तृप्ति (लघुकथा)

तृप्ति (लघुकथा)
कल टेस्ट समाप्त हो चुके थे। सुबोध जल्दी से बैट-बॉल लेकर अपने दोस्त नीरज को बुलाने चला गया। नीरज के घर पहुंचने पर सुबोध ने देखा कि नीरज के पापा बाहर जल चढ़ा रहे थे। अंदर जाने पर उसने देखा कि ढ़ेर सारे खाने वाले समानों से भरा थाल है। नीरज नहा रहा था तो सुबोध वहीं एक तरफ खड़ा हो गया। उसने देखा नीरज के पापा जल चढ़ा कर अंदर आये, फिर पूजा किए। उठते समय वे नीरज की माँ से बोले," अलका, तुम ये सामग्री मंदिर में दे आना। मुझे देर हो रही है। मैं ऑफिस के लिए तैयार होने जा रहा हूँ।"
" ठीक है, मैं अभी पंंड़ित जी को दे आऊंगी। आप निश्चिंत रहिए।" अलका अपना काम करती हुई बोली।
नीरज जब सुबोध के पास आया तो सुबोध नीरज से पूछा," तुम्हारे पापा प्रतिदिन तो पूजा नहीं करते है, फिर आज क्यों कर रहे थे?" 
"आज पितृविसर्जन है। पापा बोल रहे थे कि आज जो कुछ दान करो, वह बाबा-दादी को मिलता है। इसलिए आज उनके मनपसंद की खाने की चीजें आदि बनती है। और ढ़ेर सारे उनके मनपसंद कपड़े और सामग्री दान देते है।"
" अरे याद आया। एकबार मामा को भी मैंने ऐसी ही भोजन इत्यादि सामग्री दान में देते हुए देखा था। तब मैं थोड़ा छोटा था, इसलिए ज्यादा ध्यान नहीं दिया।"
" हाँ दोस्त, कहते है ऐसी दान से मृतक आत्माएं तृप्त होती है।"
" तुम कह तो ठीक रहे हो, पर मैं तो अपने बाबा-दादी को अभी से जीवित समय में ही उनकी बात मानता हूँ और तृप्त रखना चाहता हूँ, तभी अपना किट-कैट, टॉफी, पिज्जा आदि सभी खाने की चीजें उन्हें देता हूँ और उनके साथ पार्क जाकर उन्हें टहलाता भी हैंहूँ, जिससे वे अभी से संतुष्ट रहे। यदि वे संतुष्ट रहेंगे, तब हमें बड़ा होकर ऐसी पूजा व दान नहीं करना पड़ेगा।"
" तुम बिलकुल ठीक ही कह रहे हो। पूजा-दान की बातें तो बड़े होने पर देखी जायेंगी। क्योंकि हमें अपनी परम्पराएं भी नहीं तोड़नी चाहिए। पर अब मैं भी इस बात का बराबर ध्यान रखूंगा कि मम्मी-पापा जीवित समय में ही खुश व तृप्त रहें। ताकि मेरे मन में उनके अतृप्त होने की भावना न जागे।" 
"हाँ, तुम्हारी बात बिलकुल ठीक है।" यह कहकर दोनों दोस्त खेलने के लिए पार्क में चले गये।

दिल से बड़ा होना (लघुकथा)

नये कालेज में आने के बाद रानू की दोस्ती सुमन से हो गई। शीतल का अपनी जैसी पढ़ने में तेज दो लड़कियों से अलग दोस्ती थी। अतः कालेज के पहले साल रानू शीतल तक पहुँची ही नहीं, पर एक साल बाद अगली कक्षा नौ में पहुँचने पर साइंस के छात्रों की अलग कक्षा होने के कारण उसकी दोस्ती शीतल से हो गई। तीनों दोस्त रानू, सुमन और शीतल की तिकड़ी पूरे साल एक साथ मधुर रिश्ते में बँधकर अपने खट्टे मीठे अनुभवों को साझा करती रही। परीक्षा के समय ही रानू के पापा का ट्रांसफर हो गया। वे सरकारी सेवा में उच्च अधिकारी थे। परीक्षा के आखिरी दिन रानू सुमन के साथ शीतल के घर गई। दो-तीन घंटे के धड़ामचौकड़ी के बाद विदा की बेला आई। जब शीतल रानू और सुमन को छोड़ने सड़क तक आई, तब एक छुपा पैकेट वह अपने फ्राक के बीच से निकालकर रानू को पकड़ा दी। रानू इस अप्रत्याशित उपहार को अचानक पाकर आश्चर्यचकित हो शीतल के दिल में छुपे भावों की कोमलता को पढ़ने लगी। शीतल द्वारा मिले इस अमूल्य निधि ने रानू के दिल को तरंगित करने के साथ ही आँखों को नम भी कर दिया। बिछोह की बेला में यह एक सुखद एहसास था। जो बेहद खुशी का पल साबित हुआ। 
बाद में छोटी-छोटी जरूरत की चीजों से बना शीतल का उपहार खोलने पर रानू की आँखें भी खुल गई। यह उपहार रानू को कचोटने के साथ ही अपनी सोच में कमी के कारण अफसोस और शीतल के उदार प्रवृति के कारण खुशी व संतुष्टि का बोध कराता था क्योंकि आर्थिक दृष्टि से वह शीतल से ज्यादा सक्षम और संपन्न थी। अपने अंदर की कमी को महसूस करके रानू को एक सीख मिली कि दूसरों को दिल से दिए जाने वाला उपहार जितना ज्यादा खुशी दूसरे को देता है, उससे ज्यादा वह स्वयं के आत्मबल और आत्मनिर्भरता को बढ़ाता है। 
रानू को शीतल के दिए उपहार से जो मूलमंत्र मिला, उससे वह समझ गई कि किसी को कुछ देने के लिए दिल का बड़ा होना जरुरी है, ना कि आर्थिक रूप से सक्षम होने या दिल के भावों के जागने की इंतजारी में हाथ पर हाथ रखकर निष्क्रिय बैठे रहना। देने से दिल बड़ा और महान होता है और न देने से मन में कुंठा और संकीर्ण भावना पनपती है। अतः मन को सकारात्मक और उर्जावान बनाने के लिए मन के भावों को जाग्रत करना बहुत जरूरी है।

छोटा मुँह बड़ी बात (लघुकथा)

"भैया, जब-जब रेड लाईट आता है, आप मुँह पर मास्क चिपका लेते है, और गाड़ी इससे आगे बढ़ाते ही मास्क मुँह से हटा देते है, और फिर कहीं भी नहीं लगाते है? आप ऐसा क्यों करते है? क्या कोरोना सिर्फ रेड लाईट पर ही होता है?" नन्हां हर्ष आश्चर्यचकित हो भैया अनुज को घूरते हुए पूछा।
"अरे पगले, रेड लाईट पर कोरोना नहीं होता है, रेड लाईट पर होती है सीसीटीवी कैमरा और पुलिस। बिना मास्क के होने पर जो चलान का 1000 रुपये का  चूना लगायेगा, उसकी भरपाई तो अपनी ही जेब से करना पड़ेगा ना। इतनी बड़ी मुसीबत से बचने का सरल उपाय यही है कि रेड लाईट पर मास्क लगा लो और बाद में बिना मास्क के निश्चिंत होकर आगे बढ़ जाओ।" हर्ष के गाल पर हल्की चपत लगाते हुए अनुज बेपरवाही से बोले।
" अरे वाह भैया, वाह। हजार रुपये का इतना डर और जो कोरोना पकड़़ लेगा, तो कितने का चूना लगायेगा, किसकी जेब पर लगायेगा, और कितनी मुसीबत लेकर आयेगा। कभी यह भी सोचा है?"
"तुझे कैसे पता है?" अनुज हर्ष को घूरते हुए बोले।
"मेरे दोस्त के पापा को कोरोना हो गया था। वही बता रहा था।" 
"अरे वाह। तुझे तो बहुत कुछ पता है।" यह कहकर अनुज मास्क को सही तरह से लगा कर आगे बढ़े।
बेबाकी से बोले हर्ष के जवाब ने अनुज को जो आईना दिखाया, उसने अनुज को सतर्क व विवश कर दिया। अब हर्ष खुश था। वह जब भी अनुज के साथ बाहर जाता, अनुज के चेहरे पर मास्क जरुर होता और हमेशा होता।

दार्जिलिंग हिल स्टेशन है बहुत खूबसूरत (यायावरी)

दार्जिलिंग हिल स्टेशन है बहुत खूबसूरत (यायावरी)

 कंचनजंघा की बर्फ से ढ़की विशाल चोटियों के बीच बसे पश्चिम बंगाल  का दार्जिलिंग शहर की वादियाँ बहुत हसीन है। यह हमें वहाँ जाकर पता चला। हम दार्जिलिंग दो बदार्जिलिंग घुमने का मौका तब मिला जब हम गंगटोक से वापस जलपाईगुड़ी आ रहे थे। दिनभर का समय था। ड्राइवर बोला हम आप लोगों को चाय बागान घुमाते हुए जलपाईगुड़ी पँहुचा देंगे। दार्जिलिंग के चाय बागान में सुबह से शाम तक घुमने में आनंद की जो अनुभूति मिली, वह अति विस्मरणीय लगी। पानी की हल्की बूंदाबांदी के बीच सुहाने मौसम में बढ़ती रेंगती सी गाड़ी से चारों तरफ के नजारों का लुफ्त उठाते हुए आगे बढ़ना बहुत सुखदायी था। चाय के हरे-भरे बागानों में अक्सर चाय की पत्तिया चुनती युवतियों की जो फोटो हम कलेंडर या टीवी में देखते आ रहे थे उसे प्रत्यक्ष देखने,भोगने और उनसे बाते करने में बहुत मजा आया। हम अपने गाड़ी से उतरकर चाय की पत्तियाँ तोड़े, युवतियों से ढ़ेर सारी बातें किए और ढ़ेर सारी फोटो खिचवाये। यहीं के सुरम्य वादियों में रविन्द्रनाथ टैगोर के कर्मस्थली उनके घर का भी दर्शन किए।
पहली बार दार्जिलिंग का जो कोना हम घुमें, वहीं इतना  खूबसूरत लगा कि हम पुनः दार्जिलिंग शहर घुमने के लिए दार्जलिंग पहुंच गए। दार्जलिंग-----
क्वीन ऑफ हिल्स अर्थात दार्जिलिंग हमेशा से एक बेहतरीन हनीमून डेस्टिनेशन रहा है। यहाँ के खूबसूरत पहाड़ घुमने के उत्साह को दोगुना कर देते है। यहाँ टाइगर हिल की चढ़ाई कर सकते है। इसी के पास कंचनजंघा चोटी है। सबसे ज्यादा आकर्षक यहाँ का सूर्योदय है। यहाँ चाय के बागान और देवदार के जंगल का नजारा बहुत सुन्दर है।

ट्वाय ट्रेन-----खिलौना रेलगाड़ी---
हिमालय का गेट कहे जाने वाले शहर जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग पहुंचने का रास्ता ही बहुत दिलकश और उमंगों से भरने वाला था। हमने दो फीट के नैरो गेज पर छुक-छुक करके दौड़ने वाली हिमालयन ट्रेन ट्वाय ट्रेन पर अपनी बुकिंग ऑनलाइन पहले ही करा ली थी, क्योंकि खिलौना गाड़ी का मजा हमें पूरा दिन लेना ही था। न्यूजलपाईगुड़ी से चलने पर यह सड़क मार्ग से आँखमिचौली करती हुई आगे बढ़ रही थी। कभी यह सड़क मार्ग के साथ चलती थी तो कभी चुपके से गायब हो कर जंगलों में घुस जाती थी। चाय बगानों और प्रकृति के रमणीक नजरों के बीच से गुजराती हुई यह कभी चाय बगानों में तो कभी पहाड़ी गावों और कस्बों से छुकछुक करती अपनी मदमस्त चाल से धीरे-धीरे सरकती हुई 6-7 घंटे में दार्जिलिंग पहुंचायी। भारत में सबसे अधिक उँचाई अर्थात 7407 फीट पर स्थित रेलवे स्टेशन 'घूम' इसी ट्रैक पर था। जो मजा इस ट्रेन पर मिला, उसे हम कभी भूल भी नहीं सकते है।

बेबी सीवॉक का दर्शन-----यहां दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे का संग्रहालय भी देखने को मिला। जिसे सन् 2000से दर्शकों के लिए खोल दिया गया था। 1881 में जिस इंजन 'बेबी सीवॉक' से इस ट्रेन की यात्रा शुरू हुई थी वह भी देखने को मिला। हम इसके कोच के अंदर जाकर भी घुमें थे। यहाँ रेलवे के इतिहास से जुड़ी बहुत सी दुर्लभ चीजें भी देखने को मिली थी।

चौरास्ता---सबसे ज्यादा चहलपहल वाली जगह जिसे दार्जिलिंग का दिल भी कहते है..वह है दार्जिलिंग का दिल- चौरास्ता। यह समतल जमीन जैसा भाग है, जहाँ लोग धूप सेकतें और बर्फीली चोटियों को निहारते हुए भी देख सकते है। यहाँ एक सुंदर उँचा मंच भी है, जहाँ कोई ना कोई सांस्कृतिक गतिविधियां भी होती रहती है। आसपास बहुत से होटल भी है। यहाँ बनी हेरिटेज शाप्स ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर की याद दिलाती है।लकड़ी की खूबसूरत नक्काशी से सजी ये दुकाने अभी भी वही पुराना आकर्षण समेटे हुए है।

टाइगर हिल---- यह दार्जिलिंग से 11 किमी दूर है। यह दार्जिलिंग की पहाड़ियों में सबसे उंची चोटी है यहां से सूर्योदय देखना एक अद्भुत अनुभव है। यहां से हिमालय के पूर्वी भाग की चोटियां दिखाई देती है। मौसम साफ होने पर हिमालय की सबसे उँची चोटी माउंट एवरेस्ट  (दूरी 107 मील) भी दिखती है। यहाँ सूर्योदय से कुछ सेकेंड पहले कंचनजंघा की बर्फ से ढकी चोटियों पर सूर्य की लालिमा छाने लगती है। यह मंत्रमुंग्ध कर देता है। टाइगर हिल पर सैलानियों की सुविधा और उन्हें सर्दी से बचाने के लिए एक कवर्ड शेल्टर बिल्डिंग भी बनाई गई है।

घूम मोनेस्ट्री----टाइगर हिल से वापसी में घूम मोनेस्ट्री पड़ा। इस मोनेस्ट्री का निर्माण सन् 1875 में किया गया था। इसमें 15फीट उंची मैत्रैय बुद्ध की मूर्ति विराजमान है। यह तिब्बती बौद्ध का अध्ययन केंद्र भी है। यहाँ महात्मा बुद्ध के समय की कुछ पांडुलिपियां भी संरक्षित है।सुबह ही इस मोनेस्ट्री के बाहर रेलवे लाइन पर भूटिया लोग गर्म कपड़े व अन्य समानों का बाजार लगाते है। यह बाजार सुबह नौ तक ही लगता है, क्योंकि इसके बाद ट्वाय ट्रेन का आना जाना शुरु हो जाता है।

मागढोग योलमोवा मोनेस्ट्री----  मागढोग योलमोवा मोनेस्ट्री बतासिया लूप से थोड़ी दूर पर स्थित है। यह मोनेस्ट्री आलूबारी मोनेस्ट्री के नाम से भी जाना जाता है। यह मोनेस्ट्री बड़ी है, जिसका निर्माण सन् 1914 में हुआ था। इसका संबंध उत्तर-पूर्वी नेपाल से आये नेपाली समुदाय से है। इसकी सजावट बहुत सुंदर है। इसमें बुद्ध और पद्मसंभव की विशाल मूर्तियां है। दीवारों पर खूबसूरत भित्तिचित्र भी बने हुए है। यहां के लोग बताते है कि इनके चित्रों को रंगने के लिए घास और जड़ी-बूटियों से बने रंग का प्रयोग किया गया है।

रोपवे-----चौक से 3 किमी दूर भारत का सबसे पुराना रोपवे दार्जिलिंग में है, जो रंगीत घाटी तक जाती है। जिसे सन् 1856 में शुरु किया गया था। इसे उड़न खटोला भी कहते थे। इसका एक सिरा 7000 फीट की उँचाई पर है, तो दूसरा 800 फीट की उँचाई पर है। इससे नीचे के चाय बगान का विहंगम नजारा तथा दार्जिलिंग के बेहद खूबसूरत पहाड़ों, नदियों और घाटियों के लुभावने दृश्य से मन मयूर नाच उठते है। करीब साढ़े चार किमी की यह यात्रा 45 मिनट में दिल बागबाग कर देता है।

मकाईबाड़ी टी-स्टेट कर्सियांग----दार्जिलिंग में चाय बगान पूरे रास्ते में फैले हुए है, लेकिन सबसे प्रसिद्ध है मकाईबाड़ी टी-स्टेट । यह सिलीगुड़ी से मात्र 30 किमी दूर पहाड़ के दामन में बसे खूबसूरत शहर कर्सियांग में पड़ता है। यहां चाय की खेती आर्गेनिक तरीका से किया जाता है। इसीलिए यहाँ की चाय सबसे मंहगी बिकती है।

पीस पैगोडा---हरे-भरे पहाड़ के बीच में बना एक धवल शांति स्मारक है। यह स्मारक शांति और सौहार्द का प्रतीक है।। यह 94 फीट उँचा है, जिसका व्यास 23 मीटर में फैला हुआ है। इसमें बुद्ध के जीवन-चक्र की चार अवस्थाओं को सोने की पालिश से जगमगाती सुंदर मूर्तियों में उकेरा गया है। इसके अलावा बुद्ध के जीवन से जुड़ी अन्य मुख्य घटनाओं को लकड़ी पर सुंदर नक्काशी के जरिये दिखाया गया है। द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापान के नागासाकी और हिरोशिमा में भीषण परमाणु बम विस्फोट के बाद जापानी बौद्ध भिक्षु निचीदात्सु फूजी ने विश्व भर में शान्ति स्तूपों के निर्माण का संकल्प लिया था। इस संकल्प के तहत उन्होंने यहाँ इसके निर्माण की नींव रखी थी। बाद में इस शांति स्तूप का निर्माण उनके प्रधान शिष्य निप्पोजान म्योहोजी ने सन् 1992 में करवाया। पीस पैगोडा के अहाते से लगा हुआ एक जापानी मंदिर भी है। मुख्य दरवाजे से पैदल चलने के बाद मुख्य मंदिर परिसर में पहुँच जाते है। जापानी बौद्ध मंदिर दो मंजिला भवन में है। जहाँ मुख्य प्रार्थना कक्ष पहली मंजिल पर है। यहां से आती श्लोकों की मधुर ध्वनि पूरे माहौल को अलौकिक बना देती है।

हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट------ हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट एक ऐसी जगह है, जहां पर्वतारोहण से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारियां सहेज कर सुरक्षित रखी गई है। यह संस्थान सन्  1953 में दुनिया की सबसे उँची पर्वत चोटी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाले पहले भारतीय पर्वतारोही तेनजिंग नोर्गे और एडमंड हिलेरी के सम्मान में स्थापित किया गया था यहां एक संग्रहालय और पर्वतारोहण की शिक्षा लेने वाले छात्रों के लिए बोर्डिंग स्कूल भी है। दर्शनीय स्थल तेनजिंग रॉक भी यहीं पर है।

मिनी दार्जिलिंग ः मिरिक----- यह दार्जलिंग जिले में स्थित एक अन्य मनोहर हिल स्टेशन है। यह इतना सुंदर है कि यह पर्यटकों को आकर्षित करने लगा है। यहां भीड़ न होने के कारण लोग आसानी से पहुँचने लगे है। इसका भौगोलिक स्थित ही इसे आकर्षक बनाता है। यह समुंद्र तल से 4905 फीट की उँचाई पर स्थित है। जो चाय की ढ़लान वाली पहाड़ियों से घिरा हुआ है। जंगली फूल, सुंदर झील और क्रिप्टोमेरिया जापानिका के पेड़ इसे स्वर्ग सा सुंदर बना देता है।इस कस्बे के बीच एक झील है, जिसे सुमेंदू लेक कहते है। यह  डेढ़ किमी लम्बी है।  इसके किनारे देवदार के उँचे वृक्ष है।  इस झील में बोटिंग और फिशिंग भी किया जा सकता है। इसके बीचोबीच फ्लोटिंग फाउंटेन है। मेरिक बाजार से थोड़ी दूर उचाई  पर एक सुंदर मोनेस्ट्री है।
यहां से कंचनजंघा श्रृंखला के अद्भुत दृश्य दिखाई देता है और सूर्योदय व सूर्यास्त का नजारा भी देखने को मिलता है, जो मन को मोह लेता है।
चाय बगानों की श्रृंखला-----दार्जिलिंग में एक दिन हमलोग चायबागानों के ही चारों तरफ घूमते रहे। गाड़ी रोककर हम बाग के अंदर भी गये। घूमते हुए हमें वे महिलाएं भी मिली, जो चाय बगानों से चाय की पत्तियां चुन रही थी। हमनें उनके साथ फोटोग्राफी भी किए। जो चीजें कलेन्डर में दिखता था, वहां स्वयं खड़े होकर फोटो खिंचवाना भी बहुत अच्छा लगा। चाय बगानों के साथ ही प्राकृतिक सौंदर्य का भी दर्शन हुआ। रविंद्रनाथ टैगोर का विश्राम स्थल भी देखने को मिला। हल्की-हल्की बूंदाबांदी में जितना मजा चाय की चुस्कियों में मिलता है, उससे ज्यादा मजा चाय के बागानों में घुमकर मिला।

दार्जिलिंग के स्वाद-----अंग्रेजों के समय से बसे दार्जिलिंग को निखारा है बंगाली जंमीदारों, नेपालियों और तिब्बती भूटिया लोगों ने। इसलिए यहां के खानपान में सभी वर्गों के स्वाद का मिश्रण मिलता है। अंग्रेजों के समय का बेकिंग शैली अभी भी मौजूद है। बेहतरीन बेकिंग आइटम चखने के लिए ग्लेनरीज बेकरी मशहूर है, जहाँ एपल पाई, चॉकलेट, रौल, कुकीज जरुर चखना चाहिए।
यहाँ बतासिया लूप पर भूटिया लोग बहुत से लोकल फूड का स्टॉल लगाते है। गरमा-गरम सूप के साथ सब्जियों और मीट से बना थुपका अपने आप में पूरा पेट भरने के लिए सक्षम है।
यहां नेपाल के भी कुछ खास स्वाद चखने को मिलेंगे,जैसे- आलूदम, मोमो, आलू मिमी थुपका। यहां के लोग याक के दूध  से बना चीज छुर्सी भी बनाते है। 
चावल से तैयार किया गया लोकल ड़्रिंक तोंगवा भी यही मिलता है। एक छोटी किस्म की लाल मिर्च होती है, जिसे 'डल्ले कोसानी'कहा जाता है। यह बहुत तीखी होती है । स्थानीय लोग यह मानते है कि यह मिर्च गैस की परेशानी से राहत दिलाती है।

कैसे पहुँचे----यहाँ का नजदीकी रेलवे स्टेशन जलपाईगुड़ी और एयरपोर्ट बागडोगर है, जो दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता सहित सभी बड़े शहरों से जुड़ा है।बागडोगरा से दार्जिलिंग 65किमी दूर है।
दार्जिलिंग की यात्रा पूरी करके हम लोग लखनऊ आ गये, पर दिल में बसी दार्जिलिंग जाने की चाहत अभी भी फिर बनी हुई है।

परिवार संग गोवा में की शानदार मस्ती (यायावरी)

परिवार संग गोवा में की शानदार मस्ती (यायावरी)

 देश-विदेश के पर्यटकों के लिए प्रसिद्ध शानदार गोमांतक भूमि अर्थात गोवा सबके दिलों में बसने व आकर्षित करने वाला दर्शनीय स्थल (अल्टीमेट डेस्टिनेशन) है। यहां की खूबसूरती आँखों को सुकून देती है, तो यहाँ के सागर की लहरें मन में चंचलता भरती है। तभी तो इसकी सुंदरता में रचने और आनंदित होने के लिए लोग दूर-दूर से आते है और यहाँ से सुकून भरी-शांतिपूर्ण लाइफस्टाइल का मजा लेते हुए तरोताजा होकर और यहाँ की यादों को दिल में बसाकर लौटते है। अब यहां के खूबसूरती में एक नया आयाम जोड़ा गया है वह है इको टूरिज्म। यह कुदरती पर्यटन स्थल है अर्थात कुदरत ने इसे हमें जैसा नवाजा है, हम वैसी ही सुंदरता यहां पाते है। इसलिए जो कभी गोवा नहीं आया, वह आना चाहता है और जो एक बार आ गया, वह बार-बार आने को उत्सुक रहता है। यहां की मूल भाषा कोंकणी है।
 गोवा जाने का हमारा पहला अनुभव बहुत उत्साहवर्धक और सुखद अनुभूतियों से पूर्ण था। हम लोग लखनऊ से दिल्ली गये फिर वहाँ से राजधानी ट्रेन से गोवा के लिए रवाना हुए। ट्रेन का सफर बहुत ही ज्यादा उत्साहवर्धक था, क्योंकि हम रास्ते का पूरा लुफ्त उठाते हुए जा रहे थे। हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के स्टेशनों और दर्शनीय साइड सीनों को पार करते हुए हम गोवा पहुंचे। 
गोवा में दिन-रात कैसे बीत गये पता ही नहीं चला। अब बार -बार जाने की इच्छा बलवती होती है। आइए आपको गोवा की खूबसूरती का दर्शन कराते है...जिससे आप भी इच्छुक होंगे और मौका मिलने पर गोवा जरुर जायेंगे------

नार्थ गोवा के बीच पर की मस्ती---नार्थ गोवा के होटल में विश्राम करने के पश्चात हम पणजी बस स्टेशन पहुँचे। वहां की सड़कों पर टहलते हुए वहां का नजारा और शिंगमोहत्सव त्यौहार के पोस्टर और झाँकियां देखने को मिली। इसके बाद हम कोयम्बटूर बीच गये। यहां के समुंद्र की लहरों के बीच हम लोगों ने खूब उधमबाजी, उछलकूद और मस्ती किए।
दूसरे दिन हम जल्दी ही निकल गये। कोकोबीच पर स्टीमर से लहरों पर सैर को निकल पड़े। नाव के हिचकोलों से हमारी सांसें अटकने लगी, पर जब हमें डार्फिन मछली के दर्शन होने लगा तो हम इतने उत्तेजित हो गए हमारा डर अपने आप रोमांचकारी उत्सुकता में बदल गया। अब हम निडर होकर लहरों पर सैर का मजा लेने लगे।
हम अगोंडा फोर्ट, सेंट्रल जेल, जिमी पैलेस, लाइट हाउस देखे। इसके बाद हम कलंगूट बीच (क्वीन ऑफ गोयन बीच) आरमबोल बीच और मोजिम बीच गये। हम लोग लहरों के बीच खूब लोटपोट कर लहरों के विशाल झोंकों का आनंद उठाते रहे।

क्रूज पर बितायी शाम---- शाम का समय हमनें क्रूज पर बिताया। यहां हमें गीत-संगीत के मधुर स्वर के साथ सबके डांस का मजा मिला। हमारे बच्चे भी डांस और संगीत में शामिल होकर मजा लिए।

साउथ गोवा----- नार्थ गोवा घुमने के बाद हम लोग साउथ गोवा के लिए रवाना हो गए। हम कार्बो फोर्ट (राजभवन), सेंट जेवियर्स चर्च, म्यूजियम, श्री मंगुएश मंदिर, महालक्ष्मी मंदिर, बाला कुंडी गवल मंदिर, अवर लेडी ऑफ रोजरी चर्च,सेंडोरस चर्च देखते हुए हम दूध सागर गये।

भगवान महावीर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी---- इसे पहले मोलेम नेशनल पार्क कहा जाता था। पणजी से यह 60 किमी दूर पणजी-बेलगाम हाईवे पर यह वन्यजीव अभयारण्य 107 वर्ग किमी इलाके में फैला है। यहां उँचे पहाड़ भी है और गहरी घाटियां भी। यहां के पक्षी मन को भाते है। यहां पक्षियों और जंगली जानवरों को बहुत करीब से देखने को मिलता है। यहां से एक घंटे की दूरी पर दूघसागर है।

बोन्डला वन्यजीव अभयारण्य----पणजी से 52 किमी और मडगांव से 36 किमी की दूरी पर  बना जंगल बोन्डला वन्यजीव अभयारण्य है। यहां चिड़ियाघर और बोटोनिकल गार्डन भी है। सरकार की तरफ से यहां परिवार के रहने का बेहतरीन कॉटेज भी है। यहां देखने लायक अन्य चीजें डीयर सफारी पार्क, बर्ड लाइफ पार्क, नेचर एजुकेशन सेंटर, रोज गार्डेन भी है।

कोतिगांव वाइल्ड लाइफ सेंचुरी----दक्षिण गोवा का यह पर्यटक स्थल पणजी से 76 किमी की दूरी पर बना है। यही पर सालिम अली बर्ड सेंचुरी तो पूरी दुनिया में जानी जाती है। यह गोवा की प्रख्यात मांडवी नदी के किनारे फैली है। यहां पक्षियों के विविध किस्में देखने पूरे सालभर पर्यटक आते है।

स्पाइस फार्म----कोई भी देसी हो या विदेशी पर्यटक यहां के स्थानीय फूड खाये बिना बिना उसकी यात्रा अधुरी मानी जाती है। दुनिया भर में मशहूर यहां के खाने का असली जायका तो यहां के मसालों में है। यही कारण है गोवा के इको टूरिज्म में स्पाइस प्लांटेशन भी प्रमुख रुप से शामिल है। गोवा के हर्बल गार्डंस पर्यटकों को आकर्षित करते है पार्वती-माधव पार्क प्लान्टेशन केरी नामक गांव में बसा है, जहां ढ़ेर सारे हर्बल कल्टीवेशन किया गया है। ऑर्गेनिक फार्मिंग के अतिरिक्त यहां पर पर्यटको को ठेठ गोवन लजीज खाना भी खिलाया जाता है। इसके अतिरिक्त वालपई गांव के पास रस्टिक प्लांटेशन फलों के बगीचों के लिए विशेष रूप से देखने के लिए उपयुक्त है।
स्पाइस फार्म्स में प्रसिद्ध है पास्कल ऑर्गेनिक स्पाइस विलेज। गोवा की मशहूर खांडेपार नदी के नाम पर एक गांव है खांडेपार। इसी नदी के किनारे पास्कल स्पाइस फार्म स्थित है। यहां पहुंचने के लिए फोंडा शहर से आठ किमी अंदर जाना पड़ता है। मिलग्रीस फर्नांडिस और उनकी पत्नी एमिशिएना के प्रकृति प्रेम ने ही उन्हें पास्कल स्पाइस फार्म का निर्माण करने के लिए प्रेरित किया। 1992 में इन्हें गोवा सरकार का सर्वश्रेष्ठ किसान का पुरस्कार मिल चुका है । 1998 में यह एक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी जीत चुका है। यहां के गेट पर हाथी की सवारी का मजा ले सकते है। खांडेपार नदी में राफ्टिंग का अनुभव भी लिया जा सकता है। मेहमानों के खातिरदारी के लिए गोवन संगीत और नृत्य से सजी महफिल मदमस्त कर देती है। प्रकृति के असाधारण खूबसूरती से सराबोर वातावरण में जब इतनी शानदार मेहमाननवाजी हो , तो क्या कहने। यहां जंगल के बीचोबीच बने रेस्तरां में बैठकर गोवन फूड जैसे--झींगा, लॉबस्टर क्रेब (केकड़ा) सोलकढी का मजा लेना अनोखा अनुभव है। स्थानीय फूड में सीफूड के अतिरिक्त शाकाहारी व कॉर्टिनेटल व्यंजन भी परोसे जाते है। रुकने के लिए खूबसूरत कॉटेज भी है। कई कॉटेज ठीक नदी के सामने है जहां फिशिंग, बोटिंग, स्वीमिंग जैसी सारी मौज-मस्ती उपलब्ध है। दूधसागर का बहता पानी आगे जाकर खांडेपार नदी में मिल जाता है, तभी तो वह इस नदी की सुंदरता में भी चार चाँद लगा जाता है। चारों ओर सुगंध फैलाने वाले खिले फूल, खिले हुए कमल, औषधि वनस्पतियां सबका मिला जुला असर दिवाना बना देती है। लौंग, इलायची, काली मिर्च, जायफल, हींग, हल्दी  जैसे पारम्परिक मसाले तो है ही, साथ में है केसर, वैनिला और एलोवेरा जैसी खोजी औषधियां और बांस, तुलसी, नीम, लेमनग्रास जैसे पेड़-पौधे यहां पर भरपूर है। लोकप्रिय विदेशी फूल-एंथूरियम,ऑर्किड, जरबेरा, बोगनबेलिया, एक्झोरा कयी तरह के फर्न, हेलिकोर्निया, पेंडुलम वगैरह यहां की प्रकृति में रंग भरते है।

दूधसागर फॉल्स---
गोवा से केवल  किमी की दूरी पर कुदरती वाटर-फॉल्स दूधसागर है।  यहां हमें वन विभाग की गाड़ी और लाइफ जैकेट लेना पड़ा। जंगल के बीहड़ रास्तों से गुजरते हुए हम फॉल्स के पास पहुंचे। गाड़ी छोड़ने के बाद हम उँची-नीची फिसलने वाली चट्टानों पर पांव बढ़ाते हुए हम फॉल्स के पास पहुंचे। आगे चट्टानों को बेधती हुई पानी की लहरें कलकल करके बह रही थी।  हम आह्लादित होकर पानी के पास एक चट्टान पर बैठ गये और पैर पानी के सुपुर्द कर दिए। अब पानी अपने रफ्तार से हमारे पैरों को भी बेंध रही थी। ठंड़े पानी में भीगते हुए ठंड़ी का पूरा एहसास और सिरहन हो रही थी। बेटी बार-बार आगे न बढ़ने की हिदायत दे रही थी। जिसके प्रत्युत्तर में मेरे पति बोले,"यहां कोई ड़ूबेगा नहीं।" तब बेटी बोली," जो चट्टान हमें रोकेंगे, वही हमें चोट भी तो पहुंचा सकते है।" ठीक उसी समय एक महिला फिसल गई। हम घबड़ाकर उसे देखने लगे। तभी वह स्वयं ही सम्भल गई और फिर परिवार वालों ने उसे उपर खिंच लिया।
स्वप्नगंधा जंगल में कोलारघाट में स्थित दूधसागर वाटरफॉल्स गोवा-कर्नाटक सीमा पर स्थित है। उंचाई में यह प्रपात भारत में पांचवे नंबर पर है। अति उँचाई से बड़े वेग से गिरता पानी दूध के समान सफेद दिखता है, तभी इसका नाम दूधसागर पड़ा। यहाँ की खूबसूरती दिल-दिमाग और आँखों को सूकून देती है। यहाँ के पानी में पैरों को डालकर, भींगने और लोगों को भिगोने में बहुत मजा आता है। यही मजा लेने लोग दूर-दूर से यहाँ आते और समय व्यतीत करते है।
पणजी या मडगांव से टैक्सी या बस से यहाँ पहुँचा जा सकता है। 2000 फुट की उँचाई से गिरते इस झरने के ठीक सामने कुछ मीटर की दूरी पर रेल पटरी गुजरती है। रेलयात्री भी इस विहंगम दृश्य का अवलोकन ट्रेन में बैठे- बैठे ही लेते है। मड़गांव से यहाँ ट्रेन से भी आया जा सकता है। रोमांच प्रेमी प्रपात के सहारे-सहारे चट्टानों व झाड़ियों पर चढ़ाई करते हुए इसके शीर्ष तक पहुँचा जा सकता है।

कोला बीच----दूधसागर से लौटकर हम कोला बीच आयें। कोला गावं से उबड़खाबड़ रास्ते से चलती हुई हमारी कार कोला बीच पर पहुंची। अब हमें नीचे रिजार्ट षतक पैदल ही जाना था। अपने टैंट तक आने पर हमें खुशी बहुत हुई क्योंकि हमारा टैंट समुंद्र के किनारे ही था।  थोड़ा विश्राम करके हम बीच पर आ गये। दो दिन हमें यहीं रुकना था। खुशी इस बात की थी कि हम समुंद्र की लहरों को बिना किसी व्यवधान या रोकटोक के किसी भी पल निहार सकते थे।
रात में अचानक महसूस हुआ कि बाहर आंधी-तुफान जैसी तेज हवा चल रही है। मैं अपनी उत्सुकता दबा नहीं पायी। भय मिश्रित माहौल में धीरे से दरवाजा खोल कर झांकी तो बाहर समुंद्र की लहरों की गूँज या यूं कहे शोर ही सुनाई पड़ा। यह शोर मुझे रोमांचित करने लगा, पर डर के कारण शीघ्र ही दरवाजा बंद कर ली।
हमें तैरना आता नहीं था इसलिए हम यहां के लहरों की झकझोरते हुए उँचे-उँचे उफनती वेग को झेल नहीं पाते। इसलिए हम यहां के सागर की लहरों का मजा वैसे नहीं ले पाये जैसे नार्थ गोवा के बीच पर लिए थे। घुटनों तक लहरों का मजा लेते रहे और सागर तट पर लेटकर सनवाथ का मजा भी लिए। समुंद्र के सामने ही छिछले साफ पानी का बड़ा सा तालाब जैसा भाग था। यहां का पानी बिलकुल साफ, पारदर्शी, शीतल और प्राकृतिक नजारों वाले नारियल के पेड़ों से घिरी धीमी-धीमी ठंड़ी हवा के झोंकों के साथ बह रही थी। हम यहां के पानी में घंटों लोटपोटकर नहाते रहे। दो दिन का प्रवास बड़ा सुखद और मनोरंजक था। आनंद के अतिरेक से अभिभूत होकर हम तीसरे दिन मड़गांव आ गये। हमने काजू और मसालों की ढ़ेर सारी खरीदारी किए ताकि लोगों को उपहार स्वरूप भेंट दिया जा सकें।
ट्रेन आने पर राजधानी ट्रेन से हम दिल्ली आ गये। एकदिन दिल्ली में रुककर हम लखनऊ आ गये।
हम अपने शहर लखनऊ तो आ गये ,पर मन अब भी भटककर गोवा की हसीन वादियों और लहरों के बीच पहुंच जाता है। तब हम वहां के उस  सुखमय क्षणों में खो जाते है, जो हमनें वहां महसूस किया था।

कैसे घूमें-----
गोवा की सड़के बेहद आराम दायक है। यहां कहीं से भी कहीं जाने के लिए किराये पर मोटरसाइकिल और कार उपलब्ध है। निजी बस सेवा और सरकारी बस सेवा भी हर शहर के लिए उपलब्ध है। दूधसागर या मडगांव से टैक्सी या बस से यहां  पहुंचा जा सकता है। दूधसागर के झरने से गिरते पानी से कुछ मीटर की दूरी पर ही रेलवे लाइन है। मडगांव से ट्रेन से यहां आया जा सकता है। मडगांव से दिल्ली-मुम्बई व अन्य जगहों के लिए सीधी ट्रेन है।दांबोलिन हवाई अड्डा भी मड़गांव से पांच किमी दूर है।


टपकते बूंदों में आह्लादित मन (संस्मरण)

झमाझम बरसते पानी की बड़ी-बड़ी बूंदें जब तन मन को भिगोकर तरबदर करती है, तब वह मुझे अतीत के झरोखों से आती हुई उस  सुनहरे पल की यादों के सुखद अनुभूति में डूबों कर भींगों जाती है, जो बरसात के मौसम में अनजान झोपड़ी के छत से टपकते बूंदों की वजह से कालेज के जमाने में मिली थी, और जिसकी मधुर स्मृति जेहन में आज भी जस की तस सुर्ख गुलाब सी अंकित है। 
नौवीं कक्षा गवर्नमेंट गर्ल्स इण्टर कालेज में पढ़ी, तो पापा के ट्रांसफर के कारण दसवीं में पढ़ने के लिए श्री सिंहेश्वरी इण्टर कालेज में नाम लिखाना पड़ा। यहाँ के बदले कस्बानुमा माहौल में लड़को के साथ पढ़ना…एकदम नया, अजीब पर मजेदार अनुभवों से लबरेज था। नया सेशन शुरु होते ही कालेज आना-जाना शुरु हो गया। कालेज में पूरी छात्राओं की संख्या बहुत कम थी। मैं अपनी कक्षा में अकेली थी। तभी तो कक्षा में मैं सबकी बातें सुनती ज्यादा, पर बोलती कम थी। इसी बीच अनजाने में ही एक सहपाठी के आकर्षक व्यक्तित्व ने मुझे अपनी तरफ आकर्षित कर लिया। अब मेरा ध्यान उसी के इर्दगिर्द केंद्रित रहने लगा अर्थात न देखने पर उसकी राह ताकना, देख लेने पर नजरें चुराना, हरकतों को महसूस करना और बातों पर कान लगाये रखना। ये गतिविधियाँ मैं बड़ी खामोशी और सावधानी से करती, ताकि मन के भाव उजागर न हो जाए।

एकदिन मध्यावकाश के बाद कक्षा में आने पर सुनाई पड़ा," ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से"। मैं अचकचाई। क्योंकि यह पाठ सिर्फ मेरे किताब में ही था। किताब खोली तो मुझे उस पर लिखी गाने की दो पंक्तियां दिखी। मेरे एक-दो आर्ट के पन्ने भी गायब थे। मुझे आभास हुआ कि मेरी अनुपस्थिति में किसी ने मेरे किताब-कापी को खंगाला है। तमतमाया चेहरा अध्यापक के सामने फट पड़ा। खोज-खबर लेने पर दो छात्रों का नाम सामने आया। जिसमें एक मेरा प्रिय सहपाठी भी था। पूरी कक्षा के सामने डॉट सुनना भला किसे रुचिकर लगेगा, वो भी तब, जब वह कक्षा का सबसे मेघावी छात्र हो। उसके उतरे और बनते-बिगड़ते चेहरे को देखकर मुझे अपनी हड़बड़ी पर ग्लानि हुई। मैंने तत्काल ही किसी छात्र की शिकायत न करने का संकल्प ले लिया। दिन यूं ही बीतते गया। एकदिन अंग्रेजी की कापी उसके हाथों मुझे मिली तो उस कापी के पहले पेज पर एक फूल अंकित था। उस फूल के एहसास में मैं खो गई, फिर किसी की धरोहर समझ उसे सहेज ली।  

 बरसात के मौसम का एकदिन कालेज में छुट्टी होने का समय था। बदले मौसम में आती जाती घनघोर घटाओं की गरजतड़क तड़तड़ाहट कानों को बेधती हुई दिल की धड़कनें बढ़ा रही थी। भीषण बरसात का डर था। यदि पानी झमाझम बरसा तो घर कैसे पँहुचेंगे? मन की अकुलाहट छुट्टी की घंटी सुनने को बेताब थी। तभी घंटी टनटना गई। पिंजड़े में बंद पक्षियों का झुंड पिंजरें का फाटक खुलने पर अफरातफरी मचाती हुई जिस तरह खुले आकाश में फड़फड़ाती हुई उड़ने को बेताब लगती है, वैसे ही सारे बच्चे अपना बैग समेंटे, हो हल्ला मचाते हुए कक्षा से निकलकर भेड़िया धसान सा फाटक की तरफ भागे। कालेज का मुख्य फाटक बिल्ड़िंग से दूर था।  कालेज मुख्य बस्ती से डेढ़-दो किमी अंदर कंक्रीट सड़क से जुड़ा था। बच्चों का झुंड कालेज से निकल तो गया, पर बेताब बूंदों ने किसी को घर पहुंचने का मौका नहीं दिया। झमाझम बरसात होने लगी। सबकी बौखलाहट बढ़ गई। छिपनें की कोशिश होने लगी। पगडंडी के एक तरफ खेतों में इक्कादुक्का झोपड़ी, तो दूसरे तरफ खेतों के पार रेलवे स्टेशन। जिसको जहाँ जगह मिला, वह वहीं पनाह लेने को मजबूर हो गया। हम 15-20 छात्र-छात्राएं एक खाली झोपड़ी में घुस गये। छोटी सी झोंपड़ी खाली, पर साफ था। फिर भी गोबर की सुगंध नथुड़ों को फुला-पिचका रही थी। मजबूरी में एक दूसरे से सटे-सिमटे भींगते हुए खड़े होने को सभी मजबूर थे। अचानक झोंपडी के छत से भी पानी की बूंदें टपकने लगी। टप-टप टपकती बूंदों के बीच दोस्तों के सामिप्य व सांनिघ्नता में डर से सहमें हुए स्वयं में सिमटने की कोशिश बेकार थी। थोड़ी देर में छात्रों की टिपकारियाँ माहौल को मजेदार व खुशनुमा बनाने लगी। हम भी मंद मंद मुस्कुरा कर मौसम का मजा लेने लगे। अचानक ऐसे माहौल में अपने प्रिय साथी को अपने बहुत करीब पाने और महसूस करने का पहला अनुभव दिल के धड़कनों को बढ़ाने वाला था। घबड़ाहट में नैनों के बाण टकरा ही गये, तो धुकधुकी तेज हो गई, पर मैंने स्वयं को समेट लिया और लाज से सिमटती, संकुचित होते हुए मधुर एहसास में डूबी रही। मैं ही क्यों..वहाँ तो सभी अपने अंदाज में आनंद के रस का रसास्वादन लेने में मस्त थे। करीब आधें घंटे बाद जब पानी थोड़ा कम हुआ तो भीगते हुए हम झोपड़ी से बाहर निकलने को आतुर हुए। उसी समय कोई मुझसे टकरा गया। एक पल को मैं ठिठक गई। पीछे मुड़कर नजर टकराने वाले को देखी तो लाज से दोहरी हो गई। मेरा प्यार.. मेरे इतने करीब। मन आह्लादित होकर पोर-पोर को पुलकित कर गया। मैं अजीब सी तरंगों से तरंगीत व झंकृत हो गई। पर मौका बाहर निकलने का था, तो मैं झटके से बाहर निकल गई। इधर सड़क के लड़के और खेतों के उस पार स्टेशन से निकलने वाले बच्चे भी समवेत स्वर में हो हल्ला मचाने और उछलते-कूदते हुए भागने लगे। पानी अब भी बरस रहा था। मेरे मन की तरंगें अब भी सड़क पर इकट्ठी पानी की लहरों की तरह हिलोरें ले रही थी। मैं मद मस्त सी भींगते हुए और अपने भींगते बैग को बचाने की जद्दोजहद में लम्बे-लम्बे डग भरती हुई घर पँहुच गई। दूसरे दिन भी संकुचित मन की धड़कने तेज थी, बेताब नजरों को काबू में करने और स्थिति को सामान्य करने में थोड़ा समय लगा।

ऐसे ही मन के भावों की आँखमिचौली और उथलपुथल में कालेज का बाकी समय भी बीत गया। एहसास के भंवरजाल में दोनों फँसे थे, पर मन के भावों को हम एक दूसरे तक पहुँचा नहीं पाये, क्योंकि एक अदृश्य लक्ष्मण रेखा हम दोनों के बीच खींची थी, जो अंत तक बरकरार रही।
परीक्षा हुआ। हम फिर बिछुड़ भी गये। बिछुड़ने का वह आखिरी पल भी मेरे जेहन में जस का तस बना हुआ है। पेपर समाप्त होने पर वह मेरे सामने से गुजरा और चलता चला गया। मैं ठिठकी हुई उसे ओझल होने तक अपलक निहारती रही। यही मिलन की आखिरी घड़ी थी।
छुट्टियों में ही पापा के ट्रांसफर के कारण कालेज क्या छूटा, साथी भी छूट गया। बचपन के प्रेम पर मर्यादा का मूक आवरण चढ़ा ही रह गया। मुझे  न अता, न पता, न उसके रहने का ठौर-ठिकाना ज्ञात था। बस दिल में मधुर स्मृतियों की सूक्ष्म छाप ही शेष थी।
बचपन के बचपना में किए गए प्रेम के अनुभूति की पैठ बहुत गहरी थी। जो दिल की गहराईयों से निकलती नहीं। आज उम्र के इस पड़ाव पर संतुष्ट हूँ कि प्यार सिर्फ पाने की पीड़ा नहीं होती। यह तो बिछुड़ने के बाद की वह खूबसूरती है, जो हर थोड़े अंतराल के बाद मधुर झोंकों के रुप में थपथपाती, गुदगुदाती व सुधबुध हरती हुई मेरे उद्विग्न-उद्वेलित मन को अपने आगोश में छुपा लेती है। फिर उस पल को जीवंत करने का मौका देती है, जो पल प्रेममय सुखद एहसासों से पूर्ण था।
'हमारी नजरों में आज तक वो हिना की खुशबू महक रही है।'
यही जीवन चक्र है, जो वर्तमान में रहते हुए अतीत को आगोश में छुपाये हुए भविष्य की ओर कदम बढ़ाता है।

घर और बच्चे (चित्रकारी-3)


सबका होता है...एक सुंदर सपना...अपना घर और अपने बच्चे।

सबका सपना घर हो अपना (चित्रकारी-7)

बचपन (चित्रकारी-2)

गांव (चित्रकारी-4)

तृप्ति (लघुकथा)