दो पराठे का स्वाद (संस्मरण)

कहने को तो कोई भी यह प्रश्न चिन्ह लगा सकता है कि आखिर ये दो पराठा है क्या, और इस दो पराठे में ऐसा क्या स्वाद, मिठास और खूबी छुपा हुआ है..जो आज भी उसका महत्व आपके जेहन में ऐसा रचा-बसा हुआ है कि आप उसे भूली नहीं, बल्कि उसे मुद्दा बनाकर लेखनी उठा ली और लिखने बैठ गयी है।
मेरी भूली-बिसरी स्मृतियों में दो पराठे का अस्तित्व सचमुच आज भी ऐसा ही घुला-मिला मिठास भरी यादें है, जिसके रसास्वादन का मजा मैं आज भी चटकारे लेकर लेती हूँ और आज आपको भी उसके रसास्वादन से सराबोर करने की वीणा उठा ली हूँ।
तो सुनिए...
आँखें मिंचते हुए उठो, दैनिक क्रियाकलापों से निवृत्त होने के बाद गर्मा-गर्म चाय के साथ दो मकुनी (सत्तू भरा पराठा), हरे मटर का पराठा या सादा  पराठा अचार के साथ का स्वादिष्ट नाश्ता जो तत्काल रखा हुआ मिलता था, वह बहुत अच्छा लगता था क्योंकि उससे सुबह-सुबह किसी परिवार में नाश्ते के समय में जो हलचल नजर आता... वह यहाँ दिखता नहीं था बल्कि शांत भाव और सुगमता से अपने आप निबट सिर्फ इसलिए जाता था क्योंकि इसमें दो बुजुर्गो के सोच, संकल्प ,समानता और व्यवस्था में सामंजस्य निभाने की नींव विराजमान था और इस दो पराठे में बाकी सदस्यों के उदरपूर्ति के शांत होने का साधन था।
पंद्रह-सोलह सदस्यों और गाँव के  लड़के भजुराम की इतनी बड़ी जिम्मेदारी सिर्फ एक की कमाई पर बड़ी सुगमता, सरलता से और बिना किसी हिलहुज्जत के आसानी व शांति से आगे बढ़ता रहा...यह सुकून देने वाला पल  बलिया दीदी के ससुराल का ही था...जहाँ मेरे दो साल बड़ी सरलता व सुगमता से बीत गया।
जी हाँ...उस दो पराठे में किसी का मेहनत, सहुलियत, प्यार और त्याग के साथ पूरे परिवार को एकसूत्र में बाँधनें की सुंदर व सटीक तरीका से व्यवस्थित करने का जो सार्थक गुण दीदी के सास-ससुर माई और बाबू जी में मौजूद था उसका सही मूल्यांकन करने का मौका मुझे आज मिला है। 
बलिया दीदी के ससुराल से बी.एस-सी. करने का संयोग मेरा अचानक बन गया। वहाँ जाने पर पता चला कि यह कई परिवारों का संगम स्थल है। संगम स्थल बनाना आसान है, पर उस संगम स्थल को व्यवस्थित करना इतना सरल नहीं था, जितनी सरलता से बाबु जी और माई ने उन्हें व्यवस्थित किया और सुचारू रूप से आगे बढ़ाया। 
रात दस बजे तक खाने-पीने की क्रिया जब समाप्त होती थी तब माई और चाची की लड़की माधुरी मिलकर दो-दो पराठा गिनकर चौदह-पन्द्रह लोगों के लिए निश्चित रूप से प्रतिदिन तैयार करती थी। सबकी जिम्मेदारी यह थी कि वह सुबह मंजन करने के बाद अपने हिस्से का दो पराठा और स्वाद के अनुसार अचार लेकर गरम चाय के साथ खा ले। जाड़े में यह स्वाद इसलिए दुगुना हो जाता था क्योंकि उस समय पराठा भरा हुआ होता था। भीषण से भीषण गर्मी में पसीने की टपकती बूंदों का एहसास हो या कपकपाती सर्दी में ठिठुरते बदन हो...रात के साढ़े दस-ग्यारह के बीच जब हम रजाईयों के आगोश में सुखद निद्रा की चादर ओढ़ने की तैयारी में जुटे होते थे, उस समय माई अपनी सहयोगी माधुरी और भजुराम के साथ जिस तरह पराठे बनाने या रसोई समेटने के कठोर काम में प्रतिदिन व्यस्त दिखती थी। वह मेरे नेत्र पटल पर आज भी जीवंत है। मेरा बलिया प्रवास बहुत सुखद और एक नयी पारिवारिक सहयोग और सामंजस्य की अनुभूति से पूर्ण था। जहाँ सब कुछ अनुशासित था। व्यर्थ की चिल्ल पों या हलचल कहीं नजर नहीं आया। तभी तो उस ममतामयी, समर्पित देवी और घर के मुखिया बाबू जी को याद करती हुई मैं श्रद्धा सुमन समर्पित करती हूँ।
उन बूढ़े लोगों के सोच और उसके क्रियान्वयन की प्रक्रिया ही इतनी मजबूत थी कि उसमें चीं-चूं करना किसी के वश में नहीं था। एक बुजुर्ग पति-पत्नी जिनके स्वयं के पाँच बच्चे, एक भाई का पूरा परिवार और मुझे लेकर तीन सगे-सम्बंधी के स्नातक डिग्री पाने वाले विद्यार्थी। इतने लोगों को एक साथ एक चूल्हे पर व्यवस्थित करना आज की शहरी पीढ़ी के लिए समझना बहुत मुश्किल है। पर उसी परिवार में मेरा दो साल का समय बिताना यदि सुखद व व्यवस्थित हो तो इसे बहुत अच्छा ही कहेंगे। 
माई और बाबू जी को मेरा शत-शत नमन।

आस्था का केंद्र चित्रकूट धाम - भाग-3 (यायावरी)

प्रागैतिहासिक काल की गुफाओं, झरनों, उच्च शैल शिखरों व हैरान करने वाली कंदराओं के बीच चित्रकूट धाम स्थित है।

माँ की इच्छा थी..चित्रकूट घूमने की। इसलिए माँ जब वे मेरे पास आयीं, तब हमने चित्रकूट घूमने का प्रोग्राम बना लिया। यह उत्तर प्रदेश का एक जिला है जो मंदाकिनी नदी के तट पर बसा भारत के प्राचीन तीर्थ स्थलों में से एक है।चित्रकूट के प्रमुख दर्शनीय स्थल मध्य प्रदेश के सतना जिले में स्थित है। इसी स्थान पर ऋषि अत्रि और अनसुइया ने ध्यान लगाया था। बह्मा, विष्णु और महेश ने चित्रकूट में ही  अनसुइया के घर जन्म लिया था। चारों ओर से विन्ध्यपर्वत श्रृंखलाओं और वनों से घिरे चित्रकूट को अनेक आश्चयों की पहाड़ी कहा जाता है। रामचंद्र जी अपने वनवास का ग्यारह साल यहीं सीता और लक्ष्मण के साथ बिताये थे। अतः ऐसे तीर्थ स्थल को देखने, समझने और घूमने के लिए हम माँ के साथ ट्रेन से कर्वी स्टेशन पहुँच गये, क्योंकि चित्रकूट पँहुचनें का हमारे लिए निकटतम सुविधाजनक रेलवे स्टेशन कर्वी ही था। वहाँ से हम चित्रकूट बस से गये। सबसे पहले हमने एक होटल में अपने ठहरने का इंतजाम किया। चित्रकूट प्रवास के समय हमने यहाँ के नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य व  पवित्र दर्शनीय स्थलों का भरपूर आनंद लेते हुए हम बार-बार अपना सुधबुध खोते रहे। एकबार तो नदी के किनारे शंकर भगवान की विशाल मूर्ति के सामने हमें भक्ति भाव ऐसा अनूठा अनुभव महसूस हुआ कि हम कहाँ किसी और दुनियाँ में आ गये है, क्योंकि उस समय हमें विचित्र स्वर्गीय सुख की प्राप्ति का आभास हुआ। माँ का भी यही हाल था। वे भी भावविभोर होकर आनंद के अतिरेक में डूब और उतरा रही थी। मुझे यह देखकर अपार संतुष्टि मिली।

यहाँ के प्रमुख धार्मिक स्थल निम्न है-

राम घाट

रामघाट वह घाट है..जहाँ भगवान राम प्रतिदिन स्नान करते थे। इसलिए सबसे पहले हम रामघाट गये। यहाँ हमने जी भरकर स्नान, दर्शन और पूजा-पाठ किए।असीम आनंद की पहली अनुभूति की पराकाष्ठा यहाँ हमें यही मिल रही थी इसलिए हमने यँहा का पूरा मजा लिया। इस घाट पर अनेक मंदिर तथा गोस्वामी तुलसीदास की प्रतिमा भारत स्थित थी। यहाँ अनेक धार्मिक क्रियाकलाप चलते रहते है।शाम को यहाँ आरती होती है जो मन को काफी सुकून और शान्ति प्रदान करती है।

कामदगिरि पर्वत

मान्यताओं के अनुसार आदिकाल में पर्वत से निकलकर प्रभु कामदनाथ विग्रह के रुप में प्रकट हुए। परिक्रमा मुख्य द्वार से प्रारम्भ होती है।चारों दिशाओं में चार द्वार है जिनमें विग्रह विराजमान है। अलौकिक छटायुक्त पर्वत के चारों ओर शनि मंदिर, महलों वाले मंदिर के पीछे गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लगाया गया पीपल का वृक्ष, उनके द्वारा लिखी गई रामचरित मानस की हस्तलिखित प्रति, माँ पयस्वनी का उद्गम स्थल आदि स्थान दर्शनीय है।
धार्मिक महत्व वाले इस पवित्र पर्वत की पाँच किमी की परिक्रमा हमने पूरे मनोयोग से धीरे धीरे, रुककर आराम से किया। कहते है श्रद्धालु यहाँ अपने मनोकामना के पूर्ण होने की कामना करते है। जंगलो से घिरे इस पर्वत तल पर अनेक मंदिर है। लोकप्रिय कामतानाथ और भरत मिलाप मंदिर यही पर है। मम्मी के चेहरे पर थकान के आसार तो दिख रहे थे पर उत्साह और लगन में कोई कमी नहीं थी।  इसलिए उन्होंने परिक्रमा अपने दम पर पूरे मनोयोग से पूरा किया।

मंदाकिनी धाट

मंदाकिनी नदी अनुसुइया के जंगलों से निकलती है। लेकिन इसके बहाव के स्थान पर अलग-अलग घाट है, जो अपनी अलग विशेषताओं के कारण प्रसिद्ध है। टाठी घाट जंगलों के मध्य स्थित देवरहवा बाबा का साधना स्थल माना जाता है। यहाँ की धारा में थाली घूमने लगती है। सर्वाधिक लोकप्रिय स्थान राघव प्रयाग घाट, रामघाट, भरत घाट है। राघव प्रयाग घाट पर सरयू व पयस्वनी का संगम है। यहाँ पर राम ने अपने पिता दशरथ का पिंड तर्पण किया था।

हनुमान धारा

दूसरे दिन हम पहाड़ी के शिखर पर स्थित हनुमान जी की विशाल मूर्ति के दर्शन को गये। करीब तीन सौ सीढ़ी की चढ़ाई चढ़कर हम इस स्थान पर पँहुचें थे। हनुमानजी के बाएं हथेली पर झरने से पानी लगातार गिरता रहता है।कहते है यह धारा श्री राम ने लंका दहन से आए हनुमान के आराम के लिए बनवायी थी। पहाड़ी के शिखर पर सीता रसोई था। हमने यँहा से चित्रकूट के सुंदर दृश्य देखे।
इसके बाद हम जानकी कुंड, स्फटिक शिला, अनसुइया अत्रि आश्रम और गुप्त गोदावरी घूमने गये।

जानकी कुंड

राम घाट से दो किमी दूर मंदाकिनी नदी के किनारे जानकी कुंड था। जनक पुत्री जानकी यहाँ स्नान करती थी। यहीं पर रघुवीर मंदिर और संकट मोचन था।

स्फटिक शिल

जानकी कुंड से कुछ ही दूरी पर मंदाकिनी नदी के किनारे स्फटिक शिला अपने पूरे वैभव के साथ स्थित है। इस शिला पर सीता के पैरों के निशान मुद्रित है। कहते है..इस शिला पर बैठकर राम सीता यहाँ के प्रकृति के सुंदरता को देखते और आनंदित होते थे। राम ने यहीं बैठकर सीता का पुष्पों से श्रृंगार किया था।
इसके साथ ही जानकीकुंड, पंचवटी घाट, प्रमोदवन घाट, सूरजकुंड का घाट जहाँ माँ मंदाकिनी पश्चिम मुखी हो जाती है , देखने योग्य है। यहाँ घूमकर और स्फटिक शिला के दर्शन से मन को असीम शक्ति व शांति मिली।

अनसुइया आश्रम

महर्षि कर्दम की पुत्री और महर्षि अत्रि की पत्नी अनसूइया का विशाल गुरुकुल वाला आश्रम शहर से 15 किमी दूर था।
हम ये सभी कुछ  देखते और घूमते हुए अनसुइया आश्रम पँहुचे। स्फटिक शिला से चार किमी दूरी पर घने वनों से घिरा यह आश्रम स्थित है। प्रकृति के सुंदरतम नैसर्गिक नजारों के बीच में एकांत में स्थित इस आश्रम में सुकून और शान्ति थी। आश्रम के सामने की कल कल करती साफ और शीतल  जल वाली मंदाकिनी नदी बह रही थी। मंदाकिनी नदी के सैकड़ों धाराओं के उद्गम स्थल का प्रत्यक्षरुप में दर्शन करके असीम आनंद की अनुभूति हुई। इस आश्रम में अत्रि मुनि, अनसुइया, दत्तात्रेयय और दुर्वासा मुनि की प्रतिमा स्थापित थी।

अमरावत
दृष्टांतों के आधार पर राम की दसवीं पीढ़ी के पूर्वज अयोध्या नरेश महाराज अम्बरीश यहाँ आकर घोर तपस्या किए थे। यह अनसुइया आश्रम सेतीन किमी दूर जंगलो में है।

भभका उद्गम

यह स्थान अनसुइया आश्रम से दो किमी दूर झूरी नदी का उद्गम स्थल है। यह स्थान गुरु गोरखनाथ की प्राचीन तपस्या स्थली माना जाता है।

गुप्त गोदावर

प्रकृति की अनमोल धरोहर गुप्त गोदावरी ऐसा स्थान है जहाँ पर आकर हमने अपना सुधबुध खो दिया। प्रकृति की विलक्षण कारीगरी वाली गुफाओं में नक्काशी देखने योग्य है। यह शहर से 18 किमी की दूरी पर थी। यहाँ दो गुफाएं थी। एक गुफा चौड़ी और उंची थी। इसका प्रवेश द्वार सँकरा होने के कारण इसमें आसानी से घुसा नहीं जा सकता है। गुफा के अंत में एक छोटा सा तालाब था जिसे गोदावरी नदी कहा जाता है। दूसरी गुफा लम्बी और सँकरी थीऔर जिसके नीचे पानी बहता रहता था। पानी में सम्भलते हुए हमने गुफा के अंतिम छोर का दर्शन किये। माँ के साथ पानी में रुक रुककर धीरे धीरे चलना बहुत रोमांचकारी था। यहाँ से जल निकल कर कुंड में जाती है पर इसकेबाद वह दिखाई नहीं देती है। यह रहस्य आज भी बना हुआ है।

भरत कूप

भगवान राम के राज्याभिषेक के लिए भरत ने भारत के नदियों से जल एकत्रित करके यहाँ रखा था। अत्रि मुनि के कहने पर भरत ने जल एक कूप में रख दिया था। इसी कूप को भरत कूप के नाम से जाना जाता है। भगवान राम को समर्पित यहाँ एक मंदिर भी था।

वाल्मीकि आश्रम लालापुर

महर्षि वाल्मीकि की तपस्थली लालापुर चित्रकूट से इलाहाबाद जाने पर मिलती है।झुकेही से निकली तमसा नदी इस आश
रम के समीप से बहती हुई सिरसर के समीप यमुना नदी में मिलती है। पूरी पहाड़ी पर अलंकृत स्तम्भ और शीर्ष वाले प्रस्तर खंड़ बिखरे पड़े है, जिनसे इस स्थल की प्राचिनता का बोध होता है।

तुलसी पीठ

तुलसी पीठसेवा न्यास जानकी कुण्ड, चित्रकूट, मध्य प्रदेश में स्थित एक भारतीय धार्मिक और सामाजिक सेवा संस्था है। इसे हिन्दू धार्मिक नेता जगद्गुरु रामभद्राचार्य द्वारा 2अगस्त 1987 में स्थापित किया गया था।
वैसे आस्था से जुड़े श्रद्धालुओं की भीड़ यहाँ पूरे वर्ष रहती है पर यातायात के संसाधनों के अविकसित होने के कारण लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। निकटतम रेलवे स्टेशन कर्वी और शिवराज पुर है।इलाहाबाद, लखनऊ, दिल्ली सभी प्रमुख शहरों से बस और टैक्सी की सुविधा हमेशा मिलती है।
यद्यपि यहाँ से अभी मन भरा नहीं था ...फिर भी तीसरे दिन हम वापिस अपने शहर लखनऊ आ गये ।
यद्यपि हमारी चित्रकूट की यात्रा पूरी हो गयी, पर मन न भरने के कारण यह यात्रा अधूरा ही लगता है। मम्मी का मन भी पूर्ण रुप संतुष्ट नहीं हुआ था पर उन्होंने अपने मन की बात तब बताई, जब हम वहाँ से निकल चुके थे। यदि मम्मी पहले ही मन की बात बताती तो हम मैहर देवी के मंदिर जाने के बजाय यहीं दो-तीन दिन और घूमते। खैर जो हो गया, वह हो गया। यदि मौका मिला तो फिर चित्रकूट जाने का या बाकी बचे अधूरे वर्णन को पूरा करने के लिए हम फिर आयेंगे।

दर्द भरी दास्तान उपेक्षित वस्त्रों की (व्यंग्य)

पैजामा, लूंगी और मैक्सी जो वर्षों से उपेक्षित जीवन जी रहे थे। उपेक्षित इस मामले में कि उनके मालिक-मालकिन उनका उपयोग सिर्फ घर में ही अर्थात रात में सोते समय ही अधिकतर करते थे। दुख तो उन्हें तभी होता था, जब घुमने की बारी आती, देश-दुनिया को समझने-बूझने या मनोरंजन का समय आता तो मालिक उन्हें बेरुखी से उतारकर खूंटी पर लटका देते और दूसरे वस्त्रों में सजधज कर सुशोभित हो जाते। फिर बड़े गर्व से वे बाहर चले जाते और जाते समय उसकी तरफ नजरें उठाकर भी नहीं देखते। यह उनका अपमान नहीं तो और क्या था? जिसे वे चुपचाप अभी तक खामोशी से सिर्फ इसलिए सहते और फिर टसूएं बहाकर रह जाते...। पर कुदरत की लीला अपरम्पार होती है। यहाँ देर है, पर अंधेर नहीं। 
 कहते है एक दिन किस्मत सबकी बदलती है, तो आज उपेक्षित वस्त्रों की किस्मत बदल चुकी थी। तभी तो अपमान का घूँट पीने वाले उपेक्षित वस्त्र आज लाॅकडाउन के इस दौर में सम्मानजनक जीवन जी रहे थे। तभी तो वही उपेक्षित लुंगी, पैजामा और मैक्सी आज मंद मंद विजयी मुस्कान बिखेरते हुए गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। क्योंकि आज वही वस्त्रों के राजा थे। मालिक-मलकिन उन्हें ही प्यार से पहनते, सहेजतें और बहुत सम्भाल कर रखते थे। उपेक्षित वस्त्र मालिक-मालकिन के इस  अप्रत्याशित प्रेम से अति प्रसन्न थे।
उनकी यह बचकानी सी ठीठोली वाली हँसीं अलमारियों में बंद पड़े साफ-सुथरें, खूबसूरती से सजे, उजले प्रेस किए हुए पैंट-शर्ट, सलवार सूट और साड़ी-ब्लाउज को रास नहीं आ रहा था। ये पैंट-शर्ट और साड़ी बहुत मायूस थे। काफी दिनों से इस अलमारी में बंद रहने से उनका जी इतना उब चुका था कि वे उबलते हुए इस अलमारी के दायरे से बाहर बुलबुलों के रुप में छंलाग लगाने को बेचैन थे। 
 लॉकडाउन के ऐसे मुसीबत भरे समय में जब उन्हें बाहर जाने का मौका नहीं मिला, तब वे अपने आँसुओं को पोछते हुए निरीह व बेबस आँखों से वे एक दूसरे को निहारने लगे। तब दुखी मन से अपने मन की भड़ास निकालते हुए साड़ी बोली," कैसा पतझड़ वाला बोरिंग व नीरस समय आ गया है आज। जिसे मालिक-मालकिन मुड़ा-चिमुड़ा होने पर भी घर आकर पहन लेते थे। कभी प्रेस भी नहीं कराते थे। उन्हीं उपेक्षित पहनावे पर मालिक आज अपना सारा प्यार और ध्यान लुटा रहे है। पर आजकल इनके बदले घमण्डी भाव तो देखो...कैसे इतराते और जलवा बिखेरते नजर आ रहे है। आजकल इनका भाव सातवें आसमान पर बैठा है क्योंकि मालिक इन्हें रोज अपने हाथ से प्रेस करते और पहनते है और अक्सर बाहर तक भी टहलनें चले जाते है। मालिक की बैमानी देखो,  जब  हमारी बारी थी, तब हमें गठरी बनाकर प्रेस वाले के यहाँ ले जाकर पटक देते थे। प्रेस करने के लिए कभी हमें प्यार से हाथ भी नहीं लगाये। मेरा तो दिल जलता है। मैं तो इनके इतराते हुए सलोनेपन को देखकर मन ही मन में दिन-रात जलती-भुनती व कुढ़ती रहती हूँ। मुझसे ये सब बर्दाश्त नहीं हो रहा है।"
"सब्र करो, बहन। सब्र करो। जल-भूनकर अपना दिल मत जलाओ। कभी हम इतराते और अपना जलवा दिखाते थे। आज इनकी बारी है, तो इन्हें आज हँस लेने दो।  जीवन धूप-छांव का दौर होता है। ये तुफान के आने-जाने का जलवा है। पहले हमारी चलती थी, अब इनकी चल रही है। कोरोना की महामारी रुकने तो दो। फिर देखना हमारी बारी कैसे लहराकर आयेगी। तब हमीं मालिक-मालकिन के बदन को सुशोभित करेंगे।" ब्लाउज हँसकर साड़ी को टोकती हुई बोली।
" यह तो ठीक है। पर हम आज जो बंद होने के कारण घुट रहे है, उसका क्या करे?" साड़ी उदास हो कर सिसकती हुई फिर बोली।
 उन दोनों की फालतू किचकिच से परेशान हो कर टाई बोली," चुपचाप आराम करो। ऐसा सुनहरा मौका बार-बार नहीं मिलता है। रोज बाजार-माल और ऑफिस में  इधर-उधर घिसे और रगड़े जाते थे। ऐसे में घिस-घिसकर फट जाते थे। अब शांति से बैठने का अच्छा मौका मिला है तो उसमें भी बेचैनी। मुझे देखो, आराम से मस्ती मारता हूँ। मालिक मुझे कभी-कभी किसी विशिष्ट अवसर पर ही याद करते है। बाकी दिनों में तो मैं चैन की बंसी बजाता हुआ आराम फरमाता हूँ। मुझे तो किसी से कोई शिकायत या जलनखोरी नहीं होती है। तुम भी आराम से चैन की बंसी बजाओ। और शोर मचाकर सबको परेशान मत करो।"
यह सुनकर कमीज गदगद हो गया,बोला," केवल चिल्ल-पों मचाने से कुछ नहीं होगा। टाई की तरह समझदार और बड़े दिल वाले बनों। आराम करने का समय है तो खामोशी से आराम करो। जब तुम्हारी बारी आयेंगी, तब तुम्हें फिर मौका मिलेगा। तब तुम अपनी महत्ता और गुरुर दिखाना। अभी बेकार की बकवास बंद करो।" 
 सबकी किचकिच से पैंट उब चुका था। वह शांत भाव से बोला," ये बेकार का घड़ियाली आँसू बहाना छोड़ो। मैं कह रहा था कि सुख-दुख में जो समान भाव से चलता है, वही सुखी होता है। हर परिस्थितियों में जीना आना चाहिए, तभी तो जिंदगी समान गति से चलायमान रहती है। अब मुझे देखो, मैं चैन से आँखें बंद करके सोने जा रहा हूँ। कोई भी मेरी नींद में खलल ड़ालनें का प्रयास नहीं करेगा। वरना मैं हो हल्ला मचाकर सबका जीना हराम कर दूंगा।" पैन्ट जोर से सबको धमकाते हुए बोला और फिर जम्हाई लेते हुए करवट बदलकर सोने लगा।
" कह तो सब लोग ठीक ही रहे हो। आराम और मौज करो। जब अपनी बारी आयेगी, तब की तब देखी जायेगी। अभी से सर क्यूं खपाये। मायूसी में क्यों जीए। बाहर निकलने का जब मौका मिलेगा तब बाहर जाकर काम करेंगें।" यह कहकर साड़ी सोने लगी तो अलमारी में सन्नाटा छा गया। सब बारी-बारी अपनी आँखें बंद करके अपने-अपने ख्यालों में मगन हो गये।।

दोस्ती का मान (संस्मरण)

दोस्त की उपयोगिता कितनी होती है, यह बचपन के अल्हड़ बेला में पता नहीं रहता है। तभी तो कुट्टी-मिल्ली का मजेदार खेल बचपन में खूब खेला जाता है।
मैं आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। मेरी पक्की सहेली थी..मंजू। हम पढ़ने के साथ-साथ हँसी-खेल में मजे से दिन बिता रहे थे कि अचानक एकदिन मेरे और मंजू के बीच किसी बात पर कुट्टा-कुट्टी हो गया। अब हम एक दूसरे के लिए अजनबी बन गये। हम एक दूसरे को देखते, कुछ कदम जो आगे जाने और मिलने को तत्पर होते, उन्हें गुरुर के अंधेपन के आगोश में बाँधकर पीछे खिंच लेते। हमें समझाने वाला कोई नहीं था।
इसी बीच मेरी पूनम दीदी की शादी का दिन आ गया। निमंत्रण-पत्र बँट रहा था। हमें भी अपनी सहेलियों को निमंत्रण देने की अनुमति माँ से मिली थी। मैं अपनी पूरी कक्षा को निमंत्रण दे दी, पर मंजू को मैंने जान-बूझकर अनदेखा करके छोड़ दिया। यद्यपि आँखें मुंद तो ली थी, पर दिल को गवारा नहीं हुआ। तभी तो यह बात पेट में पची नहीं, तब मैंने अपनी रागिनी दीदी को अपना राजदार बना लिया।
शादी के दिन मैं अपनी सहेलियों के स्वागत में फिर उनके साथ खुशियाँ मनाने में व्यस्त थी। तभी मेरी दृष्टि आती हुई सहेलियों में मंजू पर पड़ गई। मैं अचकचाकर मुँह फेर ली। बिन बुलाये मेहमान का स्वागत करने का इरादा दिल को गवारा नहीं था। मंजू मेरी नादानियों भरी बेरुखी को भांप ली, तभी वे रागिनी दीदी से बात करने लगी। रागिनी दीदी को मेरी नादानी रास नहीं आयी। वे मुझे बुलाकर बोली," मंजू को मैंने बुलाया है, इसलिए इसका पूरा ध्यान रखना कि वह अपमानित महसूस न करे। तुम्हारा व्यवहार सही होना चाहिए।"
मैं अपने आचरण से लज्जित हुई। मैंने दीदी के बात का कद्र किया और उसी समय से उससे ऐसा व्यवहार की, जैसे हममें कभी कुट्टा-कुट्टी हुआ ही नहीं था।
गलत राह पर बढ़ते हुए कदम को रोकने के लिए किसी बड़े की छत्रछाया कितनी बड़ी उपलब्धि होती है...यह उस दिन समझ में आया। बड़ों की छाया में मन स्वयं को बहुत सुरक्षित महसूस करता है।  
अब हम क्लास में कुट्टा-कुट्टी के बंधन से मुक्त थे। अब हम फिर पहले वाले दोस्त बन गये।
पापा के ट्रांसफर के कारण बचपन में बिछुड़ने के बाद एक बार हम फिर मिले। मैं एक बेटी शालू की माँ बन चुकी थी। मायके जाने पर मंजू छोटी बहन के साथ घर आई।  वह बहन के साथ एल.टी. कर रही थी। भूली-बिछुड़ी यादें जो हृदयपटल पर अंकित थी...वह एक बार फिर अंकुरित होकर हरहरा गयी। बातों के दौर के बाद वह शालू को नेग देकर प्यार की और चली गई। बचपन की दोस्त से दुबारा मिलना बहुत ही अविश्वसनीय और रोचक लगा।
 ऐसे में रागिनी दीदी के सीख के हम आभारी थे, जिनके प्रयास से दोस्ती का मान रखने के कारण हम बिछुड़ने के बाद भी मिले और दोस्त बने रहे।



माँ का शौक (संस्मरण)

88साल की मेरी माँ को पढ़ने का बहुत शौक था। यद्यपि उनके दोनों आँखों का आपरेशन हो चुका था फिर भी जब कोई किताब उन्हें मिलता वे पढ़ने बैठ जाती और उसे तब तक नहीं छोड़ती, जब तक कि वे उसे पूरा पढ़ नहीं लेती। अपने घर के पेपर से उन्हें संतुष्टि नहीं मिलती तब वे पड़ोस से दूसरा पेपर लाकर पढ़ जाती। पढ़ने में वे इतनी तेज थी कि विज्ञापन, मेट्रीमोनियल और  नौकरी वाले कॉलम को भी नहीं छोड़ती थी। मैंने उन्हेँ संस्कृत में दुर्गासप्तशती और गीता पढ़ते देखा था। इसके अतिरिक्त कामचलाऊ अंग्रेजी भी वे बोल, समझ और पढ़ लेती थी।
पढ़ना-लिखना तो वैसे आम बात है, पर मेरी माँ के लिए यह खास इसलिए था कि उन्होंने कभी स्कूल का मुँह भी नहीं देखा था। उत्सुकतावश यही प्रश्न जब एकदिन मैंने माँ से पूछा तो वे बोली," छोटी थी, तभी माँ गुजर गयी। पढ़ने का मौका नहीं मिला। रहने के लिए अधिकतर मामा के घर जाती थी। पढ़ने में रुचि थी तभी वहाँ ममेरे भाई-बहनों को पढ़ते देखकर स्वयं पढ़ना-लिखना सिखने लगी। लगन की पक्की थी, इसलिए पढ़ना-लिखना आ गया।
माँ की ऐसी ही रुचि के कारण अपनी कहानी, व्यंग्य और संस्मरण आदि छपने की पहली सूचना मैं माँ को देती थी, क्योंकि उम्र के ऐसे दौर में भी माँ जिस उत्सुकता से पत्रिका खरीदने दुकान तक चली जाती थी या किसी से मँगाती थी...उसी उत्सुकता व लगन से वे पढ़ती, लोगों को पढ़ाती और फिर खुश होकर तारीफ के साथ-साथ  हौसलाअफजाई भी करती। उनके इस कृत से मेरा मनोबल काफी बढ़ता था।
" माँ " आज हम लोगों के पास नहीं है, पर अध्ययन के प्रति उनकी तल्लीनता, तत्परता और जागरुकता आज भी मेरी लेखनी की लेखन शक्ति बनी हुई है।
शत-शत नमन प्यारी माँ को।

करे कोई, भरे कोई और (लघुकथा)


शैक्षणिक काल में कभी किसी खड़ूस अध्यापक से सामना हो जाये तो कक्षा में कोई ना कोई ऐसी विचित्र घटना हो जाती है जो जीवनपर्यंत याद आती रहती है।
राधिका को भी इण्टर में पढ़ते समय की अपनी एक घटना अक्सर स्मृतिपटल पर घूम जाती है। यादों में भटकते हुए उसे ऐसा लगा जैसे कल की ही बात है, जब भौतिक विज्ञान के अध्यापक जावेद सर त्रैमासिक परीक्षा की कापियाँ दिखाने कक्षा में आये थे। बड़ा सा क्लास रूम जिसमें 60 बच्चे खचाखच भरे बैठे थे। राधिका अपने कक्षा की अकेली छात्रा थी। बाकी सभी लड़के थे। जीवविज्ञान और गणित के छात्र एक साथ एक कमरे में भौतिक विज्ञान पढ़ते थे।
कापी देखकर अधिकतर छात्रों के मुँह लटक गये थे क्योंकि 15-20 छात्रों को छोड़कर सभी छात्र फेल थे। इतने बड़े क्लास में चीं-चीं,चूं-चूं करने की हिम्मत किसी छात्र में नहीं थी। लटके चेहरों ने सर को मंद-मंद कुटिल मुस्कान बिखेरने का मौका दे दिया। ऐसे में हँसते हुए सर ही बोले," देखा, आज तुम लोग मेरे इस पेन की नोंक के नीचे कितने विवश व परेशान नजर आ रहे हो। अब अगर किसी ने मेरे सामने चिल्ल-पौ करने की हिम्मत दिखाई, तो मैं इसी पेन की नोंक से उसे रगड़कर ऐसा मरोड़ दूंगा कि वह सर उठाने के लायक भी नहीं बचेगा।"
सर दो घड़ी सांस लेने के लिए रुके तो सब बेवकूफों की तरह एक दूसरे का मुँह ताकने लगे कि सर कह क्या रहे है?उनके कहने का उद्देश्य क्या है?
तभी सर आगे बोले," कुछ समझे कि नहीं समझे तुम लोग? अब इतना तो जान ही गये होगे कि नम्बर न लुटाने के कारण ही तुम लोग हमेशा मेरी बात मानोगे, वरना मेरे पास तुम्हारे मनमानी को रोकने का कोई उपाय नहीं होगा?
तुम्हारी तरह जब मैं भी विद्यार्थी था, तब मेरे भी मन में एक ही विचार हमेशा कौंधता था कि टीचर नम्बर देने में इतना कंजूसी क्यों करते है? मैं जब टीचर बनूंगा तब नम्बरों के मामले में इतना कंजूस नहीं बनुंगा। बच्चों को ढ़ेर सारा नम्बर लुटाकर मैं उन्हें मालामाल कर दूंगा। अध्यापक बनने के बाद पहली बार त्रैमासिक परीक्षा में मैंने नम्बर लुटाकर अपने मन की आंतरिक इच्छा पूरी कर ली। उस समय मैं बहुत खुश व संतुष्ट था।
पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। तभी तो कक्षा के दो छात्र बहुत बदमाश निकल गए। एक बार मैं उनके गलत कामों से परेशान होकर उन्हें डाट रहा था। डाट का कोई असर उन पर नहीं देखकर मुझे क्रोध आ गया। मैं गुस्से से तिलमिला कर बोला यदि तुम लोग अपनी शैतानी बंद नहीं करोगे तो मैं तुम्हें फेल करके इसी क्लास में रगड़ने के लिए मजबूर कर दूंगा।  मेरे क्रोध पर ठंडा पानी तब पड़ गया, जब उनमें से एक छात्र मेरा खिल्ली उड़ाते और हाथ नचाते हुए बोला कि सर, अब आपके हाथ में कुछ नहीं है। आप अभी इतना नम्बर पहले ही लुटा चुके है कि यदि आप जीरो भी देंगे, तब भी हम आसानी से पास हो जायेंगे। उनकी खिल्ली और अपनी मजबूरी ने मुझे उस दिन बेबसी का एसास कराया। तभी तो मैं उसी दिन बदलने पर मजबूर हो गया। हमने दृढ़ निश्चय कर लिया कि अब मैं बच्चों को अपनी मुट्ठी में कैद रखूंगा। आज तुम लोग मेरी इस पेन की नोंक के नीचे मजबूर हो। अब किसी में हिम्मत हो तो शैतानी करके दिखा दे। और यदि कभी किसी नेकिया भी तो इसी पेन से रगड़ दूंगा क्योंकि यही मेरा हथियार है।"
कुछ देर बाद सर तो चुप हो गये।
पर राधिका सोचने लगी कि आज तो याद करके मुस्कुरा रही हूँ, पर उस दिन तो यही महसूस हुआ था कि,' करनी किसी की,और भुगत हम लोग रहे है अर्थात करे कोई, भरे कोई और।

मात खा गई लोमड़ी (बाल कहानी)

चंदन वन में रहने वाली लल्ली लोमड़ी बहुत चालाक थी।  वह लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए इतनी चिकनी चुपड़ी  बातें करती कि लोग उसके झाँसें में फँस जाते। चिकनी चिपुड़ी बातों के बीच में वह उनका शिकार करने की कोशिश भी करती। ऐसे समय में उसके चंगुल से जो बच जाता, वह उससे सतर्क हो जाता और अपने साथियों को भी सतर्क करता।
लल्ली लोगों की सतर्कता को समझने लगी थी। फिर भी वह हमेशा अपने लिए नये शिकार की तलाश में इधर-उधर भटकती रहती थी।
एकदिन मालू कौवा अपने पेड़ पर बैठकर अपने बच्चे को  रोटी खिला रहा था। ठीक उसी समय लल्ली मस्ती में चौकस नजरों से शिकार की तलाश में घुमती फिरती हुई  वहाँ आ गयी।
मालू को रोटी खिलाते देखकर वह बोली," मालू, तुम बहुत चालाक और बुद्धिमान हो। फिर तुम यह बेवकूफी क्यों कर रहे हो?"
"मैं कौन सी बेवकूफी कर रही हूँ, लल्ली बहन।" मालू आश्चर्यचकित हो गया। उसके काँव-काँव करके बोलते ही उसके चोंच से रोटी छूटकर नीचे जमीन पर गिर गया।
"बच्चे को अपने चोंच से खिलाकर बच्चे को आलसी बना रहे हो। वह अपना भोजन खोजकर खायेगा तभी तो आत्मनिर्भर बनेगा। चलो, हम पास के सुंदर  पार्क में सैर को चलते है और वहीं मौज-मस्ती करेंगे। तभी तुम्हारे बेटा को भोजन ढूंढ़कर खाने का मौका मिलेगा।"
यह सुनकर मालू को आश्चर्य हुआ। वह लल्ली से बोला, "अरे लल्ली बहन, मेरा बेटा अभी बहुत छोटा है। वह अपने आप कुछ खोज कर खा नहीं पायेगा।"
लल्ली बोली," तुम कहाँ अपनी पुरानी परम्परा में फँसें हो? बच्चे को जागरुक और सक्षम बनना है कि नहीं। उसको आगे बढ़ाने के लिए तुम्हें थोड़ा त्याग तो करना ही पड़ेगा। इसलिए जल्दी से नीचे आओ और बच्चे को समर्थ बनने दो।"
लल्ली की मीठी बोली में मालू फँस गया। कुछ सोचकर वह कावँ-कावँ करता हुआ बोला," तुम ठीक कह रही हो, लल्ली बहन, मैं जल्दी से आता हूँ। तुम पेड़ के नीचे बैठकर मेरा इंतजार करो। मैं बच्चे को थोड़ा समझा तो दूं, तभी वह अपना भोजन ढूँढने को तैयार होगा।"
मालू के काँव काँव करने से गिरी रोटी को उठाकर लल्ली बोली,"तुम जब तक बच्चे को समझाओं, तब तक मैं यह रोटी खा लेती हूँ।" यह कहकर मालू गिरे रोटी को उठाकर खाने लगी। 
बच्चे की रोटी को उठाकर लल्ली को खाते देखकर मालू  सतर्क हो गया। उसे समझ में आ गया कि यह लल्ली बहुत लालची और चालाक हैं, तभी यह बच्चे की गिरी रोटी उठाकर खा रही है। यह मुझे अपने जाल में फँसाना चाहती है। इससे बचकर रहना पड़ेगा। यह सोचकर मालू नीचे आया ही नहीं। वह अपने बच्चों के पास घोंसलें में ही बैठा रहा।     
लल्ली बार-बार आवाज लगाती रही पर मालू ने कोई जवाब दिया ही नहीं। मालू को अपने जाल में फँसता न देखकर लल्ली निराश होकर वँहा से चली गयी।
अब मालू सावधान हो गया। वह लल्ली को जब भी शिकार के खोज में भटकता देखता तब वह लल्ली के धूर्त स्वभाव से सबको आगाह करता। वह जोर-जोर से बोलता," कावँ- कावँ- कावँ, लल्ली से हो जाओ सावधान।" इस प्रकार वह लल्ली के आने की सूचना सबको देता। जिससे आसपास के जीव-जन्तु सावधान हो जाते। इस प्रकार जो नादान जीव-जन्तु उसके बोली को समझ नहीं  पाते थे, वहीं लल्ली के चंगुल में फँसते थे। ऐसे समय मालू बहुत दुखी हो जाता। पर उसने सबको सतर्क करने का अपना काम छोड़ा नहीं था।
मालू की सतर्कता के कारण लल्ली को मिलने वाले शिकार कम हो गये। मालू  के कारण लल्ली बहुत परेशान हो गई। अब वह लोगों को अपने चिकनी-चिपुड़ी बातों में फँसाना छोड़कर चुपके से घात लगाकर शिकार करने लगी थी।
एकदिन बेनू मेमना मैदान की हरी घास को आराम से चर रही थी। पीछे से लल्ली धात लगा कर झाडियों के बीच में  छुपी थी। पेड़ पर बैठा मालू काँव-काँव की रट लगाए जा रहा था,"कावँ-कावँ-कावँ, लल्ली से हो जाओ सावधान।"
उसके काँव-काँव का जब कोई असर बेनू पर नहीं हुआ तब वह मैदान में आकर बेनू के  सर पर चिल्लाने लगा। उसके काँव-काँव से परेशान बेनी झल्लाकर बोली," क्यों अपने बेसूरे सूर का राग मेरे सर पर बजा रहे हो। यहाँ से चले जाओ। मुझे चैन से घास चरने दो।"
"जब बचोगी, तभी तो चैन से घास चरोगी। लल्ली पीछे  घात लगाकर बैठी है। मैं तो चला। अब अपनी जान बचाओ।" यह कहकर मालू जाने लगा तब बेनू को झाड़ियों में आहट सुनाई पड़ी। वह घबड़ाकर जोर से चिल्लाने  लगी," मुझे छोड़कर मत जाओ मालू भैया। मै आपकी बात समझ नहीं पायी थी इसलिए ऐसा बोल दी। मुझे माफ कर दो।" मालू रूक गया। वह नन्हें बेनी को अकेला छोड़ना नहीं चाहता था।
मालू को रूकता देखकर लल्ली घबड़ा गयी। वह झाड़ियों से निकलकर बेनी को झपटने वाली थी तभी मालू पीछे से अपनी चोंच उसके पीठ में गड़ा कर उड़ गया। लल्ली तिलमिला कर पीछे मुड़ी तब तक मालू घात लगाकर बार-बार उसे चोंच से चोट पॅहुचाने लगा था। मालू के आक्रामक रुख से लल्लीे घबड़ा कर उसे पकड़ने की कोशिश करती। लेकिन मालू के सतर्कता के आगे लल्ली विफल हो गई जंगल में भाग गयी। बेनू भी दौड़कर भागने लगी। उसी समय उसे उसकी माँ मिल गयी। बेनू की बातें  सुनकर  उसकी माँ बोली," आज तुम मालू के कारण बच गयी। पहले मालू अंकल को धन्यवाद बोलो।"
"माँ, मैंने मालू अंकल की बातें न सुनकर बहुत  बड़ी  गलती की है। मुझे इस बात की सजा मिल ही जाती, यदि मालू अंकल लल्ली पर हमला नहीं करते।" बेनू अपनी गलती पर पछताते हुए बोली।
बेनू की माँ बेनू को प्यार करते हुए बोली," बेटा, कभी दूसरें की बातों को सुनने और समझने में विलम्ब नहीं करना चाहिए। हरपल सतर्क होकर अपना काम करो। इसलिए  दूसरों की बातों को पहले सुनों और फिर उस पर अमल करो।" 
"हाँ माँ, आपकी बातें मैं समझ गयी। मालू अंकल, मुझे   माफ कर दीजिये। अब ऐसी गलती नहीं होगी।"
'मात खा गई, लल्ली' इस खुशी को मालू काँव-काँव करके दिखा रहा था। थोड़ी देर बाद मालू बोला," ठीक है बेनू। पर आगे से सदैव सावधान रहना। अब अंधेरा घिरने वाली है। इसलिए सतर्कता से तुम लोग घर जाओ। कल फिर  मिलेंगे।" यह कहकर मालू उड़ गया। बेनू की माँ  बेनू को समझाते हुए घर की ओर चली गयी।

कुरकुरे-चाकलेट गया (लघुकथा)

बच्चे चिप्स-कुरकुरे-टाफी के बहुत दिवाने होते है। यहीं कारण है कि उन्हें रिश्तों में वही संबंध ज्यादा प्यारा होता है, जो उनको ये चीजें उपलब्ध कराता है। 
मोहित-मोहिनी को अपने बाबा प्रेम प्रकाश जी से लगाव इसलिए ज्यादा था, क्योंकि बाबा बिना किसी के फरमाइश के ही ये चीजें घर पर लाकर बच्चों को खुश कर देते थे। दादी अंजली के पास इन चीजों के लिए बच्चों की दाल नहीं गलती थी, इसलिए इन चीजों के उम्मीद में कोई दादी के पास फटकता भी नहीं था।
एक बार प्रेम प्रकाश जी और अंजली बेटा मयूर के पास गुडगांव ज्यादा दिन टिक गये। मौज-मस्ती के बीच बच्चों की इच्छाएं भी पूरी हो रही थी। इसलिए सभी खुश और मस्त थे।
कुछ दिनों बाद अंजली को छोड़कर प्रेम प्रकाश जी लखनऊ वापस जाने लगे। बच्चों ने बाबा का पैर छुआ। बाबा आगे बढ़े। तभी नन्हा मोहित, दीदी मोहिनी के कान में फुसफुसाया," दीदी, अब तो कुरकुरे-चाकलेट गया।" यह सुनते ही मोहिनी चौंककर चारों तरफ इस भय से देखने लगी कि कहीं किसी ने सुन तो नहीं लिया है। बच्चों का दिमाग कितना सतर्क व तेज होता है...यह मोहित के फुसफुसाने और मोहिनी के चौंककर देखने से पता चलता है।
कहने को तो मोहित ने धीरे से फुसफुसाया था, पर उसकी कही बातें सबके कानों से टकरा गई । बातों का मर्म बहुत दिलचस्प व अनोखा था और सबके दिल को छू भी गया। इसलिए बाबा के यात्रा पर जाने के विदा बेला पर भी सब लोग जोर से हँसने लगे।
आगे बढ़ते बाबा भी पल भर के लिए ठिठक कर बच्चों को प्यार से देखकर मुस्कुरा दिए। और आगे बढ़ गये। तब दादी हँसकर बच्चों से बोली," अच्छा, तो तुम लोगों को बाबा से नहीं, बल्कि बाबा के लाये कुरकुरे-चाकलेट से प्यार था। बहुत चालू हो। अब मैं समझ गयी तुम लोगों के मतलब को।"
मोहित बोला," दादी, मेरे कहने का मतलब ये नहीं था। मैं आप दोनों को बहुत प्यार करता हूँ।" यह कहकर वह मोहिनी के पीछे छिपने का असफल प्रयास करने लगा तो अंजली उसे पकड़कर अपने गोद में समेट ली।

बुढ़ापे की लाठी (लघुकथा)

नींद से जागकर रामलाल जब बिस्तर पर बैठे तब वे अपनी लाठी टटोलने के लगे। जब उन्हें अपनी लाठी नहीं मिली तब वह जोर से आवाज लगाये," अरे सुगना बेटा, सुन तुमने मेरी लाठी कहाँ रख दी। मिल नहीं रहा है।" बाबा की इतनी आवाज सुनकर सुगना दौड़ा हुआ आया, बोला,"बाबा, लाठी की क्या जरुरत है। मैं हूँ ना। मुझे लाठी समझकर पकड़ लो, फिर जहाँ चलना है चलो।"
"अरे, तुम्हें लाठी क्यों समझु? तुम मेरे लाठी ही तो हो।" यह कहकर रामलाल सुगना की सहायता से उठे और सुगना के कंधें पर हाथ रखकर चलने को तत्पर हुए कि तभी सुगना की छोटी बहन चुनिया जो सुगना के पीछे ही कमरे में आ गई थी, वह आगे बढ़कर बाबा का दूसरा हाथ पकड़ ली। रामलाल बोले चलो, बाहर बैठा दो। बाहर के ठंड़ी हवा का मजा जरा मैं भी ले लू। और थोड़ा टहल भी लू। शरीर बैठे-बैठे अकड़ गया है।"
रामलाल को बाहर कुर्सी पर बैठाकर दोनों बच्चे खेलने लगे। दोनों बच्चों के कारण रामलाल बहुत संतुष्ट थे। इस बुढ़ापे में भी वे अधिकतर बिना लाठी के ही चलते थे, क्योंकि जब भी उन्हें विशेष सहारा की जरूरत पड़ती दोनों बच्चे हाजिर हो जाते।
अब कोरोना काल में समय बिलकुल बदल गया है। सोशल डिस्टेंडिंग का जब से फार्मुला लागू हुआ है तब से रामलाल का जीना दुश्वार हो गया। जब भी उन्हें सहारा की जरुरत पड़ती और वे सुगना को आवाज लगाते तब सुगना दौड़कर तो आता था, पर दरवाजे पर ही ठिठक कर अंदर झांकता और बाबा से बोलता," बाबा, आपकी लाठी बिस्तर के सिरहाने रखी है। आप उसी का सहारा लेकर बाहर आ जाओ।"
एकदिन रामलाल को बर्दाश्त नहीं हुआ तो वे जोर से चिल्ला पड़े,"अरे, तुम लोग अंदर क्यों नहीं आ रहे हो? मुझे पकड़ो या न पकड़ो पर मेरी लाठी तो पकड़ा दो। जाने कहाँ रख देते हो, तुम दोनों।"
सुगना अपने मुँह पर अंगुली रखकर चुनिया को न बोलने का संकेत देकर दबे पांव अंदर आया और बाबा को लाठी पकड़ाते हुए धीरे से फुसफुसाया, बोला, "बाबा, आपकी तबीयत ठीक नहीं रहती है ना। हमेशा छींकते और खाँसतें रहते है, इसीलिए माँ ने आपसे दूर रहने को बोला है। अभी माँ नहीं है, इसलिए मैं आपको पँहुचा देता हूँ, लेकिन आप अपनी लाठी अपने पास ही रखियेगा ताकि माँ को पता न चले कि मैंनें आपको पँहुचाया है।"
रामलाल को काठ मार गया। बाहर जाने की अपेक्षा वे वहीं बिस्तर पर धम्म से बैठ गये। 
बाबा के संबल बनने वाले बच्चे आज कोरोना काल में बाबा से दूर होते जा रहे थे। ये रामलाल के लिए बहुत कष्टकारी था। 
लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। ऑफिस से लौटने वाले रामलाल के बेटा जोगेंद्र ने सुगना की बातें दरवाजे पर खड़े होने के कारण सुन लिया था। चाय पीने के बाद वे सुगना व चुनिया के साथ उनकी माँ शीला को अपने पास बुलाकर समझाये, बोले," बेटा, सोशल डिस्टेंडिंग का मतलब ये नहीं होता है कि रिश्ते की नींव ही खोद दो। बाबा जैसे आज है, वैसे ही कल भी थे। तुम्हें या चुनिया को क्या कभी कोई बीमारी उनसे हुआ? नहीं ना। तो फिर आज ये नयापन का सनक क्यों सवार है तुम लोगों पर? हमें तो कोरोना बीमारी से बचने के लिए उन लोगों से दूर रहना है जो बाहर से आ रहे है। बाहर से आने वाले  कोरोना के कैरियर बन सकते है, इसलिए हमें उनसे दूर रह कर कोरोना बीमारी बनाने वाले चेन को तोड़ना है, ना कि आपसी रिश्ते को ही तोड़-मरोड़ कर रख देना है। आपसी स्नेह, सम्बल और सहयोग का रिश्ता कायम रखकर पारिवारिक सुख का सम्मलित रुप से उपभोग करो और एक दूसरे का साथ निभाओ। इस संकट काल में पारिवारिक एकता को कायम रखकर ही पारिवारिक खुशियाँ बटोरी जा सकती है। इसलिए ऐसे संबन्धों को जीवंत रखो।"
दूसरे कमरे में बैठे रामलाल के आँखों से संतुष्टी व खुशी के आँसू टपकने लगे। वे बुदबुदाये,' जिस घर में ऐसा समझदार बेटा होगा, वहाँ के बुजुर्गो को किसी भी बात की चिंता नहीं करना चाहिए।'
उसी समय सुगना दौड़ता हुआ उनके पास आया, बोला," बाबा चलिए, आपको थोड़ी देर बाहर ठंड़ी हवा में बैठा दे।"
" नहीं बेटा, आज देर हो गया है। कल चलेंगे..बाहर बैठने। जरा देखना, मेरी लाठी कहाँ है?"
"बाबा, अब लाठी का क्या काम है? जब जरुरत होगी आवाज लगाइयेगा, मैं आ जाऊंगा। मैं हूँ ना आपका प्यारा लाठी...आपके पास।" इतना बोलकर सुगना उछलते-कूदते  हुए खेलने चला गया तो रामलाल आराम करने लगे। उनके चेहरे पर संतोष व सुकून की छाया मड़रा रही थी।

समझदारी का प्रभाव (लघुकथा)

मोहिनी अपने पति दीपांश और सास शशि से किसी बात पर खुन्नस खा के बैठी थी। उसका गुस्सा मन ही मन में उबाल के चरम सीमा पर था। वह उबलकर बिखरना चाह रही थी। थोड़ी देर में दीपांश को सामने पाकर वह उबल ही पड़ी। दोनों में  बीती बातों को लेकर तीखी नोंकझोंक और बहस होने लगी। नोंकझोंक के कर्कश अस्फुट स्वर दूसरे कमरे में बैठी शशि के कानों से भी टकरा रहा था, पर वह यह सोचकर खामोश सी बैठी थी कि पति-पत्नी का आंतरिक रगड़ा है अपने आप सुलझ जायेगा।
थोड़ी देर बाद दीपांश उठकर शशि के कमरे में आ गया, तो मोहनी भी कमरे में आ गई। तू-तू,मैं-मैं की बकवास भरी बरसात के छींटे जो अभी तक दूर से शशि पर पड़ रहा था, वह अब शशि के कमरे में बरसने और उसे भिगोने लगा। दीपांश की खामोशी से खुन्नस खाकर मोहिनी ने अपना रुख शशि की तरफ कर लिया। 
दीपांश नहीं चाहता था कि माँ इन बेतुकी बातों में फँसे। वह तैश में मोहिनी को चुप कराने लगा, तब शशि मुखरित होकर दीपांश को चुप कराते हुए बोली," तुम चुप रहो। मुझे मोहिनी के मन का गुबार सुनने दो।" फिर वह मोहिनी से बोली," हाँ बोलो मोहिनी, तुम क्या कह रही थी? तुम्हारी बातें सुनने को अब मैं तैयार हूँ।"
मोहिनी बकबक करके अपने मन का गुबार निकालने लगी। शशि जानती थी कि लीव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले बेटा और उसकी सहयोगी मोहिनी को एक सम्मानजनक व्यवस्थित वैवाहिक व सुंदर पारिवारिक जीवन देने के लिए उन्हें कितने पापड़ बेलने पड़े थे। पर ऐसी बातों का कोई अंत नहीं होता है। ऐसी बातों को जिसमें एक दूसरे की जिम्मेदारियों को समझने या दोषारोपण लगाने की गुत्थी को जितना सुलझाने की कोशिश करो...वह उतनी ही उलझती है। इसलिए शशि सीधी व सरल भाषा में बोली," बस, इतनी सी ही बात थी? अरे, मैंने तो तुम लोगो के लिए कभी कुछ किया ही नहीं और न कभी कुछ भविष्य में करने का इरादा ही है। मैंने तो जो कुछ भी किया या करुंगी...वह अपनी खुशी या अपनी संतुष्टि के लिए था। अब तुम्हारी जिंदगी व्यवस्थित है और तुम  दोनों की अपनी है। इसलिए इसे अपने तरीका से जिओ...मौज करो या कलह में व्यतीत करो। अब यह तुम दोनों समझना है। मैं तो अपने पोता व पोती में व्यस्त व मस्त हूँ, वैसे तुम्हें आज इस समय की कोई परेशानी है, तो वह बताओ। मैं उसका निराकरण अभी कर दूंगी ।"
यह सुनकर मोहिनी चुप हो गई, क्योंकि इसका प्रत्युत्तर उसके पास कुछ था ही नहीं। वह बोली," ऐसी बात है, तब आपसे शिकायत करने का कोई उद्देश्य बनता ही नहीं है।" यह कहकर मोहिनी शांत मन से अपने कमरे में चली गई। घंटों की बकवास शशि की समझदारी की वजह से पल भर में ही सुलझकर छूमंतर हो गई।
थोड़ी देर बाद मोहिनी फिर शशि के कमरे में आई और शशि से बोली," मम्मी जी, इण्डिया गेट घूमने का मन कर रहा है, चलेंगी।"
शशि ने स्वीकृति दे दी। इसके बाद शशि बेटा-बहू और उनके दोनों बच्चों के साथ तैयार हो कर इण्डिया गेट घुमने चली गई। और फिर पूरी शाम मस्ती मारकर वोटिंग और खा पीकर खुशनुमा माहौल में पूरा परिवार वापस आ गया।
शशि की समझदारी की वजह से लग ही नहीं रहा था कि घूमने जाने से पहले यहाँ बातों का कोई बवंडर भी उठा था।