माँ का साथ (कविता)

पहली बार माँ मुझे ले गोद में 

स्निंग्ध मुस्कान से मुस्कुराई थी। 

मिला स्नेहिल आंचल का छांव

पुलकित हो अंग फड़कने लगा। 

मां ने प्यार से चूमकर दुलाराया 

खिल-खिल कर मैं खिलखिलाया। 

अमृत सदृश दुग्ध पान किया 

सुखद अनुभूति से संतृप्त हुआ। 

सेवा टहल कर मेरा रुप संवारा

खुशी से इठलाने व झूमने लगा। 

मां के करकमलों से मिला निवाला 

प्रेम के बशीभूत हो तृप्त हो गया। 

डगमग-डगमग पांव लड़खड़ाएं

अंगुलियों का मिला सबल सहारा। 

शैतानियों पर जब वे हुंकार भरती

मैं भी क्रोधित हो आंखें तरेरता। 

मां छड़ी उठाकर जब भी धमकाती 

मेरे झरझर आंसू झट बहने लगता। 

मां के अति प्रेम ने जीवन संवारा

उन्नति पथ पर मैं अग्रसर होने लगा। 

मां सौ-सौ बलैया लेती रही मेरी

मैं गदगद हो उन्हें निहारता रहा। 

मेरी शादी करके निढ़ाल हुई  वे

जीवन संगनी पा मैं इतराने लगा। 

मेरे बीवी-बच्चों में मगन हो गयी

घर खुशियों भरा संसार कहलाया। 

मां दिनचर्या में अपनी मगन रही

मैं लाठी बन उनका सहारा बना। 

मां अचानक चिरनिंद्रा में सो गयी

अश्रुपूरित श्रद्धासुमन अर्पित किया। 

वे नहीं,पर स्नेहसिंचित आशीर्वाद ही अब

मेरे घर के खुशियों का सबल सहारा है।।।

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दो रोटी की दरकार (कविता)

भीड़ भरे उस सुंदर हाल

के गहमागहमी माहौल में

गूंजती थी चहुंओर एकसाथ

रामू इधर आओ की पुकार


तब रामू के डगमग पांव

डोलते  हुए चकरघिन्नी से

कभी इधर, तो कभी उधर

पहुंचते थे एक-एक के पास


उसके दोनों हाथ भरे होते थे

पानी भरे जग व गिलास से

कभी रसमलाई से, तो कभी

चाय की केतली व कुल्हड़ से


भागम-भाग के इस  दौर में

कब और कैसे सिकुड़ जाती

क्षुधा से तिलमिलाती उसके

पेट की ज्वाला व बेकरारी



तभी तो वह भूल जाता था कि

उसे भी है दरकार दो रोटी की

खाकर जिससे वह मिटा सकता

अपनी थकान व बेचैनी भूख की


ऐसी विषम परिस्थितियों में भी

कम नहीं होता था दौड़ना उसका

भींगे हुए पसीने से लथपथ, अपनी

कमीज़ से पोंछता था अपना माथा


उस गहमागहमी भरे माहौल में

तब भी समय नहीं बचता था

किसी के पास थोड़ा सा भी जो

यह सोच सकें कि वह भी है


अपने परिवार का पालनहारा

छोटे भाई-बहन का रखवाला

बुढ़े बाप की लाठी  सा सहारा

और अपनी मां का राजदुलारा ।।।

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एहसास की सुखद अनुभूति (लघुकथा)

एहसास की सुखद अनुभूति (लघुकथा)

गणतंत्र दिवस पर दिल्ली के राजपथ से निकलने वाली झांकी को करीब से देखती हुई शामली उत्तेजित थी। इस परेड मे शामिल उसकी इकलौती बेटी अदिति का जोश व जज्बा देखने योग्य थी। देश के प्रति जीवन कुर्बान करने वाले पति और पुत्र को मन ही मन में श्रद्धांजलि अर्पित करने वाली शामली आज बड़ी प्रसन्न थी। 
एक समय था जब अदिति ने माँ से पूछा था," माँ, पापा और भैया अचानक सीमा पर लड़ते हुए शहीद हो गये। उनके शहीद हो जाने के बाद आपको उनके फौज में जाने का कभी मलाल तो नहीं होता है?" 
माँ चौंककर अदिति को देखी, फिर गर्व से बोली थी,"मलाल कैसा, बेटी? मलाल तो कभी नहीं हुआ। हाँ, आज दुख इस बात का होता है कि यदि मेरे और बेटे होते, तो मैं उन्हें भी फौज में भर्ती करा कर अपने परिवार की परम्परा और गौरव को बढ़ाती और गर्व महसूस करती।"  माँ के चेहरे की चमकती आभा को देखकर अदिति माँ को चूमती हुई बिना कुछ बोले वहां से उठ गई। 
मन की दृढ़ता के लिए एक क्षण ही काफी होता है। माँ के चेहरे के नूर से अदिति के मन में एक दृढ़ता बस गई। उसी दृढ़ता के बलबूते अदिति आज  अपने परिवार की परम्परा को कायम रखते हुए एनडीए की परीक्षा उत्तीर्ण करके फौज में दाखिल थी।
गणतंत्र दिवस की झांकी को पास से देखने के लिए अदिति ने विशेष तौर पर अपनी मां को अगली पंक्ति में बिठा दिया था।
 परेड के बाद जब अदिति अपनी माँ से मिली तो माँ के गले में अपने बाहों का हार पहनाते हुए बोली," माँ, अब तो आपको अपने और बेटा न होने का दुख तो नहीं है।"
"अरे नहीं बेटी, तू मेरे परिवार की परम्परा को कायम रखने वाली वीर योद्धा मेरी शान, मेरा अभिमान और मेरी बेटी हो। मुझे तम्हारे बेटी होने पर भी वही गर्व है, जो गर्व मैं तुम्हारे पापा और भैया पर करती थी।" 
आलिंगनबद्ध माँ-बेटी की आँखों से निकलने वाले खुशी के आँसूं बेटा-बेटी के भेद को समाप्त कर एक में विलीन हो गये।
26.01.2022.

मैं-तुम तुम-मैं (कविता)

मैं तुम नहीं बन सकती
तुम मैं नहीं बन सकते
तो क्यों नहीं
मैं मैं ही रहूँ
तुम तुम ही रहो
दोनों के अस्तित्व का
अपना-अपना हो महत्व
समरसता के भाव में
न हो कोई छेड़छाड़
पर एकाकार होने के लिए
जीवन डगर पर
साथ चलने के लिए
समझौतों के
मूक आह्वाहन से
मैं-तुम बनकर
तुम-मैं बनकर 
खुशियों का रंग खिलाते हुए
एक नया संसार बनायें हम।।।


17.04.2022.
रविवार



चकरघिन्नी (कविता)

चार बच्चों की 

थी, वह माँ

छोटे से ठिकाने में 

थी पति के साथ 

करती बेपनाह प्यार

बच्चों को एक समान

सहेजती थी सबको 

आँचल के छाँव में

बच्चों के हित में

डटी रहती थी हमेशा

बच्चे बनें, उभरते सितारे 

उज्जवल भविष्य के साथ

बन जाती थी चकरघिन्नी  

बच्चों के इशारों पर

बनके चकरघिन्नी 

हो जाती थी बेहाल 

पर ये बेहाली भी

उन्हें था स्वीकार

क्योंकि उनमें था 

अति मनोबल व उत्साह

बड़े हो गये बच्चे

तो बढ़ गया परिवार 

फिर हो गई उनकी

कुटिया भी चार

माँ तो वही थी

पर बदल गए हालात

अब वे हो गई 

बूढ़ी, अशक्त व बेहाल

मजबूरी है बहुत 

फिर भी नहीं करती इंकार  

चारों घरों में आज भी

डोलती है उंगलियों पर

घुमती हुई चकरघिन्नी।

बनके चकरघिन्नी।।।

दो कविताएं (बेरोजगारी और हौसले की उड़ान )

आज के माहौल में बेरोजगारी एक ज्वलंत समस्या है। जो चलती हुई जिंदगी के राह में रोड़ा अटका देती है। ऐसे भुक्तभोगियों के कष्ट को महसूस करने के कारण कविता 'बेरोजगारी' का सृजन हो गया, पर जिंदगी रुकने का नाम तो होता नहीं है। अतः बेरोजगारी की समस्या से निजात पाना ही जिंदगी का उद्देश्य होना चाहिए। अतः इसी सकारात्मक सोच को नया आयाम देने के लिए  मैंने दूसरी कविता 'हौसले की उड़ान' का सृजन किया।




अतः मेरी दोनों कविताओं को एक साथ पढ़कर ही कविता का विश्लेषण करें।

बेरोजगारी (कविता)
परिंदे सी चाहत 
थी उड़ान भरने की
गगन में विचरते हुए
चाँद तक पहुँचने की
काबिलियत पर उसे
था, अति गुमान
उसके पास था
डिग्रियों का भंडार
सपनों में बँधकर
लगा वह उड़ने
पर भटकते-भटकते
लगे अंग उसके छिलने
लहुलूहान मन देख
लगी शिक्षा रोने
किताब-कापी का ढ़ेर
बनी रद्दी की टोकरी
उपलब्धियाँ भी
लगी चिड़चिड़ाने
मिला नहीं जब
कोई रोजगार
नाकामियों पर
लगे आँसू बहने
क्या मुँह दिखलाये 
माँ-बाप को अपने
कुर्बानियों पर जिनके
पाले थे बडे सपनें
सारी मनोकामनाएं
बेआबरु हो बदली
लेके निकम्मेपन व
बेरोजगारी का तमगा
किससे कहे
किसको समझायें
मुँह छुपाकर बैठे है
अपने ही घोसलें में
निराशा के बादल को 
अपनी कब्रगाह मानकर।।।
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हौसले की उड़ान (कविता)
कोरोना महामारी 
के माहौल में
क्या हुआ आज, जो
हो गये बेरोजगार
ठिठक गये कदम         
रुक गये सब काम       
तब बैठकर एकदिन      
सोचने लगे कई बार    
यूं निठल्ला बैठने से                            
नहीं चलेगा काम
उम्मीद जगाने के बाद
तलाशना है कोई काम
तभी नजर आया
एक नन्हां परिंदा 
उड़ने की चाहत में
पंख फड़फड़ाता है 
बार-बार गिरता है,
फिर भी सम्भलता है
मानता नहीं हार
अपने उम्मीदों के लिए
करता है बड़ी कोशिशें
होता है बुलंद 
उसका जब हौसला
नाकामियाँ भी तब
हो जाती है पस्त
उड़ने लगा परिंदां
दे गया, कई नसीहतें
ऐसी ही मेहनतों की
उसे भी है दरकार
उठना उसे भी है
बुलंद हौसले के साथ
क्योंकि आगे अभी भी 
हैं, रास्ते नये हजार
आगे कदम बढ़ायेंगे
तो मिलेंगी नई मंजिलें
जैसे मिली थी 
कई कोशिशों के बाद
नन्हें परिंदा को
सफलता का उपहार
खुशियों से भरा 
अद्भुत नया संसार।।।
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