बेबाकी (लघुकथा)

"साहब बीस रुपये में ले लीजिए। बड़ी कृपा होगी।" शीशे के सामने दस साल का लड़का हाथ में प्लास्टिक का गुलदस्ता लेकर रिरियाते हुए बोला।
कार में बैठे साहब को गुस्सा आ गया। वे मुहँ को फेर करके दूसरी तरफ देखने लगे। उनकी इस बेरुखी पर भी वह आगे नहीं बढ़ा, तब साहब पलटे, फिर गुस्से से बड़बड़ाते हुए बोले," क्यों दस रुपये की चीज को बीस की बताकर लूटने चले हो? भागो यहाँ से, नहीं तो अभी पुलिस को बुलाता हूँ।"
"क्यों साहब, लेना हो तो लो, वरना गाड़ी आगे बढ़ाओ। पुलिस का नाम लेकर हमें डराते हो। अरे हमारे ही बीस-पच्चीस से उनकी शाम रंगीन होती है। वह हमें क्यों भगायेगा?" 
शान से बुदबुदाते और सच का आईना दिखाता हुआ वह लड़का गुलदस्ता लेकर आगे बढ़ कर दूसरे कार के शीशे के सामने खड़ा हो गया। गाड़ी में बैठे साहब उसकी बेबाकी पर हैरान होते हुए उसके मुंह को निहारने लगे।

रोमांचकारी यात्रा पीलीभीत के शारदा डैम की (यायावरी)

यात्रा --- 26.06.2021 - 28.06.2021.

मन में ताजगी और उमंग भरने के लिए जरूरी नहीं है कि जब भी हम कहीं घुमने का प्रोग्राम बनाये, तो हमें लम्बी छुट्टी की दरकार हो और  हमारा दर्शनीय स्थल कोई प्रसिद्ध नदी, पर्वत, सागर या उसका कोई समीपवर्ती इलाका हो। 
कभी-कभी छोटी छुट्टी में छोटा अनजाना शहर भी बड़ी खुशी और ढ़ेर सारी जानकारियां देकर हमें उमंग और उत्साह से लवरेज कर देता है। पीलीभीत हमारे लिए अनजाना शहर था। कोरोनाकाल की बीमारी झेलने के बाद मन को ऐसे ही किसी खूबसूरत वातावरण की तलाश थी, जो मन की हताशा को दूर करके जीवन्तता का रंग भरके उम्मीदों की चमक से मन को जगमगा दे। पीलीभीत का वीकेंड यात्रा, इस उम्मीद पर खरा उतरा।

वीकेंड पर पीलीभीत जाने का प्रोग्राम बना, तो हमने सारी तैयारी रात में ही कर ली, ताकि सुबह 6 बजे ही हम लोग अपने घर से टैक्सी द्वारा निकल सकें। गर्मी अपने चरम पर था, पर रास्ते में दिखने वाले नजारों और बच्चों की चुहुलबाजियों में छह पारिवारिक लोगों का सफर आसानी से कट गया। बीच में जब उछल कूद मचाने वाला सड़क मिला, तो बच्चे हो-हल्ला मचाकर यात्रा में रोमांच भर दिए। पीलीभीत पँहुचते पहुँचते हमें पुरनपुर के आसपास के खेतों में धान की रोपाई करते हुए जो ग्रामीण महिलाएं दिख रही थी...वह हमें बहुत मनमोहक और लुभावने लग रहे थे। खेतों का यह दृश्य बहुत लुभावना था, जो जगह-जगह के खेतों में दिख रहा था। पीलीभीत के मुख्य शहर में तो हम गये ही नहीं। पर शहर आने से पहले ही हमारी कार दाहिने तरफ मुड़ गई और हम रॉयल किंगडम रिजार्ट पहुंच गए।

नहर के पानी के प्रेशर फ्लो की सुंदरता-----
रिजार्ट शानदार था। खा-पीकर हम आराम किए। चार बजे हम उठकर तैयार हो गए। हम माधो टॉड़ा रोड पर निकल गये। रास्ते में सड़क के साथ ही साथ समानांतर में नहर का पानी भी बह रहा था। हम पानी की लहरों को देखकर उत्साहित हो रहे थे, तभी हमें लहरें दो भागों में बटी बटी हुई दिखी, तो हम कार को रुकवाकर कार से उतर गये और नहर के किनारे खड़े होकर लहरों के इस अद्भुत दृश्य का नजारा देखने लगे। नहर पानी से लबालब भरा था। 


शांत गति से एक लय में बहने वाला पानी अचानक एक सीधे में किसी व्यवस्था के कारण गिरते ही पूरा उबलते हुए पानी की तरह बुलबुले मारते हुए उछलने लगता था। नहर तो बहुत देखने को मिला था, पर लहरों का इस तरह सुंदर और खुबसूरत तरीके से दो अलग-अलग रुपों में बँटना पहली बार दिखा। पानी की उछाल मारती लहरें समुंद्र की याद दिला रही थी। 



हम काफी देर तक लहरों के शांत और उछाल मारते लहरों का आनंद एक साथ लेते रहे। हमें बहुत मजा आया। नहर के समानांतर चलते हुए कार से हमें यह दृश्य हर थोड़ी-थोड़ी दूर पर कई बार देखने को मिला। नहर के इस पार से उस पार जाने के लिए कई लाल रंग का खूबसूरत पुलिया भी था, जहाँ आने जाने वालों के अतिरिक्त आनंद लेते हुए लोगों का भीड़ भी दिखा। अंधेरा होने पर हम रिजार्ट लौट आये।

गोमती नदी का उद्गम स्थल-----
दूसरे दिन हम लोग नाश्ता के बाद गोमती नदी के उद्गम स्थान को देखने के लिए निकल पड़े। जिस गोमती नदी के किनारे हमारा शहर लखनऊ बसा है, उसी गोमती नदी के उद्गम स्थल को देखेंगे, यह कल्पना से परे था। गोमती नदी का उद्गम माधौटांडा (पीलीभीत) के गोमत ताल से होता है और यह शाहजहांपुर, लखीमपुर, सीतापुर, लखनऊ, बाराबंकी, सुल्तानपुर होते हुए जौनपुर में गंगा नदी में  जाकर मिल जाती है। लेकिन करीब 900 किमी की इस नदी के जन्म स्थान  (पीलीभीत) में ही इसे खोजना कठिन हो जाता है, क्योंकि  यह नदी अपने जन्म स्थान पर ही मृतप्राय होकर गायब हो रही है।
हम यहां गोमत ताल में वोटिंग का मजा लिए। वोटिंग के मध्य कछुआ, बत्तखों का झुंड और नन्हीं मछलियों के तैराकी का सुख भोगे। इसके बाद हम मंदिरों में ईश देवीयों-देवताओं का दर्शन किए और पेड़ों से टपकने वाले मीठे जामुनों का मजा और रसास्वादन वहां के पेड़ पर चढ़े बच्चों की सहायता से किए । लौटते समय नहर के एक पुलिया के किनारे बने सुंदर सजे हुए साफसुथरे ढ़ाबा के किनारे बैठकर चाय पीने और गर्मागर्म पकौड़े खाने का और बहते पानी को देखने और उसके कलकल आवाज की मधुरता सुनने का आनंद  उल्लसित मन से भरपूर लिए। रिजार्ट लौटकर भी हम कुछ देर उन्हीं आनंद में ड़ूबे हुए आपस में चर्चा करते रहे। उसके बाद  खाना खाकर आराम कर लिए, क्योंकि शाम को खुली जीप से बफर जोन ऑफ चुका फॉरेस्ट जाना था।

जंगल सफारी की यात्रा------
शाम को हम लोग खुले जीप पर बैठकर माधोटांडा रोड़ होते हुए नहर के लहराते पानी के समानांतर बने सड़क पर आगे बढ़ते रहे, फिर एक पुलिया पार करके फिर नहर के समानांतर ही आगे बढ़ते हुए आगे बढ़ते रहे। यह सड़क हमे एक ऐसे स्थान पर पहुंचा दिया जहाँ नहर चार भागों में बंटा था। नहर के पानी को रोकना और छोड़ना यहां के सिंचाई विभाग का काम था। तीन भाग तो स्पष्ट दिख रहा था, पर एक भाग सुखा था। यहाँ की खूबसूरती देखते बन रही थी। सबसे मजेदार यहाँ के लोगों की निर्भिकता लगी। बहुत से लड़के पुलिया पर चढ़ते,चलते और फिर छपाक से नदी में कूदकर डूबते-उतराते और फिर तैरने लगते। पानी की लहरें उफान पर थी। ऐसे विकराल व वीभत्स रूप में लहराते पानी में निर्भिकतापूर्वक पानी में कूदना और तैरना अद्भुत था। यह दृश्य कई जगह बड़ी संख्या में नहाते हुए लड़कों में दिखा। हम तो भयभीत होते हुए भी देखने का़ सुख त्याग नहीं पा रहे थे, इसलिए ऐसे रोमांचकारी पल को भोगते हुए आनंदित हो रहे थे, क्योंकि ऐसे रोमांकारी अनुभव से वंचित होना कोई नहीं चाहेगा। शायद यहां के युवा और बच्चे ऐसे वातावरण में रहते हुए ही ऐसा करने के लिए अभ्यस्त हो चुके थे। 
इसके बाद हमारी जीप बफर जोन ऑफ चुका जंगल की तरफ बढ़ने लगा। सूर्यास्त की लालिमा का समय, एक तरफ जंगल और दूसरी तरफ नहर का बहता पानी...तीनों के संगम स्थल को एक साथ निहारने का पल काफी रोमांचकारी था। जंगल के अधिकांश भाग में जाने का इजाजत नहीं था।  जंगल का जितना भाग हमें दिखा, उसमें हम बंदर और हिरण का झुंड और उनके धड़ामचौकड़ी का मजा ही ले पाये। 


शारदा डैम-----
आगे जाकर शारदा डैम का पानी अपने विशालता और फैलाव में काफी दूर तक नजर आया। पानी का दृश्य बहुत विहंगम और अद्भुत था। डैम के किनारे-किनारे आगे बढ़ते हुए हम उस स्थान पर पहुंच गए, जहाँ सड़क के नीचे ढ़लान के बाद  बसा हुआ बहुत ही खुबसूरत, साफ सुथड़ा और हरियाली से भरा हुआ गांव मन को मोहने के लिए बहुत था। भले ही यह गांव अपने कठिनाइयों से भरा और जुझता हुआ हो, पर हमारे जैसे शहर के भीड़भरे वातावरण में बसने वालों के लिए बहुत सुकून भरा और मनमोहने वाला लगा। यहां से आगे जाने पर एक तरफ उत्तराखंड का बार्डर था तो दूसरी तरफ नेपाल का बार्डर वाली नदी का आभास हो रहा था।

रोमांचित मन में यादों को संजोये हुए हम वापस उन्हीं राहों पर लौटने लगे। जंगल में सड़क के किनारे बने एक झोपड़ी में ड्राइवर ने बताया कि यहां सोनपापड़ी बनता है, जो बहुत ही स्वादिष्ट और प्रसिद्ध है। हम लोग भी सोनपापड़ी खरीदे और आगे बढ़ गये। लौटते समय नहर वाले ढ़ाबा पर एक बार फिर रुककर चाय पिएं, लहरों का मजा लिए और उछलकूद के बाद फिर लौटने लगे। लौटते समय पेड़ों और झाड़ियों के बीच जुगनू चमचमा रहे थे, पीछे देखने पर दोनों तरफ के पेड़ों की टहनियों और पत्तियों से बना गुफानुमा आकृति और उपर आकाश में तारें की झुंड चमकते हुए इतने करीब लग रहे थे कि हम इन्हीं मनमोहक नजारों में डूबते-उतराते और चहकते हुए और  एक दूसरे को रोमांचित करते हुए अपने रिजार्ट लौट आये। यात्रा को यादगार बनाने के लिए हमने फोटोग्राफी और वीडियों भी खूब बनाये, ताकि इसकी यादें जब स्मृतिपटल से ओझल होने लगे, तो हम इसे देखकर इस रोमांचकारी क्षणों की पुनरावृत्ति फिर से कर लें।
इस यात्रा ने कोविड़ भरे माहौल के जीवन में जीवंतता व खुशियों का रंग भर दिया। हम जब-जब इस यात्रा की यादों को स्मृतिपटल पर लाकर जीवंत करेंगे.. उस दिन कोरोना की सारे बोझिल पीड़ा को कुछ क्षणों के लिए भूलकर जीवंत होते नजर आयेंगे।




पन्ना टाइगर रिजर्व (यायावरी)

खतरों के बीच का रोमांचकारी पल-पन्ना टाइगर रिजर्व
(पन्ना राष्ट्रीय उद्यान मध्यप्रदेश के पन्ना और छतरपुर जिलों की सीमा पर स्थित है इस पार्क का क्षेत्रफल 542.67 वर्ग किलोमीटर है। यहाँ प्रमुख वनस्पतियों में सागौन, बांस, बोसवेलिया आदि शामिल है। इस उद्यान में कई दुर्लभ प्रजातियों और लुफ्तप्राय प्रजातियों को देखा जा सकता है। यहाँ पाये जाने वाले जानवरों में बाघ, तेंदुआ, चीतल, चिंकारा, नीलगाय, सांभर और भालू है।)

एडवेंचर से पूर्ण था हमारा सफर
हम खजुराहो घूमने गये थे। खजुराहो भ्रमण के पश्चात हमें पता चला कि यहाँ से 25 किमी दूर ही पन्ना नेशनल पार्क है,जो मध्य प्रदेश की सबसे प्रमुख वन्यजीव अभयारण्यों में से एक है। हम पन्ना नेशनल पार्क की हरी-भरी घाटियों, दुर्गम झरनों और प्राकृतिक पार्क की सुंदरता देखने की उत्सुकता को दबा नहीं पाये। अतः हमारा अगले दिन का प्रोग्राम पन्ना नेशनल पार्क ही  था। पन्ना के वन्यजीवों को बहुत करीब से देखने और समझने के साथ ही यहाँ के खूबसूरत परिदृश्य में फोटोग्राफी और वीडियो बनाने की कल्पना में हम पूरी रात गोते लगाते रहे। 

खुले सफारी का मजा
खजुराहो के कलात्मक कलाकृतियों का अवलोकन करने के पश्चात तीसरे दिन सूर्योदय से पूर्व ही हम अपने होटल से सफारी से निकल पड़े पन्ना टाइगर रिजर्व घूमने के लिए। 
सुबह के सुहाने मौसम में खजुराहो शहर से दूर गाँव की गलियों से होती हुई तेज रफ्तार में दौड़ती सफारी हमें अभी से आनन्द की अनुभूति कराने लगा। खुली जीप के तेज रफ्तार में जब हम डरने लगे, तब हमने ड्राइवर भैया से रफ्तार धीमी करने का अनुरोध किए, तब वे बोले," टाइगर सड़क पर आने वाला है, यदि समय पर नहीं पँहुचे, तो हम उसे देख नहीं पायेंगे। फिर आपकी यात्रा उतनी जानदार नहीं रह जाएगी, जितनी की उम्मीद लगाकर आप यहाँ तक आये है। फिर साहब हमारी मेहनत भी बेकार साबित हो जायेगी।"
ड्राइवर के तर्क भरी जिंदादिली के हम कायल होकर खामोश हो गये। जब दिखाने वाला ही इतना उत्साहित था, तो हमारी जिज्ञासा भी चरम सीमा पर पँहुचने लगी। अब हम लोग सफर के साथ ही साथ गाँव के सुहाने अनुभवों को साझा करते हुए आनन्दित होते रहे। 

सामने से टाइगर का दर्शन
पन्ना टाइगर रिजर्व के गेट के बाहर आई डी चेक करवाने के पश्चात हमारी जीप फाटक के अंदर धड़धड़ाती हुई 50 मीटर की दूरी पर जाकर एक जगह खड़ी हो गई। आगे तीन-चार जीप और खड़ी थी। 15 मिनट इंतजार करने के पश्चात आगे वाली चारो जीप आगे बढ़ गई। हमारे ड्राइवर साहब आगे बढ़ने को तैयार नहीं थे। अभी मुस्किल से पांच मिनट ही हुए होंगे कि आगे जाने वाली जीपें धड़धड़ाती हुई वापस आई और बीच का कुछ जगह छोड़कर खड़ी हो गई। ड्राइवर गाड़ी को और आगे बढ़ाने लगा तो हम सब एक साथ चिल्ला पड़े," हमें इससे आगे नहीं जाना है, क्योंकि हम कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहते है।" गाइड भी रुकने को बोले, तब ड्राइवर भैया रुक गये। अब गाइड ने हमें न बोलने की निर्देश दिया, तो हम चुप हो गये। भयमिश्रित उमंग,उत्साह से लबरेज़ होकर हम लोग उस ओर टकटकी लगाये एकटक निहारने लगे, जिधर से टाइगर के आने की उम्मीद थी। हमारी इंतजारी रंग लायी। थोड़ी ही देर में झाड़ियों में झूमता, बल खाता, इठलाता धीमी गति से चलता टाइगर हमारे जीप के सामने आकर खड़ा हो गया। डर लगने के बावजूद भी हम उसे अपलक निहारते रहे। एक क्षण रुककर वह आगे के पेड़ के पास जाकर सू-सू किया, फिर कुछ सोचता हुआ एकपल को रुक गया, जैसे वह आगे के सफर का अंदाजा लगा रहा था कि किधर जाने पर वह सुरक्षित है। हम उससे डर रहे थे, तो वह हमें भी छेड़ना नहीं चाहता था। जानवरों को जबतक छेड़ों नहीं, तब तक वे भी हिंसक नहीं बनते है। उनके इसी सूक्षबूझ के कारण हम इतने करीब से एक खूंखार जानवर के खुले रुप का दर्शन आसानी से कर लिए, वरना वर्षों से बनी उसके डरावने रुप के अवधारणा को हम तोड़ नहीं पाते। इसके बाद वह धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए दाहिने तरफ के पगडंडियों पर आगे बढ़ गया। हम निर्विकार रुप से उसके मतवाली चाल का आनंद लेते रहे। कुछ लोग फोटोग्राफी में तो कुछ लोग वीडियो बनाने में मस्त थे। हमारे ड्राइवर भैया सबसे आगे थे और वे भी वीडियो बनाने में मस्त थे। टाइगर के जाने के बाद वे उत्साहित होकर बोले," देखा आपने, यदि टाइगर का दर्शन नहीं होता, तो हमें अपनी यात्रा अच्छी नहीं लगती।" ड्राइवर भैया का उत्साह हमारी उत्सुकता में चार चांद लगा रहा था। टाइगर के दर्शन से हमारे सफर की शुरुआत अच्छी हो गई। 
दुर्लभ प्रजाति के पशु-पक्षियों का दर्शन
अब हम रास्ते में पड़ने वाले पशु-पक्षियों का आनन्द उठाते रहे। रास्ते में सांभर खड़ा होकर हमें यूं आश्चर्यमिश्रित नजरों से एकटक ऐसे घूर रहा था, जैसे हम उसे देखने नहीं, बल्कि वह हमें देखने आया था। हमने उसका फोटो खिंच लिया।

नदी के किनारे का लुफ्त
नदी के किनारे पत्थरों का टिला था। यहाँ उँचा एक मचान भी बना था। इस मचान पर चढ़कर दूर तक के नजारों का अवलोकन किया जा सकता था। बच्चे उपर चढ़कर खूब मजा किए। हम लोग नदी के किनारे बैठकर नाश्ता किए। होटल से ढ़ेर सारी खाने की सामग्री लाये थे। थोड़ी दूर अलग हटकर ड्राइवर और गाइड ने भी खाने में साथ निभाया। फिर हम लोगों ने विभिन्न स्थानों से, विभिन्न पोजों में फोटो खिंचवाकर अपनी यात्रा को सुरक्षित कैमरे में कैद कर लिए। क्योंकि यात्रा पूरी होने पर यादगार लम्हों का अवलोकन फोटोज में करने पर बहुत मजा आता है।

वापसी का दौर
वापसी का दौर भी सुहाना था। धूप थी, पर उसमें वह तेजी नहीं थी कि हमें बर्दाश्त न हो। एक ओर जंगल के उबड़खाबड़ कच्चे रास्ते, तो दूसरी तरफ दूर बहती हुई केन नदी। ढ़ेर सारे आँवले पेड़ के नीचे बिखरे पड़े थे।

पाण्डव फॉल का मनमोहक नजारा
पन्ना नेशनल पार्क से निकलने पर हमारे पास पर्याप्त समय था। ड्राइवर भैया से जानकारी लेने के बाद हम पांडव वाटर फॉल घूमने के लिए निकल पड़े। पांडव फॉल टाइगर रिजर्व से केवल ऑठ किमी दूर था। लगभग 20 मिनट में हम वहाँ पँहुच गये। करीब 300 सीढ़ियां उतरने के बाद ही सामने वॉटरफॉल था। वॉटर फॉल की ठंडक बहुत राहत देने वाली थी। गाइड ने बताया कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय यहाँ भी बिताया था। प्राचीन पत्थरों से बनी गुफाएं इस बात की सत्यता को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त थी। गाइड ने हमें यह भी बताया कि यहाँ का पानी औषधीय गुणों से पूर्ण है, जो लैब टेस्ट के मानकों पर भी खरा उतरता है। पत्थरों से गिरती पानी की ठंडी बूंदें तन-मन को शीतलता से सराबोर करके सुधबुध खोने के लिए पर्याप्त थी। सबने खूब मजे किए। शाम को हम वापस अपने होटल आने के लिए तैयार हो गए।

कैसे पँहुचे और कहाँ रुके
यह जंगल खजुराहो से 25 किमी दूर है। इसलिए खजुराहो यहाँ के लिए नजदीकी हवाई अड्डा और रेलवे स्टेशन है। ठहरने के लिए पन्ना नेशनल पार्क के समीप ही विकल्प मिल जायेंगे, जिसमें मध्य प्रदेश पर्यटक विभाग के होटल भी शामिल है। वैसे सही रुप में पर्यटन का मजा लेना हो तो खजुराहो के होटल में रुककर खजुराहो और पन्ना के नेशनल पार्क का मजा एक साथ ले सकते है, बशर्ते आपके पास दोनों जगह घूमने का पर्याप्त समय हो। 

खजुराहो की घुमक्कड़ी (यायावरी)

खजुराहो की घुमक्कड़ी (यायावरी)

----------------------- (बादलों के झुरमुट आँखमिचौलियों के बीच बसे पहाड़ों की अट्टालिकाओं और समुंद्र की उछाल मारती लहरों वाली प्राकृतिक संपदाओं से दूर अचानक कलाकृतियों से युक्त मंदिरों के विशाल समूह में जब घुमने, विचरने का अवसर मिला, तब कोरोनाकाल की दुश्वारियों के बावजूद भी मन आंनद की उपलब्धि लेने से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाया।)


कोरोनाकाल के लॉकडाउन समय में मन भयभीत था और सुरक्षा के आवरणों से जकड़े हुए हम घर में कैद थे। काफी समय एक ही नीरस व भयावह वातावरण में रहते हुए मन बेचैन हो गया। अचानक सतर्कता के साथ जब अनलॉक का समय आया, तब हम लोग इस मकड़जाल से बाहर निकलने को आतुर दिखे। अतः जब अवसर मिला  तब हम घर से निकलकर एक खुले स्वच्छंद वातावरण में सांस लेने के लिए खजुराहो घुमने के लिए नोवा गाड़ी से निकल पड़े। घुमने से मनोस्थिति में जो बहुत बड़ा परिवर्तन आया, वह हमें जीवंतता के बहुत करीब लाकर खड़ा कर दिया।  

मंदिरों का सबसे बड़ा समूह----

खजुराहो के मंदिरों की खोज ब्रिटिश इंजीनियर टी एस बर्ट ने की थी। इस स्थान की भव्यता, सुंदरता और प्राचीनता को देखते हुए युनेस्को ने इसे 1986 में विश्व विरासत की सूची में शामिल किया है।

भारत के मध्यप्रदेश प्रांत के छतरपुर जिला में स्थित खजुराहो एक ऐसा छोटा सा स्वच्छ शहर है, जो प्राचीन एवं मध्यकालीन चंदेल वंश के राजाओं द्वारा निर्मित कलात्मक हिन्दू और जैन मंदिर के भंडार के कारण विश्वविख्यात है। खजुराहो को प्राचीन काल में 'खजूरपुरा' और 'खजूर वाहिका' के नाम से भी जाना जाता था। यहाँ खजूर के पेड़ों का विशाल बगिचा था, इसलिए इसका नाम खजुराहो पड़ा। इन मंदिरों का निर्माण 950 ईसवीं से 1050 ईसवीं के बीच हुई थी। मंदिरों को बनाने में करीब 100 साल लगे। पहले मंदिरों की संख्या 85 थी, जो अब घटकर 22 ही रह गई है। मंदिर परिसर को तीन भागों में विभाजित किया गया है पश्चिमी,पूर्वी और दक्षिणी। पश्चिमी में अधिकांश मंदिरों का समूह है,पूर्वी में नक्काशीदार जैन मंदिर है, जबकि दक्षिणी समूह  में कुछ ही मंदिर है। हमने खुदाई में मिले एक अधुरे मंदिर के खंडहर को भी देखा। खुदाई में मिले पत्थरों को संरक्षित करने और मिलाने का काम अद्भुत था, पर लॉकडाउन के कारण यह काम अधुरा ही पड़ा था। 

खजुराहो लखनऊ से करीब 300 किमी की दूरी पर स्थिति है।

 वहाँ अधिकांश समय हम गाइड के साथ मंदिरों के दर्शन करते और एक एक कलाकृतियों की सुंदरता को बारीकी से निहारने और आनंदित होने में व्यस्त रहे। इन मंदिरों में भव्यता,जीवन्तता और कलात्मकता का जो संगम समाहित है, वह कला प्रेमियों के लिए एक अनूठा उपहार ही लगा। 

पत्थरों के चट्टानों पर बने सुंदर कलाकृतियाँ दाँतों तले अंगुली दबाने को मजबूर कर रही थी। मंदिर की बाहरी दिवारों पर असंख्य सुंदर कलाकृतियाँ है..जिनकी बनावट, साज-सज्जा अपने अप्रतिम गुणवत्ता के कारण पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करती है। 

प्रत्येक मंदिर अपने शिल्प, सौंदर्य तथा शैलीगत विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध है। एक-एक मूर्ति की कला देखने में समय व्यतीत होने की कोई सीमा ही पता नहीं चल रहा था। हम घंटों मंत्रमुग्ध हो एक ही कला को अपलक निहारने में लगे रहते थे, जब तक कि हमें कोई टोककर आगे नहीं बढ़ाता था।

मंदिर की बाहरी दिवाल कई पट्टियों पर अंकित है।  यहाँ हाथी, घोड़े , योद्धा और सामान्य जीवन के अनेकानेक दृश्य है। अप्सराओं को इस तरह व्यवस्थित किया गया है कि वे स्वतंत्र, स्वच्छंद एवं निर्बाध जीवन का प्रतीक मालूम पड़ती है। कामकला के आसनों में दर्शाए गये स्त्री-पुरुषों के चेहरे पर एक अलौकिक और दैवी आनंद कीछटा झलकती है। प्रेमी के पत्र को पढ़ने के बाद  उसकी यादों में खोई मनन करती प्रतिमा के हावभाव दिल को छू गए। 

  सबसे प्रसिद्ध था लक्ष्मण मंदिर जो विष्णुजी को समर्पित था।

कंदरिया महादेव मंदिर, लक्ष्मण मंदिर, चतुर्भुज मंदिर, लक्ष्मी मंदिर, वराह मंदिर, देवी जगदम्बा मंदिर, सिंह मंदिर, सूर्य(चित्रगुप्त) मंदिर, विश्वनाथ मंदिर, वामन मंदिर, नन्दी मंदिर , पार्वती मंदिर आदि यहाँ की प्रसिद्ध मंदिरें है। जैन मंदिर पुराने हिंदू मंदिरों के अवशेष पर ही बना है। ये मंदिर और इनका मूर्तिशिल्प भारतीय स्थापत्य और कला की अमूल्य धरोहर है।

कंदारिया महादेव का मंदिर---यह खजुराहो का सबसे विशाल तथा विकसित शैली का मंदिर है। यह मंदिर सप्तरथ शैली में बना है, जिसकी उंचाई और लम्बाई लगभग 117 फुट और चौड़ाई लगभग 66 फुट है। इसके बाहरी दीवारों पर कुल 646 मूर्तियां है तो अंदर भी 226 मूर्तियां स्थित है। इतनी मूर्तियां अन्य किसी मंदिर में नहीं मिलेगी। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है।

मतंगेश्वर--- मतंगेश्वर खजुराहो का सबसे प्राचीन मंदिर है, जिसे राजा हर्षवर्धन ने 920 ई. में बनवाया था। 

मंदिरों में  मूर्तियों की सुंदरता, उनकी भाव-भंगिमा को देखना बहुत अद्भुत है, जिसे लेखनी में समेटना बहुत कठिन है, पर एक बार खजुराहो जाने के बाद बार-बार जाने का मन करेगा।

निकटवर्ती दर्शनीय स्थल

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कालिंजर और अजयगढ़ का दुर्ग -----

खजुराहो से 105 किमी दूर कालिंजर का किला है। यह प्राचीन किला है, जिसका संबंध चंदेल वंश के उत्थान-पतन से है। प्राचीनकाल में यह शिव भक्तों की कुटी थी। 108 फुट उँचे इस किले में प्रवेश के लिए अलग-अलग शैलियों के सात दरवाजों को पार करना पड़ता है। इसके अंदर आश्चर्यचकित करने वाली पत्थर की गुफाएं है। यहाँ बहुत से बेसकीमती पत्थर पड़े हुए है। इसके भूमि तल से पातालगंगा नामक नदी बहती है जो इसकी गुफाओं को जीवंत करती है।

खजुराहो से 80किमी दूर अजयगढ़ का दुर्ग है। विंध्य की पहाड़ियों की चोटी पर यह किला है किला में दो प्रवेशद्वार है। किले के बीचोबीच अजय पलका तालाब नामक  झील है। झील के किनारे बहुत से प्राचीन मंदिर है। 

लॉकडाउन के बाद के पहले पर्यटक----

पहला शब्द सुनने में बहुत अच्छा और आकर्षक लगता है। पर्यटकों से सदैव भरा रहने वाला माहौल आज खामोश था। होटल में हम लॉकडाउन के बाद के पहले मुसाफिर थे। 

गाइड अनुराग को लॉकडाउन के बाद का पहला काम था।

और तो और जब मंदिर के बाहर किताब बेचने वाले से मैंने बात की तो वह बहुत खुश हुआ, बोला," आप तो किताब लेकर बात भी कर रही है, वरना कोई बात करने को तैयार नहीं होता था। रोज चार-पाँच सौ की किताब बेचने वाला घर में कैद हो गया। आज नवरात्र व शनिवार होने की वजह से आ गया, वरना आता ही नहीं था।"

लाइट एण्ड साउंड प्रोग्राम----

खुला मैदान, हल्की सिरहन के बीच जिज्ञासु मन लाइट एण्ड साउंड शो का लुफ्त उठाने में पूरी तल्लीनता से ड़ूबा हमारा परिवार पर्यटकों के अभाव में वहाँ अकेला ही था। यद्यपि वहाँ का इतिहास की जानकारी होने पर मजा बहुत आया, पर भीड़ भरे वातावरण की कमी खटक रही थी। यह कार्यक्रम खजुराहो के इतिहास को जीवंत कर देता है।

पन्ना राष्ट्रीय उद्यान----

खजुराहो से 57किमी दूर स्थित है।यहाँ की सफारी  यात्रा हमने की। वनविहार के अंदर जाते ही हमें बाघ दिख गया।  सागौन के वृक्षों से सजे वन मे बेजोड़ सुंदर केन नदी बहती है। हिरण, मोर के अतिरिक्त और भी जानवर दिखे, जिनका हमने भरपूर आनंद लिया।

पाण्डव केव----

खजुराहो के पास ही पाण्डव केव घुमने की जगह है। झरनों के मध्य पाण्डवों की गुफा देखने में मजा आया।

जाने का मार्ग----

लखनऊ से खजुराहो का सीधे हवाई मार्ग है। कानपुर से खजुराहो का रेल मार्ग है पर लखनऊ से सीधा कोई ट्रेन मार्ग नहीं है। सड़क के द्वारा कानपुर से महोबा होते हुए छतरपुर खजुराहो पँहुचा जा सकता है।


आखिर अक्ल आ गई (लघुकथा)

आइसोलेशन के 14 दिन अस्पताल में बिताने के बाद मनोज का रिपोर्ट जब निगेटिव आया, तब उसे अस्पताल से छुट्टी मिली। घर लौटते समय मनोज खुश होने की अपेक्षा ग्लानि से भरा हुआ था। कोरोनाकाल में मिले भयंकर असहनीय एकांतवास के पल में वह विक्षोभ-विषाद से विचलित था। उसे पापा के मौत के बाद के माँ के चार साल के आइसोलेशन पीरियड की पीड़ा आइना दिखा रही थी। सबके होने के बावजूद माँ के अकेलेपन के दुखदायी दर्द को झेलाने में उसका भी बड़ा हाथ था। 

घर पँहुचकर मनोज स्वागत में पलकें बिछाये उल्लसित खड़े पत्नी-बच्चों और पड़ोसियों को छोड़ता हुआ जब वह उपेक्षित पड़ी खामोश माँ के कमरे में गया तो सभी आवाक हो गये। मनोज माँ को पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगा। माँ-बेटा का यह मिलन पत्नी और बच्चों को भी विचलित कर दिया। कुछ न समझ पाने की स्थिति में वे मूकदर्शक बने एकतरफ खड़े थे।

माँ रजनी भी बेटा के सिर को सहलाते हुए खुशी के आँसू रो रही थी। जिस पल को तरसती उसकी आँखें अब तक निश्तेज हो गई थी..वह खुशी के पल उसे अचानक कैसे नसीब हो गया? वह बेटा के मुँख को चुमती हुई उसके मुँखड़े को हथेलियों में भरकर मूक नजरों से निहारने लगी तो मनोज जोर से सिसकता हुआ माँ के आँचल में मुँह छुपाकर और जोर से रो पड़ा। उसके बोल फूट नहीं रहे थे।

जी भरके रो लेने के बाद मनोज उठे और माँ को सहारे से उठाते हुए बोले," माँ, अब तुम यहाँ नहीं, बल्कि हम लोगों के साथ आगे रहोगी, जहाँ हम सब एकसाथ रहते है।"

"बेटा, ये तुम्हारे बोल है, वो भी अपनी पत्नी के सामने?" माँ रजनी आश्चर्य से बोली।

"हाँ माँ, कोरेंनटाइन के कठिन एकांतवास पल ने एकांतवास की दुश्वारियों और उपेक्षित जीवनशैली की कटुता से जब मेरा परिचय कराया तब मुझे अपनी गलतियों का आभास हुआ। माँ इस सीख ने मेरी आँखे खोल दी है। अब ऐसी गलती दुबारा नहीं होगी। अब हम सब एक साथ मिलजुल कर रहेंगे।"

देर से ही सही, पर दुरुस्त हुए बेटा को एक बार फिर गले लगाकर माँ फफक पड़ी। इसी बीच बहू और पोता भी पास आकर उनके गले लग कर रोने लगे । थोड़ी देर में खुशियों का माहौल छा गया।

 कोरोना एक बार एक परिवार में पॉजिटिव क्या हुआ...निगेटिव हुए उनके संबंधों की डोर को भी पॉजिटिव कर दिया।



डरना नहीं है (कविता)

डरना नहीं है, कोरोना के खौफ से,

कोविड19 को दूर भगाना है।

साफ सफाई को ढाल बनाकर,

हरदम आगे बढ़ते जाना है।


धोना है, हथेली को बार-बार,

नाक-मुँह को हरपल नहीं छूना है।

मास्क को अपना ढाल बनाना है,

मुँह पर चिपकाए रखना है।


करोना ने बहुत कुछ सिखाया है हमें,

लोगों से दूर रहकर संयम भी दिखलाना है।

लिंक तोड़ना है वैश्विक महामारी का,

इसलिए सोशल डिस्टेंडिंग अपनाना है।


यह सब तभी सम्भव व स्वीकार्य होगा,

जब हम अपने कर्तव्यों में बँधें होंगे।

दृढ़ संकल्पों को अपनाकर ही हम,

कोरोना वायरस को दूर भगा पायेंगे।

दीप प्रज्वलित करो मन का... (कविता)

मन के विश्वास
की ज्योति जलाकर,
अगर हम जीवनपथ
पर बढ़ते जायेंगे।

तब गम का अंधेरा
छिप जायेगा,
सूरज की अरुणिमा
नभ पर निखरेगी।

दिन उज्जवल
हो चमकेगा,
कोई मुँह
नहीं छुपायेगा।

घुलमिलकर सब
मिलेंगें-जुलेंगे,
खुशी भी हँसी बनकर
खिलखिलायेगा।

नाते-रिश्ते सब
एक होंगें,
जब प्रेमभावना
जागृति हो जायेंगा।

इस नफरत 
भरे माहौल को,
हम दोस्ती में
बदलकर दिखलायेंगे।

दीप प्रज्वलित करके मन का
हम आगे बढ़ते जायेंगे,
मन में मिले प्रकाश को
हम आगे तक फैलायेंगे।

यहीं होगा जीवन का उद्देश्य
सब फूल सरीखे खिल जायेंगे,
तब जीवन सरल हो जायेगा
मुखरित हो सब मुस्कुरायेंगे।


03.05.21.

जागृति अभिलाषा (कविता)

जागृति मन की अभिलाषा लिए,
मैं आगे बढ़ती जाती हूँ।
धूलधूसरित न हो जाए ख्वाब,
अतः सपनों में पंख लगाती हूँ।

बहुत कठिन है सार्थक करना, सपनों को,
पर हाथ पर हाथ रखकर बैठूं, क्यों?
कुछ करने को सोंचू, कुछ में रम जाऊं,
नये कलेवर में बह सपनों को सजग बनाऊं,मैं।

मासूमों की किलकारियाँ सुनूं,
बच्चों संग छुकछुक ट्रेन चलाऊं।
पोते-नातियों संग आर्ट बना,
बुढ़ों का सम्बल बन जाऊं।

चिड़ियों की चहचहाहट सुनती,
कोयल की कूं कूं आवाज निकालूं।
बकरी-गाय को रोटी खिलाती,
मेमना-बछड़े को पुचकारती रहूँ मैं।

पेड़ पौधौ से नाता जोड़ूं,
रोज मिट्टी में लोटरियाँ मारुं।
रेत छानकर महल बनाऊं,
फिर सागर में बह जाने दूं।

मंजिल कभी मिले या न मिले,
रुकना अब अपने वश में नहीं।
जिसके भी काम आ सकूं कभी,
उसके सपनों का संबल बन जाऊं।

जीवन को बेहतर बनाने के लिए,
जीने की कला समझना होगा।
नहीं बैठना नीरस बनकर,
आगे कदम है, बढ़ाते रहना।
08.05.21.

सकारात्मकता का खेल (लेख)

मैं सकारात्मकता( पॉजिटिव) से पूर्ण यानि जीवंत थी। इसलिए जीने की कला से परिपूर्ण थी..अपने दैनिक क्रिया-कलापों में व्यस्त थी। इसलिए उम्र का कोई पादान मेरे राह का रोड़ा नहीं था। मैं, बूढ़ों में बूढ़ी थी, जवानों में जवान थी, किशोरों में किशोर थी, तो बच्चों में नन्हीं बच्ची बन जाती थी। सकारात्मक सोच, उर्जा और कामों में मन लगाती थी, इसीलिए हँसती थी, लोगों को हँसाती थी, चुहुलबाजियाँ करती थी, बच्चों के साथ पार्क में खेलती थी, मचलती थी, दौड़ती थी और उन्हें दौड़ाती भी थी। कहने का तात्पर्य यह था कि दुखों के पहाड़ को भी सहनशीलता से झेल जाना मेरी गुणवत्ता थी, इसलिए जो निगेटिव व्यवहार करता उससे दूर भागती थी। कसमसाती थी..लगता था ये जीवन को पीछे खींच रहा है। इसलिए सतर्क हो जाती थी। फिर धीरे-धीरे अपने विचार को बदलती और उसके संपर्क में आने की कोशिश करके उसे सकारात्मकता का पाठ पढ़ाने में जी जान से जुट जाती थी। यही मेरे जीवन का उद्देश्य था।
लेकिन पिछले साल से जब इस कोरोना ने देश-दुनिया में अपना कहर बरसाना शुरू किया। तो लोग त्राहि-त्राहि करने लगे। स्कूल-कालेज बंद हो गये। परीक्षाएं स्थगित होने लगी। ऑफिस-बाजार, मॉल, सिनेमाघर सब बंद करके लॉकडाउन लगाना पड़ा, तब जिंदगी एक बार थम सी गई। डराती, झेलाती और अपने चपेट में लोगों को लीलती जब कोरोना एक बार अपना कहर बरपाने के बाद थम सी गई, तब लोगों ने कुछ दिन चैन की सांस के साथ जीवन जिया। हम इसके भूलावे को भूलने और बिसराने लगे और आगे के लिए सतर्क होने की तत्परता और जागरूकता को भूला बैठे। अपने मौज-मस्ती और महत्वाकांक्षाओं की आड़ में हम यथार्थ के इस कहर को भूल गये और सीख ग्रहण किए नहीं और सामान्य हो गये। हमारे इसी भूल का फायदा उठाकर एक बार कोरोना पुनःपैर पसार कर तीव्र व उग्र रूप धारण करके पलटकर फिर हमारे बीच आकर हमें तबाह करने लगा। पछतावा हमारे रग-रग में बसा है...हम पछताते रहे, पर सतर्कता का पाठ पढ़ नहीं पाये।
  तभी तो कोरोना महामारी ने सकारात्मकता के छलावे वाले चोला को धारण करके हमें भरमाना शुरू कर दिया है। जब से उसने पॉजिटिव-निगेटिव का अपना उल्टा खेल फिर से खेलना प्रारम्भ कर दिया है, तब से हमारे जीवन का मकसद भी सकारात्मकता और नकारात्मकता के विचित्र उलझन में डूब गया है।
सकारात्मकता की सोच में जीने वाले हम कोरोना के पॉजिटिव होने से घबड़ाने लगे है। पॉजिटिव सोच में जीने वाले हम कोरोना से निगेटिव होने की दौड़ में जुट गए है। नकारात्मकता से दूर भागने वाले हम अब त्राहि माम की पुकार लगाकर कोरोना निगेटिव होना चाहते है, ताकि जीवन के बेहतर समय को हम सुगमतापूर्वक जी सकें।
लेकिन इस कोरोना महामारी की छलावे वाली कोरोना पॉजिटिव पर यदि हमें विजय भी प्राप्त करना है तो भी हमें जीवन के सकारात्मक रुख को ही अपनाना पड़ेगा। हम सकारात्मक सोच,उर्जा, प्रभाव और परिणाम से भरे रहेंगे तो कोरोना पॉजिटिव होते हुए भी हमारा कुछ बिगाड़ नहीं पायेगा। बस हमें हिम्मत की जरूरत है। घबड़ाना नहीं है। सोच को सकारात्मक करते हुए इससे बचाव के सभी सार्थक उपाय का क्रियान्वयन करना पड़ेगा। मुँख पर मास्क, सोशल डिस्टेंडिंग, हाथ को बार-बार धुलना, लॉकडाउन का पालन करते हुए घर में सुरक्षित रहे, तो हम कोरोना पर विजय प्राप्त कर लेंगे।

लेकिन अभी हम अपने सोच को अमली जामा पहना भी नहीं पाये और हम चैन की बंसी ठीक से बजा भी नहीं पाये कि चारों तरफ एक बार फिर अफरा तफरी का माहौल व्याप्त हो गया। कोरोना के कहर की सुमानी देश में चारों तरफ फैलने लगी। इस बार यह इतनी विकट थी कि जो सुचनायें हम टीवी और अखबार में देखते और पढ़ते आ रहे थे, वह घर के आसपास, पड़ोस और रिश्तेदारी में भी दिखने लगा। हम डरने लगे, सतर्क होने लगे, सम्भलने लगे।
 पर अभी हम इसके विभिषिका की गम्भीरता के तह में जाते, तब तक यह हमें भी अपने आग में लपेट लिया। इसने हमारे दो दिल अजीज लोगों को हमसे बिछुड़ा दिया। इस पर भी इसका मन नहीं भरा तो इसने दो लोगों के साथ हमें भी और हमारे बहुत से करीबी लोगों को पॉजिटिव कर दिया। 
हमारे परिवार में हम तीन लोग कोरोना पॉजिटिव हो गये। एक साथ तीन लोगों का पॉजिटिव होना मायने रखता है। हम तीनों लोग एक दूसरे के संबल और सहारा बने एक दूसरे को देखते हुए जीने की कोशिश में लगे रहे। तीन कमरे में तीनों लोग अर्ध मूर्छित अवस्था में पड़े रहते। दूर से हालचाल ले लेते, पर एक दूसरे के समीप घड़ी दो घड़ी बैठने की हिम्मत ही किसी के पास नहीं थी, जो एक दूसरे की थोड़ी भी सेवा कर पाते। नीरीह व बेबस आँखों में बहुत बड़ी विवशता थी। टुकुर-टुकुर एक दूसरे देखते, पर स्पर्श से दूर रहते थे। वैसे हम नाश्ते, खाने और थोड़ी देर टीवी देखने के लिए एक ही कमरें में होते थे। बातचीत बहुत कम होती थी।
तब से मन निगेटिविटी को पाने के लिए कुलबुला रहा था। निगेटिविटी की उम्मीद इस कदर मन में ऑफत मचाएगी..यह कभी सपनें में भी नहीं सोचा था।
पर निगेटिविटी पाने की उम्मीद में भी हमें पॉजिटिविटी का दामन नहीं छोड़ना था। यह हमने दृढ़ निश्चय कर लिया था। हमें अपने को जीवंत रखने के लिए पॉजिटिव एनर्जी, पॉजिटिव सोच, पॉजिटिव क्रियाकलापों को ही अपनाना था। इसलिए हमनें हिम्मत को हारने नहीं दिया और संयम का दामन थामें हुए दिन बीताने लगे। ऐसे समय में बच्चे देवदूत बन गये थे। शालू-बाबू-मंटू के लगन, क्रियाकलापों और स्फूर्ति से लिया गया निर्णय बहुत कारगर और जीवंत करने वाला था। मंटू तो स्वयं बीमार होते हुए भी हमारे लिए संजीवनी बना हुआ था। दो कौर भोजन और पानी जो मुँह में पड़ता था, वह शालू-मंटू की बदौलत ही पड़ता था। मंटू अपना घर छोड़कर यहाँ पड़े हुए माँ-बाप की सेवा में जुटे और उन्हें सम्भाले हुए थे। यह उसकी बहुत बड़ी विशेषता थी। शालू अपने ड्राइवर उमेश के साथ तीन घरों की व्यवस्था सम्भालने में लगी थी। संजीवनी मतलब पुनः जीवन...हमें यह संजीवनी मिली अपने बच्चों से ही...जिनका शुक्रिया अदा करना मेरा भी काम है।
कहने का तात्पर्य यह है कि कोरोना अपने पॉजिटिव खेल में लगी हुई थी। लेकिन हमें भी इसके जोड़ को तोड़ने के लिए भी पॉजिटिव का ही खेल खेलना पड़ेगा। यदि हम मन से, सोच से, उर्जा से, अपने क्रियाकलापों से पॉजिटिव नहीं रहेंगें, तब हम कोरोना के पॉजिटिव खेल को बिगाड़ नहीं पायेंगे। 
निष्कर्ष यही है कि कोरोना पॉजिटिव को हराने के लिए हमारी सोच, विचार, क्रियान्वयन पॉजिटिव हो, हम मास्क लगाकर रहें, सोसल डिस्टेंडिंग का पालन करें, बार-बार हाथ धुलें, घर को सेनेटाइज करें...तभी हम कोरोना के पॉजिटिव असर को हराकर निगेटिव कर पायेंगे।
 इसलिए एकबार हम फिर दृढ़ होकर जागरूक हो जाएं, ताकि असमय आये इस विपदा से छुटकारा पा लें।

कोरोना के विभिन्न रुप (कविता)

कोरोना वायरस जब--
विदेश में था,
तो डरे नहीं।

देश में आया,
तो सजग हुए।

शहर में आया,
तो सतर्क हुए।

कालोनी में आया,
तो  सहम गये।

गली में आया,
तो डर गये।

अब घर में घुस गया,
तो भयभीत हो गए।

कोरोना का वीभत्स रुप,
बहुत डरावना होता है।

तोड़ मरोड़ देता है,
जान पर बन जाता है।

इसलिए सतर्क रहो,
सम्भलकर रहो।

जितना हो सके,
इससे दूर ही रहो।

यह दूर तभी रहेगा,
जब तुम इसको समझोंगे।

जब पूरी सतर्कता और,
सजगता दिखलाओंगे।

हिम्मत के साथ रहोगें
मनोबल को बढ़ाओगे।

और पूरी तरह
इससे दूर रहने के,
नियमों को अपनाओंगे। 

बेबाकी (लघुकथा)