प्रकृति से बना अनोखा रिश्ता (संस्मरण)

प्रकृति के अनजान पहलू में भटकना और रमना..मेरी आदत व जुनून है। कहीं भी-कभी भी जब सुंदर फूल-पत्ती,पेड़, कैक्टस, तालाब,नदी-नाले, झरने, खेत-खलिहान या कच्चे-पक्के मकान मुझे दिखते और आकर्षित करते है, तो ठिठकती हुई उन्हें निहारने में ही, मैं अपनी सुधि-बुधि खो देती हूँ। पहाड़ों की उँची-उँची चोटियों या उनके मनोहर दृश्य की क्या कहू... छोटा, मनभावन रंग-बिरंगा या चितकबरा गोल पत्थर भी यदि कहीं मेरा मन मोह लें, तो मैं उसे जमीन से उठाकर अपने आंचल में समेट कर सुरक्षित घर पँहुचा देती हूँ। मेरे पास ढ़ेरों चीड़ का फल, सीप, घोंघें और कौड़ी तथा पंक्षियों के पंखों में मोर का पंख, नीलकण्ठ का पंख, और सफेद उल्लू का पंख सुरक्षित है, जिन्हें मैं कहीं ना कहीं से अनाधिकृत रुप से एकत्र करके ही संजोयी हूँ। प्रकृति के इस अनूठे लगाव से ही मुझे हरपल जीवंत रहने की सीख मिलती है। 
 
बाहर की कौन कहे, मैं तो जब घर में भी रहती हूँ, तब भी बाहर मुंड़ेर पर रखे दाने को चुगती चिड़यों की चहचहाहट और उनका फुदकना...मुझे बहुत भला लगता है और फिर जब उन दानों पर कबुतर और कौए भी उड़ते हुए आकर अपना एकाधिकार जमाने की कोशिश करने लगते है, तब भी इनका आपस में जुड़ना व जूझना अच्छा लगता है। बुलबुल भी बिजली के तारों और पेड़ों पर जोड़ों में इठलाती और चहकती है, तो बहुत भली लगती है। सब्जी काटते हुए इन्हें निहारनें में जो समय बीतता है, वह मुझे जायज और आत्मविभोर करने वाला लगता है। 
जीवन में सबसे सुखदायी पल मेरा तब था, जब मेरे आँगन में दो बार कबुतरों ने और रसोईघर की खिड़की पर पांच-छः बार गौरैयों ने अपना ठिकाना बनाकर अण्डा दिया। एक-एक तिनके को चुनना, घोंसला बनाना, अण्डों का आना, फिर अण्डों से नन्हें पक्षी बनना, फिर उनका नन्हें पंखों से उड़ना सीखना और बड़े होने पर घोंसला को छोड़कर कहीं और बस जाना...एक लम्बें पल की जीवन्तता थी, जिसके विभिन्न रुपों का इस  प्रकार झेलना बहुत सुखदायी था। रोटी सेंकते हुए जो चावल के दाने और आटे की गोलियाँ जिन्हें मैं जमीन पर और अपने हाथ पर रखती थी, तब उन्हीं दानों को चुगती हुई गौरैया जब मेरे हाथों पर से मेरे करीब आ जाती थी, तो दिल में जिस गुदगुदी का आभास होता... वह बहुत ही निराला लगता था।
 
सफर कहीं का भी हो,  मुझे रात्रि में या दिन में भी सोते हुए या पत्रिका पढ़ते हुए गंतव्य स्थल पर पँहुचना बिलकुल भाता नहीं है। सफर में खिड़की की सीट न मिले, तो मन उदासियों व मायूसियों से भर जाता है। बुझे मन से इधर-उधर दूसरे की खुली खिड़की से कौतूहलवश बाहर झांकने व निहारने का असफल प्रयास करना, वो खुशी नहीं दे पाता जिसकी मुझे चाहत होती थी। तब अधूरी चाहत को दिल में समेटे हुए ही सफर पूरा करना पड़ता था। दिन का सफर हो और खिड़की वाली सीट मिल जाएं तो क्या कहना। दिल बल्ले-बल्ले होकर नाचने हुए सफर के आंनद में डूब जाता है।
 
सफर में नीलकण्ठ को निहारना बहुत बड़ी खुशी, संतुष्टि और जीवंत करने वाला लगता है। बिजली के तार पर बैठा हुआ नीलकण्ठ, उड़ता और कलाबाजियाँ करता हुआ नीलकण्ठ स्वर्णिम सुख देने वाला होता है। रास्ते में मोर, मोरों का झुंड, नीलगाय और बहुत से जानवर दिखते है। तालाब में नहाते भैंस और तैरते हुए बत्तख बहुत प्यारे लगते है।
कतार में लगे पेड़ों का झुंड, जंगल और ईट के भट्ठे भी बहुत उत्साहित करते है। चाँद या सूरज को विभिन्न कोणों से निहारना अच्छा लगता है, पर यदि सूर्योदय, सूर्यास्त के साथ पूनम के चाँद का दीदार हो जाये तो सफर बहुत आनंदित करता है।
 
देशाटन के उत्तम पलों में कई ऐसे दिलचस्प व अनोखे पल मिले, जो एकांत पलों में अक्सर मेरे मन में उमड़ते-घुमड़ते है। ये पल हैः अण्डमान- निकोबार द्वीप समूह में हैलवाक बीच जाते समय समुंद्र की लहरों को निहारना, भूटान-सिक्किम के उँचें गगनचुंबी पहाड़ों और नजारों को महसूस करना, मेघालय-दार्जिलिंग के उमड़ते-घुमड़ते बादलों के बीच का रौनक, हिमाचल का सफेद बर्फ वाले पहाड़ों की चोटियाँ, अलमोड़ा जाते समय दो पहाड़ों को जोड़ती हुई एक ही साथ दो इंद्रधनुष का विहंगम दृश्य देखना, प्रयागराज में संगम के शाम की सुरमई बेला में लाखों पक्षियों का एक साथ चहचहाते हुए गुंजायमान करना और कालका स्टेशन पर बहुत सी मैनाओं का एक साथ सोने के जगह के लिए कलवर करते हुए भीड़ना...यादगार लम्हों में से एक है, जो अक्सर दिल को उमड़ती-घुमड़ती हुई आनंदित करती रहती है।
 
प्रकृति के साहचर्य व सांनिध्नता में अजब-गजब उत्साहित करने वाली खुशी सिर्फ मुझे ही नहीं, बल्कि बहुतों के दिल को कुदेरती व हिलोरें लेती हुई मिलती है..पर यह उन्हीं को महसूस होती है, जिनके दिल में इन अनुभूतियों को खुशी मन से स्वीकार करने का जज्बा होता है...। अतः प्रकृति के साहचर्य व सांनिध्नता रहकर जिंदगी को रंगीन बनाना भी...जीवन को जीवंत करने की एक कला है।
प्रकृति के आगोश में एक बार समाकर तो देखो...जीवन बहुत सुखदायी और जीवंत लगता है।
 

दो कदमों की दूरी, मिटाना है जरूरी (लेख)

अपने घर-गाँव से दूर दूसरे शहर में  रहने वाले बच्चों को अक्सर ये शिकायत होती है कि उनके माँ-बाप अक्सर उनके घर ज्यादा दिन रुकना नहीं चाहते है और यदि रहते भी है तो वे उनके उल्लासपूर्ण वातावरण में पूर्ण रुप से वैसे संतुष्ट या खुश नहीं रह पाते है, जैसे वे अपने शहर में रहते थे। जबकि बच्चे उन्हें बड़े आदरभाव से अपने पास रखना चाहते है। बहुत से युवाओं को अपने माँ-बाप से अटूट लगाव होता है। इस दूरी को कम करने के लिए ही वे उन्हें अपने पास, अपनी नौकरी वाले शहर में रखना चाहते है लेकिन अपने घर-गाँव से मानसिक रुप से बँधें होने के कारण उनके बुजुर्ग स्वेच्छापूर्वक उनके पास रहना नहीं चाहते है। ऐसे में बच्चे भी अपने बुजुर्गों की परेशानी व मर्म को जब  समझ नहीं पाते है। तब वे भी पशोपेश में पड़ जाते है। उन्हें यही लगता है कि जब वे सारी सुख-सुविधा अपने माँ-बाप को बैठे-बैठाये दे रहे है, फिर उनका इस तरह उदास व अनिच्छापूर्वक रहना या रहने की मजबूरी क्या हो सकती है? ऐसे माँ-बाप तो उन बुजुर्गों से अधिक भाग्यशाली है, जिनके बच्चे उन्हें पूछते नहीं है। फिर वे अपने को मजबूर व दुखी क्यों समझने लगते है?
 
यह प्रश्न जटिल है। इसलिए इसे समझना बहुत जरुरी है। क्योंकि यह दो पीढ़ी के सोच-समझ और विचारों के अंतर को उजागर करता है। अतः दोनों पक्षों का मर्म समझना जरुरी है।
नया युवा वर्ग आधुनिकता के नये दौर में आगे बढ़ना और विकसित  होना चाहता है, जो पुराने, पारम्पारिक रुप से अपने पुराने ख्यालों में बँधे और उससे न डिगने वाले बुजुर्गों से मेल नहीं खाता है। तब ऐसे में जब दोनों मनमानी और अपने मनमाफिक करने पर आतुर हो  जाते है, तभी टकराव की स्थिति  उत्पन्न होने की सम्भावना बढ़  जाती है।
 
जैसे सिक्के के दो पहलू होते है, वैसे ही युवाओं व बुजुर्गों की भी अपनी- अपनी सोच, सिद्धांत या मिलकियत का अपना पहलू होता है, जो गाहेबगाहे एक दूसरे से मेल नहीं खाता है। तब जिंदगी के इसी पहलू या कटू सत्य को दोनों को समझना पड़ता है। यदि दोनों में समझदारी है, तो जीवन सुगमता से आगे बढ़ता है और यदि वे समझदारी नहीं दिखाते है, तभी उनमें साथ रहने के बावजूद भी टकराव की स्थिति पैदा होती है।
 
आज जो बुजुर्ग है, वहीं कल के युवा थे। अतः अपने समय में अपने उपर पड़ने वाले दुर्गम व दुरुह मुसीबतों व कठिनाइयों को स्वयं के विवेक व निर्णय के आधार पर झेलने और हल करने के कारण, जो उनका सोच व सिद्धांत बनता है...वहीं उनकी पूंजी होती है। अतः उम्र के ढ़लान पर जब बच्चे उनके सोच व अधिकारों पर अपना अधिपत्य जमाने की कोशिश करते है, तभी उन दो पीढियों के बीच टकराव की नींव बनने लगती है। बुजुर्गों को अनाड़ी, या नासमझ समझने की भूल जब बच्चे करते है..और गाहेबगाहे यह टिप्पणी सुनाते है कि आपको कोई समझ नहीं है, तब उनके दिल के जो टुकड़े होते है...फिर उन टुकड़ों के चुभन से उनका दिल तार-तार हो जाता है। ऐसे में वे स्वयं को लुटे-पीटे मजबूर और अशक्त समझने लगते है। यह उनके लिए असहनीय, दुखदायी पल होता है।
ऐसी परिस्थिति में अपने-अपने दायरे में बँधें दो पीढ़ियों के कश्मकश को समझना आज के युग में जरुरी हो गया है। जहाँ एक प्रगति के पथ पर तेज गति से बढ़ने वाला, झटपट निर्णय लेने वाला तेजतर्रार जागरूक युवा होता है, वहीं दूसरी तरफ उँच-नीच के खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजरने वाला ठोस बुनियादी सोच रखनेवाला बुजुर्ग होता है, जो अपने टोका-टोकी वाले व्यवहार को बदलना नहीं चाहते। क्योंकि अपने अनुभवों के आधार पर उन्हें जो सही व उचित लगता है, वही सीख वे बच्चों के सामने परोसना और बच्चों को उसी राह पर चलने के लिए दबाव डालना, उनका शगल होता है, इसलिए जब वे अपनी जिह्वा खोलते है, तब आधुनिकता के रंग में रंगें नयी पीढ़ी को मिर्ची लगना अनिवार्य है। क्योंकि आधुनिकता के रंग में रमे बच्चे उस रास्ते पर जाना ही नहीं चाहते जिसपर उनके बुजुर्ग चलकर अपना जीवन यापन कर चुके है। बच्चों को अपने बुजुर्ग दकियानूस लगते है।  सोच का यहीं नया दायरा दोनों के बीच मिलते हुए प्यार की मिठास में खट्टेपन की बिसात बिछाना शुरु कर देता है। तब गतिशील जिंदगी मात खायें जुआड़ी की तरह सिकुड़कर रह जाता है। परिणामस्वरूप उनके  दिल की दूरी, उनके बीच की खाई बन जाती है।
 
बच्चे भी बुजुर्गों के मन की व्यथा को समझना नहीं चाहते है, क्योंकि बुजुर्गों का कुछ समझाना, टोकना...उन्हें अपने राह में रुकावट पैदा करना लगता है।
 
अधिकतर बुजुर्गों के पास जो विकल्प होता है.. वह बच्चों के हित का ही होता है, पर नयेपन के एहसास में डूबे बच्चे या  युवा अपने बुजुर्गों के मर्म को समझना या मानना ही नहीं चाहते है। वे स्वयं को उस उलझन को समझने में पूर्ण रुप से असमर्थ व असफल महसूस करते है, जिसका अनुभव उनके अभिभावक के पास होता है। और बुजुर्ग अपनी पुरानी सोच व ठोस सोच को बदलना नहीं चाहते, तभी तो छलांग लगाते बच्चों के सोच को वे अपने टोका-टोकी से उसपर पाबंदी लगाना चाहते है। सही अर्थो व सही तरीका से समझा न पाने के कारण उनके सही होते हुए भी उनके नासमझ बच्चे उसे अपने राह की रुकावट समझने लगते है।
 
अपने घर या गाँव में एक ही जगह या दिनचर्या में समय गुजारना जिस प्रकार बुजुर्गो के लिए सरल होता है, वैसी सुविधा उन्हें स्थान परिवर्तन करके बच्चों के पास जाने में तुरंत नहीं मिल पाता है। और बच्चे, जो स्वतंत्र वातावरण में स्वच्छंद रहना चाहते है, उन्हें बंधन युक्त माहौल रास नहीं आता, पर सामंजस्य बैठाना ही एकमात्र ऐसा विकल्प है जो दोनों के सोच और तालमेल को एकसूत्र में बाँधकर एक सीध में ला सकता है। युवा बुजुर्गों को समझे और बुजुर्ग युवाओं को समझे तभी अपने अपने संकल्पों से हटकर एक हँसी-खुशी का माहौल पनप पायेगा।
 
कहने का तात्पर्य यह है कि जिस परिवार में दो-तीन पीढ़ियाँ एक साथ एक छत के नीचे रह रही है...वहाँ अपनी मनमानी चलाने से सिर्फ परिवार की एकजुटता में सेंध ही लगेगी। इसलिए परिवार की एकजुटता के लिए एक दूसरे की भावनाओं को सम्मानपूर्वक समर्थन देने से ही स्नेह, विश्वास, सामंजस्यता की नींव पड़ेगी और परिवार आदर्श परिवार की तरह हँसते-मुस्कुराते हुए स्वच्छ व सकारात्मक वातावरण में आगे बढ़ते हुए  उन्नति की ओर अग्रसर होगा। इसलिए वैचारिक विभिन्नता को छोड़कर सामंजस्य के नाम पर कुछ झुकना दोनों के सकारात्मक सोच को उजागर करेगा।
जहाँ तालमेल होगा..वहीं सुकून होगा...फिर वहीं पर उन्नति का मार्ग बनेगा और खुशियों का बसेरा होगा।
 

हॉट ड्रिंक देना (संस्मरण)

स्मृतियाँ कभी कभी बहुत मधुर व मजेदार होती है। जिन्हें याद करने पर हँसी के फौआरे फूट पड़ते है और मन हँस-हँस कर  लोटपोट करने लगता है। 

शादी के बाद की ही तो घटना है, जिसे मैं (शालू) अक्सर याद करके हँसती रहती हूँ। नयी नवेली दुल्हन थी। शादी के बाद ही बूआ सासू माँ के यहाँ पारिवारिक पार्टी में जाना पड़ा। फुफा जी सेना में कैप्टन थे।
खुशनुमा माहौल में खुले मैदान में कोल्ड-ड्रिंक का दौर चल रहा था। मैं जुकाम से पीड़ित थी, अतः कोल्ड-ड्रिंक न लेकर चुपचाप एक जगह अकेले बैठ गयी। अचानक वेटर मेरे पास आकर बोला," मैम, आप क्या लेंगी?" मैंने पूछा, "कुछ हाॅट है? कोई हाॅट-ड्रिंक चाहिए।" वेटर चुपचाप चला गया। मैं यूंही बैठे हुए अपने में मगन थी।

कुछ देर बाद वेटर ट्रे में सजे सुंदर गिलास में बीयर के साथ उपस्थित हो गया। मैं अचकचा गई। ससुराल का भरापूरा माहौल। लोग मुझे विस्मय से देखने लगे। मैं वेटर को घूरने लगी। वह बीयर लेकर यहाँ क्यों खड़ा है? 

मैं घबड़ाकर तल्ख स्वर में बोली," ये क्या है?"
"मैम, हाॅट-ड्रिंक, जो आपने मांगा, वही तो है।" वेटर भी सकपकाकर सफाई देने लगा। 
मैं झेंपकर झुंझलाहट भरे लहजे में बोली, "मेरा मतलब चाय-काॅफी से था। इससे नहीं। ले जाओ यहाँ से।"

वेटर मेरी बेवकूफी समझ गया कि मैं इस माहौल से अनजान हूँ। अतः सहमकर बोला, "साॅरी मैम, यहाँ चाय-काॅफी नहीं मिलता है। मुझे समझने में गलतफहमी हो गई। वेरी साॅरी।"

दूर बैठे पतिदेव की निगाह जब बीयर के साथ वेटर पर पड़ी तो वे अचम्भित हो सोचने लगे कि इतनी माडर्न लेडी कौन है यहाँ? जो सभा में बीयर मगां रही है। जब वेटर मेरे पास रुका तब ये घबड़ाकर लम्बे-लम्बे डग भरते आ गये। बताने पर इन्हें भी हकीकत समझते देर नहीं लगी। फिर तो सबके साथ ये भी हँसते-हँसते लोटपोट होने लगे और मैं सबके सामने अपने बेवकूफी पर शर्मिंदगी महसूस कर आँखें नीची कर ली।

ईर्ष्या बसी है मेरे मन में (व्यंग्य)

मैं टहलती हूँ, घूमती हूँ। मॉल, रेस्टोरेंट और किटी पार्टी में जाती हूँ, जिससे बिंदास रहने की भरपूर कोशिश करती हूँ...पर मैं वैसे खुश नहीं हो पाती हूँ, जैसे औरों को खुश देखती हूँ। मैं क्यों खुश नहीं हो पाती हूँ..यह त्वरित सतर्क होने वाली बुद्धि के समझ से परे है...क्यों परे है? यह समझना मैं चाहकर भी समझ नहीं पाती हूँ। क्योंकि मैं उलझती हुई, कभी न स्वयं को देखती हूँ, न कभी स्वयं को तौलती हूँ और न मनन कर पाती हूँ। यह इसलिए भी होता है क्योंकि मेरी निगाहें हमेशा दूसरों पर टीकी रहती है। तभी मेरी आँखें तो टुकुर-टुकुर निहारती है, परखती हैै...दूसरे के वस्त्रों को, दूसरे के पर्स को, दूसरों के मेकअप को, दूसरे की खूबसूरती को और दूसरे की खुशी और चहचहाती हुई खनकती व गूंजती आवाज को। तब मैं उसे स्वयं से तुलनात्मक रूप से तौलती हुई जलती हूँ, कुढ़ती हूँ और कुड़बुड़ाती हूँ। क्योंकि उस समय मैं लबरेज होती हूँ, ईर्ष्या नामक ज्वलनशील पदार्थ से। तभी तो भभकते और जलते हुए दिल के ताप को आँखों की नमी भी शांत नहीं कर पाती है। तभी तो मैं मगन व व्यस्त रहती हूँ...दूसरों के गतिशील हावभाव और क्रियाकलापों में।
 ऐसे में मेरे पास वक्त ही वक्त होता है। तभी तो मैं इसी उंधेरबून में हमेशा विचरती हुई फँसी रहती हूँ। दूसरे कामों में मेरा मन  लगता नहीं है। क्या करु...कैसे अपने मन को समझाउं ...कैसे इस लत को छुड़ाउं... क्योंकि मन तो अपने बस में होता ही नहीं। वह बरबस खिंचा रहता है..दूसरे की गतिशील हावभाव और  क्रियाकलापों में।
 
दिन ऐसे ही बीत रहा था कि एकदिन अचानक कनॉट प्लेस के भीड़ भरे माहौल में अपने बचपन की सहपाठिनी उर्वशी से मेरी मुलाकात हो गई। चेहरे पर वही मुस्कुराहट, वही बिंदास हँसी...जिसकी मैं उस समय कायल थी। जिससे मैं मन ही मन में ईर्ष्या वश चिढ़ती थी। इसीलिए कभी उसके और अपने बीच की खाई को पाट नहीं पायी। पर हमेशा उसे निहारती थी, टटोलती थी कि कैसे अपने गमगीन भरे माहौल में भी वह मुक्त है अपने माहौल से, अपनी परिस्थितियों से, अपनी कमियों से और अपनी गरीबी से। बेहद गरीबी में पढ़ी बढ़ी वही उर्वशी एक खनकती हुई आवाज में मुझे पुकारी तो मैं चौंककर चारों तरफ नजरें दौड़ाने लगी, तभी वह पीछे से कंधें पर धौल जमाते हुए बोली," अरे, कहाँ ढ़ूढ़ रही हो? मैं तो तुम्हारे पास ही खड़ी हूँ।"
"ओह तुम, तुम यहाँ कैसे?" मैं अचकचा कर बोली।
"क्या मैं यहाँ नहीं हो सकती? अरे मैं यहीं रहती हूँ। मैं यहाँ के एक अस्पताल में डॉक्टर हूँ।"

उर्वशी और डॉक्टर? मैं गश खाने को हुई कि तभी उसकी कूकती आवाज फिर गूंजी," अरे कहाँ खो गई। चल मेरे घर चल, वहीं बैठकर बातें करेंगें।"
मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सी उसके पीछे-पीछे चल दी। उसके कार में बैठते हुए शर्म से पानी-पानी हो रही थी। कार की चालक वही थी। बगल में बैठी हुई आज उसकी मोहनी-कूकती हँसी मुझे चिढ़ा नहीं रहीं थी, बल्कि प्रेरित कर रही थी। अपनी परिस्थितियों से जुझने वाली बिंदास लड़की..ऊँचाइयों पर पँहुचने वाली लड़की आज अपनी सादगी में बहुत महान दिखने लगी।
मैं बरबस पूछ बैठी," तू इतनी बिंदास कैसे रहती है? सूरज की गर्मी हो, सर्दी की शीतलता हो, भीषण बरसात हो या पतझड़ की खनकती गूंज हो..तेरे चेहरे पर कोई असर ड़ालता क्यों नहीं है? यह कैसे सम्भव है...जरा मुझे भी तो इसकी गूढ़ता  समझा।"
मेरी रोनी सूरत देख वह और जोर से हँस पड़ी, बोली," अरे यह जरा भी कठिन नहीं है। बिंदास रहने का एक ही मूलमंत्र है...कभी दूसरे पर तुलनात्मक दृष्टि डालो नहीं। यह तभी सम्भव है...जब तू स्वयं में मगन या खुश रहती है। अपने परिस्थितियों में, अपने माहौल में स्वयं डूबे रहो, तुलना न करो तो खुशी अपने आप तुम्हारा दामन थाम लेगी। तुम्हें जरूरत ही नहीं पडेगी उसे आमंत्रण देने की।"

"तू ठीक कह रही है। मैं दूसरे की खुशी नापने में सदैव व्यस्त थी इसलिए मुझे अपनी खुशी पाने और महसूस करने की कोई ललक हुई ही नहीं। मैं चिढ़नें में, जलने में समय गवां दी। आज तुझे देख आँखें खुल गई। पर अब क्या हो सकता है? समय तो चूक गया।"
"अरे, समय कभी चुकता नहीं है। जब जागों तभी सबेरा है। खुश रहने के लिए अपने परिस्थितियों से समझौता करना पड़ता है, रास्ता निकालना पड़ता है, जुझना और उठना पड़ता है। ऐसे में खुश रहो, बिंदास रहो और लक्ष्य का पीछा करो। पर दूसरों पर तुलनात्मक दृष्टि भूलकर भी न डालो..वरना रास्ता भटक जायेगा, फिर मंजिल कहीं नजर नहीं आयेगा।"
अचानक कार रोककर वह बोली,"चल घर आ गया। घर में बैठकर बातें करते है।"
उर्वशी के घर से लौटते हुए मैं बहुत संतुष्ट थी, खुश थी, बिंदास थी। वर्षो से ईर्ष्या के ताप से जलता मेरा तन-मन उर्वशी के सम्पर्क की शीतलता से पिघलकर शांत व सरल हो गया। ऐसी सादगी, ऐसी सरलता। उथल-पुथल का कोई नामोंनिशान नहीं। उसने मेरा दिल जीता ही नहीं, बल्कि बदलने की तरफ रुख मोड़ दिया। सकारात्मक सोच की तरफ बढ़ता मेरा पहला कदम मुझे बहुत भला और सुकून देने वाला लगा।

देश का गौरव (गणतंत्र दिवस पर बाल कहानी)

गणतंत्र दिवस के पूर्व संध्या पर विभास अपने पापा के साथ बाजार गया था। बाजार में उसने देखा कि उसके यहाँ काम करने वाली आंटी का बेटा मोनू कागज और प्लास्टिक का बना झंडा साइकिल पर लगाकर बेच रहा था। विभास उससे दो झंडा खरीदकर ले आया। विभास जब भी कुछ खरीदता, उसे अपने भाई के लिए भी जरुर लेता।
घर आते ही विभास घर में घुसने से पहले अपना झंडा बाहरी फाटक के एक तरफ फहरा दिया। फिर वह दूसरा झंडा विपिन को देते हुए बोला," विपिन लो, ये तुम्हारा झंडा है। तुम इसे भी बाहर फाटक के दूसरी तरफ लगा दो, जैसे मैंने लगाया है। फिर दोनों झंडा हवा में लहराते हुए बहुत अच्छे लगेंगे।" 
विपिन झंडा पाकर बहुत खुश हुआ। वह झंडा हवा में लहराते हुए बोला,"नहीं भैया, मैं अपना झंडा आपको फहराने के लिए नहीं दूंगा। मैं इससे खेलूंगा।"

"तुम इससे खेलोगे? अरे यह खेलने की वस्तु नहीं है।  यह देश की शान है। यह हवा में लहराते हुए ही अच्छा लगेगा। इसे बाहर फहरा दो।" विभास तल्ख स्वर में बोला।
"अरे, जब मुझे मेरे मन का काम करने ही नहीं दोगे, तो फिर मेरे लिए लाये ही क्यों हो?" विपिन नाराज होकर बोला।
"मैं यह तुम्हारे खेलने के लिए नहीं लाया हूँ। इससे खेला नहीं जाता है। इसलिए लाओ इसे वापस कर दो।" विभास तल्ख स्वर में बोला।

"तीन रंगों वाला झंडा, चक्र के साथ बहुत सुंदर है। मैं इसे आपको वापस नहीं करुंगा, बल्कि पापा के कार पर लगा दूंगा।" यह कहकर विपिन भागने लगा। विभास उसके पीछे दौड़ा तो विपिन ठोकर खाकर गिर पड़ा। विपिन रोने लगा। विभास उसे उठाने लगा तो वह उसका हाथ झटककर बोला," जाओ, मैं तुमसे नहीं बोलता। तुमने मुझे गिरा दिया।" यह कहकर वह फिर रोने लगा। 
उसके रोने की आवाज सुनकर उसकी माँ भावना उसके पास आ गई, बोली," क्या हो गया? विपिन तुम क्यों रो रहे हो?"
विपिन और विभास की पूरी बात सुनने के बाद भावना बोली," बेटा, यह हमारा राष्ट्रीय ध्वज है। हमारे देश का गौरव है। इसलिए इससे खेलते नहीं, बल्कि इसका सम्मान करते है।"
"माँ मैं इसे पापा की कार पर लगाना चाहता था, पर भैया मुझे लगाने ही नहीं दे रहे थे।" विपिन अपने आँसुओं को पोछते हुए बोला।

"बेटा, यह हमारे देश की पहचान और गौरव है। हम इसे गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस या किसी भी सम्मानित अवसर पर फहराते है। इसके शान में कोई कमी न हो, इसलिए इसका पूरा सम्मान करते है।"
" मैं तो पापा के कार पर इसे सम्मान पूर्वक फहराना चाहता था, भैया ने उसके लिए ही क्यों मना कर दिया।" विपिन विभास की शिकायत करते हुए बोला।
" विभास को पता होगा, तभी वह तुम्हें मना कर रहा था। हमारे भारतीय झंडा संहिता में झंडा को सम्मानपूर्वक फहराने का नियम बताया गया है। इन्हीं नियमों में एक नियम यह है कि सिर्फ सरकार के महत्वपूर्ण व्यक्ति जैसे- राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, क्लास वन अफसर और भारत के प्रधान न्यायाधीश को छोड़कर कोई भी अपने वाहन पर झंडा नहीं लगा सकता है।" भावना बोली।

"लेकिन ऐसा क्यों करते है, माँ।" विपिन उत्सुकतावश पूछा।
"यह इसलिए करते है ताकि देश के गौरव में कोई कमी न हो।"
यह सुनकर विपिन बोला,"कल गणतंत्र दिवस है। स्कूल में झंडा फहराया जायेगा, खेलकूद प्रतियोगिता होगा, लड्डू मिलेगा। यह मुझे पता था। पर झंडा को कार पर नहीं लगा सकते है, यह पता नहीं था।" 
भावना विपिन को समझाते हुए बोली," बेटा हमारा देश 15 अगस्त 1947 (स्वतंत्रता दिवस) को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हुआ। इस आजादी के लिए हमारे देशवासियों ने बहुत समय से शांति वार्ता की, विद्रोह हुआ, संधर्ष किए,और फिर बहुत बड़ी-बड़ी कुर्बानियाँ दी, शहीद हुए, तब जाकर आजादी की स्वच्छ हवा में विचरण करना हमें नसीब हुआ।"

"मम्मी, जब हम 15 अगस्त को आजाद हो गये, तो हमें 26 जनवरी गणतंत्र दिवस की आवश्यकता क्यों पड़ी? हमें विस्तार में समझाकर बताईये।" विपिन उत्सुकता वश जानकारी के लिए पूछा।
तब भावना बोली,"  बेटा देश तो आजाद हो गया, पर देश में अभी तक अंग्रेजों के बने नियम ही चल रहे थे। अब आजाद भारत के लिए जरुरी हो गया कि उसके देश में उसका अपना नियम कानून हो। अतः डॉ० भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में समिति द्वारा हमारे देश का अपना नियम और संविधान बना। यह संविधान हमारे देश में 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ था। इसीलिए 26 जनवरी को हम गणतंत्र दिवस मनाते है और इसी दिन से हम अपने को पूर्ण रूप से स्वतंत्र मानते है। यह हमारा राष्ट्रीय पर्व है।"
"अच्छा, तभी यह पर्व हमारे स्कूल में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।" विपिन चहकते हुए बोला।
विभास जो अभी तक चुपचाप सुन रहा था, वह बोला," यह पर्व केवल स्कूल ही नहीं, बल्कि पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। सभी स्कूल, कालेज, दफ्तर और विभिन्न महत्वपूर्ण स्थलों पर झण्डारोहण, खेलकूद, रंगारंग कार्यक्रमों द्वारा इसे मनाते है। दिल्ली में इस दिन महामहिम राष्ट्रपति के सामने से परेड और विभिन्न राज्यों की झांकियाँ गुजरती है। इस कार्यक्रम में किसी नामी हस्ती को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाते है। अपने देश और विदेश के बहुत से नागरिक दूर-दूर से इसमें सम्मिलित होने आते है।"
"अरे वाह भैया, आपको तो बहुत जानकारी है।" विपिन उत्साहित होकर बोला।
"हाँ बेटा, विभास को जानकारी थी, तभी तो वह तुम्हें कार पर झंडा लगाने के लिए मना कर रहा था।" भावना बोली।

"मम्मी,भईया मुझे ठीक से समझा नहीं पाये थे, तभी तो मैं समझ नहीं पाया। अब आपने मुझे ठीक से समझा दिया तो मैं समझ गया।"
भावना बोली," बेटा, प्रत्येक देश का एक गौरव होता है, जिसका प्रतीक उसका राष्ट्रीय ध्वज होता है। हमारे देश का गौरव हमारा राष्ट्रीय ध्वज...हमारा राष्ट्रीय तिरंगा है, जिसे राष्ट्रीय पर्व के दिन बड़े धूमधाम व सम्मान से फहराते है। इसलिए हम ऐसा कोई काम नहीं करते है, जिससे हमारे राष्ट्रीय तिरंगा के गौरव के सम्मान में कहीं कोई कमी रह जाएं। इसलिए उससे खेलना, तोड़ना और फेंकना मना है।"
"माँ, आप कितनी अच्छी है। आपने गणतंत्र दिवस की महत्ता समझा दिया तो सारी बातें समझ में आ गई। भैया को तो समझाना ही नहीं आता है। आज मेरी समझ में आया कि हमेशा परेड के समय जब किसी बच्चे से उसका झंडा गिर जाता है तो अध्यापक उसे झटपट उठा लेते है। अब हम बड़े धुमधाम से गणतंत्र दिवस मनायेंगे।"

विभास बोला,"हाँ मम्मी, मैं भी गणतंत्र दिवस पर बहुत से खेल में और वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग ले रहा हूँ। आप आशीर्वाद दीजिएगा कि मैं विजयी बनूं।"
"बहुत अच्छा बेटा, मुझे तुम दोनों से यही उम्मीद थी। अब तुम अपनी तैयारी करो। मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ रहेगा। अब मैं काम करने जा रही हूँ।" भावना पूर्ण विश्वास से बोली।
"माँ, मैं भैया के साथ झंडा बाहर फाटक पर फहराने जा रहा हूँ। आप अपना काम करिए।"
भावना दोनों बच्चों के सर पर हाथ फेरती हुई चली गई तब विपिन विभास के साथ बाहर झंडा फहराने चला गया।

मजा बन गई सजा (बाल कहानी)

अदिति और आरोही दो बहनें थी। उनका घर उत्तराखंड के सतताल झील के समीप की पहाड़ियों पर था। अदिति के पापा एक रेस्टोरेंट के मालिक थे।
गर्मी की छुट्टियों में अदिति के मामा-मामी अपने दोनों बच्चों राधिका और रोहन के साथ नैनीताल घुमने से पहले अदिति के घर आये थे और वहीं रुक गये। 
बच्चें एक दूसरे से जल्दी ही घुलमिल गये। प्रकृति के सुंदर नजारों में एक दूसरे के साथ खेलने-कूदने, दौड़ने-भागने,  डांस करने और फिर अपने पसंद की डिशे व फल खाने में उन्हें बहुत मजा आया। वे मस्ती में इतने चूर थे कि समय कब और कैसे इतनी जल्दी बीत जाता, ये उन्हें पता ही नहीं चलता था।
एकदिन अदिति के मामा अदिति से बोले," अदिति तुम लोग कल सुबह जल्दी तैयार हो जाना। हम लोग नैनीताल घुमनें चलेंगे।"
"वाह मामा जी, आप बहुत अच्छे है। हम लोग आपको सुबह तैयार मिलेंगे।"
अदिति ने यह खुशखबरी सबको सुनाया तो सब खुशी से झूम उठे।
नैनीताल से घुमकर आने में सबको बहुत मजा आया।
उसी शाम अदिति के मामा लेटे थे, उसी समय अदिति उनके पास आकर बोली," मामा,आपने हमें नैनीताल तो घुमा दिया, पर यहीं घर के पास हीे एक झरना है, वह बहुत सुंदर और आकर्षित करने वाला है। आप हमें वहाँ ले जाकर कब घुमायेंगे। मैं राधिका और रोहन को वह झरना दिखाना चाहती हूँ। पापा वहाँ जाते नहीं है।"
"अभी-अभी तुम लोग घुमकर आये हो। अभी तुम लोगों का घुमने से पेट नहीं भरा क्या?" नींद की खुमारी में मस्त होने के कारण मामा ने झिड़ककर ऐसा जबाब दे दिया तो अदिति मायूस होकर चुपचाप वहाँ से हट गयी।
वह राधिका के पास आकर बोली," यहाँ पास में एक बहुत सुंदर झरना है। मैं चाहती थी कि हम लोग वहाँ चलते क्योंकि वहाँ बहुत मजा आता है। पर मामा साथ चलने को बिलकुल तैयार नहीं है।"
अदिति को मायूस देखकर राधिका भी दुखी हो गई, बोली, "अदिति दीदी, ये पापा तो ऐसे ही है। नींद में मस्त हो जाते है तब कुछ सुनते नहीं है। इसलिए ये तो अब हमें घुमा चुके। अब ये कहीं नहीं जायेंगे। कोई बात नहीं, अब हम लोग बिना झरना घुमें ही वापस चले जायेंगे?" 
राधिका की मायूसी  अदिति को मंजूर नहीं था, बोली,"अरे नहीं, दुखी क्यों होती हो? हम है ना। मुझे वहाँ का रास्ता पता है। हम कल तुम लोगो को लेकर झरना देखने चलेंगे। पर किसी को कोनों कान खबर न होने पाये, वरना  कोई  हमें वहाँ जाने नहीं देगा।" अदिति राधिका से फुसफुसाकर बोली ताकि कोई सुन न ले। 
"ठीक है दीदी, मैं किसी को नहीं बताऊँगी।" 
लेकिन होनी को कुछ और स्वीकार था। उस दिन शाम से ही मौसम बदलने लगा। खूब ठंड़ी हवा बहने के बाद गरजते-तड़कते बादलों ने झमाझम बरसना शुरु कर दिया।
"रोहन भैया, कितना मजा आ रहा है। चलिए हम लोग भीगते है।" नन्हीं आरोही टपकते पानी के बूंदों को हथेली में भरकर बोली।
"रोहन और आरोही, तुम लोग पानी में भीगना मत वरना कल झरना देखने जा नहीं पाओंगे।" अदिति ने उन्हें सतर्क किया।
"ठीक है। हम नहीं भीगेंगे। लेकिन यदि पानी कल तक बरसता रहेगा तब क्या होगा?" राधिका उदास हो गई।
"दीदी, हम बादलों से विनती करते है कि वह कल के बाद बरसे क्योंकि कल हमें झरना देखना है।" यह कहकर आरोही गाने लगी," रैन रैन गो अवे, कम्स अगेन अनेदर डे।" 
"अरे चुप, तुम तो सारा पोल खोलकर मजा ही किरकिरा कर दोगी।" अदिति ने उसे झिड़ककर चुप कराया।
"आओ, हम सब मिलकर दूसरा गाना गाते और डांस करते है। इस तरह हमारा मनोरंजन भी होगा और बादल से विनती भी। हमारे मनोरंजन से कोई समझ भी नहीं पायेगा कि हम कल क्या करने वाले है?" राधिका आरोही का हाथ पकड़कर बोली।
"ठीक, बिलकुल सही। चलो सब लोग नाचते और गाते है।"
बच्चें मिलकर धूमधड़ाका मचाने लगे। जब वे थक गये तब सोने चले गयेे। सोने से पहले उन्हें सुकून था कि बरसात रुक चुकी है।
सोने से पहले राधिका अदिति के कान में फुसफुसायी," दीदी, पानी बंद हो गया। कल मजा आयेगा।"
"चुप हो जा। शुभ रात्रि। कल जल्दी उठना है।"
"ठीक, गुड नाईट, दीदी।"
 
दूसरे दिन जब सारे बच्चें गुपचुप तरीके से तैयार हो गये तब अदिति अपनी मम्मी से बोली," माँ ,हम लोग नीचे ताल के किनारे खेलने जा रहे है।"
"बेटी, सबको लेकर पानी के पास मत जाना क्योंकि  वहाँ पानी बहुत गहरा है। तुम लोग खेलकर जल्दी आ जाना।"
"ठीक है माँ, हम लोग जल्दी आ जायेंगे।" यह कहकर अदिति तीनों बच्चों के साथ बाहर आ गयी।
अदिती बोली,"जल्दी चलो। कोई इधर-उधर मत जाना वरना मुझे ही डाँट पड़ेगी।" 
"ठीक है दीदी, हम आपके ही साथ रहेंगें क्योंकि मुझे डर लग रहा है।" राधिका की बाते सुनकर आरोही राधिका की अंगुली पकड़ ली।
"डरो मत। झरना के पास बहुत मजा आयेगा।" अदिति राधिका का हौसला बढ़ाते हुए बोली।
कुछ दूर पक्के सड़क पर चलने के बाद अदिति रुक गयी, बोली," अब हम लोग ये सीढ़ियाँ उतर कर कच्चे पगडण्डी वाले रास्ते पर चलेंगे। सब लोग सम्भलकर सीढ़ियाँ उतरना क्योंकि यहाँ फिसलन बहुत है।"
अदिती रोहन का हाथ पकड़कर राधिका से बोली,"  राधिका, तुम आरोही का हाथ पकड़े रहना। आरोही अभी छोटी है अकेले चल नहीं पायेगी।"
"ठीक है दीदी, मैं आरोही का हाथ छोड़ूँगी नहीं। आप चिंता मत करिए।" राधिका आरोही की अंगुली पकड़ते हुए बोली।
राधिका आरोही का हाथ पकड़कर चलने लगी। आगे की सकँरी पगडण्डी गीली थी।इसलिए सबको चलने में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था।
"दीदी यहाँ तो पानी से सड़क गीली हो गयी है। मुझे तो बहुत डर लग रहा है।" रोहन बोला ।
यह सुनकर अदिति बोली," डरो मत, ये रात में होने वाले बरसात का नतीजा है। धीरे- धीरे सम्भलकर चलो। अब हम लोग पहुचँने वाले है।"
थोड़ी देर बाद राधिका रुक गई। उसको रुकते हुए देखकर अदिति भी रुककर राधिका को देखने लगी।
 राधिका बोली," दीदी मेरे पैरों में कुछ चुनचुना रहा है। बार बार अंगुलियों में कुछ चुभ रहा है जिससे आगे चल नहीं पा रही हूँ।" 
"कीचड़ होगा। लाओ चप्पल का कीचड़ मैं निकाल देती हूँ। फिर तुम आराम से चलना।" 
अदिति राधिका का चप्पल हाथ में ली ही थी कि तभी राधिका अपना पैर देखकर चिल्लायी," दीदी, मेरे पैरों से खून बह रहा है। ये कैसे हो गया?"
अदिति राधिका के चप्पल में फँसे जोकों को देख चुकी थी। वह भी घबड़ा गई, पर हिम्मत के साथ बोली," राधिका, तुम्हारे पैरों को जोंकों ने काटा है। चप्पल में भी बहुत सारे जोंक ही फँसे है। रुको, मैं पहले जोंकों को चप्पल से निकाल दूं, फिर आगे चलेंगे।"
अदिति जोंकों को निकालने का, असफल प्रयास कर रहीं थी तभी रोहन बोला," दीदी देखो, मेरे पैरों से भी खून बह रहा है। मैं क्या करु?"
तभी आरोही खून देखकर घबड़ाने के कारण जोर जोर से रोने लगी,"दीदी, मुझे अब यहाँ नहीं रुकना है। जल्दी घर चलो।"

एक साथ इतनी मुसीबत देखकर अदिति भी प्रत्यक्ष रुप से 
 घबड़ा गयी। वह झल्लाकर बोली,"आरोही रोना बंद करो। पहले जोंकों से छुटकारा तो मिलने दो, फिर घर चल चलेंगे।"
सूनसान पगडण्डी पर कोई दिख भी नहीं रहा था। अदिति जोंक को निकालने का प्रयास कर रही थी। जब वह जोंक को निकाल नहीं पायी तब राधिका को चप्पल देती हुई बोली,"अब कुछ हो नहीं सकता। राधिका जल्दी चप्पल पहनों, हम दौड़कर वापस घर चलेंगें। इन जोंकों से वहीं छुटकारा मिलेगा।"
"दीदी, झरने का क्या हुआ? क्या हम झरना नहीं देख पायेंगे?" रोहन रुआँसा होकर बोला।
"तुम्हें झरना की पड़ी है, यहाँ जान आफत में फँसती नजर आ रही है। नहीं रोहन, पहले यहाँ से जल्दी वापस चलो। देखो, तुम्हारे और आरोही के पैर से भी खून बह रहा है।"
आरोही अब भी रो रही थी। अदिति सबको साथ लेकर जल्दी जल्दी दौड़ती हुई बाहर सड़क पर आ गयी।
सड़क पर चाय का एक ढ़ाबा था। अदिति जल्दी से ढ़ाबा में घुस गई ,बोली "गोपी अंकल, जल्दी से थोड़ा नमक दे दीजिए।"
अदिति की घबड़ाहट देखकर गोपी बोले," लो नमक ले लो।पर नमक का करोगी क्या?"
"अंकल हमारे पैरों में बहुत सारे जोंक घुस गये है। उन्हीं को मारना है।"
"जोंक? पर वह कैसे? तुम लोग गयी कहाँ थी?" गोपी को आश्चर्य हो रहा था ।
"अंकल, हम लोग झरना के पास जा रहे थे।" अदिति सच बोल दी।
"झरना के पास क्यों जा रही थी? रात में बारिश हुई थी। जोंक गीली मिट्टी में निकलते है, यह तो तुम्हें पता होना चाहिए क्योंकि तुम तो यहीं रहती हो।"
"अंकल, मैं भूल गयी थी। मुझसे गलती हो गयी।आप हम लोगों की मदद कर दीजिए।"
"बेटी, हम तुम्हारी मदद करते है। पर तुम लोगों को बिना बताए इस तरह अकेले झरना देखने नहीं जाना चाहिए था। रास्ते में कुछ भी हो सकता था।" गोपी बच्चों को समझाते हुए बोले।
गोपी के मदद से बच्चों का जोंक साफ हो गया। गोपी अंकल बोले ,"ये जोंक केंचुए से छोटा पर मोटा कीड़ा होता है जिसके मुख पर गोल छोटे छोटे काँटेनुमा आकृति 'सकर'  होती है। इसी से यह शरीर का गंदा खून चूसकर मोटा हो जाता है। नमक डालने से यह मर जाता है।"
"अंकल यह जहरीला तो नहीं होता है। हमें कोई नुकसान तो नहीं होगा।" राधिका घबड़ाकर बोली।
"नहीं यह जहरीला नहीं होता है। अब तुम लोग जल्दी घर जाओ, सब लोग घबड़ा रहे होंगें।" गोपी अंकल बोले।
"ओह, इस जोंकों ने तो हमें डराकर हमारा सारा मजा ही किरकिरा कर दिया। अब ड़ाँट भी खूब पड़ेगी।" राधिका रुआँसी हो गयी।

"हाँ दीदी, देखो ना..हमें मजा से मिली है सजा क्योंकि हम लोगों ने सबसे छुपकर यह प्रोग्राम बनाया था...उसी का हमें फल मिला। शुक्र करो कि जोंक ही खून चूसे है वरना कोई बड़ी सजा भी मिल सकता था। इसलिए कभी भी बड़ों से छुपकर कोई काम नहीं करना चाहिये।" रोहन बोला ।
"बात तो सही है। चलो, जल्दी घर चलो। हम मजा लेने निकले थे, पर मजा इन जोंकों के कारण सजा में बदल गया।"
अदिति सबके साथ घर के लिए रवाना हो गई। आरोही अब भी रो रही थी। रोहन अपना चिप्स और कुरकुरे का पैकेट आरोही को देकर बोला," आरोही, अब चुप भी हो जाओ वरना हम सभी को डाँट पड़ेगी।" 
घर पहुँचने पर पता चला कि सब लोग परेशान हैं और वे लोग बच्चों को ढ़ूढ़ रहे थे।
अदिति के मामा बोले ," मैं तो तुम लोगों को घुमाने ही आया था। फिर तुम लोगों को इतनी जल्दी क्यों हो गई थी। थोड़ा इंतजार तो करते। इस तरह अकेले कहीं नहीं जाते है। आज तो तुम लोग बच गये, बस जोंको ने तुम्हारे खून का स्वाद ही चखा है, यदि इससे खतरनाक और जहरीले जीव-जन्तु से सामना होता, तब तुम लोग अकेले क्या करते?"
अदिति दुखी थी। उसका अभियान सफल भी नहीं हुआ। अतः वह मामा से बोली,"सॉरी मामा, अब ऐसी गलती दुबारा नहीं होगी। अब हम बिना बताए कहीँ नहीं जायेंगे।"
"पर मैं तो इन जोंको को भूल नहीं पाऊँगी। जोंकों ने हमें बहुत डरा दिया था। अब जब हिम्मत आ गया है तो लगता है कि जैसे घर जाकर अपने दोस्तों को बताने के लिए गरमागरम मसाला मिल गया है। जरूर बताऊंगी। "राधिका बोली, जो थोड़ी आश्वस्त हो गई थी। 
"गरमागरम चाय पकौड़े तैयार है। जोंकों को भूलकर अब इसका मजा लो। अब हम सब लोग मिलकर कल झरना देखने चलेंगे।" अदिति की माँ ने कहा। 
अदिति, राधिका और रोहन ताली बजाकर एकसाथ बोले, " वाह मजा आयेगा। हम लोग जोंकों के लिए नमक भी साथ में लेकर जायेंगे। अब जोंक हमें डरा नहीं पायेंगा।"
रोहन बोला," अब हम चाहे जितना भी घुमकर मजा ले ले, पर जोंकों से मिलने वाली सजा को हम कभी भूल नहीं पायेंगे।" 
"एक बात है। हम जब भी किसी गलत काम की तरफ बढ़ेंगे, ये जोंक याद आकर हमारा रास्ता रोक देंगे। चलो अब चाय-पकौड़े का मजा लेते है।" राधिका बोली। 
यद्यपि आरोही को भी जोंको ने काटा था पर वह यह भूलकर चुपचाप चिप्स और कुरकुरे खाने में व्यस्त व मस्त थी। क्योंकि सभी उसे बहलाने और चुप कराने के लिए अपना-अपना चिप्स और कुरकुरे उसे थमा चुके थे। 
पकौड़े खाकर जब बच्चे खेलने के लिए बाहर आये तो अदिति मायूस होकर बोली," कभी बड़ों से बिना पूछे कोई काम नहीं की थी, इसलिए गलत काम की सजा हमें मिल गई।"
" हाँ दीदी, पर अब इसे भूलकर चलो खेलते है।"
बच्चे मिलकर खेलने और मस्ती मारने लगे।
 

मेहमाननवाजी (संस्मरण)

अपनी बेटी की शादी में मैं बहुत उत्साहित थी। अतः उमंग व उत्साह से लबरेज होकर अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में मैं काफी व्यस्त हो गई थी। शादी वाले दिन बारात आने से पूर्व मैं जल्दी से तैयार हो कर सबसे पहले पंडाल में पहुँच गयी ताकि वहाँ आने वाले सभी मेहमानों की खातिरदारी मैं अच्छे से कर संकू।
पंडाल में पहुँचकर मैं वहाँ आने वाले प्रत्येक मेहमानों को चाहे वे किसी भी पक्ष के या किसी भी आयु वर्ग के हो..हँसकर अभिनंदन करती और फिर उनको सम्मान पूर्वक अंदर लाकर बैठने का और नाश्ता करने का अनुरोध करती। कभी-कभी खुद बैरे से लेकर किसी को कुछ खाने या पीने के लिए पकड़ा देती। कहने का तात्पर्य यह है कि उस समय मैं सिर्फ आने वाले आगंतुकों को अपना अतिथि व आदरणीय मानकर ही आदर-सत्कार करने में जुटी रही।
उस समय मैं काफी व्यस्त थी। इसलिए इस बात से अनभिज्ञ थी कि किसी की सतर्क नजरें मेरी गतिविधियों पर अपनी सूक्ष्म व सघन दृष्टि जमायें हुए है।
फुर्सत के समय जब मैं अपनी प्रिय दोस्त के पास आकर बैठी, तो वे बोली," आज मैं तुम्हारे अतिथ्य से अति प्रभावित हुयी हूँ। अपनी बेटी की शादी में मैं किसी की सलाह मानकर ऐसा व्यवहार करने से चूक गयी थी। क्योंकि उनके अनुसार मेहमानों द्वारा भेदभाव महसूस करने पर कोई मेहमान किसी भी रुप में नाराज हो सकता था। अतः मैंने तटस्थ भाव अपनाकर किसी में कोई रुचि नहीं दिखाई, जिसके कारण कोई मेरे व्यवहार में पक्षपात करने का आरोप न लगा सके और उसको नागवार भी न लगे। 
पर तुम्हारी दोनों पक्षों से एकरुपता और एकरसता की भावना से 'हँसना, बोलना और पूछना' ने मेरी आँखें खोल दी और मुझे प्रभावित भी की है। अतः अपनी दूसरी बेटी की शादी में मैं भी तुम्हारा अनुसरण करके अपने इच्छानुसार मेहमाननवाजी करके मैं अपने इच्छा की पूर्ति करुंगी।"
दोस्त की बातों से मुझे भी अति प्रसन्नता का अनुभव हुआ कि मेरी सहेली को अपनी दूसरी बेटी की शादी में अपनी भूल सुधारने का एक मौका मिलेगा और तब उनकी इच्छा की पूर्ति होकर उन्हें संतुष्टि मिल जायेगी। 
 

उफ्...ये लैला (व्यंग्य)

तेज रफ्तार में दौड़ती मनु की साइकिल आखिर टकरा ही गई... एक लैला जैसी लड़की से। लैला जैसी इसलिए क्योंकि मनु तो बच निकलता पर उसने तो जानबूझकर भिड़ा दी...अपनी साइकिल उसकी साइकिल से।
"होश में नहीं हो क्या?" मनु चिल्लाया  तो लड़की मनु को घूरती हुई मुस्कुराई फिर मन ही मन में बुदबुदाई," होश... होश में ही तो थी, तभी तो भिड़ी हूँ।" 
मनु शेर था तो लड़की सवा शेर।
भिड़ने के बाद दोनों अपने आप उठ खड़े हुए। मनु ने अपनी किताबें उठा ली तभी अचानक लड़की ने अपनी वाणी की बंदुक मनु की नजरों से नजरें मिलाकर दाग दी, बोली,"क्या तुम मुझे पसंद करते हो?"
गोली रुपी इस बौछार से घायल मनु बड़बड़ाते हुए हकला गया बोला,"मैं और तुम्हें? मैं तो तुम्हें जानता भी नहीं।।"
" जानते कैसे नहीं हो? मैं नीलू... वही नीलू, जिसे तुम रोज ही अपने बॉलकनी से घूरते हो। अब ऐसे बन रहे हो जैसे जानते ही नहीं हो।" नाटकीय अंदाज में लड़की आँखें नचाते हुए बोली।
"मैं और तुम्हें घूरता हूँ। पागल लगता हूँ क्या तुम्हें? मैंने तुम्हें कभी देखा नहीं, जानता नहीं, पहचानता नहीं, फिर तुम्हें घूरुंगा कैसे? अच्छा बताओ तुम रहती कहाँ हो?" मामले को सुलटाने और मामले की नाजुकता को समझने की गरज से मनु नीलू से पूछने लगा। 
"तुम्हारे सामने वाले घर में।" नीलू जोर देकर बोली।
"सामने वाले घर में? पर वह तो  किसी घर का पिछवाड़ा है।, जिसका सिर्फ रोशनदान ही दिखता है। बाकी तो बस  दिवाल ही दिवाल है।" आश्चर्यचकित मनु बोला।
"हाँ हाँ वही, तुमने ठीक पहचाना। मैं उसी मकान के दूसरी मंजिल पर रहती हूँ। मैं जब अपने कमरे में बड़ी मेज पर स्टूल रखकर उस पर चढ़ती हूँ, तो तुम्हें सदैव अपने को घूरते हुए पाती हूँ।" नीलू मटकते हुए बोली।
झूठमूठ का तोहमत लगते देखकर मनु सरल तो हो गया। पर तल्ख स्वर में बोला," मैं  कभी ऐसा कर सकता हूँ, नामुमकिन।"
" घूरते तो हो ही। अब सच सच बताना, झूठ मत बोलना। क्या तुम मुझे प्यार करते हो?" नीलू मटकते हुए बोली।
मनु बौखलाकर बोला,"अरे, मुझे तुम्हारी मुंडी तो कभी दिखी नहीं, फिर मैं तुम्हें प्यार कैसे कर सकता हूँ?"
" मुंडी नहीं दिखती तो क्या हुआ? आँखें तो दिखती है। प्यार आँखों से होती है, मुंडी से नहीं। और फिर प्यार तो एक नजर में होती है। तुम एक नजर के प्यार को झुठला नहीं सकते। माना तुम्हारी आँखें दूर की नजर को पहचान न पाई हो, पर अब तो तुम मेरे पास हो और तुम्हारी नजरें मेरी नजरों से टकरा चुकी है। मुझे तुमसे प्यार है। तुम्हें मुझसे अभी-अभी प्यार हुआ होगा, फिर तुम कैसे इंकार कर सकते हो?" नीलू बकबक किए जा रही थी।
गले में लटकते ढोल की तरह नीलू लैला बनकर जबरन उसके गले लटककर अटकने लगी थी। मनु घबड़ा गया।
" तुम्हारी बातें तुम जानों। मुझे उससे कोई मतलब नहीं है। माँ के डंडे नहीं खाना है मुझे, इसलिए मैं तो चला।" यह कहते हुए मनु फुर्ती से साइकिल उठाने लगा।
और बैठकर नौ दो  ग्यारह होने की तैयारी में था।
"माँ के चमचे।"? नीलू ने आखिरी गोली दागी।
नीलू की टिपकारी पर ध्यान न देकर मनु वहाँ से रफूचक्कर  होकर सीधा अपने घर पहुँच कर सांस लिया। गले की फाँस को खंखारकर गला साफ किया, फिर सोचने लगा,' कैसी बेवकूफ लड़की से पाला पड़ गया। अच्छा हुआ जो जल्दी से पिंड़ छुड़ा लिया।, वरना न जाने किस जाल में फँसा लेती।'
 लड़की...वह भी लैला जैसी...ऐसी बला से दूर रहने वाले मनु का ध्यान सिर्फ अपनी पढ़ाई पर केंद्रित रहता था। वह होनहार कुशाग्रबुद्धि का चतुर छात्र था, जो अपने कालेज में सदैव टॉप करता था। गोल्डमैडलिस्ट मनु को उन लफड़ों से कोई सारोकार नहीं था, जिन मंगढ़ंत लफड़ों का वर्णन नीलू कर रही थी। मनु कमरे में टलहता था, पढ़ता  था। रटने और सोचने के वक्त वह खिड़की के सामने खड़ा होकर मनन करता। इस निस्वार्थ और स्वच्छंद सोच पर किसी का ग्रहण लग सकता है, यह मनु के सोच से परे था।
     मनु विचलित हो गया, तभी खिड़की के पास जाने से कतराने और डरने लगा, पर आदत से मजबूर वह खिड़की के पास पहुँच जाता तो बरबस उसकी आँखें सामने के रोशनदान पर टँग जाती, तब दो आँखें उसे घूरती नजर आ जाती।
यह देखकर मनु सोचने पर मजबूर हो गया कि क्या यह लड़की सिरफिरी है, दीवानी है या पागल है या उसके पास कोई काम नहीं है जो हर पल खिड़की...नहीं- नहीं रोशनदान पर अटकी रहती है।
मनु गुस्साया, उबलते दुध की तरह बौखला गया परंतु धीरे-धीरे जब वह नीलू की बचकानी हरकत सोचता तो तरस खा जाता। तब कभी-कभी छुपकर वह भी रोशनदान की तरफ झांक लेता था।
अचानक एकदिन नीलू फिर टकरा गई थी मनु से। टकराते ही वह मनु पर गुब्बारे की तरह फूट पड़ी, बोली," सोचे, कुछ समझे? क्या तुम्हारे दिल में कुछ-कुछ हुआ? देखो मेरा दिल जोर से धड़क रहा है। सांस भी ठीक से नहीं ले पा रही हूँ। जल्दी से चलो किसी रेस्ट्रा में बैठकर चाय पीते है।"
मनु कुछ बोलता उससे पहले ही वह उसका हाथ पकड़कर आगे बढ़ने लगी।
मनु होशहवास गवां चुका था। इसलिए वह बिना कुछ बोले  चुपचाप उसके पीछे चल दिया। दोनों ने मिलकर काफी पिया। नीलू बक-बक करती रही और मनु मूक श्रोता बना रहा।
उठते ही नीलू बोली," फिर कब मिलोगे?" उत्तर की परवाह कहाँ थी नीलू को। वह तपाक से फिर बोली," चलते है, लेकिन कल शाम को ठीक 5 बजे इसी रेस्ट्रोरेंट में आना। मैं तुम्हें यही मिलूंगी।"
"ठेंगा से...राह ताकती रहना, मैं किसी भी कीमत पर आने वाला नहीं। उल्लू का पट्ठा समझ लिया है मुझे।" मनु सोचता और दृढ़ निश्चय करता हुआ घर पहुँच गया।
दूसरे दिन चार बजे से ही मनु बेचैन हो गया..पर मन को दृढ़ करते हुए सोचने लगा,'कैसी जादुगरनी है? चैन हराम कर दिया है। नहीं जाऊंगा। देखे क्या करती है?"
 पौने पांच बजे बेचैन मनु को उसकी बंदरघुड़की याद आ गई,"देखो, ठीक समय पर आ जाना, वरना मैं तुम्हारे घर पहुँच जाऊंगी।"
मनु की सारी काबलियत धरी की धरी रह गई। वह झटपट उठा और रेस्ट्रोरेंट पहुँच गया। मनु की बुद्धि भ्रष्ट हो कर बिगड़ चुकी थी। लैला के धन्चक्कर में उसका मन पढ़ाई से उचट चुका था। वह प्यार के दुधारी तलवार पर टँगकर फँस चुका था। उसकी तूती नीलू के सामने ठप हो चुकी थी।
एकदिन मनु ने देखा नीलू माँ की सब्जी का झोला थामें घर तक आ गई। वह हँस-हँसकर माँ से बातें कर रही थी। माँ भी उसकी चापलूसी भरी बातों में मगन थी। मनु विचार मग्न होकर पशोपेश में पड़ गया कि यह नीलू अब क्या गुल खिलायेगी।
असमंजस में मनु की जान अटकी ही थी कि नीलू ने गुल खिला दिया। माँ ने बिना कुछ सोचे-समझे यह घोषणा कर दिया कि नीलू ही इस घर की बहू बनेगी। कुशाग्रबुद्धि वाले मनु की सारी काबलियत एक लड़की के सामने फिस्स हो गई। गोल्डमैडलिस्ट मनु...प्रशासनिक अधिकारी का सपना पालने वाला मनु... एक ऑफिस का बाबु बनकर रह गया।
   माँ-बेटा को फँसाकर लैला (नीलू) इस बड़े कोठी की मालकिन बन बैठी। अब माँ-बेटा दोनों की जिंदगी नीलू के सामने 'हाँ जी-हाँ जी' करते-करते बीतने लगा।
ऐसी लैलाएं दिल फेंक नहीं होती, पर अपना उल्लू सिधा करने अर्थात स्वार्थ सिद्ध करने की कला में पारंगत होती है। आलिशान कोठी की अपार संपदा या किसी होनहार विरवान को देखकर उनका मन मचला या लालायित हुआ तो वे उस लाडले के पीछे तब तक मड़राती है, जब तक कि वह उनके जाल में फँसकर शादी के बंधन में न बँध जाएं।
     इसलिए जब सामना हो ऐसी लैला से...तो सावधान हो जाओं... और तौबा कर लो, वरना...सारी काबिलियत धरी की धरी रह जायेगी और बलि का बकरा बनते देर नहीं लगेगी।
 

गुब्बारा दुबारा मिल गया (संस्मरण)

मैं (रेनू) अपनी बेटी शालू के परिवार, समधिन सुमन और पति के साथ जयपुर घुमने गई थी। 
शाम के समय जब हम घूमकर वापस होने को हुए, तब हम लोग खचाखच वाहनों के आवाजाही से व्यस्त जयपुर की सड़क के फुटपाथ पर चहलकदमी करते हुए अपने होटल की तरफ बढ़ने लगे। अचानक नाना की अंगुली थामें चल रही नन्हीं नातिन अनुष्का के हाथ से बड़ा वाला गुब्बारा छूटकर उड़ गया। 
"मेरा गुब्बारा?" कहकर रोने को आतुर अनुष्का अपने गुब्बारे को कौतुहलवश उड़ते हुए देखने लगी  और रोना भूल गई। आगे चल रहे शालू-अमित और पीछे चल रही सुमन और मैं भी उड़ते गुब्बारे में रम गये क्योंकि उँची उड़ान भरता हुआ गुब्बारा कभी किसी वाहन से टकराता तो कभी किसी से।
हम लोग उत्सुकतावश उसके मस्त-मस्त उड़ान का मजा लेते हुए इस उम्मीद में नजरें टिकाए थे कि गुब्बारा अब फुटा कि तब...पर गुब्बारा फुटा नहीं, बल्कि वाहनों के उपर उसे छूने को मचलता हुआ कभी इस वाहन से तो कभी उस वाहन से टकराता हुआ अठखेलियाँ करता रहा।
हम आगे बढ़ने को हुए कि अचानक गुब्बारा अपना रुख बदला और हमारे ही तरफ उड़ता हुआ वह हम लोगो से बीस-पच्चीस कदम पीछे फुटपाथ पर आ गया।
अपने पँहुच के दायरे में गुब्बारा को देखकर सुमन जी गुब्बारे की तरफ लपकी। उन्हें गुब्बारा मिल जायेगा यह सोचकर हम आगे बढ़ने लगे। 
वे आ रही है...यह देखने के लिए मैं एकाएक पीछे मुड़ी तो देखा कि उनके हाथ से छूटा गुब्बारा ठीक मेरे पीछे था। आश्चर्यचकित मैं गुब्बारा को झटपट लपककर पकड़ ली।
        वह गुब्बारा जो छूटकर लम्बी व उँची उड़ान के कारण अपने पहुँच के दायरे से बाहर जा चुका था...वह फिर इतराता हुआ मेरे हाथों में आ गया, तो हम स्तब्ध हो गये। "वाह...क्या ऐसा भी हो सकता है?" यह सोचते हुए हम इस अप्रत्याशित अनहोनी घटना के अलौकिक, आंतरिक असीम आंनदमय अनुभूति में ड़ूबे हुए आगे बढ़ गये।
 

कान्हा की समझ (लघुकथा)

बच्चे जब अपने लय में मचलते है, तब अपनी नादानियों में बहुत सी उटपटांग बातें कर जाते है। यह उनके या यूं कहे किसी के भी समझ से परे होता है, पर होता मजेदार ही है।
घर में शादी के माहौल के कारण खूब धुमधड़ाका और खुशियों का माहौल था। यह देखकर नन्हा कान्हा मचलते हुए अपनी दादी सुमन से बोला, "दादी, मैं भी शादी करुंगा?"
सुमन चौककर कान्हा को देखती हुई बोली,"तुम शादी करोगे?"
"हाँ, शादी करुंगा टोस्टी से।"
"टोस्टी से शादी? लेकिन क्यों?"
"टोस्टी अच्छी लड़की है। वह मेरे साथ खेलती है और मुझे बहुत अच्छी लगती है।" कान्हा ने जवाब दिया।
"तुम उसके साथ शादी नहीं कर सकते हो, क्योंकि वह तुम्हारे बुआ की बेटी और तुम्हारी बहन है।" सुमन उसे समझाते हुए बोली।
कान्हा सोचने लगा फिर अकड़कर बोला," ठीक है, आप यहाँ टोस्टी से शादी नहीं करने देंगी तो मैं दिल्ली जाकर मंटू चाचा वाली आरुषि दीदी से शादी कर लूंगा। आरुषि दीदी मेरी बहुत बहुत अच्छी दीदी है। वे मुझे बहुत प्यार से खेलाती भी है।"
सुमन सोचने लगी कि अब इस नासमझ को कैसे समझाऊ कि बहनों से शादी नहीं करते है? पर कान्हा के बाल सुलभ समझदारी और कहने के अंदाज पर वहाँ मौजूद लोग हँसते-हँसते लोटपोट होने लगे कि वाह रे आजकल के बच्चों की बुद्धि।