आखिर अक्ल आ गई (लघुकथा)

आइसोलेशन के 14 दिन अस्पताल में बिताने के बाद मनोज का रिपोर्ट जब निगेटिव आया, तब उसे अस्पताल से छुट्टी मिली। घर लौटते समय मनोज खुश होने की अपेक्षा ग्लानि से भरा हुआ था। कोरोनाकाल में मिले भयंकर असहनीय एकांतवास के पल में वह विक्षोभ-विषाद से विचलित था। उसे पापा के मौत के बाद के माँ के चार साल के आइसोलेशन पीरियड की पीड़ा आइना दिखा रही थी। सबके होने के बावजूद माँ के अकेलेपन के दुखदायी दर्द को झेलाने में उसका भी बड़ा हाथ था। 

घर पँहुचकर मनोज स्वागत में पलकें बिछाये उल्लसित खड़े पत्नी-बच्चों और पड़ोसियों को छोड़ता हुआ जब वह उपेक्षित पड़ी खामोश माँ के कमरे में गया तो सभी आवाक हो गये। मनोज माँ को पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगा। माँ-बेटा का यह मिलन पत्नी और बच्चों को भी विचलित कर दिया। कुछ न समझ पाने की स्थिति में वे मूकदर्शक बने एकतरफ खड़े थे।

माँ रजनी भी बेटा के सिर को सहलाते हुए खुशी के आँसू रो रही थी। जिस पल को तरसती उसकी आँखें अब तक निश्तेज हो गई थी..वह खुशी के पल उसे अचानक कैसे नसीब हो गया? वह बेटा के मुँख को चुमती हुई उसके मुँखड़े को हथेलियों में भरकर मूक नजरों से निहारने लगी तो मनोज जोर से सिसकता हुआ माँ के आँचल में मुँह छुपाकर और जोर से रो पड़ा। उसके बोल फूट नहीं रहे थे।

जी भरके रो लेने के बाद मनोज उठे और माँ को सहारे से उठाते हुए बोले," माँ, अब तुम यहाँ नहीं, बल्कि हम लोगों के साथ आगे रहोगी, जहाँ हम सब एकसाथ रहते है।"

"बेटा, ये तुम्हारे बोल है, वो भी अपनी पत्नी के सामने?" माँ रजनी आश्चर्य से बोली।

"हाँ माँ, कोरेंनटाइन के कठिन एकांतवास पल ने एकांतवास की दुश्वारियों और उपेक्षित जीवनशैली की कटुता से जब मेरा परिचय कराया तब मुझे अपनी गलतियों का आभास हुआ। माँ इस सीख ने मेरी आँखे खोल दी है। अब ऐसी गलती दुबारा नहीं होगी। अब हम सब एक साथ मिलजुल कर रहेंगे।"

देर से ही सही, पर दुरुस्त हुए बेटा को एक बार फिर गले लगाकर माँ फफक पड़ी। इसी बीच बहू और पोता भी पास आकर उनके गले लग कर रोने लगे । थोड़ी देर में खुशियों का माहौल छा गया।

 कोरोना एक बार एक परिवार में पॉजिटिव क्या हुआ...निगेटिव हुए उनके संबंधों की डोर को भी पॉजिटिव कर दिया।



डरने से अच्छा है जीना (सोच)

थक गया हूँ, बुझ गया हूँ, 
मन में दहशत फैल गई है, 
लॉकडाउन में अकेला दिल कमजोर होने लगा है, 
यदि मन-मस्तिष्क की सारी किवाड़ें कोरोनाकाल में बंद कर ली हैं, 
तो मायूस होकर यू हीं पड़े रहकर अपने दिल-दिमाग को और कुंद मत करो। 
बुझो नहीं, रुको नहीं, ठहरों नही, 
उठो, 
बंद होते दरवाजे को खोलो...
अपने मेहनत और मशक्कत से। 
फिर खिलते फूल-पत्तियों और पेड़ो को निहारों। 
सूर्य-चाँद-सितारों की कर्तव्यपरायणता को सराहों, उनकी खुशियों में खुशियाँ ढ़ूढ़ों। 
फिर फूल खिलाओं, तुलसी रोपों, पेड़ लगाओ, मिट्टी खोदो, गमले सजाओ, गमले रंगों। 
अपने मन-पसंद क्रियात्मक कार्यों को करके मन लगाओ, मन बहलाओ। 
ऐसा करके उत्तम पलों को जी कर आनंदित हो। ये सब जाने कितने काम व उत्तरदायित्व है तुम्हारे पास… जो तुम लॉकडाउन व विषम परिस्थितियों में अकेले रहकर भी करके स्वयं को उर्जावान बनाकर जीवंत कर सकते हो।
फिर तुम्हें किसी चीज से डरना क्या? डरोगे तो जीते जी मर जाओगे… मर जाओगे तो तुम्हारे सहारे जो है, उन्हें बहलायेगा और सम्भालेगा कौन? 
इसलिए स्वयं उर्जावान बनों, स्फूर्ति लाओ, दूसरो के जीवन को जीवन प्रदान करने के लिए जीवंत बनों और उस काम में जुट जाओ, जिन्हें करके तुम स्वयं को उत्सुक कर सकते हो और लोगों को उत्साहित करके जीवन के प्रति सकारात्मक सोच को प्रेरित करके, उन्हें जीवंत कर सकते हो…...। 
जीवन जीने का नाम है...।

कोरोनाकाल की होली (व्यंग्य)

ये कोरोना महामारी होली के हुड़दंग के पहले ही क्यों अपना बवाल मचाकर होली के रंग में भंग डालता है। क्या इसे लोगों की मस्ती के रंग में डूबना व उतराना बिच्छू जैसा डंक मारता है। तभी तो होली के आगमन के ऐन मौके पर ही यह सुरसा की तरह मुँह बाकर लोगों के दिलों में डट जाती या उनके शरीर में आकर धमक जाती है, फिर देश में, समाज में अपना वीभत्स रुप दिखाने के लिए ताण्डव करने लगती है। पहले यह लोगों को डराकर अपने जाल में फँसाने के लिए चुपके से दस्तक देती है, फिर अपनी पैठ एक शरीर में बना लेती है। एक के बाद यह दूसरे और तीसरे शरीर में भी पँहुचने का दम्भ भरने लगती है।
वैसे एक के शरीर से दूसरे के शरीर में पँहुचने के लिए इसे भी अधिक मसक्कत करनी पड़ती है, क्योंकि जो सावधान रहते है, उनके पास यह फटकती और उन्हें यह छूती भी नहीं है, पर जो लापरवाही के आलम में थोड़ा भी डूबते-उतराते है, उन्हें वह अपने दामन में जकड़ लेती है। पिछले साल दुनिया को तबाही के राह में ढ़केलने के बाद भी इसे सुकून व शांति नहीं मिली, जो एक जगह सिमटकर जम जायें। तभी तो चली आई है, झुनझुने सी ठुमकती-मचलती बिन बुलाये मेहमान की तरह। होली के आकर्षक मौसम में, होली के रंग में भंग डालने होली से ठीक पहले यह फिर आ धमकी और पसरी है।
 कितने प्रयास हो रहे है..इसे भगाने, खदेड़ने और चारों खाने चित्त करने के लिए। मुँह पर मास्क चिपकाएं, पीपी कीट पहने, दो गज की दूरी बनाये, बार-बार हाथ को साबुन से रगड़-रगड़कर दुबला कर दिए, लॉकडाउन होकर स्वयं को घर में कैद करके योग विद्या में घुसकर पालन भी करने लगे, पर इस मुई को इतनी तबाही के बाद भी चैन नहीं मिला। चली आई फिर अपने ताम-झाम और दुश्वारियों के साथ अपना नंगा डरावना नाच दिखाने के लिए।
कोरोना महामारी क्या आया..पूरे होली का मस्ती ही ले डूबा। पार्क में दोस्तों संग मस्ती की फुहार, गुझियों की मिठास, रंग-बिरंगें रंगों की बौछार..जीभ पर  लपलपाते हुए स्वाद के लिए मचलते दिल में उत्साह और उमंग की कमी चारों तरफ दिख रही है। कुछ लोग मन मसोसकर बैठे है कि फीकी ही सही, पर होली के रंग से अपने गुलाबी गाल को थोड़ा बहुत ही सही रंगीन तो करेंगे ही। भले ही होली के हुडदंग व अफरातफरी थोड़े थमें हुए क्यों न हो?
पर मेरी बात और है। मैं जोश, उमंग व उत्साह से पूरी तरह लबरेज बहादुर युवा जो ठहरा। खुशियाँ मेरे अंग-अंग से टपक  रही थी। मुझे कोई डर अपने बंधन में जकड़ नहीं सकती थी, इसलिए कोरोना की ऐसी की तैसी करके मैं मदमस्त हो गया। मैंने ठान लिया कि सालियों और भौजाइयों की खट्टी मीठी नोंकझोंक की गूँज से अपनी होली रंगीन करुंगा ही, साथ में भर-भर पिचकारी के रंगीन रंगों की बरसात करके सबको सराबोर भी करुंगा...इसी मीठे सपनों में रमा हुआ मन ही मन गुलछर्रों की बौछार करने के लिए सावधानियों की धत्ता बजाते हुए निर्भीक हीरो की तरह बेखौफ बिना मास्क लगाये, दो गज की दूरी को भूलकर इस बाजार से उस बाजार टहलता और धड़ामचौकड़ी मचाता ही रहा। घर आकर हाथ धुलने की गुस्ताखी भी नहीं किए। होली की तैयारियों में कुछ भी नहीं छोड़ा- सबके नये कपड़े बनवाये,श्रृंगार की सामग्री भी खरीदे। पकवानों के लिए रच-रचकर सामग्री इकट्ठा किए। और गर्व से इतराते हुए घर आ गये।
पर वाह रे कोरोना महामारी। कोरोना को मेरी इतनी हेकड़ी रास नहीं आई। वह हमसे भी तेज थी, इसलिए बदले की भावना से लबरेज होकर अचानक मेरी सभी तैयारियों को अंगूठा दिखाती होली से पहले ही मुझ पर आक्रमण करके मुझे दबोच लिया। घर में अफरातफरी मच गई। लोग कोरोना के कारण मुझ बेबस-लाचार को ले जाकर कोरोना अस्पताल के एक बिस्तर पर पटककर अकेला छोड़ दिया और मुड़कर भी नहीं देखा।। मन के रंगीन सपनें फुर्र हो गये। साल भर इंतजारी के बाद आया रंग-बिरंगी होली बेजान हो गई। कोरोना बीमारी के मायाजाल में फँसने के कारण नितांत अकेला पड़ गया । होली के दिन के मन में फूटने वाले लड्डू मन में ही फूटकर चारों तरफ बिखर गये।
शुक्र है होली के दो दिन पहले ही घर आ गया और कोरेंनटाइन कर दिया। मेरे कमरे में आने की सबको मनाही थी, पर मैं दूर से ही होली को रंगीन होते सबके चेहरे पर देख रहा था। सब नख से शिख तक रंगों से सराबोर थे। चटकारे ले लेकर खाते पकवानों की खुशबू मेरे नथुनों को फुला-पिचका रही थी। सबकी होली रंगीन थी, पर मेरी एकदम फीकी व नीरस थी।
वाह रे होली की मस्ती का रंगीन सपना। लापरवाही की ऐसी भारी मार पड़ेगी, इसका सपनें में भी हल्का आभास नहीं था कि सर मस्ती के बजाय कोरोना बीमारी के कारण चकराने, झूमने और नाचने लगेगा। अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत। इसीलिए कहते है मस्ती और उमंगों में डूबों, पर ऐसा न डूबों कि लेने के बजाय देना पड़ जाये...मेरी तरह।
आप लोग होली में स्वस्थ्य रहे, प्रसन्नचित्त रहे और होली के रंगों से सराबोर होकर जोर से चिल्लाये...होली का त्यौहार मंगलमय हो...हैप्पी होली।
 

होली के मस्ती की दर्द भरी दास्तान (व्यंग्य)

रंग-बिरंगी होली के मादकता में चकरघिन्नी की तरह नाचता यह बौराया बावला मन अब कोरोनाकाल के महामारी में भय, दुख, पीड़ा, उलझन व आक्रोश से युक्त मजबूरियों के मकड़जाल में फँसा हुआ मधुमक्खी सा बिलबिला रहा है। पहले होली के क्या रंगीन दिन थे? सालियों के मादकता से यौवन भरे चुहलबाजी का रसपान करते हुए कितने आंनद की अनुभूति होती थी। सालों के साथ मिलकर मुहल्ले की छोरों-छोरियों पर नजर टिकाएं बैठे घंटो समय गुजार देते थे। ऐसे में कोई रोकने-टोकने वाला नहीं मिलता। खूब रसभरी का आनंद लेता था। यदि भूले-बिसरें से कोई टोक भी देता,"अरे यार, कितनी मस्ती में चूर हो? अभी से इतनी जल्दी भांग चढ़ा लिए हो क्या?" तब ऐसे समय में कितनी सरलता से हँसकर खीसें निपोरते हुए बात टालकर कह देते थे,"अरे भाई, होली का मस्ती भरा रंगीन त्यौहार है। होली कोई रोज-रोज थोड़े आती है। फिर ऐसा मौका कब नसीब होगा?"

पर ऐसे में मुझे सूंघती-सांघती, रंग में भंग डालती श्रीमती जी हर समय सीने पर मूंग की दाल पिसती अपनी मोटी (गुस्से में कहा गया संबोधन) सूरत लिए सामने प्रकट हो जाती। कितनी भी नजरें बचाने की कोशिश करता, पर चोरी पकड़ ही ली जाती। फिर सर पर गुम्बद फुलाना व एक समय का उपवास मेरी मजबूरी बन जाती। हाँ भाई, जब श्रीमती जी मेहरबान होंगी ही नहीं, तो भूखे चूहे को दाना-पानी देगा कौन? 

ऐसे में टसूएं बहाने के सिवा बचता ही क्या है, पर मैं भी जनम का ढ़ीठ व कमीना जो हूँ। मुझे लाज तो आती नहीं, इसलिए बहाना मिल जाता था साली के घर जम जाने के लिए। भूखे को दानापानी का गुहार लगाते पँहुच जाता किसी साली के घर, तो साली की हमदर्दी के साथ ही हँसी-ठिठोली में समय गुजारने का मौका रसगुल्ले की तरह मुलायम व गुदगुदाने वाली लगती थी। अरे यार, बीवी का डर तो मन के कोने में बैठा मुझे झाडू मारने वाले अंदाज में आगाह तो कर ही रहा था। पर मैं उसके खोदने वाली टीसों को परे ढ़केलकर अपने ही मौज-मस्ती में डूबा अठखेलियों में लोटपोट रहा था। घर जाकर जो डंडे बरसेंगे, उसे इस मस्ती के बदले में सह लूंगा। इसलिए आज बीवी की ऐसी की तैसी। बीवी तो रोज अपनी है..वासी है। पर साली को तो बस होली तक ही अपनी रसभरी जायदाद समझना है। क्योंकि इस मस्ती भरे माहौल में कुछ पल की मस्ती जायज होती है।

पर इस कोरोना महामारी ने तो सारा मजा ही गुड़गोबर कर दिया है। वह दिलेरपने वाली होली की मस्ती अतीत के सुहाने सपनें में तब्दील हो गई है। अब तो मुँह पर टाट की पट्टी चिपकाएं सालियाँ एक मीटर की दूरी को कम करने का नाम ही नहीं लेती है। यह दूरी चुपके से कम करने का हल्का भी प्रयास करो तो वे सजगतापूर्वक जोर से चिल्ला पड़ती है,"अरे रे रे... जीजा जी, दो कदमों की दूरी, रखना है बहुत जरुरी। वरना कोरोना के महामारी में, मरना पड़ जायेगा बखूबी।"

 अभी मैं सम्भल भी नहीं पाता कि बीवी का बेलन मुंड़ी पर अपना प्रसाद दे चुकी होती है। मैं पीड़ा से कराहने की बेला में भी मुँह दबाकर सिर पकड़कर धम्म से बैठ जाता हूँ। मेरी रोनी सूरत पर सबका खिलखिलाना बहुत भारी लगता है। फिर मैं बहाने बनाकर आशिक मन को राहत पँहुचाने के लिए दूसरे साली की सांकल खटखटाने पँहुच जाता हूँ दूसरे साली के घर। सालियों का कोई अकाल तो नहीं पड़ा है। गली-मुहल्ले हर जगह साली-भौजी मिल जाएंगी। देखे बीवी कहाँ-कहाँ पँहुचती है। ऐसे में बीवी से भी आँखमिचौली खेलने में मजा ही आता था। वह डाल-डाल तो मैं पात-पात। क्योंकि मैं भी खानदानी नामी गुंडा हूँ। इतनी जल्दी हार मानने वालों में नहीं हूँ।

पर वाह रे कोरोना महामारी का वीभत्स रुप। सारा होली का रंगीन गुलछर्रों वाले मस्ती का गुड़गोबर ही करके मेरी पलीदी निकाल दी है। बीवी की सख्त चेतावनी है कि होली तक घर से बाहर पैर निकाला, तो हड्डी-पसली एक कर दूंगी। कोरोना तो एक बहाना है, बीवी को अवसर मिला सुहाना है। अब मैं, न हँसने में हूँ, न रोने में हूँ...बस मुँह पर मास्क लगाकर घर के कोने में दुबका बैठा सिसकियाँ भर रहा हूँ।

 वाह रे, इस बार की होली। न पिछले बार पिंड छोड़ा और न इस बार छोड़ने का इरादा है। कभी-कभी मन में ये ख्याल आता है कि खतरा किससे ज्यादा है-- बीवी से या कोरोना से। क्योंकि ये दोनों होली के त्यौहार में रंग में भंग डालने की होड़ में एक-दूसरे को पछाड़ने के लिए डंड़ बैठक करने पर तुली है।

फुस्फुसवाँ (छोटी कहानी)

काम करते हुए रमिया के हाथ अचानक रुक गये। उसकी उत्सुक छुपी निगाहें झटके से उधर अटक गई, जहाँ शीलू दीदी अपनी मौसी और उनकी बेटी पूजा के साथ हँसी-ठिठोली लगाने में व्यस्त थी। रमिया अपनी जिज्ञासा दबा नहीं पाई। वह मन ही मन में उस मस्ती भरे जादू की छोटी सी शीशी के आकर्षण में डूबे लोगों को देखकर बहुत उत्तेजित हो रही थी, जिसे पूजा दीदी शीलू दीदी के लिए उपहार में लायी थी।

शीशी में न जाने ऐसा कौन सा आकर्षण भरा था, जिसे फुस्सफुसा कर निकालते और हथेलियों पर लगाकर, सुँघते और दूसरे को सुघाँते हुए मदमस्त हो रहे थे।

 हँसी-फौहारों के बीच रमिया की भी उत्सुकता हिलोरें मारने लगी, सारा ध्यान उन लोगों पर केंद्रित होने के वाबजूद कहीं कोई उसकी चोरी न पकड़ ले, यह सोचकर वह अपने काम में व्यस्त होने का दिखावा भी करती रही। रमिया शीलू की हमउम्र गाँव की वह छोरी थी। जो पहली बार शहर के चकाचक माहौल में अपने को अभ्यस्त करने की कोशिश करती।

रमिया उम्र के उस नाजुक दहलीज पर कदम बढ़ा चुकी थी, जहाँ उमंग-उत्साह व उत्तेजना में बहना आम बात होती है। रमिया की  चाहत भरी नजरें शीशी पर टिककर सोचने लगी,' वाह,बहुत मजेदार चीज है, काश मुझे भी मिल जाता, सुंधने और मस्ती मारने के लिए।' रमिया की भावनाएं मन ही मन में गोता लगाने लगी। वह शीशी को हाथ में लेकर उसके मजेदार चीज को हथेली पर लगाकर सुंघना चाह रही थी। पर नयी-नयी कामवाली होने के कारण वह मन मारकर रह गई। उसकी अधुरी चाहत उसके मन में दबकर कहीं छुप गई।

रमिया को सालभर हो गया था शीलू के घर काम करते हुए। अब वह शीलू और उनकी मम्मी-पापा सबकी चहेती बन चुकी थी। 

रमिया की शादी तय हो गई। अगले महीने उसकी शादी थी। वह शादी के ख्यालों में डूबती-उतराती उमंग-उत्साह से लबरेज रहती। एकदिन काम करते हुए उसकी निगाह शीलू पर पड़ी, जो पूजा से हँस-हँसकर बाते कर रही थी। अचानक शीलू जोर से चिल्लाई," अरे,पूजा दीदी, आप कल आ रही है। ठीक है, फिर तो बहुत मजा आयेगा।"

 पूजा आ रही है। यह सुनकर रमिया के कान खड़े हो गये। वह अविलम्ब झटके से काम छोड़कर शीलू के पास मौन-मूर्ति सी खड़ी हो गई। शीलू को अटपटा लगा। वह फोन पर हाथ रखकर उसे घूरने लगी, तो रमिया बोली," शीलू दीदी, पूजा दीदी आ रही है तो आप उनसे कहकर फुसफुसवाँ की एक शीशी मेरे लिए भी मँगवा लीजिएगा।"

" फुसफुसवाँ की कैसी शीशी?" शीलू आश्चर्यचकित होकर बोली।

"अरे वही, जो पूजा दीदी आपके लिए पिछले साल उपहार में लायी थी।"

"ओह, तो इत्र की शीशी चाहिए तुझे। लेकिन तू उसको लेकर क्या करेगी?" घोर आश्चर्य में डूबी शीलू बोली।

"करुंगी क्यों नहीं? अरे मैं उसे अपने कलुआ को भेंट में दूंगी। फिर  उसके सुँघने का मजा दोनों साथ-साथ लेंगे।" यह कहती हुई लजाती-सिमटती रमिया आँचल में मुँह छुपाकर वहाँ से भाग गई। शीलू विस्मय से उसके अल्हड़पने वाली हरकत को एकटक देखती रही, फिर खिलखिला कर जोर से हँस पड़ी।

https://www.facebook.com/Phulkari.RenukaSrivastava/posts/294055032342573 

प्रकृति से बना अनोखा रिश्ता (संस्मरण)

प्रकृति के अनजान पहलू में भटकना और रमना..मेरी आदत व जुनून है। कहीं भी-कभी भी जब सुंदर फूल-पत्ती,पेड़, कैक्टस, तालाब,नदी-नाले, झरने, खेत-खलिहान या कच्चे-पक्के मकान मुझे दिखते और आकर्षित करते है, तो ठिठकती हुई उन्हें निहारने में ही, मैं अपनी सुधि-बुधि खो देती हूँ। पहाड़ों की उँची-उँची चोटियों या उनके मनोहर दृश्य की क्या कहू... छोटा, मनभावन रंग-बिरंगा या चितकबरा गोल पत्थर भी यदि कहीं मेरा मन मोह लें, तो मैं उसे जमीन से उठाकर अपने आंचल में समेट कर सुरक्षित घर पँहुचा देती हूँ। मेरे पास ढ़ेरों चीड़ का फल, सीप, घोंघें और कौड़ी तथा पंक्षियों के पंखों में मोर का पंख, नीलकण्ठ का पंख, और सफेद उल्लू का पंख सुरक्षित है, जिन्हें मैं कहीं ना कहीं से अनाधिकृत रुप से एकत्र करके ही संजोयी हूँ। प्रकृति के इस अनूठे लगाव से ही मुझे हरपल जीवंत रहने की सीख मिलती है। 
 
बाहर की कौन कहे, मैं तो जब घर में भी रहती हूँ, तब भी बाहर मुंड़ेर पर रखे दाने को चुगती चिड़यों की चहचहाहट और उनका फुदकना...मुझे बहुत भला लगता है और फिर जब उन दानों पर कबुतर और कौए भी उड़ते हुए आकर अपना एकाधिकार जमाने की कोशिश करने लगते है, तब भी इनका आपस में जुड़ना व जूझना अच्छा लगता है। बुलबुल भी बिजली के तारों और पेड़ों पर जोड़ों में इठलाती और चहकती है, तो बहुत भली लगती है। सब्जी काटते हुए इन्हें निहारनें में जो समय बीतता है, वह मुझे जायज और आत्मविभोर करने वाला लगता है। 
जीवन में सबसे सुखदायी पल मेरा तब था, जब मेरे आँगन में दो बार कबुतरों ने और रसोईघर की खिड़की पर पांच-छः बार गौरैयों ने अपना ठिकाना बनाकर अण्डा दिया। एक-एक तिनके को चुनना, घोंसला बनाना, अण्डों का आना, फिर अण्डों से नन्हें पक्षी बनना, फिर उनका नन्हें पंखों से उड़ना सीखना और बड़े होने पर घोंसला को छोड़कर कहीं और बस जाना...एक लम्बें पल की जीवन्तता थी, जिसके विभिन्न रुपों का इस  प्रकार झेलना बहुत सुखदायी था। रोटी सेंकते हुए जो चावल के दाने और आटे की गोलियाँ जिन्हें मैं जमीन पर और अपने हाथ पर रखती थी, तब उन्हीं दानों को चुगती हुई गौरैया जब मेरे हाथों पर से मेरे करीब आ जाती थी, तो दिल में जिस गुदगुदी का आभास होता... वह बहुत ही निराला लगता था।
 
सफर कहीं का भी हो,  मुझे रात्रि में या दिन में भी सोते हुए या पत्रिका पढ़ते हुए गंतव्य स्थल पर पँहुचना बिलकुल भाता नहीं है। सफर में खिड़की की सीट न मिले, तो मन उदासियों व मायूसियों से भर जाता है। बुझे मन से इधर-उधर दूसरे की खुली खिड़की से कौतूहलवश बाहर झांकने व निहारने का असफल प्रयास करना, वो खुशी नहीं दे पाता जिसकी मुझे चाहत होती थी। तब अधूरी चाहत को दिल में समेटे हुए ही सफर पूरा करना पड़ता था। दिन का सफर हो और खिड़की वाली सीट मिल जाएं तो क्या कहना। दिल बल्ले-बल्ले होकर नाचने हुए सफर के आंनद में डूब जाता है।
 
सफर में नीलकण्ठ को निहारना बहुत बड़ी खुशी, संतुष्टि और जीवंत करने वाला लगता है। बिजली के तार पर बैठा हुआ नीलकण्ठ, उड़ता और कलाबाजियाँ करता हुआ नीलकण्ठ स्वर्णिम सुख देने वाला होता है। रास्ते में मोर, मोरों का झुंड, नीलगाय और बहुत से जानवर दिखते है। तालाब में नहाते भैंस और तैरते हुए बत्तख बहुत प्यारे लगते है।
कतार में लगे पेड़ों का झुंड, जंगल और ईट के भट्ठे भी बहुत उत्साहित करते है। चाँद या सूरज को विभिन्न कोणों से निहारना अच्छा लगता है, पर यदि सूर्योदय, सूर्यास्त के साथ पूनम के चाँद का दीदार हो जाये तो सफर बहुत आनंदित करता है।
 
देशाटन के उत्तम पलों में कई ऐसे दिलचस्प व अनोखे पल मिले, जो एकांत पलों में अक्सर मेरे मन में उमड़ते-घुमड़ते है। ये पल हैः अण्डमान- निकोबार द्वीप समूह में हैलवाक बीच जाते समय समुंद्र की लहरों को निहारना, भूटान-सिक्किम के उँचें गगनचुंबी पहाड़ों और नजारों को महसूस करना, मेघालय-दार्जिलिंग के उमड़ते-घुमड़ते बादलों के बीच का रौनक, हिमाचल का सफेद बर्फ वाले पहाड़ों की चोटियाँ, अलमोड़ा जाते समय दो पहाड़ों को जोड़ती हुई एक ही साथ दो इंद्रधनुष का विहंगम दृश्य देखना, प्रयागराज में संगम के शाम की सुरमई बेला में लाखों पक्षियों का एक साथ चहचहाते हुए गुंजायमान करना और कालका स्टेशन पर बहुत सी मैनाओं का एक साथ सोने के जगह के लिए कलवर करते हुए भीड़ना...यादगार लम्हों में से एक है, जो अक्सर दिल को उमड़ती-घुमड़ती हुई आनंदित करती रहती है।
 
प्रकृति के साहचर्य व सांनिध्नता में अजब-गजब उत्साहित करने वाली खुशी सिर्फ मुझे ही नहीं, बल्कि बहुतों के दिल को कुदेरती व हिलोरें लेती हुई मिलती है..पर यह उन्हीं को महसूस होती है, जिनके दिल में इन अनुभूतियों को खुशी मन से स्वीकार करने का जज्बा होता है...। अतः प्रकृति के साहचर्य व सांनिध्नता रहकर जिंदगी को रंगीन बनाना भी...जीवन को जीवंत करने की एक कला है।
प्रकृति के आगोश में एक बार समाकर तो देखो...जीवन बहुत सुखदायी और जीवंत लगता है।
 

दो कदमों की दूरी, मिटाना है जरूरी (लेख)

अपने घर-गाँव से दूर दूसरे शहर में  रहने वाले बच्चों को अक्सर ये शिकायत होती है कि उनके माँ-बाप अक्सर उनके घर ज्यादा दिन रुकना नहीं चाहते है और यदि रहते भी है तो वे उनके उल्लासपूर्ण वातावरण में पूर्ण रुप से वैसे संतुष्ट या खुश नहीं रह पाते है, जैसे वे अपने शहर में रहते थे। जबकि बच्चे उन्हें बड़े आदरभाव से अपने पास रखना चाहते है। बहुत से युवाओं को अपने माँ-बाप से अटूट लगाव होता है। इस दूरी को कम करने के लिए ही वे उन्हें अपने पास, अपनी नौकरी वाले शहर में रखना चाहते है लेकिन अपने घर-गाँव से मानसिक रुप से बँधें होने के कारण उनके बुजुर्ग स्वेच्छापूर्वक उनके पास रहना नहीं चाहते है। ऐसे में बच्चे भी अपने बुजुर्गों की परेशानी व मर्म को जब  समझ नहीं पाते है। तब वे भी पशोपेश में पड़ जाते है। उन्हें यही लगता है कि जब वे सारी सुख-सुविधा अपने माँ-बाप को बैठे-बैठाये दे रहे है, फिर उनका इस तरह उदास व अनिच्छापूर्वक रहना या रहने की मजबूरी क्या हो सकती है? ऐसे माँ-बाप तो उन बुजुर्गों से अधिक भाग्यशाली है, जिनके बच्चे उन्हें पूछते नहीं है। फिर वे अपने को मजबूर व दुखी क्यों समझने लगते है?
 
यह प्रश्न जटिल है। इसलिए इसे समझना बहुत जरुरी है। क्योंकि यह दो पीढ़ी के सोच-समझ और विचारों के अंतर को उजागर करता है। अतः दोनों पक्षों का मर्म समझना जरुरी है।
नया युवा वर्ग आधुनिकता के नये दौर में आगे बढ़ना और विकसित  होना चाहता है, जो पुराने, पारम्पारिक रुप से अपने पुराने ख्यालों में बँधे और उससे न डिगने वाले बुजुर्गों से मेल नहीं खाता है। तब ऐसे में जब दोनों मनमानी और अपने मनमाफिक करने पर आतुर हो  जाते है, तभी टकराव की स्थिति  उत्पन्न होने की सम्भावना बढ़  जाती है।
 
जैसे सिक्के के दो पहलू होते है, वैसे ही युवाओं व बुजुर्गों की भी अपनी- अपनी सोच, सिद्धांत या मिलकियत का अपना पहलू होता है, जो गाहेबगाहे एक दूसरे से मेल नहीं खाता है। तब जिंदगी के इसी पहलू या कटू सत्य को दोनों को समझना पड़ता है। यदि दोनों में समझदारी है, तो जीवन सुगमता से आगे बढ़ता है और यदि वे समझदारी नहीं दिखाते है, तभी उनमें साथ रहने के बावजूद भी टकराव की स्थिति पैदा होती है।
 
आज जो बुजुर्ग है, वहीं कल के युवा थे। अतः अपने समय में अपने उपर पड़ने वाले दुर्गम व दुरुह मुसीबतों व कठिनाइयों को स्वयं के विवेक व निर्णय के आधार पर झेलने और हल करने के कारण, जो उनका सोच व सिद्धांत बनता है...वहीं उनकी पूंजी होती है। अतः उम्र के ढ़लान पर जब बच्चे उनके सोच व अधिकारों पर अपना अधिपत्य जमाने की कोशिश करते है, तभी उन दो पीढियों के बीच टकराव की नींव बनने लगती है। बुजुर्गों को अनाड़ी, या नासमझ समझने की भूल जब बच्चे करते है..और गाहेबगाहे यह टिप्पणी सुनाते है कि आपको कोई समझ नहीं है, तब उनके दिल के जो टुकड़े होते है...फिर उन टुकड़ों के चुभन से उनका दिल तार-तार हो जाता है। ऐसे में वे स्वयं को लुटे-पीटे मजबूर और अशक्त समझने लगते है। यह उनके लिए असहनीय, दुखदायी पल होता है।
ऐसी परिस्थिति में अपने-अपने दायरे में बँधें दो पीढ़ियों के कश्मकश को समझना आज के युग में जरुरी हो गया है। जहाँ एक प्रगति के पथ पर तेज गति से बढ़ने वाला, झटपट निर्णय लेने वाला तेजतर्रार जागरूक युवा होता है, वहीं दूसरी तरफ उँच-नीच के खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजरने वाला ठोस बुनियादी सोच रखनेवाला बुजुर्ग होता है, जो अपने टोका-टोकी वाले व्यवहार को बदलना नहीं चाहते। क्योंकि अपने अनुभवों के आधार पर उन्हें जो सही व उचित लगता है, वही सीख वे बच्चों के सामने परोसना और बच्चों को उसी राह पर चलने के लिए दबाव डालना, उनका शगल होता है, इसलिए जब वे अपनी जिह्वा खोलते है, तब आधुनिकता के रंग में रंगें नयी पीढ़ी को मिर्ची लगना अनिवार्य है। क्योंकि आधुनिकता के रंग में रमे बच्चे उस रास्ते पर जाना ही नहीं चाहते जिसपर उनके बुजुर्ग चलकर अपना जीवन यापन कर चुके है। बच्चों को अपने बुजुर्ग दकियानूस लगते है।  सोच का यहीं नया दायरा दोनों के बीच मिलते हुए प्यार की मिठास में खट्टेपन की बिसात बिछाना शुरु कर देता है। तब गतिशील जिंदगी मात खायें जुआड़ी की तरह सिकुड़कर रह जाता है। परिणामस्वरूप उनके  दिल की दूरी, उनके बीच की खाई बन जाती है।
 
बच्चे भी बुजुर्गों के मन की व्यथा को समझना नहीं चाहते है, क्योंकि बुजुर्गों का कुछ समझाना, टोकना...उन्हें अपने राह में रुकावट पैदा करना लगता है।
 
अधिकतर बुजुर्गों के पास जो विकल्प होता है.. वह बच्चों के हित का ही होता है, पर नयेपन के एहसास में डूबे बच्चे या  युवा अपने बुजुर्गों के मर्म को समझना या मानना ही नहीं चाहते है। वे स्वयं को उस उलझन को समझने में पूर्ण रुप से असमर्थ व असफल महसूस करते है, जिसका अनुभव उनके अभिभावक के पास होता है। और बुजुर्ग अपनी पुरानी सोच व ठोस सोच को बदलना नहीं चाहते, तभी तो छलांग लगाते बच्चों के सोच को वे अपने टोका-टोकी से उसपर पाबंदी लगाना चाहते है। सही अर्थो व सही तरीका से समझा न पाने के कारण उनके सही होते हुए भी उनके नासमझ बच्चे उसे अपने राह की रुकावट समझने लगते है।
 
अपने घर या गाँव में एक ही जगह या दिनचर्या में समय गुजारना जिस प्रकार बुजुर्गो के लिए सरल होता है, वैसी सुविधा उन्हें स्थान परिवर्तन करके बच्चों के पास जाने में तुरंत नहीं मिल पाता है। और बच्चे, जो स्वतंत्र वातावरण में स्वच्छंद रहना चाहते है, उन्हें बंधन युक्त माहौल रास नहीं आता, पर सामंजस्य बैठाना ही एकमात्र ऐसा विकल्प है जो दोनों के सोच और तालमेल को एकसूत्र में बाँधकर एक सीध में ला सकता है। युवा बुजुर्गों को समझे और बुजुर्ग युवाओं को समझे तभी अपने अपने संकल्पों से हटकर एक हँसी-खुशी का माहौल पनप पायेगा।
 
कहने का तात्पर्य यह है कि जिस परिवार में दो-तीन पीढ़ियाँ एक साथ एक छत के नीचे रह रही है...वहाँ अपनी मनमानी चलाने से सिर्फ परिवार की एकजुटता में सेंध ही लगेगी। इसलिए परिवार की एकजुटता के लिए एक दूसरे की भावनाओं को सम्मानपूर्वक समर्थन देने से ही स्नेह, विश्वास, सामंजस्यता की नींव पड़ेगी और परिवार आदर्श परिवार की तरह हँसते-मुस्कुराते हुए स्वच्छ व सकारात्मक वातावरण में आगे बढ़ते हुए  उन्नति की ओर अग्रसर होगा। इसलिए वैचारिक विभिन्नता को छोड़कर सामंजस्य के नाम पर कुछ झुकना दोनों के सकारात्मक सोच को उजागर करेगा।
जहाँ तालमेल होगा..वहीं सुकून होगा...फिर वहीं पर उन्नति का मार्ग बनेगा और खुशियों का बसेरा होगा।
 

हॉट ड्रिंक देना (संस्मरण)

स्मृतियाँ कभी कभी बहुत मधुर व मजेदार होती है। जिन्हें याद करने पर हँसी के फौआरे फूट पड़ते है और मन हँस-हँस कर  लोटपोट करने लगता है। 

शादी के बाद की ही तो घटना है, जिसे मैं (शालू) अक्सर याद करके हँसती रहती हूँ। नयी नवेली दुल्हन थी। शादी के बाद ही बूआ सासू माँ के यहाँ पारिवारिक पार्टी में जाना पड़ा। फुफा जी सेना में कैप्टन थे।
खुशनुमा माहौल में खुले मैदान में कोल्ड-ड्रिंक का दौर चल रहा था। मैं जुकाम से पीड़ित थी, अतः कोल्ड-ड्रिंक न लेकर चुपचाप एक जगह अकेले बैठ गयी। अचानक वेटर मेरे पास आकर बोला," मैम, आप क्या लेंगी?" मैंने पूछा, "कुछ हाॅट है? कोई हाॅट-ड्रिंक चाहिए।" वेटर चुपचाप चला गया। मैं यूंही बैठे हुए अपने में मगन थी।

कुछ देर बाद वेटर ट्रे में सजे सुंदर गिलास में बीयर के साथ उपस्थित हो गया। मैं अचकचा गई। ससुराल का भरापूरा माहौल। लोग मुझे विस्मय से देखने लगे। मैं वेटर को घूरने लगी। वह बीयर लेकर यहाँ क्यों खड़ा है? 

मैं घबड़ाकर तल्ख स्वर में बोली," ये क्या है?"
"मैम, हाॅट-ड्रिंक, जो आपने मांगा, वही तो है।" वेटर भी सकपकाकर सफाई देने लगा। 
मैं झेंपकर झुंझलाहट भरे लहजे में बोली, "मेरा मतलब चाय-काॅफी से था। इससे नहीं। ले जाओ यहाँ से।"

वेटर मेरी बेवकूफी समझ गया कि मैं इस माहौल से अनजान हूँ। अतः सहमकर बोला, "साॅरी मैम, यहाँ चाय-काॅफी नहीं मिलता है। मुझे समझने में गलतफहमी हो गई। वेरी साॅरी।"

दूर बैठे पतिदेव की निगाह जब बीयर के साथ वेटर पर पड़ी तो वे अचम्भित हो सोचने लगे कि इतनी माडर्न लेडी कौन है यहाँ? जो सभा में बीयर मगां रही है। जब वेटर मेरे पास रुका तब ये घबड़ाकर लम्बे-लम्बे डग भरते आ गये। बताने पर इन्हें भी हकीकत समझते देर नहीं लगी। फिर तो सबके साथ ये भी हँसते-हँसते लोटपोट होने लगे और मैं सबके सामने अपने बेवकूफी पर शर्मिंदगी महसूस कर आँखें नीची कर ली।

ईर्ष्या बसी है मेरे मन में (व्यंग्य)

मैं टहलती हूँ, घूमती हूँ। मॉल, रेस्टोरेंट और किटी पार्टी में जाती हूँ, जिससे बिंदास रहने की भरपूर कोशिश करती हूँ...पर मैं वैसे खुश नहीं हो पाती हूँ, जैसे औरों को खुश देखती हूँ। मैं क्यों खुश नहीं हो पाती हूँ..यह त्वरित सतर्क होने वाली बुद्धि के समझ से परे है...क्यों परे है? यह समझना मैं चाहकर भी समझ नहीं पाती हूँ। क्योंकि मैं उलझती हुई, कभी न स्वयं को देखती हूँ, न कभी स्वयं को तौलती हूँ और न मनन कर पाती हूँ। यह इसलिए भी होता है क्योंकि मेरी निगाहें हमेशा दूसरों पर टीकी रहती है। तभी मेरी आँखें तो टुकुर-टुकुर निहारती है, परखती हैै...दूसरे के वस्त्रों को, दूसरे के पर्स को, दूसरों के मेकअप को, दूसरे की खूबसूरती को और दूसरे की खुशी और चहचहाती हुई खनकती व गूंजती आवाज को। तब मैं उसे स्वयं से तुलनात्मक रूप से तौलती हुई जलती हूँ, कुढ़ती हूँ और कुड़बुड़ाती हूँ। क्योंकि उस समय मैं लबरेज होती हूँ, ईर्ष्या नामक ज्वलनशील पदार्थ से। तभी तो भभकते और जलते हुए दिल के ताप को आँखों की नमी भी शांत नहीं कर पाती है। तभी तो मैं मगन व व्यस्त रहती हूँ...दूसरों के गतिशील हावभाव और क्रियाकलापों में।
 ऐसे में मेरे पास वक्त ही वक्त होता है। तभी तो मैं इसी उंधेरबून में हमेशा विचरती हुई फँसी रहती हूँ। दूसरे कामों में मेरा मन  लगता नहीं है। क्या करु...कैसे अपने मन को समझाउं ...कैसे इस लत को छुड़ाउं... क्योंकि मन तो अपने बस में होता ही नहीं। वह बरबस खिंचा रहता है..दूसरे की गतिशील हावभाव और  क्रियाकलापों में।
 
दिन ऐसे ही बीत रहा था कि एकदिन अचानक कनॉट प्लेस के भीड़ भरे माहौल में अपने बचपन की सहपाठिनी उर्वशी से मेरी मुलाकात हो गई। चेहरे पर वही मुस्कुराहट, वही बिंदास हँसी...जिसकी मैं उस समय कायल थी। जिससे मैं मन ही मन में ईर्ष्या वश चिढ़ती थी। इसीलिए कभी उसके और अपने बीच की खाई को पाट नहीं पायी। पर हमेशा उसे निहारती थी, टटोलती थी कि कैसे अपने गमगीन भरे माहौल में भी वह मुक्त है अपने माहौल से, अपनी परिस्थितियों से, अपनी कमियों से और अपनी गरीबी से। बेहद गरीबी में पढ़ी बढ़ी वही उर्वशी एक खनकती हुई आवाज में मुझे पुकारी तो मैं चौंककर चारों तरफ नजरें दौड़ाने लगी, तभी वह पीछे से कंधें पर धौल जमाते हुए बोली," अरे, कहाँ ढ़ूढ़ रही हो? मैं तो तुम्हारे पास ही खड़ी हूँ।"
"ओह तुम, तुम यहाँ कैसे?" मैं अचकचा कर बोली।
"क्या मैं यहाँ नहीं हो सकती? अरे मैं यहीं रहती हूँ। मैं यहाँ के एक अस्पताल में डॉक्टर हूँ।"

उर्वशी और डॉक्टर? मैं गश खाने को हुई कि तभी उसकी कूकती आवाज फिर गूंजी," अरे कहाँ खो गई। चल मेरे घर चल, वहीं बैठकर बातें करेंगें।"
मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सी उसके पीछे-पीछे चल दी। उसके कार में बैठते हुए शर्म से पानी-पानी हो रही थी। कार की चालक वही थी। बगल में बैठी हुई आज उसकी मोहनी-कूकती हँसी मुझे चिढ़ा नहीं रहीं थी, बल्कि प्रेरित कर रही थी। अपनी परिस्थितियों से जुझने वाली बिंदास लड़की..ऊँचाइयों पर पँहुचने वाली लड़की आज अपनी सादगी में बहुत महान दिखने लगी।
मैं बरबस पूछ बैठी," तू इतनी बिंदास कैसे रहती है? सूरज की गर्मी हो, सर्दी की शीतलता हो, भीषण बरसात हो या पतझड़ की खनकती गूंज हो..तेरे चेहरे पर कोई असर ड़ालता क्यों नहीं है? यह कैसे सम्भव है...जरा मुझे भी तो इसकी गूढ़ता  समझा।"
मेरी रोनी सूरत देख वह और जोर से हँस पड़ी, बोली," अरे यह जरा भी कठिन नहीं है। बिंदास रहने का एक ही मूलमंत्र है...कभी दूसरे पर तुलनात्मक दृष्टि डालो नहीं। यह तभी सम्भव है...जब तू स्वयं में मगन या खुश रहती है। अपने परिस्थितियों में, अपने माहौल में स्वयं डूबे रहो, तुलना न करो तो खुशी अपने आप तुम्हारा दामन थाम लेगी। तुम्हें जरूरत ही नहीं पडेगी उसे आमंत्रण देने की।"

"तू ठीक कह रही है। मैं दूसरे की खुशी नापने में सदैव व्यस्त थी इसलिए मुझे अपनी खुशी पाने और महसूस करने की कोई ललक हुई ही नहीं। मैं चिढ़नें में, जलने में समय गवां दी। आज तुझे देख आँखें खुल गई। पर अब क्या हो सकता है? समय तो चूक गया।"
"अरे, समय कभी चुकता नहीं है। जब जागों तभी सबेरा है। खुश रहने के लिए अपने परिस्थितियों से समझौता करना पड़ता है, रास्ता निकालना पड़ता है, जुझना और उठना पड़ता है। ऐसे में खुश रहो, बिंदास रहो और लक्ष्य का पीछा करो। पर दूसरों पर तुलनात्मक दृष्टि भूलकर भी न डालो..वरना रास्ता भटक जायेगा, फिर मंजिल कहीं नजर नहीं आयेगा।"
अचानक कार रोककर वह बोली,"चल घर आ गया। घर में बैठकर बातें करते है।"
उर्वशी के घर से लौटते हुए मैं बहुत संतुष्ट थी, खुश थी, बिंदास थी। वर्षो से ईर्ष्या के ताप से जलता मेरा तन-मन उर्वशी के सम्पर्क की शीतलता से पिघलकर शांत व सरल हो गया। ऐसी सादगी, ऐसी सरलता। उथल-पुथल का कोई नामोंनिशान नहीं। उसने मेरा दिल जीता ही नहीं, बल्कि बदलने की तरफ रुख मोड़ दिया। सकारात्मक सोच की तरफ बढ़ता मेरा पहला कदम मुझे बहुत भला और सुकून देने वाला लगा।

देश का गौरव (गणतंत्र दिवस पर बाल कहानी)

गणतंत्र दिवस के पूर्व संध्या पर विभास अपने पापा के साथ बाजार गया था। बाजार में उसने देखा कि उसके यहाँ काम करने वाली आंटी का बेटा मोनू कागज और प्लास्टिक का बना झंडा साइकिल पर लगाकर बेच रहा था। विभास उससे दो झंडा खरीदकर ले आया। विभास जब भी कुछ खरीदता, उसे अपने भाई के लिए भी जरुर लेता।
घर आते ही विभास घर में घुसने से पहले अपना झंडा बाहरी फाटक के एक तरफ फहरा दिया। फिर वह दूसरा झंडा विपिन को देते हुए बोला," विपिन लो, ये तुम्हारा झंडा है। तुम इसे भी बाहर फाटक के दूसरी तरफ लगा दो, जैसे मैंने लगाया है। फिर दोनों झंडा हवा में लहराते हुए बहुत अच्छे लगेंगे।" 
विपिन झंडा पाकर बहुत खुश हुआ। वह झंडा हवा में लहराते हुए बोला,"नहीं भैया, मैं अपना झंडा आपको फहराने के लिए नहीं दूंगा। मैं इससे खेलूंगा।"

"तुम इससे खेलोगे? अरे यह खेलने की वस्तु नहीं है।  यह देश की शान है। यह हवा में लहराते हुए ही अच्छा लगेगा। इसे बाहर फहरा दो।" विभास तल्ख स्वर में बोला।
"अरे, जब मुझे मेरे मन का काम करने ही नहीं दोगे, तो फिर मेरे लिए लाये ही क्यों हो?" विपिन नाराज होकर बोला।
"मैं यह तुम्हारे खेलने के लिए नहीं लाया हूँ। इससे खेला नहीं जाता है। इसलिए लाओ इसे वापस कर दो।" विभास तल्ख स्वर में बोला।

"तीन रंगों वाला झंडा, चक्र के साथ बहुत सुंदर है। मैं इसे आपको वापस नहीं करुंगा, बल्कि पापा के कार पर लगा दूंगा।" यह कहकर विपिन भागने लगा। विभास उसके पीछे दौड़ा तो विपिन ठोकर खाकर गिर पड़ा। विपिन रोने लगा। विभास उसे उठाने लगा तो वह उसका हाथ झटककर बोला," जाओ, मैं तुमसे नहीं बोलता। तुमने मुझे गिरा दिया।" यह कहकर वह फिर रोने लगा। 
उसके रोने की आवाज सुनकर उसकी माँ भावना उसके पास आ गई, बोली," क्या हो गया? विपिन तुम क्यों रो रहे हो?"
विपिन और विभास की पूरी बात सुनने के बाद भावना बोली," बेटा, यह हमारा राष्ट्रीय ध्वज है। हमारे देश का गौरव है। इसलिए इससे खेलते नहीं, बल्कि इसका सम्मान करते है।"
"माँ मैं इसे पापा की कार पर लगाना चाहता था, पर भैया मुझे लगाने ही नहीं दे रहे थे।" विपिन अपने आँसुओं को पोछते हुए बोला।

"बेटा, यह हमारे देश की पहचान और गौरव है। हम इसे गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस या किसी भी सम्मानित अवसर पर फहराते है। इसके शान में कोई कमी न हो, इसलिए इसका पूरा सम्मान करते है।"
" मैं तो पापा के कार पर इसे सम्मान पूर्वक फहराना चाहता था, भैया ने उसके लिए ही क्यों मना कर दिया।" विपिन विभास की शिकायत करते हुए बोला।
" विभास को पता होगा, तभी वह तुम्हें मना कर रहा था। हमारे भारतीय झंडा संहिता में झंडा को सम्मानपूर्वक फहराने का नियम बताया गया है। इन्हीं नियमों में एक नियम यह है कि सिर्फ सरकार के महत्वपूर्ण व्यक्ति जैसे- राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, क्लास वन अफसर और भारत के प्रधान न्यायाधीश को छोड़कर कोई भी अपने वाहन पर झंडा नहीं लगा सकता है।" भावना बोली।

"लेकिन ऐसा क्यों करते है, माँ।" विपिन उत्सुकतावश पूछा।
"यह इसलिए करते है ताकि देश के गौरव में कोई कमी न हो।"
यह सुनकर विपिन बोला,"कल गणतंत्र दिवस है। स्कूल में झंडा फहराया जायेगा, खेलकूद प्रतियोगिता होगा, लड्डू मिलेगा। यह मुझे पता था। पर झंडा को कार पर नहीं लगा सकते है, यह पता नहीं था।" 
भावना विपिन को समझाते हुए बोली," बेटा हमारा देश 15 अगस्त 1947 (स्वतंत्रता दिवस) को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हुआ। इस आजादी के लिए हमारे देशवासियों ने बहुत समय से शांति वार्ता की, विद्रोह हुआ, संधर्ष किए,और फिर बहुत बड़ी-बड़ी कुर्बानियाँ दी, शहीद हुए, तब जाकर आजादी की स्वच्छ हवा में विचरण करना हमें नसीब हुआ।"

"मम्मी, जब हम 15 अगस्त को आजाद हो गये, तो हमें 26 जनवरी गणतंत्र दिवस की आवश्यकता क्यों पड़ी? हमें विस्तार में समझाकर बताईये।" विपिन उत्सुकता वश जानकारी के लिए पूछा।
तब भावना बोली,"  बेटा देश तो आजाद हो गया, पर देश में अभी तक अंग्रेजों के बने नियम ही चल रहे थे। अब आजाद भारत के लिए जरुरी हो गया कि उसके देश में उसका अपना नियम कानून हो। अतः डॉ० भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में समिति द्वारा हमारे देश का अपना नियम और संविधान बना। यह संविधान हमारे देश में 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ था। इसीलिए 26 जनवरी को हम गणतंत्र दिवस मनाते है और इसी दिन से हम अपने को पूर्ण रूप से स्वतंत्र मानते है। यह हमारा राष्ट्रीय पर्व है।"
"अच्छा, तभी यह पर्व हमारे स्कूल में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।" विपिन चहकते हुए बोला।
विभास जो अभी तक चुपचाप सुन रहा था, वह बोला," यह पर्व केवल स्कूल ही नहीं, बल्कि पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। सभी स्कूल, कालेज, दफ्तर और विभिन्न महत्वपूर्ण स्थलों पर झण्डारोहण, खेलकूद, रंगारंग कार्यक्रमों द्वारा इसे मनाते है। दिल्ली में इस दिन महामहिम राष्ट्रपति के सामने से परेड और विभिन्न राज्यों की झांकियाँ गुजरती है। इस कार्यक्रम में किसी नामी हस्ती को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाते है। अपने देश और विदेश के बहुत से नागरिक दूर-दूर से इसमें सम्मिलित होने आते है।"
"अरे वाह भैया, आपको तो बहुत जानकारी है।" विपिन उत्साहित होकर बोला।
"हाँ बेटा, विभास को जानकारी थी, तभी तो वह तुम्हें कार पर झंडा लगाने के लिए मना कर रहा था।" भावना बोली।

"मम्मी,भईया मुझे ठीक से समझा नहीं पाये थे, तभी तो मैं समझ नहीं पाया। अब आपने मुझे ठीक से समझा दिया तो मैं समझ गया।"
भावना बोली," बेटा, प्रत्येक देश का एक गौरव होता है, जिसका प्रतीक उसका राष्ट्रीय ध्वज होता है। हमारे देश का गौरव हमारा राष्ट्रीय ध्वज...हमारा राष्ट्रीय तिरंगा है, जिसे राष्ट्रीय पर्व के दिन बड़े धूमधाम व सम्मान से फहराते है। इसलिए हम ऐसा कोई काम नहीं करते है, जिससे हमारे राष्ट्रीय तिरंगा के गौरव के सम्मान में कहीं कोई कमी रह जाएं। इसलिए उससे खेलना, तोड़ना और फेंकना मना है।"
"माँ, आप कितनी अच्छी है। आपने गणतंत्र दिवस की महत्ता समझा दिया तो सारी बातें समझ में आ गई। भैया को तो समझाना ही नहीं आता है। आज मेरी समझ में आया कि हमेशा परेड के समय जब किसी बच्चे से उसका झंडा गिर जाता है तो अध्यापक उसे झटपट उठा लेते है। अब हम बड़े धुमधाम से गणतंत्र दिवस मनायेंगे।"

विभास बोला,"हाँ मम्मी, मैं भी गणतंत्र दिवस पर बहुत से खेल में और वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग ले रहा हूँ। आप आशीर्वाद दीजिएगा कि मैं विजयी बनूं।"
"बहुत अच्छा बेटा, मुझे तुम दोनों से यही उम्मीद थी। अब तुम अपनी तैयारी करो। मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ रहेगा। अब मैं काम करने जा रही हूँ।" भावना पूर्ण विश्वास से बोली।
"माँ, मैं भैया के साथ झंडा बाहर फाटक पर फहराने जा रहा हूँ। आप अपना काम करिए।"
भावना दोनों बच्चों के सर पर हाथ फेरती हुई चली गई तब विपिन विभास के साथ बाहर झंडा फहराने चला गया।