दीप प्रज्वलित करो मन का... (कविता)

मन के विश्वास
की ज्योति जलाकर,
अगर हम जीवनपथ
पर बढ़ते जायेंगे।

तब गम का अंधेरा
छिप जायेगा,
सूरज की अरुणिमा
नभ पर निखरेगी।

दिन उज्जवल
हो चमकेगा,
कोई मुँह
नहीं छुपायेगा।

घुलमिलकर सब
मिलेंगें-जुलेंगे,
खुशी भी हँसी बनकर
खिलखिलायेगा।

नाते-रिश्ते सब
एक होंगें,
जब प्रेमभावना
जागृति हो जायेंगा।

इस नफरत 
भरे माहौल को,
हम दोस्ती में
बदलकर दिखलायेंगे।

दीप प्रज्वलित करके मन का
हम आगे बढ़ते जायेंगे,
मन में मिले प्रकाश को
हम आगे तक फैलायेंगे।

यहीं होगा जीवन का उद्देश्य
सब फूल सरीखे खिल जायेंगे,
तब जीवन सरल हो जायेगा
मुखरित हो सब मुस्कुरायेंगे।


03.05.21.

जागृति अभिलाषा (कविता)

जागृति मन की अभिलाषा लिए,
मैं आगे बढ़ती जाती हूँ।
धूलधूसरित न हो जाए ख्वाब,
अतः सपनों में पंख लगाती हूँ।

बहुत कठिन है सार्थक करना, सपनों को,
पर हाथ पर हाथ रखकर बैठूं, क्यों?
कुछ करने को सोंचू, कुछ में रम जाऊं,
नये कलेवर में बह सपनों को सजग बनाऊं,मैं।

मासूमों की किलकारियाँ सुनूं,
बच्चों संग छुकछुक ट्रेन चलाऊं।
पोते-नातियों संग आर्ट बना,
बुढ़ों का सम्बल बन जाऊं।

चिड़ियों की चहचहाहट सुनती,
कोयल की कूं कूं आवाज निकालूं।
गाय को रोटी खिलाती,
बछड़े को पुचकारती रहूँ मैं।

पेड़ पौधौ से नाता जोड़ूं,
रोज मिट्टी से खेलू मैं।
रेत छानकर महल बनाऊं,
फिर सागर में बह जाने दूं।

मंजिल कभी मिले या न मिले,
रुकना अपने वश में नहीं।
जिसके भी काम आ सकूं कभी,
उसके सपनों का संबल बन जाऊं।

जीवन को बेहतर बनाने के लिए,
जीने की कला समझना होगा।
नहीं बैठना नीरस बनकर,
आगे कदम है, बढ़ाते रहना।
08.05.21.

सकारात्मकता का खेल (लेख)

मैं सकारात्मकता( पॉजिटिव) से पूर्ण यानि जीवंत थी। इसलिए जीने की कला से परिपूर्ण थी..अपने दैनिक क्रिया-कलापों में व्यस्त थी। इसलिए उम्र का कोई पादान मेरे राह का रोड़ा नहीं था। मैं, बूढ़ों में बूढ़ी थी, जवानों में जवान थी, किशोरों में किशोर थी, तो बच्चों में नन्हीं बच्ची बन जाती थी। सकारात्मक सोच, उर्जा और कामों में मन लगाती थी, इसीलिए हँसती थी, लोगों को हँसाती थी, चुहुलबाजियाँ करती थी, बच्चों के साथ पार्क में खेलती थी, मचलती थी, दौड़ती थी और उन्हें दौड़ाती भी थी। कहने का तात्पर्य यह था कि दुखों के पहाड़ को भी सहनशीलता से झेल जाना मेरी गुणवत्ता थी, इसलिए जो निगेटिव व्यवहार करता उससे दूर भागती थी। कसमसाती थी..लगता था ये जीवन को पीछे खींच रहा है। इसलिए सतर्क हो जाती थी। फिर धीरे-धीरे अपने विचार को बदलती और उसके संपर्क में आने की कोशिश करके उसे सकारात्मकता का पाठ पढ़ाने में जी जान से जुट जाती थी। यही मेरे जीवन का उद्देश्य था।
लेकिन पिछले साल से जब इस कोरोना ने देश-दुनिया में अपना कहर बरसाना शुरू किया। तो लोग त्राहि-त्राहि करने लगे। स्कूल-कालेज बंद हो गये। परीक्षाएं स्थगित होने लगी। ऑफिस-बाजार, मॉल, सिनेमाघर सब बंद करके लॉकडाउन लगाना पड़ा, तब जिंदगी एक बार थम सी गई। डराती, झेलाती और अपने चपेट में लोगों को लीलती जब कोरोना एक बार अपना कहर बरपाने के बाद थम सी गई, तब लोगों ने कुछ दिन चैन की सांस के साथ जीवन जिया। हम इसके भूलावे को भूलने और बिसराने लगे और आगे के लिए सतर्क होने की तत्परता और जागरूकता को भूला बैठे। अपने मौज-मस्ती और महत्वाकांक्षाओं की आड़ में हम यथार्थ के इस कहर को भूल गये और सीख ग्रहण किए नहीं और सामान्य हो गये। हमारे इसी भूल का फायदा उठाकर एक बार कोरोना पुनःपैर पसार कर तीव्र व उग्र रूप धारण करके पलटकर फिर हमारे बीच आकर हमें तबाह करने लगा। पछतावा हमारे रग-रग में बसा है...हम पछताते रहे, पर सतर्कता का पाठ पढ़ नहीं पाये।
  तभी तो कोरोना महामारी ने सकारात्मकता के छलावे वाले चोला को धारण करके हमें भरमाना शुरू कर दिया है। जब से उसने पॉजिटिव-निगेटिव का अपना उल्टा खेल फिर से खेलना प्रारम्भ कर दिया है, तब से हमारे जीवन का मकसद भी सकारात्मकता और नकारात्मकता के विचित्र उलझन में डूब गया है।
सकारात्मकता की सोच में जीने वाले हम कोरोना के पॉजिटिव होने से घबड़ाने लगे है। पॉजिटिव सोच में जीने वाले हम कोरोना से निगेटिव होने की दौड़ में जुट गए है। नकारात्मकता से दूर भागने वाले हम अब त्राहि माम की पुकार लगाकर कोरोना निगेटिव होना चाहते है, ताकि जीवन के बेहतर समय को हम सुगमतापूर्वक जी सकें।
लेकिन इस कोरोना महामारी की छलावे वाली कोरोना पॉजिटिव पर यदि हमें विजय भी प्राप्त करना है तो भी हमें जीवन के सकारात्मक रुख को ही अपनाना पड़ेगा। हम सकारात्मक सोच,उर्जा, प्रभाव और परिणाम से भरे रहेंगे तो कोरोना पॉजिटिव होते हुए भी हमारा कुछ बिगाड़ नहीं पायेगा। बस हमें हिम्मत की जरूरत है। घबड़ाना नहीं है। सोच को सकारात्मक करते हुए इससे बचाव के सभी सार्थक उपाय का क्रियान्वयन करना पड़ेगा। मुँख पर मास्क, सोशल डिस्टेंडिंग, हाथ को बार-बार धुलना, लॉकडाउन का पालन करते हुए घर में सुरक्षित रहे, तो हम कोरोना पर विजय प्राप्त कर लेंगे।

लेकिन अभी हम अपने सोच को अमली जामा पहना भी नहीं पाये और हम चैन की बंसी ठीक से बजा भी नहीं पाये कि चारों तरफ एक बार फिर अफरा तफरी का माहौल व्याप्त हो गया। कोरोना के कहर की सुमानी देश में चारों तरफ फैलने लगी। इस बार यह इतनी विकट थी कि जो सुचनायें हम टीवी और अखबार में देखते और पढ़ते आ रहे थे, वह घर के आसपास, पड़ोस और रिश्तेदारी में भी दिखने लगा। हम डरने लगे, सतर्क होने लगे, सम्भलने लगे।
 पर अभी हम इसके विभिषिका की गम्भीरता के तह में जाते, तब तक यह हमें भी अपने आग में लपेट लिया। इसने हमारे दो दिल अजीज लोगों को हमसे बिछुड़ा दिया। इस पर भी इसका मन नहीं भरा तो इसने दो लोगों के साथ हमें भी और हमारे बहुत से करीबी लोगों को पॉजिटिव कर दिया। 
हमारे परिवार में हम तीन लोग कोरोना पॉजिटिव हो गये। एक साथ तीन लोगों का पॉजिटिव होना मायने रखता है। हम तीनों लोग एक दूसरे के संबल और सहारा बने एक दूसरे को देखते हुए जीने की कोशिश में लगे रहे। तीन कमरे में तीनों लोग अर्ध मूर्छित अवस्था में पड़े रहते। दूर से हालचाल ले लेते, पर एक दूसरे के समीप घड़ी दो घड़ी बैठने की हिम्मत ही किसी के पास नहीं थी, जो एक दूसरे की थोड़ी भी सेवा कर पाते। नीरीह व बेबस आँखों में बहुत बड़ी विवशता थी। टुकुर-टुकुर एक दूसरे देखते, पर स्पर्श से दूर रहते थे। वैसे हम नाश्ते, खाने और थोड़ी देर टीवी देखने के लिए एक ही कमरें में होते थे। बातचीत बहुत कम होती थी।
तब से मन निगेटिविटी को पाने के लिए कुलबुला रहा था। निगेटिविटी की उम्मीद इस कदर मन में ऑफत मचाएगी..यह कभी सपनें में भी नहीं सोचा था।
पर निगेटिविटी पाने की उम्मीद में भी हमें पॉजिटिविटी का दामन नहीं छोड़ना था। यह हमने दृढ़ निश्चय कर लिया था। हमें अपने को जीवंत रखने के लिए पॉजिटिव एनर्जी, पॉजिटिव सोच, पॉजिटिव क्रियाकलापों को ही अपनाना था। इसलिए हमनें हिम्मत को हारने नहीं दिया और संयम का दामन थामें हुए दिन बीताने लगे। ऐसे समय में बच्चे देवदूत बन गये थे। शालू-बाबू-मंटू के लगन, क्रियाकलापों और स्फूर्ति से लिया गया निर्णय बहुत कारगर और जीवंत करने वाला था। मंटू तो स्वयं बीमार होते हुए भी हमारे लिए संजीवनी बना हुआ था। दो कौर भोजन और पानी जो मुँह में पड़ता था, वह शालू-मंटू की बदौलत ही पड़ता था। मंटू अपना घर छोड़कर यहाँ पड़े हुए माँ-बाप की सेवा में जुटे और उन्हें सम्भाले हुए थे। यह उसकी बहुत बड़ी विशेषता थी। शालू अपने ड्राइवर उमेश के साथ तीन घरों की व्यवस्था सम्भालने में लगी थी। संजीवनी मतलब पुनः जीवन...हमें यह संजीवनी मिली अपने बच्चों से ही...जिनका शुक्रिया अदा करना मेरा भी काम है।
कहने का तात्पर्य यह है कि कोरोना अपने पॉजिटिव खेल में लगी हुई थी। लेकिन हमें भी इसके जोड़ को तोड़ने के लिए भी पॉजिटिव का ही खेल खेलना पड़ेगा। यदि हम मन से, सोच से, उर्जा से, अपने क्रियाकलापों से पॉजिटिव नहीं रहेंगें, तब हम कोरोना के पॉजिटिव खेल को बिगाड़ नहीं पायेंगे। 
निष्कर्ष यही है कि कोरोना पॉजिटिव को हराने के लिए हमारी सोच, विचार, क्रियान्वयन पॉजिटिव हो, हम मास्क लगाकर रहें, सोसल डिस्टेंडिंग का पालन करें, बार-बार हाथ धुलें, घर को सेनेटाइज करें...तभी हम कोरोना के पॉजिटिव असर को हराकर निगेटिव कर पायेंगे।
 इसलिए एकबार हम फिर दृढ़ होकर जागरूक हो जाएं, ताकि असमय आये इस विपदा से छुटकारा पा लें।

कोरोना के विभिन्न रुप (कविता)

कोरोना वायरस जब--
विदेश में था,
तो डरे नहीं।

देश में आया,
तो सजग हुए।

शहर में आया,
तो सतर्क हुए।

कालोनी में आया,
तो  सहम गये।

गली में आया,
तो डर गये।

अब घर में घुस गया,
तो भयभीत हो गए।

कोरोना का वीभत्स रुप,
बहुत डरावना होता है।

तोड़ मरोड़ देता है,
जान पर बन जाता है।

इसलिए सतर्क रहो,
सम्भलकर रहो।

जितना हो सके,
इससे दूर ही रहो।

यह दूर तभी रहेगा,
जब तुम इसको समझोंगे।

जब पूरी सतर्कता और,
सजगता दिखलाओंगे।

हिम्मत के साथ रहोगें
मनोबल को बढ़ाओगे।

और पूरी तरह
इससे दूर रहने के,
नियमों को अपनाओंगे। 

बिवाईयों वाला पैर (कविता)

आखिर ये पैर है किसके???
ये प्रश्न हर पल उठता है, मेरे मन में
कटे-फटे, मटमैले बिवाईयों से पूर्ण
थके-हारे, बोझिल गंदे पैर को देख
मन विह्वल हो फिर पूछता है...
आखिर ये पैर है किस-किस के???

क्या ये है यह, उस किसान का, 
जो जी-तोड़ मेहनत करता है खेतों में
खून-पसीना बहाकर लहराता पेड़ उगाता है  
पर प्रकृति के क्रूर हाथों 
फसल की बर्बादी को देखकर 
अरमानों के टूटने पर, घायल मन को
सुदृढ़ नहीं रख पाता है सम्भाल कर
तब बेबस व विकल होकर मौत को गले लगाता है।

या है, यह उस नौजवान मजदूरों की टोली का 
जो कर्मठ होते हुए भी, काम की तलाश में
दर-दर भटकता और तड़पता है
और काम का जुगाड़ न कर पाने पर 
खाली हाथ विकल हो लौटता है, घर को
फिर सामने पा अपने भूखे बच्चों को 
मुँह चुराये फिरता और कलपता है
अगले दिन काम की तलाश में फिर निकलने को सोचता है।

या है, यह उस बेबस बेरोजगार युवा का
जो निकलता तो है, रोजी-रोटी की तलाश में
पर काम न मिलने पर
नाकामी का ठप्पा लगाकर 
नाकारा कहलाता घर लौटता है।
जो बाप के बुढ़ापे की लाठी
बनने में स्वयं को असमर्थ पाता है
छलनी होते युवा मन के आक्रोशों को 
मुट्ठी बंदकर मींचता और खिसियाता है।

या है यह उस बेबस-असहाय पिता का 
जो कुवांरी बेटी के सुयोग्य वर की तलाश में 
खटखटाता है कुंडी लड़के के घर वालों का
पर अभाव में मोटी गठरी दहेज के   
अपने को निर्बल व असमर्थ पाता है
बेटी की डिग्री व गुणों को दिखलाकर
फैलाता है झोली वर पक्ष के सामने 
पर  पाकर क्रुरता, लड़के के माँ-बाप की 
वह निर्बल बन मुँह लटकाये लौटता है।

या है यह, उस नारी मन के विवशता की
जो जुझती है,दिनरात गृहस्थी के जालों में
लगाती है चक्कर सबके चारों ओर 
रिश्ते बनाती, सँवारती और सहेजती है,
सबको खुश करने की अभिलाषा में
आहुति  देकर अपनी खुशियों की 
तिल-तिल जलाती है, स्वयं के इच्छाओं की
पर होती है आहत, तानों व उलाहनों की बरसातों से 
तब भी खरी नहीं उतरती है, घुट-घुटकर जीती है
तिलांजलि देकर अपने अभिलाषाओं की।

किसने-किसने देखा है, इन पैरों को?
किसने महसूस किया, उनके दर्द को?
किसके मन में कौंधता है, मेरी तरह,
आखिर ये पैर है किस-किस के???
आखिर ये है... किस-किस के पैरों के???

आओ हम फिर एक हो जाएं (कविता)

शिद्दतें बहुत हो गई, मुस्कुराते हुए,
दोस्तों को गले से लगाये हुए।
कभी यहाँ सिर्फ हँसी बसती थी,
लोग मिलते, गुनगुनाते व चहकते थे।
बच्चों के कोलाहल धरा बेधती थी,
नन्हों की किलकारियों से घर गूँजता था।

मिलजुल कर टहलते व व्यायाम करते,
फिर गप्पें व चिड़ियों की चहचहाहट में रम जाते। 
फूल खिलते थे तितलियों की उड़ान से, 
भौरें मड़राते थे फूलों के मुस्कान पर।   
पेड़-पौधे भी हिलते और गुनगुनाते थे,
अपनी ठंडी हवा से मस्त माहौल बनाते।
पत्तियों की सरसराहट मधुर रागिनी सुनाती,
फूलों की सुगंध फिजा की रौनक बढ़ाती।
वही सारी गलियाँ, चौबारे और आशियाने,
आज भी अस्तित्व में है वैसे ही चारों तरफ।

लेकिन लोग भयभीत होकर घर के कोनों में छिपे है,
इसलिए उनकी खुशियां अंदर सिमट सी गई है।
कोरोना ने अपना कहर क्या बरपाया,
सारा आलम सूना और विरान कर दिया है।
स्कूल-कालेज ट्रेन-बस सब बंद हो गए है,
बाजार, मॉल, व पार्क गम के आँसू बहा रही है।

अकेला होना कोरोना को भगाना हो सकता है,
इसलिए हम नितांत खामोश व विवश हो गये है। 
सब कुछ वही है, जो था पास हमारे,
फिर भी फिजा खामोश व विरान हो गयी है।
चुपचाप मुँह छुपाये परेशान है वादियां,
तभी तो आँसुओं के सैलाब में बह रही है दुनिया।
हम तन्हा अकेले चले व बढ़े जा रहे है,
अपने चारों तरफ की रंगीन संमा को ढ़ूढ़ रहे है।
सबके लिए संबल और सहारा बनकर उभरना है,
इसलिए अब हमें यूं खामोश नहीं बैठना है।
आओ, हम इस माहौल को बदलने की सोचे,
एक होकर कुछ सोचने और करने का बीड़ा उठायें।
एक बार कोरोना को पछाड़कर जीवंत हो जाए,
स्वार्थ को छोड़ दे, पर्यावरण संरक्षण से नाता बढ़ाये।
बगिया लगाये और पेड़ पौधे उगाये,
हरियाली को अपना उद्देश्य बना ले।
फिर सबको बटोरें और संगठित हो जाये,
मानव अस्तित्व का बंधन जो स्वार्थ से परे हो, उभारें ।
मिलकर हँसे-खिलखिलायें और साथ निबाहें,
फिर चारों तरफ खुशियां ही खुशियां फैलायें।

अपने पांव में कुल्हाड़ी मारना (बाल कहानी)

जगौरी गाँव का रामधीन मेहनत-मजदूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण करता। मिट्टी से बना छोटा सा खपरैलों वाला मकान उनके परिवार का बसेरा था। घर के सामने एक बड़ा सा पुराना बाप-दादा का लगाया हुआ पुश्तैनी पेड़ था। यह पेड़ उसके घर की शोभा और निशानी थी। रामधीन के दो बेटे थे, सरजू और कलगू। 

बड़े होने पर दोनों की शादी हो गई। पूरा परिवार अब भी उसी मकान में मिलकर रहता था। धीरे धीरे सरजू के लिए मकान छोटा और मुसीबत लगने लगा, तब वह अपने पिता रामधीन से अनुरोध किया," बापू, बाहर वाले पेड़ को काट दिया जाए, ताकि घर को पेड़ की जमीन पर बढ़ाकर और बड़ा किया जा सकें।"

रामधीन ने कहा," यह पेड़ हमारे पूर्वजों की निशानी है। मैं इसे कटवा नहीं सकता। इसलिए जैसे रहते हो, वैसे ही रहो। वरना अपना अलग व्यवस्था कर लो।"

सरजू रामधीन के दलील के सामने कुछ बोल नहीं पाया, पर वह अपने परिवार के साथ स्वतंत्र रहने का इच्छुक था। उसे संयुक्त परिवार में रहना बंदिशों में रहने जैसा लगता था। पिता के द्वारा पेड़ काटने की अनुमति न मिलने के बाद वह अपना घर अलग दूसरी जगह बनाकर परिवार सहित रहने और मजदूरी करके अपने परिवार का पालन-पोषण करने लगा।

 रामधीन के मृत्यु के बाद भी कलगू अपने पुस्तैनी मकान में ही रहता और प्रधान के खेतों में काम करके अपना परिवार पालता था। मकान के सामने के पेड़ की वह बहुत इज्जत करता था। हरे-भरे फूल-पत्तियों से लदे पेड़ पर बहुत से पक्षियों का बसेरा था, जिसे देखकर गरीब कलगू के आँखों में चमक आ जाती थी। बुजुर्गों द्वारा लगाये पेड़ को सुरक्षित बचाना कलगू अपना कर्तव्य समझता था। इसलिए नियत समय पर पेड़ की सिंचाई-गुड़ाई करना वह अपना कर्तव्य समझता था। पेड़ की छाँव में कलगू का परिवार सदैव हँसता-खिलखिलाता ही रहता था, क्योंकि गरीबी के बावजूद उनके परिवार में एकता और सामंजस्य था। पेड़ पर चहकने वाले पक्षियों के कलवर उसे अपने बच्चों की किलकारियों जैसा महसूस होता था। बच्चे भी ज्यादातर पेड़ की छांव मे ही अपना बसेरा बनाये रहते थे। गर्मी की तपती दुपहरिया में पेड़ की छांव में बहती बयार कलगू के भीगे बदन को अपने गर्म हवा से भी सुखाकर आराम देता, शाम होते ही तपती-जलती हवा जब ठंड़ी हवा में बदल जाती, तब पेड़ की छांव तले गुट्टक, गुल्ली-डंडा और आँखमिचौली खेलने में बच्चों को बहुत मजा मिलता था। ठंड़ी के मौसम में धूप-छांव के आँखमिचौलियों के बीच जब पेड़ की छांव में कलगू का परिवार बैठता, तब कलगू का पोर-पोर पल्लवित होकर असीम सुख-शांति का अनुभव करता था। पेड़ की डाल पर पड़े झूले झूलकर सारे बच्चे बहुत आन्नदित होते। पूर्वजों की निशानी को सहेजते हुए कलगू बहुत संतुष्ट था।


पर समय सदैव ऐसे लोगों की कठोर परीक्षा लेता है। कलगू पर भी मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। कलगू के भाई सरजू को जब कलगू की  खुशी बर्दाश्त से बाहर होने लगा, तब उसने जायदाद की लड़ाई का बिगुल बजा दिया। घर और पेड़ सहित आसपास की जमीन के बटवारे में कलगू को किसी एक पर अपना हक जमाना था। न चाहते हुए भी कलगू ने मकान को चुना, क्योंकि मकान के बिना कलगू का परिवार सड़क पर आ जाता। कलगू के पास मकान के अतिरिक्त रहने का न कोई ठिकाना था और न आसरा। नया घर बनाकर बसाना उसके हैसियत में नहीं था। इसलिए बुझे मन से उसे अपना पुस्तैनी पेड़ और वहाँ की जमीन भाई को सौंपना पड़ा। 

चूंकि सरजू की नियत पहले से ही ठीक नहीं था इसलिए वह शीघ्र ही पेड़ को कटवाने की योजना बनाने लगा। कलगू से यह देखा नहीं गया। वह भाई से अनुनय विनय करके पुर्वजों की दुहाई देता रहा, पर उसके निर्दयी भाई सरजू पर इसका कुछ असर नहीं हुआ। वह रोज पेड़ की एक शाखा को काटता और बाजार में बेच देता। कलगू पेड़ को कटता देखकर रोज रोता था और अपने भाई से प्रार्थना करता और पेड़ को न काटने की मनौवत करता। हरहराता और लहराता पेड़ ठूंठ बनने की कगार पर आ गया। पर भाई सरजू पर पेड़ काटने का भूत ही सवार था। 

पेड़ काटने में सरजू का बड़ा बेटा मोहन उसका साथ निभाता था, पर छोटा राघव अपने ही खेल में मगन व व्यस्त रहता। सरजू उसे सदैव डाटता और जलील करता था, कहता," दिनभर निठल्लों की तरह आवारागर्दी करता है, नालायक-बत्तमीज लड़का। ये नहीं होता कि अपने भाई मोहन से ही कुछ सीख ले।"

पिता सरजू की यह डाट राघव के दिल में सदैव चुभती थी। वह चिढ़ता था। इसलिए वह कभी मोहन के साथ काम करके सरजू की मदद नहीं करता था।

एकदिन कलगू खेती का काम करके लौटा तो देखा कि राघव पेड़ के बचे हुए टहनी पर उलटा बैठा पेड़ की डाल को काट रहा था। यदि डाल पूरी तरह कट जाती तो राघव गिरकर गम्भीर रुप से चोटिल हो जाता। कलगू, राघव से अनुरोध कर रहा था कि वह पेड़ को न काटे और उतर जाए, वरना वह गिर जायेगा। 

पर राघव बोला," चच्चा, आप कुछ बोलिए मत। मेरे बापू तो रोज पेड़ काटते है। आप उनको कुछ नहीं कहते है। आज मैं काट रहा हूँ तो आप को क्यों साप सूंघ रहा है।"

" बेटा, मैं इसलिए कह रहा हूँ कि तुम डाल पर उल्टा बैठे हो। डाल कटेगी तो तुम भी गिर जाओगे।" कलगू राघव को समझाते हुए बोला।

"नहीं, मैं नहीं आऊंगा। मेरे बापू मुझको निकम्मा कहते है। आज मैं यह डाल काट कर उन्हें जताना चाहता हूँ कि मैं उनका निकम्मा बच्चा नहीं हूँ। मैं भी मोहन भैया की तरह कुछ अच्छा काम कर सकता हूँ।" राघव डाल काटना भूलकर कलगू को जवाब देने लगा।

"नहीं, तुम तो हम सबके राजा बेटा हो। तुम नीचे आ जाओ। कोई तुम्हें कुछ नहीं बोलेगा। मैं तुम्हें मिठाई खिलाऊंगा।"

"चच्चा, मैं अभी नीचे नहीं आऊंगा, मैं तो यह डाल काटकर ही रहूंगा। मुझे तो यह काटकर बापू को बताना है कि मैं भी उनका लायक बेटा हूँ और कुछ अच्छा काम कर सकता हूँ।" 

"पर बेटा, तुम पहले डाल पर सीधे तो बैठ जाओ, फिर डाल काटना। मैं तब तुमसे कुछ नहीं कहुंगा।"

"ये सीधा-उलटा क्या होता है चच्चा, मैं नहीं जानता। मैं तो जैसे बैठा हूँ, वैसे ही बैठकर डाल काटूंगा। आप चाहे जो सोचे या कर लें।" राघव जिद पर अड़कर बोला। उसका उल्टा बैठना, यह दर्शा रहा था कि वह मंद बुद्धि का बालक है।

कलगू राघव को बातों में उलझा रहा था। कलगू राघव को मनाकर नीचे उतारने में लगा था, पर उसका बेटा गोलू दौड़कर सरजू के पास पँहुच गया, और सरजू से बोला," बड़े बापू, जल्दी चलो। राघव भैया पेड़ की डाल पर उल्टा बैठकर उसे काट रहे है। यदि वे डाल काट देंगें तो गिर जायेंगे।"

"चलो, देखते है, मेरा यह बुद्धु-नालायक बेटा आज क्या गुल खिलाने वाला है?" यह कहकर बड़बड़ाते हुए सरजू जल्दी से  राघव के साथ दौड़ते हुए कलगू के घर की तरफ चल दिये।

सरजू और कलगू के प्रयास से राघव को नीचे उतारा गया। सरजू कलगू के हाथों को थामकर बोला,"भाई, माफ कर दो मुझे। पेड़ काटकर मैं अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मारने जा रहा था। तुम पुस्तैनी पेड़ के रक्षक थे और मैं उसका भक्षक बनने जा रहा था। आज राघव को कुछ हो जाता तो मैं क्या करता। तुमने राघव को बचा लिया, यह बहुत बड़ा उपकार है।"  

"मुझे शर्मिंदा न करो, भैया। राघव मेरा भी बेटा है।"

" नहीं भैया, मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है। हमें अपने पेड़ों को नष्ट नहीं करना चाहिए। आज से इस पेड़ के मालिक तुम ही हो। यदि बचा सको तो इस पेड़ को अब भी बचा लो। अभी इसमें जीवन बचा है।"

" आपकी सोच समय रहते सही हो गई, भैया। मुझे बहुत खुशी हुई। मैं इस पेड़ को अपनी मेहनत और लगन से सींचकर जरूर बचाने की कोशिश करुंगा, भैया।"

राघव खुश था कि उसके कारण आज बापू और चच्चा एक हो गये। पेड़ भी बच गया। और अब वह भी इस पेड़ के नीचे अपने चचेरे भाई-बहनों संग खुलकर खेल सकेगा क्योंकि दोनों परिवार की कटूता उन्हें आपस में मिलने नहीं देती थी। आज यह दूरी भी समाप्त हो गई।

सरजू की नादानियों की तरह ही हम आज अपने पुराने वृक्षों और जंगलों को काटकर अपने पैर में कुल्हाड़ी मारते है। और पर्यावरण के विपरीत किए गये गलतियों का खामियाजा भुगतते है, पर अपनी आँखें नहीं खोलते है। 

यदि हम समय रहते अब भी नहीं सुधरे तो हमें पर्यावरण के विरुद्ध अपने किए गये दुश्वारियों का फल जल्दी ही भुगतना पड़ेगा।




डरने से अच्छा है जीना (लेख)

थक गया हूँ, बुझ गया हूँ, 
मन में दहशत फैल गई है, 
लॉकडाउन में अकेला दिल कमजोर होने लगा है, 
यदि मन-मस्तिष्क की सारी किवाड़ें कोरोनाकाल में बंद कर ली हैं, 
तो मायूस होकर यू हीं पड़े रहकर अपने दिल-दिमाग को और कुंद मत करो। 
बुझो नहीं, रुको नहीं, ठहरों नही, 
उठो, 
बंद होते दरवाजे को खोलो...
अपने मेहनत और मशक्कत से। 
फिर खिलते फूल-पत्तियों और पेड़ो को निहारों। 
सूर्य-चाँद-सितारों की कर्तव्यपरायणता को सराहों, उनकी खुशियों में खुशियाँ ढ़ूढ़ों। 
फिर फूल खिलाओं, तुलसी रोपों, पेड़ लगाओ, मिट्टी खोदो, गमले सजाओ, गमले रंगों। 
अपने मन-पसंद क्रियात्मक कार्यों को करके मन लगाओ, मन बहलाओ। 
ऐसा करके उत्तम पलों को जी कर आनंदित हो। ये सब जाने कितने काम व उत्तरदायित्व है तुम्हारे पास… जो तुम लॉकडाउन व विषम परिस्थितियों में अकेले रहकर भी करके स्वयं को उर्जावान बनाकर जीवंत कर सकते हो।
फिर तुम्हें किसी चीज से डरना क्या? डरोगे तो जीते जी मर जाओगे… मर जाओगे तो तुम्हारे सहारे जो है, उन्हें बहलायेगा और सम्भालेगा कौन? 
इसलिए स्वयं उर्जावान बनों, स्फूर्ति लाओ, दूसरो के जीवन को जीवन प्रदान करने के लिए जीवंत बनों और उस काम में जुट जाओ, जिन्हें करके तुम स्वयं को उत्सुक कर सकते हो और लोगों को उत्साहित करके जीवन के प्रति सकारात्मक सोच को प्रेरित करके, उन्हें जीवंत कर सकते हो…...। 
जीवन जीने का नाम है...।

कोरोनाकाल की होली (व्यंग्य)

ये कोरोना महामारी होली के हुड़दंग के पहले ही क्यों अपना बवाल मचाकर होली के रंग में भंग डालता है। क्या इसे लोगों की मस्ती के रंग में डूबना व उतराना बिच्छू जैसा डंक मारता है। तभी तो होली के आगमन के ऐन मौके पर ही यह सुरसा की तरह मुँह बाकर लोगों के दिलों में डट जाती या उनके शरीर में आकर धमक जाती है, फिर देश में, समाज में अपना वीभत्स रुप दिखाने के लिए ताण्डव करने लगती है। पहले यह लोगों को डराकर अपने जाल में फँसाने के लिए चुपके से दस्तक देती है, फिर अपनी पैठ एक शरीर में बना लेती है। एक के बाद यह दूसरे और तीसरे शरीर में भी पँहुचने का दम्भ भरने लगती है।
वैसे एक के शरीर से दूसरे के शरीर में पँहुचने के लिए इसे भी अधिक मसक्कत करनी पड़ती है, क्योंकि जो सावधान रहते है, उनके पास यह फटकती और उन्हें यह छूती भी नहीं है, पर जो लापरवाही के आलम में थोड़ा भी डूबते-उतराते है, उन्हें वह अपने दामन में जकड़ लेती है। पिछले साल दुनिया को तबाही के राह में ढ़केलने के बाद भी इसे सुकून व शांति नहीं मिली, जो एक जगह सिमटकर जम जायें। तभी तो चली आई है, झुनझुने सी ठुमकती-मचलती बिन बुलाये मेहमान की तरह। होली के आकर्षक मौसम में, होली के रंग में भंग डालने होली से ठीक पहले यह फिर आ धमकी और पसरी है।
 कितने प्रयास हो रहे है..इसे भगाने, खदेड़ने और चारों खाने चित्त करने के लिए। मुँह पर मास्क चिपकाएं, पीपी कीट पहने, दो गज की दूरी बनाये, बार-बार हाथ को साबुन से रगड़-रगड़कर दुबला कर दिए, लॉकडाउन होकर स्वयं को घर में कैद करके योग विद्या में घुसकर पालन भी करने लगे, पर इस मुई को इतनी तबाही के बाद भी चैन नहीं मिला। चली आई फिर अपने ताम-झाम और दुश्वारियों के साथ अपना नंगा डरावना नाच दिखाने के लिए।
कोरोना महामारी क्या आया..पूरे होली का मस्ती ही ले डूबा। पार्क में दोस्तों संग मस्ती की फुहार, गुझियों की मिठास, रंग-बिरंगें रंगों की बौछार..जीभ पर  लपलपाते हुए स्वाद के लिए मचलते दिल में उत्साह और उमंग की कमी चारों तरफ दिख रही है। कुछ लोग मन मसोसकर बैठे है कि फीकी ही सही, पर होली के रंग से अपने गुलाबी गाल को थोड़ा बहुत ही सही रंगीन तो करेंगे ही। भले ही होली के हुडदंग व अफरातफरी थोड़े थमें हुए क्यों न हो?
पर मेरी बात और है। मैं जोश, उमंग व उत्साह से पूरी तरह लबरेज बहादुर युवा जो ठहरा। खुशियाँ मेरे अंग-अंग से टपक  रही थी। मुझे कोई डर अपने बंधन में जकड़ नहीं सकती थी, इसलिए कोरोना की ऐसी की तैसी करके मैं मदमस्त हो गया। मैंने ठान लिया कि सालियों और भौजाइयों की खट्टी मीठी नोंकझोंक की गूँज से अपनी होली रंगीन करुंगा ही, साथ में भर-भर पिचकारी के रंगीन रंगों की बरसात करके सबको सराबोर भी करुंगा...इसी मीठे सपनों में रमा हुआ मन ही मन गुलछर्रों की बौछार करने के लिए सावधानियों की धत्ता बजाते हुए निर्भीक हीरो की तरह बेखौफ बिना मास्क लगाये, दो गज की दूरी को भूलकर इस बाजार से उस बाजार टहलता और धड़ामचौकड़ी मचाता ही रहा। घर आकर हाथ धुलने की गुस्ताखी भी नहीं किए। होली की तैयारियों में कुछ भी नहीं छोड़ा- सबके नये कपड़े बनवाये,श्रृंगार की सामग्री भी खरीदे। पकवानों के लिए रच-रचकर सामग्री इकट्ठा किए। और गर्व से इतराते हुए घर आ गये।
पर वाह रे कोरोना महामारी। कोरोना को मेरी इतनी हेकड़ी रास नहीं आई। वह हमसे भी तेज थी, इसलिए बदले की भावना से लबरेज होकर अचानक मेरी सभी तैयारियों को अंगूठा दिखाती होली से पहले ही मुझ पर आक्रमण करके मुझे दबोच लिया। घर में अफरातफरी मच गई। लोग कोरोना के कारण मुझ बेबस-लाचार को ले जाकर कोरोना अस्पताल के एक बिस्तर पर पटककर अकेला छोड़ दिया और मुड़कर भी नहीं देखा।। मन के रंगीन सपनें फुर्र हो गये। साल भर इंतजारी के बाद आया रंग-बिरंगी होली बेजान हो गई। कोरोना बीमारी के मायाजाल में फँसने के कारण नितांत अकेला पड़ गया । होली के दिन के मन में फूटने वाले लड्डू मन में ही फूटकर चारों तरफ बिखर गये।
शुक्र है होली के दो दिन पहले ही घर आ गया और कोरेंनटाइन कर दिया। मेरे कमरे में आने की सबको मनाही थी, पर मैं दूर से ही होली को रंगीन होते सबके चेहरे पर देख रहा था। सब नख से शिख तक रंगों से सराबोर थे। चटकारे ले लेकर खाते पकवानों की खुशबू मेरे नथुनों को फुला-पिचका रही थी। सबकी होली रंगीन थी, पर मेरी एकदम फीकी व नीरस थी।
वाह रे होली की मस्ती का रंगीन सपना। लापरवाही की ऐसी भारी मार पड़ेगी, इसका सपनें में भी हल्का आभास नहीं था कि सर मस्ती के बजाय कोरोना बीमारी के कारण चकराने, झूमने और नाचने लगेगा। अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत। इसीलिए कहते है मस्ती और उमंगों में डूबों, पर ऐसा न डूबों कि लेने के बजाय देना पड़ जाये...मेरी तरह।
आप लोग होली में स्वस्थ्य रहे, प्रसन्नचित्त रहे और होली के रंगों से सराबोर होकर जोर से चिल्लाये...होली का त्यौहार मंगलमय हो...हैप्पी होली।
 

होली के मस्ती की दर्द भरी दास्तान (व्यंग्य)

रंग-बिरंगी होली के मादकता में चकरघिन्नी की तरह नाचता यह बौराया बावला मन अब कोरोनाकाल के महामारी में भय, दुख, पीड़ा, उलझन व आक्रोश से युक्त मजबूरियों के मकड़जाल में फँसा हुआ मधुमक्खी सा बिलबिला रहा है। पहले होली के क्या रंगीन दिन थे? सालियों के मादकता से यौवन भरे चुहलबाजी का रसपान करते हुए कितने आंनद की अनुभूति होती थी। सालों के साथ मिलकर मुहल्ले की छोरों-छोरियों पर नजर टिकाएं बैठे घंटो समय गुजार देते थे। ऐसे में कोई रोकने-टोकने वाला नहीं मिलता। खूब रसभरी का आनंद लेता था। यदि भूले-बिसरें से कोई टोक भी देता,"अरे यार, कितनी मस्ती में चूर हो? अभी से इतनी जल्दी भांग चढ़ा लिए हो क्या?" तब ऐसे समय में कितनी सरलता से हँसकर खीसें निपोरते हुए बात टालकर कह देते थे,"अरे भाई, होली का मस्ती भरा रंगीन त्यौहार है। होली कोई रोज-रोज थोड़े आती है। फिर ऐसा मौका कब नसीब होगा?"

पर ऐसे में मुझे सूंघती-सांघती, रंग में भंग डालती श्रीमती जी हर समय सीने पर मूंग की दाल पिसती अपनी मोटी (गुस्से में कहा गया संबोधन) सूरत लिए सामने प्रकट हो जाती। कितनी भी नजरें बचाने की कोशिश करता, पर चोरी पकड़ ही ली जाती। फिर सर पर गुम्बद फुलाना व एक समय का उपवास मेरी मजबूरी बन जाती। हाँ भाई, जब श्रीमती जी मेहरबान होंगी ही नहीं, तो भूखे चूहे को दाना-पानी देगा कौन? 

ऐसे में टसूएं बहाने के सिवा बचता ही क्या है, पर मैं भी जनम का ढ़ीठ व कमीना जो हूँ। मुझे लाज तो आती नहीं, इसलिए बहाना मिल जाता था साली के घर जम जाने के लिए। भूखे को दानापानी का गुहार लगाते पँहुच जाता किसी साली के घर, तो साली की हमदर्दी के साथ ही हँसी-ठिठोली में समय गुजारने का मौका रसगुल्ले की तरह मुलायम व गुदगुदाने वाली लगती थी। अरे यार, बीवी का डर तो मन के कोने में बैठा मुझे झाडू मारने वाले अंदाज में आगाह तो कर ही रहा था। पर मैं उसके खोदने वाली टीसों को परे ढ़केलकर अपने ही मौज-मस्ती में डूबा अठखेलियों में लोटपोट रहा था। घर जाकर जो डंडे बरसेंगे, उसे इस मस्ती के बदले में सह लूंगा। इसलिए आज बीवी की ऐसी की तैसी। बीवी तो रोज अपनी है..वासी है। पर साली को तो बस होली तक ही अपनी रसभरी जायदाद समझना है। क्योंकि इस मस्ती भरे माहौल में कुछ पल की मस्ती जायज होती है।

पर इस कोरोना महामारी ने तो सारा मजा ही गुड़गोबर कर दिया है। वह दिलेरपने वाली होली की मस्ती अतीत के सुहाने सपनें में तब्दील हो गई है। अब तो मुँह पर टाट की पट्टी चिपकाएं सालियाँ एक मीटर की दूरी को कम करने का नाम ही नहीं लेती है। यह दूरी चुपके से कम करने का हल्का भी प्रयास करो तो वे सजगतापूर्वक जोर से चिल्ला पड़ती है,"अरे रे रे... जीजा जी, दो कदमों की दूरी, रखना है बहुत जरुरी। वरना कोरोना के महामारी में, मरना पड़ जायेगा बखूबी।"

 अभी मैं सम्भल भी नहीं पाता कि बीवी का बेलन मुंड़ी पर अपना प्रसाद दे चुकी होती है। मैं पीड़ा से कराहने की बेला में भी मुँह दबाकर सिर पकड़कर धम्म से बैठ जाता हूँ। मेरी रोनी सूरत पर सबका खिलखिलाना बहुत भारी लगता है। फिर मैं बहाने बनाकर आशिक मन को राहत पँहुचाने के लिए दूसरे साली की सांकल खटखटाने पँहुच जाता हूँ दूसरे साली के घर। सालियों का कोई अकाल तो नहीं पड़ा है। गली-मुहल्ले हर जगह साली-भौजी मिल जाएंगी। देखे बीवी कहाँ-कहाँ पँहुचती है। ऐसे में बीवी से भी आँखमिचौली खेलने में मजा ही आता था। वह डाल-डाल तो मैं पात-पात। क्योंकि मैं भी खानदानी नामी गुंडा हूँ। इतनी जल्दी हार मानने वालों में नहीं हूँ।

पर वाह रे कोरोना महामारी का वीभत्स रुप। सारा होली का रंगीन गुलछर्रों वाले मस्ती का गुड़गोबर ही करके मेरी पलीदी निकाल दी है। बीवी की सख्त चेतावनी है कि होली तक घर से बाहर पैर निकाला, तो हड्डी-पसली एक कर दूंगी। कोरोना तो एक बहाना है, बीवी को अवसर मिला सुहाना है। अब मैं, न हँसने में हूँ, न रोने में हूँ...बस मुँह पर मास्क लगाकर घर के कोने में दुबका बैठा सिसकियाँ भर रहा हूँ।

 वाह रे, इस बार की होली। न पिछले बार पिंड छोड़ा और न इस बार छोड़ने का इरादा है। कभी-कभी मन में ये ख्याल आता है कि खतरा किससे ज्यादा है-- बीवी से या कोरोना से। क्योंकि ये दोनों होली के त्यौहार में रंग में भंग डालने की होड़ में एक-दूसरे को पछाड़ने के लिए डंड़ बैठक करने पर तुली है।