचल पकड़कर बोला," नानी, आपके यहाँ भगवान जी भी बहुत है।"
यह सुनते ही सब लोग खिलखिला कर जोर-जोर से हँसने लगे। शारदा देवी राजीव पर झल्लायी नहीं, बल्कि सबके साथ हँसते हुए राजीव को गोद में लेकर पुचकारने लगी। फिर बोली,"बेटा, ये घर बड़ा है ना, तो यहाँ सब कुछ अधिक है। इसलिए भगवान जी भी अधिक है। अब तुम यही रहना। हम लोग रोज अधिक भगवान जी की पूजा करेंगे।"
तीक्ष्ण बुद्धि वाले बच्चों का ध्यान कब किधर अटक जाए, कहा नहीं जा सकता है। फिर वे तब तक अपना प्रश्न दोहराते रहेंगे, जब तक कि उन्हें संतुष्टि वाला उत्तर नहीं मिल जाता है। 
 

बिवाईयों वाला पैर (कविता)

आखिर ये पैर है 
किस-किस के???
बार-बार आता है
ये प्रश्न मेरे मन में,
ये पैर है किसके?

कटे-फटे,मटमैले
बिवाईयों से पूर्ण,
थके-हारे गंदे पैर
को देख,
विह्वल मन
फिर पूछता है...
आखिर ये पैर 
है किसके???

क्या ये है, उस
किसान का, 
जो जी तोड़ मेहनत
करके खेतों में
खून-पसीना 
बहाता है,  
पर बर्बाद फसल 
से बेबस होकर 
मौत को 
गले लगाता है।

या यह है, उस 
मजदूर का 
जो काम की 
तलाश में
दर-दर भटकता
और तड़पता है।
और काम न 
मिलने पर
खाली हाथ 
घर लौटता है।
फिर सामने पा
भूखे बच्चों को 
मुँह चुराये फिरता है।

या यह है, उस बेबस
बेरोजगार युवा के,
जो रोजी-रोटी की
तलाश में भटकता है
फिर नाकामी का 
ठप्पा लगाकर 
नाकारा कहलाता है।
बाप की लाठी न 
बन पाने के दुख से,
मुट्ठी मींच कर
रह जाता है।

या यह है, उस
कुवांरी बेटी के
बेबस पिता के।
जो घर-घर
सुयोग्य वर की
तलाश में कुंडी
खटखटाता है।
पर मोटी गठरी 
के अभाव में
मुँह लटकाये
विवश हो जाता है।

या यह है,उस विवश 
नारी मन की 
विवशता का,
जो चक्कर 
लगाती है चँहु ओर
सम्बन्धों को
सुदृढ़ करने को,
पर तानों-उलाहनों 
में फँसकर
आँसू बहाती व
तड़पती है।

किसने-किसने 
देखा है इन पैरों को???
किसने महसूस किया
उनके दर्द को???
किसके मन में 
कौंधता है ये प्रश्न मेरी तरह, 
आखिर ये पैर है किस-किस के???
 

पति के घूरती तिरछी नजरों का असर (व्यंंग्य)

व्यक्ति चाहे कोई भी हो, किसी भी स्तर का हो...खुले दिमाग का हो या संकुचित विचारधारा में बंद हो, पर यदि उसके माथे पर पति होने का ठप्पा लग गया है, तब वह शहंशाह है और पत्नी उसकी सम्पत्ति है। यह किसी एक की बात नहीं है, बल्कि यह तो जमाने से चली आ रही एक सोची-समझी और अमल में लायी गई रणनीति है। जो पुरुष वर्ग की सामाजिक श्रेष्ठता को दर्शाता है। जो स्वयं पुरुष द्वारा निर्धारित की गई नीति है। जिसका पालन करना हर पुरुष वर्ग अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझता है। तभी तो वह जब चाहे, जहाँ चाहे अपनी पत्नी को तिरछी तरेरती हुई नजरों से घूर सकता है।
तभी तो पति अपनी पत्नी को सुरक्षित और अपने संरक्षण में अपने अधीन रखना चाहता है। और तब पहले की पत्नियाँ भी पति के संरक्षण में अपने को सुरक्षित महसूस करती थी। इसलिए पति के उँच-नीच, सही-गलत सभी फैसले को आँखे मूंदकर मानने को विवश हो जाती थी, तभी तो पत्नी को डराने-धमकाने के लिए एक तरेरती हुई तिरछी नजर एक हथियार की तरह अमल में लाया जाने लगा। और यह हथियार कारगर सिद्ध भी हुआ और अपना असर भी दिखाने लगा।  
 
पहले का जमाना था, पत्नी स्वयं को भी अपने पति की पूंजी मानती थी। तभी तो ससुराल में पति के मनमाफिक कोई काम न होने पर पति अपनी  खामोश, तिरछी, आँखों से मात्र एक पल के लिए ही सही बस जब पत्नी को घूर देता था, तो उसका असर कुछ इस कदर पत्नी के दिल-दिमाग पर छा जाता कि पति से नजरें चार होते ही पत्नी खौफ खा जाती थी। वे बिना पति के बोले ही पति का इशारा और इरादा समझ जाती थी कि पति क्या चाहता है, तभी तो वे झटपट उस आशय को पूरा करने की उम्मीद में पूरी तल्लीनता से जुट जाती थी। वे इतने खौफ में होती कि पति के इच्छा के विरुद्घ शौचालय भी जाना हो, तो वे उसे भी रोक लेती थी। उनमें इतनी हिम्मत नहीं बचती थी कि पति से यह कह सकें कि पहले शौचालय, फिर आपका काम। वे शादी के बाद से ही इतनी तोड़-मरोड़ दी जाती थी कि उन्हें सांस लेने की फुर्संत भी न मिले और सारा काम भी हो जाएं। ताकि वे मात्र एक कठपुतली बनकर जी सकें।
 यद्यपि आज के बदले माहौल में आधुनिक पति का गुरुर कुछ कम जरूर हो गया है,पर वह पूरी तरह बेअसर हो गया है...यह हम कह नहीं सकते है। परंतु पहले वाले पति अभी अपने पुराने स्थिति में ही होते है, तभी तो उम्र के एक लम्बे पादान को पार करने के बावजूद आज भी बहुत सी उम्रदराज पत्नियाँ अब भी पति की घूरती खामोश निगाहों से खौफ खाती है और सहम जाती है। पहले यह खौफ भयानक होने के साथ ही बहुत कुछ समझाने वाला होता था, तभी तो नजर मिली नहीं कि असर जल्दी-जल्दी शुरू हो गया और पति को खुश करने के चक्कर में काम जल्दी-जल्दी शुरू हो गया।
 
समय बदलता गया। बीच के समय की जो पौढ़ महिलाएं है, वे आज भी खौफ खाती है, पर उतना नहीं जितना उनसे पहले की महिलाएं खाती थी। बीच की स्थिति भयानक होती है, क्योंकि उनका कोई एक अपना नीजी अस्तित्व नहीं बनता। कभी वे पुरानी परंपरा में घुस जाती है, तो कभी आधुनिकता का लिबास पहनकर अकड़ने लगती है। तभी तो वे बीच मझधार में डूबती-उतराती दिखती है। ऐसी पत्नियों के पास पहले तो सिर्फ अपने ही बच्चे थे, जिसके कारण कहीं कोई कमी दिखती या पति के इच्छा के विरुद्ध जाती, तो पति का काम बस इतना था कि वह पत्नी को तिरछी नजर से घूर बस दे...फिर पत्नी की औकात ही कहाँ जो इन  नजरों की अवहेलना कर सकें। पर अब परिवार का दायरा बढ़ गया है। बेटा-बहू के साथ पोते-पोतियों की संख्या भी बढ़ गयी है। इसलिए पति के घूरती निगाहों का दायरा भी बढ़ गया है। पति के इस नाजायज शह का असर बच्चों पर भी पड़ने लगता है, तभी तो बहुत से घरों में बच्चे भी माँ का आदर उतना नहीं कर पाते, जितना सम्मान उन्हें अपनी माँ को देना चाहिए। अपने परिवारी जनों की ये चौतरफा मार बहुत सी स्त्रियाँ आज भी झेलती है।
पर आधुनिकता के इस दौर में समय की बिसात पर बिछी गोटियों के अधिकार, कार्य करने क्षमता, लोगों के प्रति बदले भाव जब बदले-बदले नजर आने लगे, तो पत्नियों को भी अपने को बदलना जरूरी हो गया। आज की पत्नियाँ पति के खौफ वाली निगाहों से डरती नहीं है बल्कि स्वयं भी आँखें तरेरने का दम रखती है। तभी तो कई जगह आधुनिक पति अपनी पत्नियों के सामने भींगी बिल्ली बनें दिखते है।
यह समय घालमेल का मिश्रण है। एक ही परिवार में दो तरह की पत्नियाँ दिख जायेंगी। एक खौफ खाती हुई, तो एक खौफ खिलाती हुई। सास-बहू के न पटने का एक कारण यह भी होता है।
 
अब पुरानी पत्नियाँ भी पति की घूरती निगाहों के खौफ से  उतना नहीं डरती है, जितना पहले डरती थी। क्योंकि आधुनिकता के रंग में अब वे पत्नियाँ भी  रंगकर ढ़ीठ हो गयी है। अब बात-बात में पति की घूरती निगाहें जब घायल करने को होती है, तब उस भाव को समझकर वह पहले ही अपनी नजरें चुरा लेती है। उन एकटक देखती नजरों से अब अपनी नजरें टकराती ही नहीं है, ताकि खौफ का जो मंजर पहले से छाने वाला हो, वह बेअसर हो जाये।
आज समय बदल गया है। आज पति का यह हथियार जंग खाकर म्यान में पड़ा-पड़ा अपने किस्मत को कोस रहा है, क्योंकि जब भी वह म्यान से निकलने की कोशिश करता है, तो पत्नी की ढ़ाल की तरह तरेरती नजरें या पत्नी की वाक्पटुता के आगे ठंड़ी पड़कर वह स्वयं ही म्यान में दुबुक जाता है। 
 
ये समय की माँग भी है। जब पति-पत्नी साथ में चलने वाले सहयात्री है, तो समता का व्यवहार होना लाजमी है। पर पलड़ा बराबर का ही होना चाहिए। एक की ज्यादती सिर्फ अन्याय कहलायेगा और असहनीय भी होगा, क्योंकि आजकल की लड़कियाँ भी कम खुराफाती नहीं होती। अपने स्वतंत्रता का वे गलत प्रयोग करती कहीं ना कहीं दिख ही जाती है, जिसका खामियाजा पति के साथ-साथ बच्चे और परिवार के अन्य सदस्यों को भी भुगतना पड़ता है।
अतः निष्कर्ष यही है कि रेल की समानांतर चलती हुई पटरियों की भांति पति-पत्नी को अपने बर्ताव में, व्यवहार में सामंजस्य स्थापित कर साथ-साथ समान भाव से समझना-चलना और व्यवस्थित करना चाहिए। तभी एक  खुशहाल परिवार की नींव पड़ सकती है।