वात्सल्य की प्रतिमूर्ति (कहानी)

((अपने चार बच्चे होने बावजूद एक बिना माँ के बच्चे को अपना कर उसके असंस्कारी जिंदगी को सवाँरनें और उसे आह से अहा बनाने में अपनी जिंदगी कुर्बान करने वाली महिला कोई साधारण महिला नहीं हो सकती। राजरानी ऐसी ही एक महिला थी जिसने अपनी जिंदगी में वह कर दिखाया ..जो एक दृढ़ निश्चय व जुझारूपन की हिम्मत वाली जिद्दी व जीवट महिला ही कर सकती थी))

वात्सल्य की प्रतिमूर्ति
--------------------------
सुसंगत व सुव्यवस्थित परवरिश और जन्मजात विरासत में मिले खराब संस्कार में द्वंद होने पर जीत किसकी हो सकती है???

वह किसी राजघराने की रानी नहीं थी..वह सिर्फ नाम की भी राजरानी नहीं थी। वह तो राजरानी थी अपने दिल में पनपने वाली उन भावनाओं की...जिसमें प्रेम, करुणा, ममत्व व दुलार का विशाल भंडार समाहित था। तभी तो वे अपने उसी अद्भुत प्रेम भंडार से अपना प्रेम छलकाती थी....सभी अपनों और अजनबियों के लिए जो उनके संपर्क में आता था और जिन्हें वे अपना और सिर्फ अपना समझने लगती थी। ऐसी ही शख्सियत की मालकिन का नाम था..राजरानी। 

सामान्य परिवार की मालकिन राजरानी के चार नन्हें - मुन्ने प्यारे बच्चे थेे..एक बेटा आकाश और तीन बेटियाँ....सुरभि , सुगंधा और सुनिधि। इन बच्चों की माँ होने के बावजूद भी राजरानी के मन में वह दर्द और कसक था जिसके कारण उन्हें उस अबोध, अनबोले, नवजात शीशु का उस समय का वह करुण कंदन बर्दाश्त नहीं हुआ..जो वह जन्म लेते ही अपनी माँ को खोकर अनाथ बन चुकने के बाद कर रहा था। बच्चे की चीख ने राजरानी के अंतर्मन को गहराई तक छूकर द्रवित कर दिया। जिसके कारण वे विवश हो गई और अपने को रोक नहीं पायी। तभी तो अस्पताल के उस गमगीन वातावरण में अजनबी होते हुए भी वे लपक कर उस बच्चे को अपने गोद में दुबका ली, और अपने मीठे स्नेह भरे आलिंगन के कारण उसे चुप करा दी। वह बच्चा कैसे और किस खानदान से सम्बंधित है...यह राजरानी ने सोचा भी नहीं..वे तो उस समय, बस अपने ममतामयी आँचल में पनाह देकर उस मातृ विहीन बच्चे को उसके परिवार की सहमति से अपने घर ले कर चली आयी।

इस नवागंतुक शीशु के साथ राजरानी को घर में प्रवेश करने के बाद जब सबको हकीकत पता चला तो घर में कुहराम सा मच गया। परिवार का कोई भी सदस्य इस नये परिस्थिति से समझौता करने को सहमत नहीं था। सबसे पहले तो बेटा आकाश ही दौड़ता हुआ राजरानी के पास आया। राजरानी के गोद में नन्हें से बच्चा को देखकर वह माँ का आँचल थामकर ठिठक गया, फिर उस बच्चे को खींचते हुए रुआँसा होकर बोला, "माँ, तुम्हारी गोद में ये किसका बच्चा है? पहले इसे इसकी माँ को दे दो, फिर मैं तुम्हारी गोद में आऊंगा।" 
"बेटा, यह तुम्हारा छोटा भाई सूरज है। अब यह तुम्हारे साथ इसी घर में रहेगा। आओ, मैं तुम दोनों को एक साथ अपने गोद में ले कर प्यार करती हूँ।" राजरानी आकाश को दुलराते हुए बोली।
आकाश रुठकर माँ का हाथ झटकते हुए बोला, "नहीं, जब तक तुम इसे इसकी माँ के पास नहीं पँहुचाती, मैं तुम्हारे गोद में नहीं आऊंगा। मैं जा रहा हूँ, मुझे पुकारना मत।" उसी समय राजरानी की  बेटियाँ आ गयी।  सुरभि बोली, "माँ, यह प्यारा बच्चा किसका है? आप थकी हुई लग रही है, इसलिए पहले इसे मेरे गोद में दे दो फिर हाथ मुँह धोकर तरोताजा हो जाओ।"
"नहीं बेटी, अभी ये बहुत छोटा है और तुम भी छोटी हो। तुम इसे सम्भाल नहीं पाओंगी।" राजरानी सूरज को बिस्तर पर लेटाती हुई बोली।

राजरानी का इरादा जब उनके पति "बाबूजी" के समझ में आया तब वे विचलित हो कर राजरानी से बोले, "राजरानी, तुम्हारे दिमाग में यह बेवकूफी भरा काम करने का ख्याल कैसे आया? घर में चार बच्चों के होते हुए तुम्हें पाँचवे को पालने का शौक क्यों चर्राया है? देखो, अपने बच्चों के पैर में कुल्हाड़ी मारने की जरूरत नहीं है। तुम यह भी तो नहीं जानती कि बच्चे का खानदान कैसा है और वह किस परिवार से संबंध रखता है। इसलिए इस नई मुसीबत को शीघ्र इसके घर पँहुचा दो।"
बाबूजी की नाराजगी राजरानी को विचलित नहीं कर पायी। वे शांत स्वर में बोली, "आप नाहक चिंता कर रहे है। कृष्ण भी तो यशोदा के घर रहकर पले थे। इसका खानदान कैसा भी हो, जब यह हमारा संगत पायेगा और हम इसे अपने बच्चों के साथ समान परवरिश देंगे तो यह जैसा हम चाहेंगे, यह वैसा ही बनेगा। यह हम सबका प्यारा कृष्ण - कन्हैया बनकर रहेगा।"
"राजरानी, तुम समझती क्यों नहीं हो? यशोदा के और कोई औलाद नहीं थी। तुम्हें तो भगवान ने पहले से ही चार बच्चे दिए है। उनके हक पर लात मत मारो। ले जाओ पहले इसे जँहा से लायी हो वँहा वापस कर दो।" बाबूजी विक्षिप्त से हो गए पर राजरानी पर कोई असर नहीं पड़ा।
वे सूरज को दुलराते हुए बोली, "देखिए जी, मैं जो कदम आगे बढ़ा चुकी हूँ, उससे पीछे नहीं हटूंगी। चाहे आप हो या कोई भी हो..वह इसका विरोध किसी भी हद तक करके देख लें। मैंने जो सोच लिया है, उसे मैं करके रहूंगी। बस एक वादा आपसे करती हूँ कि इस बच्चे के खातिर अपने बच्चों का अहित कभी नहीं करुंगी।" राजरानी के पागलपन वाले हठ के आगे बाबूजी  विवश होकर मौन हो गये।

सूरज अब एक संभ्रांत परिवार में शामिल हो कर पलने लगा। राजरानी सबका समान पालन-पोषण करने लगी। उन्हें न अपनों के रुठने की परवाह थी और न दूसरों के व्यंग्य बाणों की परवाह थी। वह बस मद मस्त हाथी की तरह अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए आगे बढ़ती रही।
राजरानी किसी धनाढ्य परिवार की तो थी नहीं, जिससे उनका मार्ग सरल व सुगम होता। अब तो उन्हें पांच बच्चों को पालना था अतः बहुत सी कठनाईयाँ आनी थी और जिनका सामना राजरानी को करना भी पड़ा। पर कठनाईयों से जुझते उतराते हुए भी अपने नाव को खेने में उनके चेहरे पर शिकन की लेशमात्र भी लकीर परिलक्षित नहीं होती थी।
बच्चों को पालने में राजरानी ने कभी भेदभाव नहीं किया। उनकी छत्रछाया में सभी बच्चे एकसाथ, एकसमान पलने और बढ़ने लगे। बच्चों को व्यवस्थित करके समय पर स्कूल-कालेज भेजना वे अपना कर्तव्य समझती थी।
बहुर्मुखी प्रतिभा की धनी राजरानी उन जरूरत मंद गरीब परिवारों की भी सहचरी बनी रहती थी..जो उनके संपर्क में आते थे। और इसी कारण वे चकरघिन्नी की तरह सबकी मदद के लिए सबके पास चक्कर लगाने पँहुच जाती थी और सबके दुख दर्द को समझकर मदद कर आती थी। यह मदद उनकी संवेदनाओ, समझ,समझदारी के साथ साथ आर्थिक भी होती थी। क्योंकि वे सिर्फ देना जानती थी, लेना नहीं।
उनके ऐसे ही अविश्वसनीय व अविस्मरणीय कृत्यों के कारण उनकी पदवी अपने आप सार्वजनिक रुप से "अम्मा" की हो गई। अब वे सबके लिए "अम्मा" बन गयी।
बाबूजी अक्सर अम्मा को समझाते और कहते, "राजरानी, हम इतने धनी नहीं है जो तुम अपने घर को धर्मशाला बना ली हो। तुम्हें इतना बोझ तले मेहनत करते मैं नहीं देख सकता इसलिए इन जिम्मेंदारियों से दूर रहकर सिर्फ अपने बच्चों पर ध्यान दो, वरना अपने सब बच्चे बर्बाद हो जायेंगें। फिर हम कहीं के नहीं रह जायेंगे।"
तंगहाली और बेहाली में भी अम्मा ने जवाब दिया, "देखिए जी, मैं हूँ ना। इसलिए आप किसी की चिंता मत करिए। बच्चों की परवरिश में कोई कोर कसर बाकी नहीं रहेगा। मैं जी जान से उनके भविष्य को सुरक्षित करने में लगी हूँ अतः आप निश्चिंत होकर अपना काम करो।"

अपने कामों में व्यस्त अम्मा को बढ़ते बच्चों में यह महसूस होने लगा कि सूरज का व्यवहार कुछ परिवारिक परम्परा से हटकर है। वे जितना सूरज की तरफ ध्यान देती, उतना ही वह उनके हाथ से छिटकने लगा था।
पर अम्मा का माथा उस समय और ठनका...जब वे यह जान गई कि एक ही शिक्षा और परवरिश होने के बावजूद भी दो संस्कारों की विरासत लेकर पैदा हुए बच्चों का मानसिक स्तर एक सा विकसित होकर एक स्तर पर पँहुच नहीं सकता। बच्चों में आने वाले गुणों की छाप अपने पूर्वजों के गुणों पर आधारित होते है। यही कारण था कि समान सुविधा और समान परवरिश होने के बाद भी सभी बच्चे समान नहीं होते। उन पर अपने माँ-बाप के व उनके पूर्वजों के गुण ही  हावी होते है।
अम्मा को अब अपने बच्चों और सूरज के रहन सहन और स्वभाव में अंतर परिलक्षित होने लगा। अम्मा के बच्चे "बाबूजी और अम्मा" के स्वभाविक गुणों के कारण पढ़ने में तेज, अग्रणी और सुव्यवस्थित थे। उन्हें अपने भविष्य की चिंता थी, इसलिए उनके अपने मार्ग से विचलित होने की सम्भावना कम थी। वहीं सूरज पर अम्मा का दबाव होने के बावजूद भी उसका मन पढ़ने में कत्तई नहीं लगता था। पढ़ने में मन न लगने के अतिरिक्त सूरज में और भी बहुत सी खामियाँ उजागर होने लगी। वह घर में ही लोगों की जेब से रुपये और सामान गायब करके अपना शौक पूरा करने लगा। छुप-छुप कर गलत बच्चों की संगत करना और उनके जैसा व्यवहार अपनाना सूरज ने चोरी-चोरी सीख लिया।
एक दिन बाबू जी ने महसूस किया कि उनके जेब से रुपया गायब था। उनका क्रोध चरम सीमा पर पँहुच गया। वे अम्मा पर चीखते हुए बोले, "राजरानी, तुम क्यों एक गलत परम्परा की नींव पर एक बिगड़े बच्चे को शह देकर पूरे परिवार को गर्त में ड़ूबोने को तत्पर हो? छोड़ आओ, इस नालायक बच्चे को इसके पिता के घर और सबको चैन से रहने दो। यदि तुम नहीं पँहुचा सकती तो मुझे बताओ, मैं पँहुचा दूंगा।"
बाबूजी के इस बात से अम्मा कुपित होकर बोली, "आप नाहक सूरज के पीछे पड़े है। माना उसमें कुछ कमियाँ है। मैं उन कमियों को दूर कर दूंगी। जहाँ तक अपने बच्चों का सवाल है, तो वे हीरा है। वे बिगड़ नहीं सकते।"
"तुम सूरज की कमियाँ क्या दूर करोगी? उसने तो अब चोरी भी सीख लिया है। मेरे जेब से रुपया गायब कोई और नहीं, सिर्फ तुम्हारा लाडला सूरज ही कर सकता है।"
"सूरज ने यदि इतनी बड़ी गुस्ताखी की है तो उसकी खैर नहीं। मैं अभी उससे पूछती हूँ और सही होने पर दण्ड भी दूंगी।"
अम्मा कहने को तो बाबूजी को चुप करा दी पर उनकी आत्मा जानती थी कि यह गुस्ताखी सूरज के अतिरिक्त कोई और कर ही नहीं सकता है। वह सूरज की कमियों को ढ़कने की पूरजोर कोशिश करती। बाबूजी यह अच्छी तरह जान गये थे कि दत्तक पुत्र के प्रेम में अंधी इस गान्धारी को कुछ कहना बेकार है। यह अपने आगे किसी की सुनेगी नहीं। इसलिए उसकी बातों को वहीं छोड़कर आगे बढ़ जाने में ही उन्हें अपनी भलाई नजर आयी।

सूरज की गलत आदतें जब सर चढ़कर बोलने लगा और अम्मा को विश्वास होने लगा कि सूरज बिगड़ चुका है, तब अम्मा का माथा ठनका। अब वे सतर्क हो कर सोचने पर मजबूर हो गई कि परवरिश पर संस्कार हाबी होने लगा है। उन्हें अपनी गलती का एहसास होने लगा। संस्कार की महत्ता अब उनके जेहन में समा गई, वे समझ गई कि उनका मार्ग उतना सरल नहीं है जितना सरल वे करना चाहती थी। अब यदि उन्होंने थोड़ी सी भी ढ़ील सूरज को दी तो  उनके कठोर परिश्रम पर पानी डालकर सूरज का संस्कार हाबी हो जायेगा। अपने आगे बढ़े कदम को पीछे खींचने की अपेक्षा अम्मा को काँटों भरे राह पर चलना मंजूर था।
अम्मा के अपने बच्चे, अभावों से जूझने के बावजूद भी शिक्षा ग्रहण करने में अग्रणी थे। पर वहीँ सूरज का रुझान व झुकाव जो गलत कार्यों की तरफ हो गया था, उसे सुधारना जरूरी था। सूरज को सुधारने के लिए अम्मा ने कमर कस लिया। कम पढ़ी लिखी होने के बाद भी सूरज को पढ़ाने के लिए अम्मा रात के अंधेरे में जब सब खा पीकर अपने कमरे में पढ़ने और सोने चले जाते थे तब वे स्वयं पढ़ती ताकि दिन के उजाले में सूरज को पढ़ा सकें। वे सूरज को स्वयं पढ़ाती थी, समझाती थी और नेक व अच्छा बनने की सलाह देती थी। सूरज को पढ़ाने के साथ ही उसके गलत आदतों को सुधारने में अम्मा जी जान से जूझती रही। जिसके परिणाम स्वरूप सूरज को सुधारते, सवाँरते, संगठित करके वे उसे इस लायक तो बना ही दी कि वह बड़ी तो नहीं पर जीविकोपार्जन के लिए कामचलाऊ नौकरी कर सके।
बाबू जी अम्मा का साथ ज्यादा दिन निभा नहीं पाये। वे बीच मझधार में ही अपनी सारी जिम्मेदारियों का बोझ अम्मा के कंधों पर डालकर इस दुनियाँ से कूच कर गये। अकेले पड़ जाने के बाद भी अम्मा ने कभी हिम्मत नहीं हारी। वे अडिग इरादें और हिम्मत के बलबूते आगे बढ़ती रही और सफल भी हुई। उम्र की कोई सीमा उन्हें उनके इरादे से डिगा नहीं पाया ।

अम्मा का बेटा आकाश आई.ए.एस. और बेटियाँ डाँक्टर और इंजीनियर बन गए। शादी के बाद सभी बच्चे अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गये।
अपने बच्चों को सुव्यवस्थित करने के बावजूद भी अम्मा ने किरायें का घर नहीं छोड़ा। वे सूरज के साथ उसी घर में रहती थी। सबके दूर रहने के बाद भी वे अपने परिवार को एकसूत्र में बाँधे रखी। अपनी प्रतिभा की सुनहरी किरणे बिखेरने वाले अम्मा के बच्चों की यह हिम्मत नहीं थी कि वे सूरज की अवहेलना कर सकें।
अम्मा ने अपने बच्चों के सहयोग से एक घर खरीदा, फिर वे सूरज के साथ उसी घर में रहकर सूरज की शादी की। सूरज की शादी के बाद आकाश बोला, "अम्मा, सूरज का घर बस गया। वह नौकरी भी करने लगा। अब तुम्हारी जिम्मेदारी सूरज के प्रति समाप्त हो गई। इसलिये तुम मेरे साथ बंगलौर चलो। वँहा भी तुम्हारे पोता-पोती है जो तुम्हारी राह देखते है। वे तुम्हें पाकर बहुत खुश होंगें। थोड़ी खुशी उनकी भी झोली में डाल दो।"
अम्मा अपने दिल से विवश थी इसलिए आकाश का मन रखने के लिए बोली, "ठीक है, चलूंगी पर शीघ्र ही वापस आ जाउंगी। क्योंकि जब मुझे संतुष्टी मिल जायेगी कि सूरज का परिवार पूर्ण रुप से व्यवस्थित हो गया है, तब मैं खुद तुम्हारे पास आकर रहने लगूंगी।"
आकाश जानता था कि वह दिन कभी नहीं आयेगा। यह अम्मा का झूठा आश्वासन है। क्योंकि सूरज न कभी व्यवस्थित होने के प्रति कटिबद्ध था और न कभी होने का प्रयास करता। इसलिए अम्मा उसे मझधार में छोड़कर नहीं जा पायेंगी। यह जानते हुए निराश आकाश अपने घर लौट गया।

सूरज की पत्नी बेला सुंदर और समझदार थी पर ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी। इसलिए बूढ़ी होती अम्मा की मैराथन दौड़ फिर शुरू हो गई। सूरज की असलियत जानने और उस पर विश्वास न जमने के कारण अम्मा वहीं सूरज के पास बनी रही क्योंकि उनके मन में बेला को पढ़ा लिखाकर इस लायक बनाना था जिससे विपरीत परिस्थितियों में सूरज के परिवार को डगमगाने से पूर्व एक ठोस सहारा ऐसा मिल जाये जिससे सुरज के परिवार की परवरिश अच्छी तरह होती रहे। बेला को आगे की पढ़ाई के लिए स्वतंत्र करके गृहस्थी का सारा बोझ अपने ढ़लते कंधों पर डाल कर अपने जीवन की दूसरी पाली जीने को अम्मा तैयार हो गयी। जिस उम्र में अम्माँ को आराम चाहिए था उस उम्र में खाना बनाना, सबको टिफिन देना, सब्जी लाने जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को स्वयं के कंधों पर ढ़ोने का दायित्व उन्होंने जिस सरलता से अपने कंधों पर लिया वह एक दृढ़ निश्चय वाली जिद्दी, जीवट व जुझारुपन की हिम्मत वाली महिला के लिए ही संभव था। बच्चों की सफलता के घमण्ड में उन्होंने कभी अपनी औकात नहीं बढ़ायी। वे अपने बच्चों के पास मेहमान की तरह जाती थी। जहाँ वे कुछ दिन रहती-टिकती पर उनका मन मयूर विहार करता था सूरज के आँगन में  अतः शीघ्र ही वे सूरज के पास लौट आती। समय अंतराल पर सूरज के दो बच्चे हुए..आदर्श और अवन्ति। आदर्श और अवन्ति दोनों अम्मा को बहुत प्यारे थे।
बड़े होते आदर्श और अवन्ति के क्रियाकलापों और रहन-सहन में जमीन-आसमान का अंतर अवतरित होने लगा। अवन्ति के गुणों में अम्मा की छाप नजर आती थी। वहीं आदर्श अवन्ति के विपरीत निकला। उस पर अपने पूर्वजों की छाप चिन्हित होने लगी।     
अम्मा ने जानबूझकर पोते का नाम आदर्श रखा था ताकि वह एक सभ्य बच्चा बने। पर होनी को कौन टाल सकता था...आदर्श सिर्फ नाम का आदर्श था। गलत  हरकतों में वह अपने बाप से दो कदम आगे ही निकला। अभी अम्मा इस दुख को झेल ही रही थी कि उन्हें बहुत बड़ा सदमा लग गया। सूरज अपने अधकचरे परिवार का बोझ अम्मा के कंधों पर डालकर इस दुनियाँ से कूच कर गया।

अब बुढ़ी अम्मा अपनी जिंदगी की इस तीसरी पाली में और भी अधिक सक्रिय होकर जागरूक, जीवट और जुझारू बन गई। बेला को सम्भालने के बाद उनकी नौकरी एक अध्यापिका के रुप में लगवा दी।  इसके बाद बच्चों को पालना-पोषना और गृहस्थी सम्भालना.. सब वे बखूबी निभाती रही। अम्मा की मुसीबतों  में कोई कमी नहीं आयी क्योंकि आदर्श एक दूसरा सूरज था। एक बार फिर अम्मा अपने पुराने जिम्मेदारियों में लिप्त हो गयी। क्योंकि सूरज के परिवार को पालना-पोषना, गढ़ना, संरक्षित और सुव्यवस्थित करना वे अपनी जिम्मेदारी समझती थी। इसीलिए सूरज के बाद आदर्श के गलत आदतों को सुधारने का  जिम्मा एक बार फिर अम्मा अपने कंधों पर ले ली। 
अम्मा जिंदगी भर सूरज और उसके परिवार को सम्भालती, सुधारती रही और असंस्कार पर अपनी परवरिश का दबदबा बनाती रही। पढ़ने के बाद अवन्ति की शादी एक संभ्रांत परिवार में हो गई। जँहा वह सुखी और संपन्न जीवन व्यतीत करने लगी। अपने पुत्र आकाश के सहयोग से अम्मा ने आदर्श को भी अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बना दिया। अम्मा के अच्छे परवरिश की छाप सभ्य तरीके से रह रहे सूरज के परिवार में परिलक्षित होने लगा था।
  
सूरज और उसके परिवार को अपनाकर उसके असंस्कारी जिंदगी को सँवारने और उसे आह से अहा बनाने  में अपनी सुख-सुविधाओं वाली जिंदगी को त्याग कर काँटों भरी राह को चुनने के बाद खुद को चलायमान और सक्रिय बनाकर अपने जिंदगी की जो आहुति अम्मा ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक दी वह काबिले तारीफ थी। ऐसा कोई कमजोर दिल वाला नहीं बल्कि एक विशाल ह्रृदय की साम्राज्ञी राजरानी ही कर सकती थी और उन्होंने वह कर भी दिखाया।

सुसंगत व सुव्यवस्थित परवरिश और जन्मजात विरासत में मिले खराब संस्कार में द्वंद्व होने पर जीत किसकी हो सकती है ?....यह समझने और सुलझाने में राजरानी ने अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी और अंत में यह साबित कर दिया कि पूरी निष्ठा और लगन से किया गया कोई परिश्रम यदि पूर्ण रुप से सफल नहीं होता तो वह बेकार भी नहीं जाता। वह अपनी छाप किसी न किसी रुप में छोड़ ही देता है।
 

हमें हमार रुपैया तव लौटाई देव (लघुकथा)

बच्चे तो बच्चे होते है, इच्छाओं,भावनाओं और लालसाओं पर बच्चों का भी बस नहीं होता। अपने सोच के अनुसार वे भी सपने देखते है...आगे बढ़ने या पढ़ने के लिए।
ऐसे ही एक गरीब शैतान बच्चे से अनुप्रिया जब मिली, तब उसकी सोच ही बदल गयी।
 
अनुप्रिया कालेज में अध्यापिका थी। पति के ट्रांसफर के कारण उसने पढ़ाना छोड़ दिया। नई जगह, पर अब किसी स्कूल में नौकरी करने की उनकी इच्छा नहीं हुई, तो वे घर पर ही रहने लगी। थोड़े दिनों बाद जब खाली समय में मन उबने लगा, तब उनसे रहा नहीं गया।  उसी समय पता चला कि पास के एक अनाथालय में खुले गरीब बच्चों के स्कूल में कोई टीचर नहीं है, तब अनुप्रिया मात्र दो घंटा के लिए वहाँ जाने लगी। 
 
आसपास के झोपड़ियों में रहने वाले गरीब बच्चों की टोली बड़े उत्साह से वहाँ पढ़ने के लिए आती थी। बरामदें में दो क्लास लगती। वह और अनाथालय की एक लड़की मिलकर दोनों क्लास के बच्चों को पढ़ाती थी। अनुप्रिया का मन इन छोटे बच्चों में काफी रम गया। वे उनकी शैतानियों, चुहुलबाजियों के  बीच उनके पढ़ने की जीजिविषा से काफी प्रभावित हुई, अतः वे मन से पढ़ाने लगी।
 
अनुप्रिया के क्लास में अभय नाम का एक लड़का था। उसकी शैतानी तो ठीक थी, पर जब वह पूरे कक्षा में व्यवधान उत्पन्न करता, तब अनुप्रिया खिज जाती। तंग आकर अनुप्रिया ने एकदिन उसे कक्षा से बाहर कर दिया। वह ब्लैकबोर्ड के पीछे ढ़ीठ बच्चे की तरह खड़ा होकर खुंसाते हुए बुदबुदाने लगा। अनुप्रिया जितना डाटती, वह उतना ही ज्यादा बड़बड़ाते हुए अनुप्रिया को परेशान करने लगा। अनुप्रिया सोच ली थी कि आज इसे कक्षा में नहीं बुलाऊंगी। शायद अभय को भी आभास हो गया कि मैम उसे अंदर नहीं बुलायेंगी, तब वह ठसकते हुए बोला," हमें कक्षा में बुलावे और पढ़ावे को नाहीं है, तो हमार दस रुपैया तो लौटाई दो। हम चले जईवे।"
रुपया? अनुप्रिया चौंक गयी। बाद में अनुप्रिया को पता चला कि इन गरीब बच्चों से यहाँ भी फीस लिया जाता था।
कुछ महीनों बाद संचालिका से तालमेल न बैठने के कारण अनुप्रिया वहाँ जाना छोड़ दी। बाद में स्कूल भी बंद हो गया।
 
कालोनी के आसपास के ही बच्चे पढ़ते थे, अतः वे अक्सर  बच्चे मिल ही जाते थे। मिलने पर वे आदर भाव ही दिखाते।अभय जब मिलता, तब उसके चेहरे पर मासूमियत के साथ दृढ़ता भी झलकती थी। वह अनुप्रिया से एक ही प्रश्न पूछता और कहता," मैम, स्कूल काहें बंद होई गवा? हमें आगे पढ़ै के बा। अब हम शैतानी कबहूँ नाहीं करब।"
अभय की लालसा अनुप्रिया को झकझोर देती । इस प्रश्न के उत्तर की तलाश में एकदिन अनुप्रिया ने अभय से कहा," मेरे घर आ जाओ, मैं तुम सबको पढ़ाऊंगी।"
 
इस प्रकार अनुप्रिया के घर में छोटे से स्कूल की नींव पड़ गई।
 

तसल्ली भरी जिंदगी (लघुकथा)

रिटायरमेंट के बाद घर में समय गुजारने वाली गायत्री की व्यस्तता और हमेशा पोते-पोतियों में उलझी रहना उनकी प्रिय सहेली प्रमिला को बहुत असहनीय लगता था। तभी तो एकदिन वह मौका पाकर गायत्री पर झल्लाकर चिल्ला पड़ी, बोली," गायत्री, तुम्हें अच्छी खासी पेंशन अपनी सुविधा और देखभाल के लिए मिलता है, जिसे तुम अपने पर खर्च न करके बेटा के सुपुर्द करके निश्चिंत हो जाती हो। यह सोचती नहीं कि तुम्हें इससे कुछ फायदा मिलता है कि नहीं। बस दिनभर पोता-पोती की गुलामी में खटती हो। इससे अच्छा तो यही था कि तुम गाँव चली जाती। गाँव में तुम स्वतंत्रतापूर्वक अपनी जिंदगी जीती और आराम से सुकून भरा जीवन व्यतीत करती।"
प्रमिला के बात करने की तीव्रता को भांपकर गायत्री शांत व सरल शब्दों मे बोली," मेरी प्यारी सहेली, इस उम्र में माली अपने सींचें सवारें बगिया को किसी और के हाथों में सौपना नहीं चाहता है। इसलिए जब तक सांस है, तब तक अपनी बगिया को संवारना और आने वाले फूल को सहेजना माली की जिम्मेदारी होती है।इस सोच के कारण मैं खुश हूँ। तुम मेरी चिंता मत करो। जहाँ तक मेरी जिम्मेदारी का प्रश्न है...वह बेटा-बहू के विवेक व सोच का काम है। मैं इस संदर्भ में अपना सर क्यों खपांऊ...वे जैसा बोयेंगें वैसा ही आगे की जिंदगी में काटेंगे। इसलिए यह सोचना उनकी जिम्मेदारी है...मेरा नहीं। अपने दुख को दुख समझो तो वह पहाड़ बन जाता है। जो सामने है उसे नीयत का खेल समझकर तसल्ली से जीते जाओ तो तसल्ली भरी जिंदगी मिलती है। इसलिए कहते है व्यस्त व मस्त रहो तो जीने का साहस और सुकून मिलता है।"
यह सुनकर प्रमिला की बोलती बंद हो गयी। वह बस इतना ही कह पायी ," तुम्हारी सोच सही है। हम जैसा सोचेंगे, हमें वैसी ही जिंदगी मिलेगी।"
 

सपने तंग करते है (लघुकथा)

अवनी सरकारी स्कूल में अध्यापिका है। अनलॉक काल में उसे स्कूल प्रतिदिन जाना पड़ता था। स्कूल की चाभी उसी के पास था, अतः वह समय पर स्कूल पँहुच जाती थी।स्कूल में बाउंड्री था नहीं। अतः कमरे का ताला खोलते ही आस पास के बच्चे मचलते और उत्साहित होते हुए न जाने कहाँ से आकर उसको घेरकर खड़े हो जाते। 
वे उत्सुक निगाहों से पुछते है," मैम जी, क्या स्कूल खुल गया? हम अपना किताब-कापी लेकर क्या आ जाये?"
"नहीं, अभी स्कूल नहीं खुला है। तुम लोग घर जाओ। और मास्क लगाकर घुमो।"
यह सुनने के बाद भी जब बच्चे गये नहीं, बल्कि डटे रहे। अवनी कसकर धमकायी, तब वे पीछे मुड़कर खिसकने लगे।
 बच्चे चले गये। अवनी अपने काम में जुट गई। काफी देर बाद अचानक अवनी को लगा कि कमरे के बाहर कोई है। वह बाहर आयी तो खामोश रोहित को कमरों को निहारते देखकर वह दंग रह गयी। वह रोहित से बोली, "जाओं घर जाकर अपने पापा को भेज दो। मुझे उनसे काम है।"
रोहित बात को अनसुनी करके बोला," मैम, क्या मैं थोड़ी देर के लिए अंदर बैठ जाऊं।" 
रोहित के इस आग्रह पर अवनी द्रवित हो गई। वह बोली, "आओ, चुपचाप बैठ जाओ। पर किसी को पता नहीं चलना चाहिए।"
"मैम, एक कागज-पेंसिल दे दीजिए। मैं अभी आपको कखगघ लिखकर दिखाता हूँ।" रोहित की मासूमियत और उत्साह अवनी के दिल को छू गयी। वह रोहित को कागज-पेंसिल देकर  अपना काम करने लगी। रोहित जब लिख लिया तो अवनी के पास आकर खड़ा हो गया। अवनी झुझलाकर बोली,"चुपचाप बैठकर लिखते रहो, वरना घर भेज दूंगी।" 
रोहित चुपचाप बैठकर लिखने लगा।
थोड़ी देर बाद दूसरा लड़का गगन दरवाजे से झांकता है।फिर उत्साहित होकर बोला,"अरे, रोहित यहाँ बैठे लिख रहे हो। मैम, क्या मैं भी अपना किताब-कापी लेकर आ जाऊं? आपको परेशान बिलकुल नहीं करुंगा?"
"नहीं, स्कूल बंद है। तुम यहाँ बैठ नहीं सकते हो। जाओ, अब तुम दोनों घर जाओ, मुझे काम करने दो।"
रोहित मायूस सा गगन को खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए बोला," तुम क्यों चले आये?"
"तुम लोग जल्दी जाओं, मुझे बहुत काम करना है।" 
अवनी बच्चों को बाहर तक छोड़ने आयी, ताकि वे दुबारा अंदर न चले आयें। 
रोहित बाहर निकलते समय अवनी से पूछा, "मैम, मैं क्या कल आ सकता हूँ?"
"नहीं, तुम आना मत, क्योंकि स्कूल अभी बच्चों के लिए बंद है, जब खुलेगा तब आना।" अवनी दोनों से बोली।
 
"मैम, मैं तो कब से परेशान हूँ कि ये स्कूल कब खुलेगा? मुझे स्कूल की बहुत याद आती है। अब तो मुझे स्कूल के सपने भी बहुत आते और तंग करते है।"
 
रोहित की मासूम दयनीय अकुलाहट देखकर अवनी विकल हो गयी। कोरोनाकाल की विवशता ने बड़े तो बड़े, मासूम को भी अपने जाल में जकड़ने से नहीं छोड़ा है।  सब इस समय बेचैन है कि कब इस कोरोनाकाल से छुट्टी मिलेगी और जिंदगी अपने पुरानी पटरी पर दौड़ने लगेगी। यही सोच इस समय की हकीकत है।
 

बड़ा दिल (लघुकथा)

बिस्तर पर अजलस्त पड़ी माँ पास खड़ी होकर दवा देती बेटी ममता से फुसफुसाई," बेटी, शाम को आना तो मेरे बक्से में पड़ी हुई नयी हरे रंग वाली साड़ी-ब्लाउज का जो नया पैकेट पड़ा है..उसे लेती आना।"
ममता चौंककर माँ को देखते हुए बोली," अस्पताल में नई साड़ी का क्या काम है?"
माँ कुछ नहीं बोली। दवा पीकर वह चुपचाप करवट बदलकर लेट गई। तभी क्रोध से बुदबुदाती ममता को भाई महेश आते दिख गये।
दिन की जिम्मेदारी महेश के सुपुर्द करके ममता ऑफिस चली गई।
शाम को माँ के बक्सा से साड़ी निकालते हुए ममता के क्रोध की कोई सीमा नहीं थी। उसे रह रहकर माँ पर गुस्सा छलक रहा था। जिस माँ की सेवा में वह दिनरात जी जान से जुटी रहती थी..उसी माँ के भाई-भाभी के प्रति उमड़तें प्रेम को देखकर वह खुन्नस खा रही थी। माँ क्यों उस अनादर को इतनी जल्दी भूल गई , जो माँ को अकेले छोड़ते समय भाई-भाभी ने किया था और कभी पलटकर माँ की सुधि भी कभी नहीं लिया। महेश के जाने के बाद ममता ने ही माँ की देखभाल और जिम्मेदारी निभाई। यह साड़ी ममता ही माँ के  लिए लायी थी, पर जिद करने पर भी माँ उसको पहन नहीं रही थी। माँ के मन में क्या चल रहा था, यह ममता उस समय समझ नहीं पायी थी।
माँ ने ही जिद करके अपने बीमारी की खबर महेश तक पँहुचवायी थी। दो दिन के लिए आये भाई-भाभी के आज जाने का दिन था।
ममता माँ के लिए खाना बना रही थी, उसी समय उसके पति आशीष आ गये। ममता के विकृति मुखमण्डल को देख वे समझ गये कि मामला जरूर कुछ गड़बड़ है। वे ममता के करीब आकर प्यार से बोले," क्या बात है, आज श्रीमती जी के चेहरे पर बारह क्यों बज रहा है?"
ममता को मौका मिल गया। वह भाई की निष्ठुरता और माँ का उनके और भाभी के प्रति प्रेम से वशीभूत हुई भावना पर अंटशंट बड़बड़ाती हुई अपने मन की गुबार निकालने लगी।
ममता की बातें सुनकर आशीष बोले," तुम माँ की बातों को इस तरह समझों कि माँ आखिर में माँ ही होती है। उन्हें अपने सभी बच्चों से प्यार होता है। वे आज भी अपने को सक्षम समझती है। वे अपने अहम् को आज भी जीवित रखना चाहती है। वे तुम्हें अपना समझती है, तभी तो तुम्हारे दिए साड़ी पर अपना अधिकार और उसे अपना समझती है। इसलिए वे उसे देने की हिम्मत को संजों कर तुमसे साड़ी लाने को कह  सकी। तुम उनके अहम् की संतुष्टि के लिए अपना मन बड़ा करो और खुशी मन से साड़ी को दे आओ।"
ममता के मन का बोझ उतर चुका था। वह अस्पताल जाने की तैयारी में दुगने वेग से तैयार होने लगी क्योंकि बड़े दिल वाले पति का बड़ा सोच अब उसमें समाहित हो चुका था।
 

झिलमिल झिलमिलाता घर (लघुकथा)

राघव और रोली दीपावली की तैयारियों में जुटे थे।  रोली अपने गुड़िया-गुड्डे को सहेज रही थी तो राघव पुरानी पड़ी झालरों को सुलझा रहा था। अचानक राघव बोला," जानती है दीदी, अबकी मैं पापा से जिद करके ढ़ेर सारी झालरें लूंगा, क्योंकि हमारा घर छोटा है, दूसरे झालरें भी हम सिर्फ कामचलाऊ लगाते है। जिससे मुझे अपना घर काफी फीका लगता है।"
यह सुनते ही रोली तैश में आकर राघव को घूरती हुई बोली,"राघव, तुम्हारे दिमाग में ये बातें आई कैसे?"
"दोस्त मुझे चिढ़ाते है, तभी तो मैं चाहता हूँ कि मैं उन्हें दिखा दूं कि मैं भी किसी से कम नहीं हूँ।"
"ओह अब समझी, मेरा भाई व्यर्थ के बहकावे में फँसा है? भैया, मैं तो ये कहूंगी कि अबकी बार हम झालर बिलकुल लगायेंगे ही नहीं।"
यह सुनकर राघव आश्चर्य से बोला," लेकिन क्यों? क्या घर को ऐसे ही खाली छोड़कर ढ़पली बजायेंगे? घर की रौनक बढ़ाने की बजाय बिगाड़ देंगे।"
"मैं कब कह रही हूँ कि हम हाथ पर हाथ रखकर बैठेंगे। अबकी हम अपने घर को सिर्फ दिए और मोमबत्तियों से सजायेंगे।" रोली उत्साहित होकर बोली।
"इससे क्या फायदा होगा? पहले ढ़ेर बत्ती बनाओ, फिर एक एक दिए में तेल डालकर बत्ती लगाओं। उसके बाद सारे दिए को लेकर जगह-जगह सजाओ। इतने मेहनत के बाद भी घर फीका का फीका ही लगेगा।"
"फीका नहीं लगेगा,भाई। बल्कि झिलमिल-झिलमिल झिलमिलायेगा। इस तरह हम पुरानी परम्परा में लौटने के साथ ही उन कुम्हारों की मदद भी करेंगे जो इसी दीपावली के लिए ढ़ेर सारे दियों के साथ खिलौने इत्यादि भी बनाते है।"
"रह गये ना हम वहीं के वहीं। इस बार मैं फिर दोस्तों से सजावट में पिछड़ जाऊंगा। और उन्हें चिढ़ाने का मौका दे दूंगा।" राघव रुआँसा होकर बोला।
"अरे भाई, मैं कब ऐसा चाहुंगी? इन दियों के कारण तुम इन कुम्हारों से जुड़ोंगे, तब तुम्हें इनके और इनके बच्चों की मुस्कुराहट से जो आंतरिक खुशी मिलेगी, वह दोस्तों के बनावटी सोच पर भारी पड़ेगी। एक बार मेरा कहा मानकर तो देखो।" 
रोली की बात में दम था। राघव बोला,"ठीक है दीदी। एकबार मैं यह भी करके देखता हूँ।"
"शाबास मेरे भाई। उम्मीद है हम अच्छा ही करेंगे।"
राघव कुछ कहता उससे पहले उनके पापा प्रमोद जी बोल उठे," वाह मेरे बच्चों, मुझे तुम्हारी सोच पर गर्व है। मैं भी तुम्हारा साथ दूंगा। ढ़ेर सारे  दियों से हम अपने छोटे से घर को सजायेंगे।"
"छोटा,नहीं पापा, अपने सुंदर घर को सजायेंगे।" राघव की इस बात पर सब लोग खिलखिलाकर हँसने लगे।
 
दीवाली के दिन चारों तरफ जगमग सजावट थी। अचानक बिजली गुल हो गई। ऐसे में सिर्फ राघव का घर ही दियों से जगमगा रहा था। राघव के सभी दोस्त आश्चर्यचकित थे, अँधेरे में दीये से चमकता राघव का घर बहुत सुंदर लग रहा था, सभी दोस्तों ने आके राघव को खूब बधाई दी। राघव फुलझड़ियाँ छुड़ाते हुए बहुत खुश था और बच्चों के नयी उपलब्धि पर उसके मम्मी-पापा दूर खड़े होकर मंद मंद मुस्कुरा रहे थे।
 

विरासत में मिली कला का विस्तार (लघुकथा)

कालेज से लौटी मेहू खुशी से माँ रागिनी के गले में बाहें डालकर बोली,"माँ, मैं आज बहुत खुश हूँ। मेरी सहेली प्रिया, जो परसों घर पर आयी थी, वह आपकी कलाकृतियों से बहुत आकर्षित हुई थी। कह रही थी तुम्हारी मम्मी कितनी गुणी है? पूछ रही थी कि मम्मी ने कहाँ सीखा है? मैं तो बता नहीं पायी, इसलिए आज आप ही बता दीजिए कि आपने ये सब कहाँ से सीखा है?"
" मैं तो कहीं सीखने गई ही नहीं। जो सीखा, वह तुम्हारी नानी की देन है और उसमें मेरी अपनी रुचि व लगन और जुट गयी।"
"मैं मान ही नहीं सकती कि कोई घर पर रहकर इतना निपुण हो सकता है? यही कारण है कि आज मैं भी प्रिया के साथ एक कला केंद्र में नाम लिखवा ली हूँ। मुझे भी आपकी तरह ही घरेलू कला में निपुण होना है।"
" इसके लिए तुम लोगों को बाहर जाने की जरूरत ही क्या थी? इसमें तो मैं ही तुम दोनों को निपुण कर देती।" रागिनी मेहू की उत्सुकता देखकर बोली।
"आपके पास चूल्हें चौके से समय ही कहाँ बचता है? प्रिया सीखेगी, तो मेरी भी इसमें रुचि बढ़ेगी।" यह कहकर मेहू वहाँ से चली गई, तो रागिनी के चेहरे पर निराशा के भाव दिखने लगा।
समय बितता गया। एकदिन मेहू कालेज से जल्दी आ गयी तो रागिनी को घर पर न पाकर वह पड़ोस की रेखा ऑंटी के घर उन्हें बुलाने चली गयी। वहाँ उसने जो देखा,उससे उसकी आँखें फटी की फटी रह गई। रेखा ऑंटी के घर में माँ की बनायी जैसी ही कई पेंटिंग टँगी थी। इस समय रेखा ऑंटी एक साड़ी पर कढ़ाई कर रही थी और मम्मी से हँस-हँसकर बातें कर रही थी।
"ऑंटी, आप ये सब कब बना ली। मैं तो कला केंद्र में सीख रही हूँ, पर अभी तक एक मेजपोश भी नहीं बना पायी।"
 यह सुनकर रेखा बोली," मेहू बेटी, कुछ चीजें किताबों से नहीं, बल्कि विरासत से मिलती है। तुमने माँ के कला की कद्र ही नहीं की, तो मैंने सोचा कि तुम्हारी माँ के ज्ञान का लाभ मैं ही उठा लूं। मैं ही क्या, तुम्हारी मम्मी से तो और भी कई लड़कियाँ और औरतें बहुत कुछ सीखती है।"
"सच" ये कहकर मेहू अपने मम्मी के गले लगकर बोली," मम्मी, मुझे माफ कर दीजिए कि मैंनें आपके ज्ञान का कद्र नहीं किया। लेकिन मुझे आज आप पर गर्व बहुत हो रहा है कि आप अपने पराये के भेद के बिना ही अपनी कला का विस्तार करती रही।"
"बेटी,अपनी माँ से सीखे इन गुणों को मैं विरासत में तुम्हें और बहू को देना चाहती थी, पर तुम लोगों की इसमें कोई रुचि नहीं थी, तो मैंने तुम लोगों को छोड़ दिया, क्योंकि जिसमें लगन नहीं होता, उसे सिखाने से कोई फायदा नहीं होता। लेकिन मुझसे जो लगन से सीखने आता, उसे मैं इंकार नहीं कर सकती थी। मेरे माँ के ज्ञान का विस्तार तो होना ही चाहिए। वही मैं कर रही थी।"
"आप धन्य है मम्मी। आज से मेरा कला केंद्र जाना बंद। आज से मैं आपकी बेटी के साथ-साथ शिष्य भी हूँ। आप मुझे सिखायेंगी ना।"
मेहू के इस कथन पर हाँ कहते हुए रागिनी का पोर-पोर पुलकित हो गया।

शंखनाद (कविता)

घायल मन की
मौन प्रतिज्ञा,
उग आती है
नैनों में।
करु कुछ ऐसा  
बंनू मैं वैसा,
चमक उठूं
जो जीवन में।

स्याह अधेंरा
लिपटा है तन में,
कांप रहा दिल
व्याकुल होकर।      
काल की 
कुटिल व्यवधान
बाँध रही है
जालें पैरों में।

उफानती है
बेताब नदियाँ,
भँवर में फँसें
तन्हाँ मन को।
हिलोरें लेती है
मंथन की लहरें,
क्षुब्ध मन के 
पागलपन में।

बहुत हो चुका
घोर निराशा,
बंधन मुक्तकर 
मन का द्वार खोलो,
उत्तेजित हो
चलो अकेले।
तभी बाँध सकोगे
जीवन को।

उद्घोष उत्तेजना 
होनी है उँची,
शंखनाद 
करनी है लम्बी।
तारें बन नहीं 
छिटकना है,
पूनम का चाँँद
बन दमकना है। 

नये संकल्पों
में बँधी जिंदगी
तोड़ देगी
नाकामी को।
कर्तव्यनिष्ठा के
आह्वाहन से,
स्वर्ग सा होगा
स्वर्णिम जीवन।।।।।
 

अनोखा बंधन (कहानी)

सास- ससुर के अभाव में नयी-नवेली बहू मृगनयनी के लिए ससुराल के नये परिवेश में नये लोगों के बीच का अनजाना माहौल अनोखी अनुभूतियों से युक्त थी। जेठ-जिठानी ही परिवार के मुखिया थे। उन्हीं की छत्रछाया में परिवार का पूरा कुनबा समाहित था।
मृगनयनी के विवाह की गहमागहमी बीत चुकी थी। एकदिन मृगनयनी की आँखें खुली, तब वह देखती कि उसकी जिठानी उज्ज्वला भाभी जी अपने कामों में जुटी हुई है। झाडू लगाने के बाद जब वह रात के बर्तन घुलने लगी, तब उसका मन सहयोग की आकांक्षा से कुड़बुड़ाने लगा। वह भाभी जी के पास पहुँच कर बोली,"आप बर्तन क्यों धो रही है। थोड़ी देर बाद बुढ़ी अम्मा तो आ ही जायेंगी।"
" कोई बात नहीं, दुलहिन। मैं रोज ऐसे ही धुलती हूँ। यह मेरा रोज का काम है। मैं आज भी धुल लूंगी। "
"मैं हाथ बँटा देती हूँ।"
"नहीं दुलहिन, इसकी कोई जरुरत नहीं है। तुम जाओ दूसरा काम देखो।"
मृगनयनी के बढ़े हाथ रुक गये। मृगनयनी जब भी किसी काम के लिए भाभी जी के पास जाती भाभी जी सदैव उसके बढ़े हाथ को अपने दलीलों से रोक देती थी। सहयोग लेना तो दूर, वह अपने काम में किसी की दखलंदाजी भी पसंद नहीं करती थी। उनका नियमित का काम बँधा हुआ था, जिसे वे करती और फिर तैयार होकर बच्चों के साथ कालेज चली जाती। खाना बनाने का काम ननद रश्मि ही करती थी।
मृगनयनी सोचने लगी कि कामवाली बूढ़ी अम्मा विलम्ब से आती है और आकर अपना पूरा काम निबटाती है। फिर भाभी जी का काम के ऐसे संकल्पों में बंधना उनकी कौन सी मजबूरी थी? यह उनकी अपनी कोई पारिवारिक जिद या स्वयं में ओढ़ी हुई कोई अभिलाषा थी, जिसे वह समझ न पा रही हो।
मृगनयनी जब से इस परिवार का हिस्सा बनी थी तभी से उज्ज्वला भाभी जी के व्यक्तित्व के जादू ने उसका मन मोह लिया था। वह उनके आकर्षण में बँध चुकी थी। भाभी जी सरकारी इण्टर कालेज में अध्यापिका थी।। सादगी, शालीनता व सौम्यता की प्रतिमूर्ति होने के बावजूद कभी-कभी उनकी चंचलता व चुहुलबाजी ऐसी होती, जो सबका मन मोह लेती। एक ही ढ़र्रे पर चलने वाली उनकी तल्लीनता व व्यस्तता उनकी खूबसूरती थी, परंतु आज की घटना से मृगनयनी को जो झटका लगा, उससे उसका दिल तार-तार हो गया। मृगनयनी असमंजस में थी...भाभी जी का यह बर्ताव क्यों?
कुछ ही दिनों बाद मृगनयनी को दूसरा और तीसरा झटका भी लगा। भाभी जी के लिए लायी गई चूड़ियों को जब भाभी जी लेने से इंकार कर दी, तब मृगनयनी को बहुत ठेस लगी।
कितनी अप्रत्याशित व अजीब सी घटना थी। प्रेम भरी भावनाओं से ओतप्रोत सौगात को लेकर वापस लौटती मृगनयनी के दिल और दिमाग के कपाट खुल गये...'हो ना हो, ऐसा कोई जख्म जरूर है, जो भाभी जी को नश्तर की भांति चुभी हुई है, तभी परिवार में उनकी एक अलग छवि थी। वे परिवार में सबसे थोड़ी दूरी बनाकर रहती थी। शायद उन्हें अपने नासूर बने घाव के फूटने का डर सताता हो।'
मृगनयनी दिल से भाभी जी की समीपता चाहती थी, पर भाभी जी उन्हें अपने दिल के करीब फटकने नहीं देती थी। भाभी जी के दिल को जीतना मीठे अंगूर को तोड़ने जैसा था। पर असमर्थता की स्थिति में मीठे अंगूर को खट्टा कहना मृगनयनी को गवारा नहीं था। इसलिए मृगनयनी की दृढ़ता ने पूरे परिवार की परिस्थितियों का अवलोकन करने के लिए स्वयं को तैयार कर लिया। मृगनयनी ने जो समझा, बूझा और अनुभव किया, उसी अनुभव के बलबूते उसकी लेखनी चल पड़ी।
मृगनयनी समझ गई कि पारिवारिक दायित्वों में जुड़ने और उससे मुक्त होने की यह एक ऐसी अनोखी दास्तान थी, जिसमें एक पति-पत्नी को अपने गिरफ्त में जकड़ लिया।
और उन्हें उलझने पर मजबूर कर दिया। शह-मात के इस खेल में कब किसकी जीत होती थी...कहना मुस्किल था। दोनों सशक्त व शिक्षित थे। अतः दोनों की परिवार में उमड़ती-घुमड़ती और बरसती उनकी भावनाओं को समझना जरुरी था,जिसके लिए मृगनयनी ने अपना कदम बढ़ा दिया।
अम्मा-बाबू जी के बाद परिवार को सम्भालने की जिम्मेदारी शाश्वत भाई साहब पर आ पड़ी। तीन बहनें, दो भाई अविवाहित थे। बड़े शशांक भाई साहब अलग रहने के कारण बहुत से जिम्मेदारियों से मुक्त थे। मृगनयनी की शादी भी घर से ही संपन्न हुआ था। अतः अधिकांश जिम्मेदारी शाश्वत भाई साहब और भाभी जी पर ही था। 
मृगनयनी के ससुराल का मकान बड़ा और खपरैल का था।मोटी-मोटी मिट्टी की दीवारों के बने कमरे और दलान के बीच में एक बड़ा सा आँगन था। आँगन के एक तरफ हैंडपम्प तो दूसरी तरफ मिट्टी का चूल्हा था। परिवार बड़ा और संयुक्त था,परन्तु घर में बुजुर्गों का अभाव था। गर्मी के दिनों में शाम का भोजन रसोईघर में न बन कर आँगन में ही बनता था। परिवार वहीं एकजुट होकर रहता और खाता-पीता। खाने के बाद आँगन में ही चारपाई बिछ जाती थी। बीच में लगे पर्दे के एक तरफ शाश्वत भाई साहब का परिवार तो दूसरी तरफ बाकी लोग सोते थे। व्यवस्था में यदि कभी कोई गड़बड़ी दिखती या वह भाई साहब के मनमुताबिक नहीं होती तो भाई साहब नुक्ताचीनी करके उसे अपने मनमाफिक कराते थे, जो मृगनयनी को अजीब लगता था। मृगनयनी की प्रारम्भिक व पहली समझ यही बनी कि इस परिवार के सर्वेसर्वा भाई साहब ही है।
मृगनयनी ने महसूस किया तब वह समझ पायी कि अम्मा-बाबू जी के न रहने पर परिस्थितिजन्य पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ अकेले शाश्वत भाई साहब के कंधों पर पड़ गया। शाश्वत भाई साहब शशांक भाई साहब से छोटे थे। शशांक भाईसाहब का परिवार पहले से ही अलग मकान में रहता था, जिसके कारण उनका परिवार स्वतंत्र और पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त था। दोनों भाइयों का यह अंतर ही उज्ज्वला भाभी जी के चिंताओं का कारण था, क्योंकि बड़ी भाभी जी बंधनों से मुक्त और वे बंधनों से युक्त थी।
शाश्वत भाई साहब के साथ पूरा परिवार बँधा था। जो उनके साथ था, उसकी देखभाल वे पूरी निष्ठा से अपने दम पर झेलना चाहते थे, जिससे परिवार की बागडोर उनकी मुट्ठी में कैद हो गया, तभी उनकी पैनी दृष्टि रसोईघर से लेकर सबके कमरों की गतिविधियों की तरफ घूमती थी। व्यवस्था में गड़बड़ी पर उनकी खोजी नजरें हस्तक्षेप भी करती और हल भी निकालती।
दायित्वों के बोझ के कारण जो उल्झनें, मुस्किलें और परेशानियाँ भाई साहब को झेलनी पड़ती थी, वह शारीरिक, मानसिक और आर्थिक तनाव के रुप में जब कभी-कभी उनमें व्याप्त होती, तब प्रतिक्रिया स्वरूप वह ऐसे भीषण क्रोध का रुप धारण कर लेती थी, जो सबके सहमने व सिकुड़ने का कारण बनती। ऐसे समय में भाभी जी सबसे ज्यादा प्रभावित होती थी, क्योंकि भाई साहब का सारा क्रोध वहीं जाकर और अधिक उबलता, उफनता और फिर बिखरकर  खामोश हो जाता। पर इन पलों में भाभी जी का दिल छलनी न होता हो, यह सम्भव नहीं था।
भाई साहब गुस्सैल थे। सब उनसे डरते भी थे, पर सब रहना भी उन्हीं के छत्रछाया में थे। कड़क स्वभाव के बीच छुपे उनके मन की कोमल भावनाओं की परख सबमें थी और सब उनकी छत्रछाया में अपने को सुरक्षित महसूस भी करते थे।  इस प्रकार दायित्वों को निबाहने की जो चुनौती उन्होंने स्वीकारी थी, उस पर वे जिस तरह खरे उतरे...वह बेजोड़ व सराहनीय था और परिवार को बाँधे हुए भी था। यही कारण था कि बच्चे हो या बड़े सभी उन्हें अपना सबसे बड़ा हितैषी और अपने को सुरक्षित समझते थे।
उज्ज्वला भाभी जी इस सोच से परे थी। भाभी जी को अपना और  अपने बच्चों का भविष्य कुहासों की धुन्ध में जकड़ा महसूस होता, तभी वे अपने को तटस्थ करके इन बंधनों से मुक्त होना चाहती थी, पर भाभी जी इन बंधनों से कभी मुक्त नहीं हो पाती थी, क्योंकि उनकी जिंदगी ऐसे व्यक्ति से जुड़ी थी, जिसे अपने परिवार से जुड़ने में ही खुशी मिलती थी। भाभी जी की एक मजबूरी और थी। उनके मायके में उनकी माँ और छोटी बहन थी। भाई के अभाव के कारण उनका अपनी माँ और बहन से लगाव लाजमी था। पर कभी-कभी यह लगाव भी खींचतान का मुद्दा बन जाता था।
भाभी जी परिवार के विपरीत चीं-चूं न कर पावे इसलिए भाभी जी के स्वतंत्र व स्वच्छंद अधिकार क्षेत्र पर भाई साहब ने डाका डालकर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। ऐसे में कभी-कभी जब भाभी जी को मौका मिलता, तब वे चीं-चूं करके सबकी चूलें हिला देती। पर इस चीं-चूं के कारण ही वे भाई साहब के विश्वास पर खरी नहीं उतर पाती थी। यही कारण था कि भाई साहब उन्हें अपने गिरफ्त में रखते थे। छोटे मोटे क्लेश के दुष्परिणाम के कारण ही उनमें  एकरसता व एकरुपता का अभाव हो गया। और उनके दिलों की दूरियाँ इस मुद्दे पर बढ़ गई। 
सम्भवतः यही कारण था, वरना सभी के मनोभावों व जरुरतों को समझने वाले भाई साहब भाभी जी की छोटी व सीधी बातों पर इतना तल्ख हो जाते कि सुनने वाले अवाक हो जाते। अपनी पाबंदियों के कारण  ही भाभी जी अपनी इच्छा के अनुरूप कुछ नहीं कर पाती थी। वह कर्मठ व जुझारू होते हुए भी अपंग व अशक्त नजर आती थी।
एकदिन मृगनयनी के खरीदे समानों को देखते समय उनके मन की पीड़ा मुखर हो उठी। वे बोली," हमसे तो अच्छी तुम्हीं हो, दुलहिन, जो न कमाते हुए भी अपनी इच्छा की पूर्ति कर सकती हो। मैं तो अपने मन से एक गिलाफ भी खरीदकर नहीं लगा सकती।"
भाभी जी की यह मजबूरी मृगनयनी के दिल को छू गयी। वह सोचती, 'भाभी जी कालेज जाती है, कुछ पलों के लिए वे वहाँ स्वतंत्र है। वहाँ वे दिल खोलकर जी सकती है।' पर नहीं भाभी जी वहाँ भी स्वतंत्र नहीं थी। एकदिन अपनी विवशता के पंख मृगनयनी के सामने खोलती हुई बोली," दुलहिन, मैं तो कालेज में भी विवश हूँ। वहाँ मैं किसी से मन की बातें कहकर हल्की नहीं हो सकती, क्योंकि मुझे वहाँ भी घर जैसा ही बंधनों वाला माहौल मिलता है।"
मृगनयनी समझ गयी कि बड़ी जिठानी और बड़ी ननद के उसी कालेज में अध्यापिका होने के कारण उज्ज्वला भाभी के अधिकार क्षेत्र पर वहाँ भी डाका पड़ा था। वहाँ भी वे सीमित दायरें में कैद थी। वे मन की बातें करती भी तो किससे कहती? जिसके सामने वे मुँह खोलती ...वह कब किसका राजदार बन जाए। , कहा नहीं जा सकता है।
पति-पत्नी के संबंध गूढ़ व गोपनीय होते हुए दो विकल्पों के रुप में मुखरित होते है...समर्पण या विद्रोह। भाई साहब और भाभी जी का सम्बंध दोनों का मिश्रण था। समर्पण के भावना में बँधने के कारण ही उनके विवाह की परिणती प्रेम विवाह के रूप में सबके सामने आया। प्रेम और विश्वास की आसक्ति में डूबे भाभी जी के पग जब ससुराल के यथार्थ माहौल में कदम रखा, तब उन्हें अपने भविष्य के नवनिर्मित उम्मीदों के परखच्चे उड़ते नजर आये।
अतः विचारों की भिन्नता उजागर होते ही वे आपसी विद्रोही बन गये। वे सभ्य व शिक्षित थे, इसलिए उनका विद्रोह तू-तू, मैं-मैं के रुप में बरसता नहीं था। ऐसे में दोनों में एक खाशियत व सहूलियत दिखती। क्रोध रुपी भड़ास से जब एक बरसता था, तब दूसरा जलती हुई उन बूंदों को समेटने वाली धरती बनकर उन बूंदों को अपने अंतर पटल पर समाहित करके खामोश रहता और अपनी दिनचर्या में लीन हो जाता। इस प्रकार गरजने-बरसने की प्रतिक्रिया जल्दी ही शिथिल पड़ जाती। इसके बाद उनके मन की शेष मौन ठसक कब और कितने दिनों तक एक दूसरे पर हाबी रहता और कब वे मान जाते , यह दूसरा समझ नहीं पाता था।
भाभी जी अक्सर कहती थी,"ये मुझे पहले ही ठोंक बजाकर परख चुके थे, तभी मुझे इस परिवार का हिस्सा बनाये ताकि मैं सभी कुछ झेलकर इनके साथ खड़ी रह संकू।"
भाभी जी प्रतिभा संपन्न महिला थी। हँसने-हँसाने में दक्ष, गीत-संगीत में माहिर और पढ़ने-पढ़ाने में अव्वल...पर पारिवारिक माहौल व परिस्थितियों को अपने अनुकूल ढ़ाल न पाने की विवशता ने उन्हें कुण्ठा के आवरण में जकड़ लिया। जिसके कारण भाभी जी के स्वयं के जिद ने उन्हें धीरे-धीरे इतना समेट लिया कि वे सीमित दायरें में कैद हो गई। भाभी जी ने स्वयं अपने को कैद परिंदा बना लिया, जो पंख फड़फड़ाती थी पर उड़ती नहीं थी। जिंदगी की सारी खुशियाँ, दुख व दर्द को वे अपने सीने में  जब्त करके भाभी जी ने अपनी उम्मीदों को अपने बच्चों और कालेज में समेट लिया।
दिन बीतते गये। जीवन के अपरान्ह बेला में ननद-देवर की जिम्मेंजारियाँ समाप्त होते ही उनके अपने बच्चों की जिम्मेंजारियाँ बढ़ गई। बच्चों के प्रति दोनों सतर्क व जागरूक थे। बच्चों के प्रति अपने दायित्वों को निभाने की चाह में ऐसे बहुत से मौके आये जिन्हें भाई साहब खूबसूरत लम्हों का जामा पहनाने की कोशिश में लगे रहे, पर ऐसे अवसर पर भी व्यवस्था की चाभी उन्होंने अपने ही हाथ में रखा। भाभी जी ने अपना अंदाज और अपनी परम्परा नहीं बदला। अपनी सोच में बँधने के कारण वे बच्चों के लिए जीती और मरती थी, पर बच्चों पर वह अपना वैसा अधिकार नहीं जता पाती थी या जमाना नहीं चाहती थी जो एक माँ का अपने बच्चों पर होता है। यही कारण था कि बेटियों की शादी में बेटी का लँहगा और साड़ियाँ भी भाई साहब अपनी और बेटियों के पसंद की ही खरीदे। ऐसे सुनहरे मौके पर भी भाभी जी अपनी उमंग, उत्साह व ललक न छलकाकर मशीन की भांति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में ही तत्पर व तल्लीन रहकर अपने को पूर्णता से अभिभूत करती थी।
समय अविराम गति से आगे बढ़ती रही। जीवन  की गौधूली बेला में जब भाई साहब के मन के एहसास ने करवट बदली, तब उन्हें अपने वैवाहिक जीवन के प्रारम्भिक क्षणों के भूल का एहसास हुआ और पछतावा भी हुआ। तब ऐसे समय में वे अपने सम्बन्धों को मधुर व कोमल बनाने के प्रयास में जुट गये। वे भाभी जी के घायल मन पर मलहम लगाने की पुरजोर कोशिश में लगे रहे।
जिंदगी का यह एक ऐसा मोड़ था, जब भाई साहब ने अपने को पूरी तरह बदल लिया, पर भाभी जी अपनी सोच से एक इंच भी खिसकना नहीं चाहती थी। तभी ऐसे नाजुक घड़ी में जब वह अपने नासूर बने पुरानी टीस की बखिया उघेरती और बिफरकर अपनी भड़ास निकालकर माहौल को गरम बना देती तब भाई साहब के अरमानों पर पानी पड़ जाता और वे क्षुब्ध हो जाते।
भाभी जी की बगिया में फिर बहार आ सकती है, इसकी कल्पना कभी भाभी जी ने की ही नहीं, क्योंकि उन्होंने अपने उमंगों के फूल को इतना मुरझा दिया कि समय अंतराल के बाद मिलने वाला खाद-पानी भी उन्हें इतना सक्रिय व जीवंत नहीं कर पाया कि वे अपने मुरझाए फूल को खिला पाती।
दोनों की थोड़ी नासमझी के कारण ...एक दूसरे को प्यार करते हुए भी उनका प्यार ...हनक-ठसक, गुरुर और क्रोध के नीचे दब जाता था। जिससे दोनों एक दूसरे के लिए सुकून के पल ढ़ूढ़ नहीं पाते थे। वे अनोखे व अजूबे प्यार में इतने रचे-बसे थे कि अपनी ठसक के चलते न तो उन्हें आंतरिक खुशी मिली, न सुखी जीवन की सुखद अनुभूति को दिल खोलकर वे अनुभव ही कर पाये और न खुशहाल, स्वंछन्द और चहकने वाले पारिवारिक माहौल का निर्माण ही करा पाये।
पारिवारिक दायित्वों को निबाहना और न निबाहना अब एक गौण क्रिया हो गयी। अतः इस कहानी का मूल मुद्दा  अब यह नहीं रह गया। मूल मुद्दा अब पहले की स्थिति से खिसककर इस बिंदू पर केंद्रित हो गया कि पति-पत्नी  में एक का वजूद दूसरे के कारण कब, कितना, कैसे, किन परिस्थितियों में किस हद तक एक दूसरे को प्रभावित करता है, जिसके कारण उनके जीने के मायने  और मकसद ही बदल जाता है, जिससे उनका वजूद  उनका न होकर किसी और के नाम गिरवी रखा जाता है।
जिंदगी आगे बढ़ी तो खपरैल का मकान पक्के और आलिशान मकान में तब्दील हो गया। परिवार के सदस्यों को ज्यों-ज्यों मंजिल मिलती गई, वे पारिवारिक कुनबे से दूर छिटकते गये। अतः अंत में बचे भाई साहब व भाभी जी। जब परिवार के सदस्य थे, तब तकरार के मुद्दे थे, अब जब सिर्फ दो थे तो दोनोंएक दूसरे के पूरक बन गए।
अब भाई साहब का अधिकांश समय भाभी जी के समीप ही गुजरता था। वजूद के उठापटक के बावजूद उनका आपसी प्रेम इतना अटूट व गहरा था कि भाई साहब पत्नी को गुड़ समझकर सदैव चींटा की भांति उस पर मड़राते हुए छाये व घेरे रहते थे। कभी पल भर को भी स्वतंत्र छोड़ना नहीं चाहते थे।
भाई साहब अपनी इच्छा के अनुरूप सारी खुशियाँ भाभी जी पर न्योछावर करना चाहते थे। चाहे वह उन्हें स्वीकार हो या न हो। प्यार थोंपने की चीज नहीं, बल्कि एक दूसरे की पीड़ा, दर्द और भावनाओं को समझने और कद्र करने का नाम होता है। इस कमी के कारण दोनों के तार बहुत करीब होते हुए भी वैसे नहीं जुड़ पाये जैसे उन्हें जुड़ना चाहिए था।
भाई साहब का स्वभाव चाहे जो हो, पर उनमें जो अच्छाइयाँ या संरक्षण के भाव थे, उसे भाभी जी समझती थी, तभी वे उस सहारे और संबल के अधीन अपना पूरा जीवन निर्वाह करना चाहती थी। एक बार उन्होंने दामाद अमित जी से कहा था,"जानते है भैया, मैं पहली बार इनके साथ घुमने गई, तो तेज चाल के कारण ये भीड़ में गायब हो जाते थे। उस समय मेरी निगाह इनके कालर पर टीकी रहती थी। उस दिन जो मैं इनके पीछे चली तो आज भी वैसे ही इनके पीछे चल रही हूँ।"
भाई साहब के इच्छाओं की अग्नि में अपनी इच्छाओं को स्वाहा करके भाभी जी ने जिस दृढ़ता से उनका साथ निभाया, उससे भाई साहब उनके कायल हो गये। एकदिन वे मृगनयनी से बोले," तुम्हारी भाभी जी आज भी जितनी कर्मठ है...उसका अंश मात्र भी तुम लोग नहीं हो। मैंने जिंदगी में जो कुछ भी किया...वह इनके सहयोग व स्वीकृति से किया। यदि ये मेरे साथ खड़ी नहीं होती,तो मैं कुछ नहीं कर पाता।"
मृगनयनी आश्चर्यचकित हो भाई साहब के बदले रुप को निहारने लगी। उसे खुशी मिली कि भाभी जी के अच्छाइयों को भाई साहब ने तहें दिल से स्वीकार कर सबके सामने व्यक्त करके वह किया जो उनके स्वभाव के विपरीत था। पर भाभी जी में कोई परिवर्तन या चमक नहीं दिखा। वक्त बीतने पर मिलने वाला यह उपहार शायद उनके लिए उतना उत्साहवर्धक नहीं था जितना होना चाहिए।
भाभी जी शिक्षित व दृढ़ संकल्पों वाली नारी थी। वे भी एक पुरुष के क्रोध के नीचे ऐसे दब गयी कि उनका मनमयूर अपनी मर्जी से पंख फैलाकर अंगड़ाई भी नहीं ले पाया। नारी की सहिष्णुता ही नारी की महानता होती है। भाभी जी की सहनशीलता व शालीनता के मध्य छुपे विवशता व अधीनता की पीड़ा को महसूस करने वाली मृगनयनी यह समझ नहीं पाती कि वह भाभी जी के कृत्य को क्या समझे और किस श्रेणी में रखें।
मृगनयनी इस परिवार की हिस्सा थी। उसके पति के रगों में वही खून बहता था, जो भाई साहब के खून में था। कभी-कभी या यूं कहे अक्सर उसे भी उन्हीं परिस्थितियों से गुजरना पड़ता था जिससे भाभी जी गुजरती थी। भाभी जी को देखकर मृगनयनी को एक सीख मिली। वह अपना वजूद निचोड़ या सिकोड़कर किसी के पास ऐसा गिरवी रखने के विपरीत थी, जिससे उसका खुद का अस्तित्व निरीह व निष्क्रिय बन जाए। वह सोच को इतना बलिष्ठ व सामर्थ्य बनाने के पक्ष में थी कि वह दिन रात के अंतर को समझ सकें। मृगनयनी ने इस सिद्धांत को अपनाकर अपनी सोच को एक नये मुकाम पर पहुँचाया।
जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर जब वे एक साथ थे तब सहयोग व सानिंध्यता के बलबूते अपने एकांत पलों में वे सिर्फ एक दूसरे के लिए जीएं। परंतु एक समय ऐसा आया जब शरीर ने बीमारियों से और मन ने चिंताओं से उन्हें मजबूर व अशक्त कर दिया। तब वे अपने अकेलेपन के असहनीय व बोझिल पलों को जीवंत करने के लिए अपना पारिवारिक कुनबा छोड़कर अपने बच्चों में अपनी खुशियाँ ढ़ूढ़ने बच्चों के पास आ गये। वे परिवार के मुखिया थे कभी उनका कुनबा सदस्यों से भरा था, जिसके कारण रौब व रुआब था।अकेलेपन के कारण उन्हें अपना कुनबा छोड़ना बहुत कष्टकारी लगा।
भाई साहब को कैंसर ने घेर लिया। भाभी जी को जब पता चला कि भाई साहब के कैंसर का आखिरी पड़ाव है,तब परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढ़ालने की उनकी दृढ़ता इस प्रकार मुखर हुई। वे मृगनयनी से बोली," दुलहिन, जिंदगी के इस विकट व असहनीय पीड़ा को सहने के लिए मैंने मन को कड़ा करके खुद को तैयार कर लिया है।
भाभी जी के कथनी और करनी के अंतर्द्वंद में जमीन आसमान का अंतर नजर आया। वे अपने मन की उथल-पुथल, कुड़बुड़ाहट व प्रबल इच्छा शक्ति को उर्जावान बनाकर एक निश्चित मुकाम पर पहुँचाने की ख्वाहिश रखती थी, जो उनके मन की मुराद पूरी कर सकें।
जिंदगी ने भाभी जी को जो दिया, उसे वे जी ली...पर जिंदगी के आखिरी पल का हार उन्हें कत्तई स्वीकार नहीं था। उनकी सुप्त व सिमटी भावनाएं अंदर ही अंदर धधककर दृढ़ इच्छाशक्ति रुपी ज्वालामुखी के समान फूट पड़ी। मौत को तो एक बहाना चाहिए था। कुदरत ने वह बहाना भाभी जी को दे दिया।
भाभी जी महसूस कर चुकी थी कि भाई साहब घातक बीमारी के सहारे आगे बढ़ रहे है, तब उन्होंने उनसे आगे जाने की होड़ में अपने शरीर को ऐसा अशक्त व कमजोर बना दिया कि वे खुद को सम्भाल नहीं पायी और बाथरूम में अचानक गिर गई। बाथरूम में गिरना तो एक बहाना था। उन्हें भाई साहब के पहले और भाई साहब के सामने विदा होना था...इसलिए वे चली गई... इस मायावी-मायाजाल वाली दुनियाँ, पति-बच्चों और परिवार को छोड़कर...।
अंत समय में भाभी जी की इच्छा पूरी हो गई। जीते जी शिकस्त के दामन में लिपटी भाभी जी को मौत ने जीत का सेहरा पहना दिया। एक अशक्त नारी ने सशक्त नारी का चोला चोला पहने कर दमकती नूर के साथ अपनी जिंदगी को विरामज लगाकर अपना परचम फहरा दिया।
भाभी जी के मौत के आगोश में समाहित होने की घटना अप्रत्याशित, अनहोनी व अचानक हुयी थी। इस घटना से भाई साहब ठगे रह गये। उन्हें भाभी जी द्वारा दी गई शिकस्त बर्दाश्त नहीं हुई। उनकी आत्मा इस सदमें को स्वीकार नहीं कर पा रही थी। वे बिलकुल टूट चुके थे। अकेले पन का कोई साथी नहीं था। वे कहाँ रहेंगे... इस चर्चा ने उन्हें तोड़ दिया। इसके बाद पारिवारिक सदस्यों की टोली जब धीरे-धीरे खिसकने लगी, तब उनकी आत्मा को जोरदार करारा झटका लगा। उन्हें महसूस हुआ कि जिस पारिवारिक प्रेम के लगाव में डूबे हुए उन्होंने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय को लगाया था और वही उन्हें जीवनभर के लिए पत्नी का गुनहगार बना दिया...उसी पारिवारिक सदस्यों के पास उनकी पीड़ा को बाँटने के लिए दो-चार दिन का समय भी नहीं है। इस समय उनकी पीड़ा को समझने वाला यदि कोई था, तो वह थी...उनकी छोटी बेटी शुचि। मृगनयनी के साथ शुचि भी लौटने वाली थी, पर पिता के दर्द को आखिर उसकी आत्मा ने समझ लिया। तभी वह मृगनयनी के साथ वापस न जाकर वही रुक गई।
 एक-एक करके जब पारिवारिक सदस्य खिसक गये, तब उनके पास बचे सिर्फ उनका छोटा बेटा और छोटी बेटी शुचि। दिल के घाव नासूर बन चुके थे। सदमें की दोहरी पीड़ा जो उन्हें इस दौरान झेलनी पड़ी उससे वे उबर नहीं पाये और वही उन्हें ले ड़ूबी। शून्य में ताकती उनकी निराश निगाहों को तब एक ही उम्मीद की चमचमाती किरण दिखी..वह थी उनकी जीवनसंगिनी... उज्ज्वला... मृगनयनी की उज्ज्वला भाभी जी।
जीत की, समर्पण की, और सहूलियत की जो भावना व लगन भाई साहब में छुपी थी, जिसके कारण भाभी जी की दूरी उन्हें पलभर को भी स्वीकार नहीं था...समर्पण की उसी भावना के तहत अपने अनोखे बंधन की अमर गाथा को रचने के लिए वे भाभी जी का वियोग बामुश्किल आठ दिन का ही झेल पाये। उसके बाद वे रुके नहीं...वे भी चले गये... अपनी अर्धांगिनी के पीछे-पीछे...अपनी जीवन सहचरी के पास...।

अकेलेपन का एहसास (कहानी)

अकेलेपन का दर्द महसूस करने वाला व्यक्ति ही इस  कष्टकारी पल के प्रति अपने अनुभव को व्यक्त कर सकता है। पर ऐसा जीवन जीने वाला व्यक्ति भी खुलकर इसके विरोध में मुँख खोलना नहीं चाहता है, क्योंकि मुँह खोलने पर जो शब्द निकलेंगे.. वह उसके अपनों को ही चुभेंगे। इसलिए संस्कारों में बँधा व्यक्ति अपनों को पीड़ा पँहुचाने वाले शब्दों का प्रयोग खुलकर नहीं करता। इसलिए ऐसी पीड़ा संदुचकी में बहुमूल्य धरोहर की ही तरह बंद रहती है। जो व्यक्ति के मौत के बाद खुलती है, पर दबे-छुपे फुसफुसाहट वाले जबानों में।
कालोनी के पड़ोस में अकेले रहने वाली धन्नों अर्थात धनवंतरी देवी का हालचाल जानने के लिए कामिनी बेचैन रहती थी। वह धन्नों के घर जब मन करता, तब ही चली जाती थी। वह तो धन्नों के पति राममोहन जी के जीवित रहते समय भी जाती थी और बोल-बतियाकर वापस आ जाती।
समय का फेर ही तो है, जो भरापूरा परिवार होने के बावजूद भी पति के बिना धन्नों के जीवन में ऐसा मोड़ आ गया, जब धन्नों स्वयं में नितांत अकेली हो गई। धन्नों बच्चों के पास रहने गई थी, पर जल्दी ही वापस आ गयी। कामिनी सोचने पर मजबूर हो गई कि धन्नों बच्चों के पास उनके किसी व्यवहार से दुखी होकर टिक नहीं पायी या उन्हें अपने घर की स्वतंत्रता खींच लाई। कामिनी जानती और समझती भी थी कि आजकल के बुजुर्गों के पुरानी और उनके बच्चों की नई पीढ़ी में अंतर आ गया है। आधुनिकता के नये दौर में बहने वाले बेटा-बहू अपने माँ-बाप से वह सामंजस्य नहीं बैठा पाते, जिसकी उम्मीद में बुजुर्ग वर्ग अब तक आश्वस्त था। और अब स्वयं बुजुर्गों की मनोस्थिति भी ऐसी हो गई है कि वे अकेले अपना स्वतंत्र जीवन जीना चाहते है, पर बच्चों के अधीन रहना नहीं चाहते। इसलिए वे अपने घर में अपने को ज्यादा सुरक्षित महसूस करते है। 
कामिनी इतना जानती थी कि परिस्थितियां चाहे जो हो, पर अकेला व्यक्ति तो अकेला ही होता है, इसलिए उसे सहयोग, सांन्त्वना और सहानुभूति की नितांत आवश्यकता होती है। यही सोचकर कामिनी गाहेबगाहे धन्नों के यहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज करा देती थी।
धन्नो अपने पति के साथ अपने मकान के नीचले हिस्से में रहती थी। उपर दो किराएदार थे। एकदिन पति की तबीयत बिगड़ने पर धन्नो अपने दोनों बेटा को फोन की, बोली," बेटा, तुम्हारे पापा की तबीयत दिन पर दिन बिगड़ती ही जा रही है। अब सम्भाले सम्भल नहीं रहा है। तुम लोग जल्दी आ जाते तो ठीक था।"
बड़ा बेटा अनूप विदेश से बोला," अम्मा, घबड़ाओ नहीं। हम आने की कोशिश कर रहे है। मैंने चाचा को फोन कर दिया है। वे आप लोगों के पास शीघ्र ही पहुँच जायेंगे। छोटे भी जल्दी ही वहाँ पहुँच जायेगा।"
राममोहन जी के बीमारी में धन्नो के देवर अपनी पत्नी के साथ आ गये। अस्पताल के दौड़ा-दौड़ी के बावजूद भी राममोहन जी को बचाया नहीं जा सका। 
राममोहन जी के मौत के समय पूरा परिवार एकजुट हो गया। विदेशी बेटा विदेश से, दूसरा बेटा मुम्बई से और लड़की दिल्ली से आ गये थे। सभी बाल बच्चेदार थे, अतः उनके साथ उनके बच्चे भी थे। बच्चों के एकजुटता और चहल-पहल से आह्लादित होने वाला धन्नो का मन ऐसे समय में सिमट-सिकुड़ कर पीद्दी सा हो गया था। यदि यही परिवार राममोहन जी के जीवित रहते इकट्ठा हो जाता, तो आज राममोहन जी की आत्मा तृप्त होकर इस संसार से विदा हुई होती।
अकेले रहने वाले धन्नो और राममोहन जी इस कल्पना से कितने प्रफुल्लित होते थे कि कब वह मौका आयेगा, जब पूरा परिवार उनके आँखों के सामने होगा। राममोहन जी तो इन सपनों के भँवरजाल में डूबते-उतराते ही चले गये। पर धन्नो जो इस मंजर को चुपचाप देख और झेल रही थी..वह भी खामोश थी। लेकिन धन्नो आज मन ही मन में इस बात पर संतुष्ट थी कि चलो बच्चों ने इस दुखद बेला में अपनी उपस्थिति दिखलाकर उनकी नाक तो समाज के सामने उँची करके बचा ली।
राममोहन जी का क्रियाकर्म भली भांति सम्पन्न हो गया।
विदेश वाला बेटा जल्दी ही, मुम्बई वाला बेटा गाँव में होने वाली पूजा के बाद सपरिवार चले गये। बेटी माँ के साथ ही रहना चाहती थी, पर ससुराल में सास की तबीयत बिगड़ने के कारण वह भी ससुराल चली गई। धन्नों अपने देवर-देवरानी के साथ समय व्यतीत करने लगी। ऐसे विकट समय में भी धन्नो काफी दुखी होने के बावजूद अपने हिम्मत को हारने नहीं दी। बेटा-बहू फोन पर समझाते थे,"अम्मा, परेशान मत होना। हम बीच-बीच में आते रहेंगे। बस अपना अच्छे से ख्याल रखना।"
दुखों का पहाड़ झेल रही धन्नो कुछ कह नहीं पाती थी। सुबह-शाम माँ का हाल लेने वाले बेटों के सांत्वना ने धन्नों के मन को आश्वस्त तो किया, पर उसके दुखती रग पर मलहम नहीं लगा सका। 
कामिनी बीच-बीच में धन्नो का हालचाल लेने धन्नों के यहाँ धमक ही जाती थी। कामिनी जब भी धन्नो के घर जाती, वह धन्नो को व्यस्त ही पाती। पति के अनुपस्थिति में बीमार रहने वाली धन्नो के हौसला से कामिनी काफी प्रभावित थी। जबकि धन्नों अपने कमरदर्द, घुटने के दर्द से अत्यधिक पीड़ित थी। 
इसी बीच कोरोना वायरस के कारण  लॉकडाउन की घोषणा हो गयी। ऐसे एकाकीपन में धन्नों की कामवाली ही धन्नों की एकमात्र सहारा वाली विकल्प थी। उसने कोरोनाकाल के लॉकडाउन जैसे विपरीत परिस्थितियों में भी धन्नों का साथ नहीं छोड़ा था। जबकि ऐसे विकट समय में धन्नों के देवर व देवरानी अपने घर जा चुके थे।
 लॉकडाउन के विषम परिस्थितियों में जो जहाँ था, वहीं का होकर रह गया। कामिनी भी अब उतनी स्वतंत्रता से धन्नों के घर जा नहीं पाती थी, जितनी स्वतंत्रता से वे पहले जाती थी। कामिनी को धन्नों का एकाकीपन खलता था। तभी तो एकदिन हिम्मत करके वह धन्नों के घर पहुँच गयी। धन्नों बच्चों के बारे में इतना बतायी कि बच्चे बहुत चिंतित रहते है। वे प्रतिदिन शाम को फोन करके कुशलक्षेम पूछ लेते है। धन्नों बतायी कि बहू का फोन आया था। बहू कह रही थी,"मम्मी जी, आप पेपर बंद कर दीजिएगा। और हाँ, कामवाली को भी बुलाइयेगा तो केवल एक समय के लिए ही, क्योंकि ये कामवालियां ही कोरोना वायरस फैलाने में अपनी अहम् भूमिका निभायेंगी। इसलिए इनसे दूर रहिएगा। और ऐसे समय में कहीं बाहर भी नहीं निकलिएगा।"
धन्नों कामिनी से बोली," बहू के इतने निर्देशों के बाद भी मैंनें न तो पेपर बंद किया और न अपने काम वाली को। पेपर जब तक अपने आप बंद था, तब तक ही नहीं आया, फिर तो आने लगा।"
"ठीक किया आपने, जो इन्हें बंद नहीं किया।" कामिनी धन्नों को आश्वस्त करते हुए बोली।
"अरे, ये दोनों ही तो मेरे अकेलेपन के साथी है। इन्हें बंद करके मैं अपने पैर में कुल्हाड़ी नहीं मार सकती थी। मैंने बहू का कहना नहीं माना।"
" जो समझ में आये, आप वही कर सकती है। आप मेरे घर भी निसंकोच आ सकती है।" कामिनी बोली।
"आप तो जानती ही है कि दर्द के कारण मैं वैसे ही कम निकलती थी। इनके दोस्त रोज आते थे। बैठते बाते करते थे। नाते-रिश्तेदार भी गाहेबगाहे आ जाते थे। पर अब सबका आना बंद है। क्या करु। समय तो बिताना ही है।"
 समय बीतता रहा। एकदिन ढ़ेर सारे बड़े-बड़े अचार के जार को धूप दिखाने वाली धन्नो से कामिनी ने पूछा," भाभी जी, आप तो अचार खाती नहीं है। फिर इतने अचार का क्या करेंगी?"
"अरे, मैं अपने लिए अचार कहाँ बनाती हूँ। बच्चे आते है तो अचार, पापड़, चिप्स ले जाते है, तो बड़ी खुशी मिलती है। उन्हीं के लिए ही तो बनाती हूँ। तुम समझ सकती हो, इन बहुओं को अचार बनाने जैसे झंझटों से कितनी खुन्नस है। मैं न बनाऊं तो बच्चे इस पुरानी पारिवारिक परम्परा से कितने दूर हो जाऐं। यही तो नई और पुरानी परमपराओं को जोड़ने की डोर है। मेरे बच्चे तो शुरू से इन्हें खाने के शौकीन रहे है। उनकी तृप्ति में ही मेरी खुशी निहित है।"
"यह तो ठीक व सराहनीय है। पर आपके प्रति उनकी निष्ठा भी इतनी ही जवाबदेही होनी चाहिए, आपने कभी इसपर विचार किया है?"
"अरे, सोचकर क्या करुंगी। जो सामने है, उसी को झेलने में संतुष्टि खोजनी है।"
" आप बच्चों के पास चली क्यों नहीं जाती है?" कामिनी धन्नों को समझाते हुए बोली।
"अरे, मेरे लिए किसी के पास समय ही कहाँ है? जब वहाँ भी एकाकीपन ही झेलना है, तो यहाँ अपने मन की आजादी,सुकून व शांति तो ज्यादा है। जिंदगी भर अपनी मनमानी चलाने के बाद अब बंधन स्वीकार नहीं होता है।" धन्नों कामिनी को समझाते हुए बोली।
"फिर तो बच्चों का कोई दोष नहीं है।"
"अरे मैं कब कह रही हूँ कि बच्चे दोषी है? ये तो आपसी समझ है। जैसा जीवन मिले, उसे संतुष्टि से जीते जाना चाहिए।"
कामिनी उस दिन ठगी सी रह गई, जब वह धन्नों का गेट खोलकर अंदर आयी तो देखती है धन्नों जूते-चप्पलों के ढ़ेर के सामने बैठी उन्हें कपड़े से पोछकर सहेज रही थी। कामिनी को सामने पाकर वे बरबस बोल पड़ी, बोली," बच्चे जूते-चप्पल छोड़कर चले जाते है। भुकड़ी लग रही थी। उसी को साफ करने बैठ गयी।"
"धन्य है, आप। आपका पुत्रों के प्रति प्रेममोह देखकर मन द्रवित हो जाता है।" 
"क्या करु? यदि ये सब न करु तो समय काटना कठिन हो जाता है। बच्चों का सामान सहेजने से लगता है, उन्हें ही सँवार रही हूँ। जैसे वे मेरे पास ही है।"
कामिनी धन्नों को हमेशा जागरूक और जीवंत ही देखती थी। कभी उनकी आँखों में आँसू की कोई बूंद टपकती हुई  नहीं दिखी। मन के कोलाहल को वे मन में ही दबाएं कभी पेड़ों में पानी डालते दिखती , तो कभी गमलों को ठीक करती रहती।
पर उस दिन धन्नों बेचैन और दुखी थी, जब बेटी के ससुर के मृत्यु के शोक में ड़ूबी बैठी थी। उस दिन उनकी व्यथा बता रही थी कि आज वह कितनी अकेली और अशक्त हो गयी है, जो बेटी के दुख के समय बेटी के पास पहुँच भी नहीं पा रही थी। पहले वे अकेले कहीं भी आ जा सकती थी, पर इस कोरोना काल में सब अपने लोकल रिश्तेदार भी दूर हो गये थे। मन छटपटाकर उनका रह गया था।
 एकदिन वे बोली,"अबकी हमनें पेड़ का आम भी किसी के घर नहीं भेजा। सबने कह दिया अबकी जाने दीजिए। कौन जायेगा आम लेने। एक देवर बोले थे,'भाभी जी बाहर ही झोले में रख दीजिएगा। बेटा को भेज दूंगा। वही लेता आयेगा।' मैंने वैसा ही किया।"
"ठीक किया आपने।"  कामिनी कुछ देर बैठकर बातें की, फिर लौट आयी।
एकदिन तो धन्नों बहुत दुखी थी। वे बोली," मेरे जेठ की लड़की का फोन था। कह रही थी घुटने में काफी तकलीफ है। आपरेशन करवाने की सोच रही हूँ। इसलिए लखनऊ आना चाहती हूँ। मैंने मना कर दिया था कि लखनऊ की हालत खराब है, डॉक्टर मिल नहीं रहे है और यहाँ कोई दौड़ धूप करने वाला भी कोई नहीं है। दो दिन बाद उनके मौत की खबर आ गई। मुझसे तो दो दिन खाया भी नहीं गया।" यह सुनकर। कामिनी धन्नों को समझाती रही।
एकदिन अपनी संदुचकी खोले नन्हें नन्हें कपड़ो को सहेजती, चूमती और गले से लगाती भावविह्वल धन्नों का रुप देखकर कामिनी को खुन्नस आ गया। वह आग्नेय नजरों से धन्नों को घूरने लगी, जो माँ अपने बच्चों की यादों को इतने प्रेम से सहेज कर रखी है, वह अपने बच्चों को कितने प्यार से पाली होंगी। अतः वह चिड़चिड़ाती हुई बोली,"धन्नों, इन पुराने कपड़ों में क्यों सर खफा रही हो? इनसे बाहर निकलो। जिन बच्चों को तुम्हारी चिंता नहीं, उनकी यादों को सहेजने से क्या फायदा?" 
धन्नों कामिनी को शांत नजरों से घूरती हुई बोली,"कह तो तुम ठीक ही रही हो। अब आखिरी बार इन्हें सम्भाल रही हूँ। जीवन का क्या भरोसा? थक गई हूँ बहुत, इसलिए अब विश्राम करना चाहती हूँ।"
एक अकेली माँ जीवन के सांध्य बेला में भी बच्चों के प्रति समर्पित रहती है, वहीं बच्चे माँ की उन भावनाओं की कद्र भी नहीं कर पाते, जो माँ अपने तरीका से सोचती और जीना चाहती है।
एकदिन धन्नों के बॉथरुम में फिसलकर गिरने की खबर सुनकर कामिनी दौड़ती-भागती धन्नों के घर पहुँच गयी। धन्नों के किराएदार धन्नों को अस्पताल में भर्ती करवा दिए थे। बच्चों को खबर हो गई। मुम्बई वाला बेटा और दिल्ली से बेटी आ गई। होश में होने पर धन्नों कामिनी से बोली," बच्चों को मेरी कितनी चिंता है? एक ही खबर पर आ गये। बड़ा वाला भी विदेश से आ जाता, तो सबको नजरभर देखकर पूरी शांति से विदा हो जाती।"
विदेशी बेटा की राह देखती धन्नों इस दुनियाँ से विदा हो गई। वह आया, पर धन्नों के जाने के बाद। धन्नों का घर एक बार फिर गुलजार हो गया। धन्नों की अंतिम विदाई बच्चों ने अपने सामर्थ्य के अनुसार बड़े शान से किया। नये-पुराने के बीच की कड़ी टूट गई। 
धन्नों के एकाकीपन की एकमात्र सहयोगी कामिनी आज धन्नों के घर से दूर ही थी। उन्हें धन्नों के घर का चहलपहल रास नहीं आ रहा था। जब धन्नों को बेटा-बहू के समीपता और सहयोग की जरूरत थी, तब उनके आँसूओं को पोछने वाला कोई उसके पास नहीं था, पर आज सभी के सभी उनकी आत्मा के शांति या यूं कहे कि अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए एकत्र होकर धार्मिक अनुष्ठान को संपन्न कराने में जी जान व तल्लीनता से जुटे है।
कामिनी इस दिखावे से अपने आप को दूर ही रखीं। वे दूर सड़क पर से ही धन्नों को विदा होते हुए देखती रहीं, फिर वहीं से अपनी सच्ची श्रद्धांजलि देकर धन्नों के आत्मा के शांति की कामना करके अपने घर लौट आयी।